Dwijpriya Sankashti 2026: कौन हैं गणपति के 'द्विजप्रिय' स्वरूप, जानें Dwijpriya Sankashti का महत्व और Puja Method

By अनन्या मिश्रा | Feb 05, 2026

फाल्गुन माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को द्विजप्रिय संकष्टी चतु्र्थी मनाई जाती है। इस बार आज यानी की 05 फरवरी 2026 को यह व्रत किया जा रहा है। संकष्टी तिथि भगवान गणेश को समर्पित होती है। ऐसे में धार्मिक मान्यता है कि जो भी जातक इस दिन सच्चे मन से भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करता है, गणपति बप्पा उसके जीवन के सभी कष्टों को हर लेते हैं। तो आइए जानते हैं द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...

पूजन विधि

इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद लाल या पीले कपड़े पहनें। फिर हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें और वेदी पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश की प्रतिमा को स्थापित करें। फिर गंगाजल से बप्पा को स्नान कराएं और सिंदूर का तिलक लगाएं। इसके बाद गणपति को फूल, अक्षत, मोदक, धूप और दीप अर्पित करें। द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कथा का पाठ करें और पूजा के अंत में आरती करें। फिर रात में चंद्रमा के निकलने पर एक लोटे में दूध, जल और अक्षत मिलाकर चंद्रदेव को अर्घ्य दें। वहीं पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमा मांगे।

मंत्र

ॐ गं गणपतये नमः

ॐ द्विजप्रियाय नमः

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

महत्व

गणपति बप्पा के 32 रूपों में से छठा रूप द्विजप्रिय गणेश का है। द्विज का अर्थ है, जो दो बार जन्म ले और शास्त्रों का ज्ञाता हो। बप्पा के इस द्विजप्रिय रूप में चार मस्तक और चार भुजाएं हैं। इनकी पूजा-अर्चना करने से जातक आरोग्य, तेज बुद्धि और लंबी उम्र वाला होता है। साथ ही जातक के जीवन में शुभता का आगमन होता है।

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