Prabhasakshi Exclusive: Niger में जो कुछ हुआ उसके पीछे असल कारण क्या थे? क्या वहां कोई भारतीय भी फँसा हुआ है?

By नीरज कुमार दुबे | Aug 05, 2023

प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क के खास कार्यक्रम शौर्य पथ में इस सप्ताह हमने ब्रिगेडियर श्री डीएस त्रिपाठी जी (सेवानिवृत्त) से जानना चाहा कि नाइजर में तख्तापलट हो गया है, सेना का सत्ता पर कब्जा लोकतंत्र और पश्चिमी अफ्रीका में अमेरिकी हितों के लिए झटका क्यों माना जा रहा है? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि पश्चिमी अफ्रीकी देश नाइजर में तख्तापलट के बाद सैन्य शासन लागू है। राष्ट्रपति मोहम्मद बजौम को अपदस्थ कर दिया गया और उनके ही सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें बंदी बना लिया। उन्होंने कहा कि तख्तापलट करने वाले नेताओं ने 28 जुलाई, 2023 को जनरल अब्दुर्रहमान त्चियानी को नया राष्ट्र प्रमुख घोषित किया जबकि अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को बहाल करने की मांग की है।

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ब्रिगेडियर श्री डीएस त्रिपाठी जी (सेवानिवृत्त) ने कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित राष्ट्रपति अब भी नजरबंद हैं। नाइजर दुनिया के सबसे कम विकसित देशों में है जहां पर उच्च गरीबी दर और अस्थिरता तथा तख्तापलट का इतिहास रहा है लेकिन हाल के वर्षों में यह क्षेत्र का अपेक्षाकृत स्थिर देश के रूप में उभरा है और पड़ोसी माली में 2012 में तख्तापलट के बाद से फैले आतंकवाद और हिंसा से निपटने में पश्चिमी देशों का साझेदार रहा है। सिर्फ दो साल पहले नाइजर ने अपने इतिहास में पहली बार लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार द्वारा सत्ता का हस्तांतरण निर्वाचित राष्ट्रपति को किया था। उन्होंने कहा कि तख्तापलट का क्षेत्र पर भी बड़ा प्रभाव पड़ा है। पड़ोसी माली और बुर्किना फासो पूर्व औपनिवेशिक ताकत फ्रांस और सामान्य रूप से पश्चिम से अलग हो गए हैं और रूस की ओर बढ़ गए हैं। उन्होंने कहा कि एक अन्य पड़ोसी चाड लोकतांत्रिक सरकार को सत्ता हस्तांतरित करने की समस्यागत कोशिश में संलिप्त है। इन देशों के विपरीत नाइजर साहेल क्षेत्र से जिहादी हिंसा का खात्मा करने की अंतरराष्ट्रीय कोशिश में गतिशील असैन्य सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहा है। उन्होंने कहा कि तक कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला है कि नाइजर का नया सैन्य नेतृत्व इस संदर्भ में कैसे कार्य करेगा।

ब्रिगेडियर श्री डीएस त्रिपाठी जी (सेवानिवृत्त) ने कहा कि नाइजर में सबसे पहला तख्तापलट 1974 में साहेल क्षेत्र में सूखे और अकाल की पृष्ठभूमि में हुआ था। उस प्राकृतिक आपदा की वजह से आजादी के बाद बनी पहली निर्वाचित सरकार के प्रति हताशा और निराशा थी जिसने सेना को सरकार को उखाड़ फेंकने का आधार दिया और यह दावा करने का मौका दिया कि वह विकास पर ध्यान केंद्रित करेगी। इसके बाद नाइजर में 1996, 1999 और 2010 में भी राजनीतिक संकट की वजह से तख्तापलट हुआ। राष्ट्रपति बजौम केवल दो साल से सत्ता में हैं और 2021 के उनके निर्वाचन को भले ही चुनौती दी गई हो लेकिन मोटे तौर पर उसे स्वीकार किया गया। वह सत्ता में देश की सुरक्षा में सुधार, शिक्षा में निवेश और भ्रष्टाचार से लड़ने के वादे के साथ आए थे और इस दिशा में उन्होंने कुछ वास्तविक प्रगति भी की थी। साथ ही कोई राजनीतिक स्थिति और संस्थागत बाधा भी उस स्तर की नहीं थी जिसकी वजह से उनके तख्तापलट को न्यायोचित ठहराया जा सके। उन्होंने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि नवीनतम तख्तापलट आंतरिक राजनीति और सेना के विभिन्न हिस्सों में असंतोष का नतीजा है। उन्होंने कहा कि ‘कुशासन’ और ‘सुरक्षा स्थिति में गिरावट’ के आरोपों के अलावा कोई ऐसा ठोस तार्किक कारण नहीं दिया गया है जिससे तख्तापलट को न्यायोचित ठहराया जा सके और इसको अंजाम देने वाले अपने नेतृत्व को सही ठहरा सके।

ब्रिगेडियर श्री डीएस त्रिपाठी जी (सेवानिवृत्त) ने कहा कि नाइजर अमेरिका का साझेदार रहा है। इसे क्षेत्र में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में वह एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जाता है और माली और बुर्किना फासो के रूस की ओर रुख करने से इसका महत्व काफी बढ़ गया है। पड़ोसी देश चाड भी अमेरिका का एक प्रमुख सहयोगी है। अमेरिका को हालांकि चाड के साथ मधुर संबंध रखने में मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है। इसके विपरीत, नाइजर ने खुद को एक लोकतांत्रिक देश के रूप में प्रस्तुत किया है और उसे अमेरिका के प्रति खुले, व्यावहारिक और मित्र के तौर पर देखा जाता है। उन्होंने कहा कि हमें देखना होगा कि चीजें कैसे सामने आती हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि इस तख्तापलट से क्षेत्र में अमेरिकी हितों को गंभीर झटका लग सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि स्थिर लोकतांत्रिक संस्थानों के निर्माण, शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने संबंधी नाइजर के प्रयासों के लिए भी यह एक झटका है।

ब्रिगेडियर श्री डीएस त्रिपाठी जी (सेवानिवृत्त) ने कहा कि जहां तक भारत का प्रश्न है तो देश ने कहा है कि वह नाइजर के घटनाक्रम पर करीबी नजर रख रहा है और पश्चिम अफ्रीकी देश में रहने वाले लगभग 250 भारतीय सुरक्षित हैं। उन्होंने कहा कि भारत की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब पिछले सप्ताह हुए तख्तापलट के बाद नाइजर में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए हैं। फ्रांस समेत कई यूरोपीय देशों ने अपने नागरिकों को नाइजर से निकालना शुरू कर दिया है। उन्होंने कहा कि विदेश मंत्रालय ने बताया है कि उस देश में भारतीय समुदाय में लगभग 250 लोग हैं और वे सभी सुरक्षित हैं। लगभग 10 से 15 भारतीय, जो अस्थायी रूप से नाइजर में थे, फ्रांस द्वारा संचालित निकासी उड़ानों में सवार होकर देश छोड़ चुके हैं। उन्होंने कहा कि नाइजर की नई सैन्य शासित सरकार ने लीबिया, माली, चाड, अल्जीरिया और बुर्किना फासो के साथ अपनी सीमाओं को फिर से खोलने की घोषणा की है यह दर्शा रहा है कि माहौल अब धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है।

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