Gyan Ganga: लंका जाते समय सुरसा के बाद कौन मिला था श्रीहनुमान जी से ?

By सुखी भारती | Nov 02, 2021

भगवान श्रीराम जी के परम भक्त श्रीहनुमान जी ने जब उड़ान भरी, तो इस उड़ान में पवन में ऐसी सुगंध भी उड़ी कि भक्ति भावों की एक आँधी-सी भी उड़ने लगी। भाव भी ऐसे कि उन पर चिंतन करें, तो वे सागर से भी गहरे हैं। और अगर गहन दृष्टि पात को त्याग दें, तो ये भाव मनस पटल पर कहीं भी नहीं ठहरते। आप श्रीहनुमान जी और सुरसा के शब्दों पर तनिक चिंतन कीजिए। जिस समय श्री हनुमान जी सुरसा से भेंट कर निवेदन करते हैं, कि मैं आप का आहार बाद में बन जाऊँगा, पहले आप मूझे श्रीराम जी का कार्य करने का अवसर प्रदान करने की कृपा करें- ‘राम काजु करि फिरि मैं आवौं।’ साथ-साथ आप सुरसा के वह शब्द भी देखें, जो उसने श्रीहनुमान जी को तब कहे, जब श्रीहनुमान जी पर वह प्रसन्न होती है- ‘राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।’ दोनों के शब्दों में एक समानता स्पष्ट दिखाई दे रही है, कि दोनों श्रीसीता जी की खोज को स्वयं का कार्य न कह कर ‘राम काजु’ के नाम से ही संबोधन कर रहे हैं। वे उसे स्वयं के काज से जोड़ कर नहीं देख रहे हैं। और यही भक्ति का सुंदर स्तंभ है। कारण कि स्वयं के काज में और प्रभु के काज में धरती और आस्माँ का अंतर है। अंतर यह है, कि जीव जिस समय स्वयं के काज करता है, तो वह काज, एक ‘कर्म’ की संज्ञा में आ जाता है। क्योंकि वह क्रिया एक कर्म है, तो निश्चित ही उसका दूसरा रुप हम बंधन भी कह सकते हैं। बंधन इसलिए, क्योंकि अगर जीव द्वारा कोई कर्म किया गया है, तो निश्चित ही उस कर्म की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप एक और कर्म भी जन्म लेगा। वह नया कर्म भी अपने साथ, अनिवार्य रूप से किसी अन्य नये कर्म की जन्म भूमि तैयार किए होता है। और इस प्रकार से एक कर्म अपने साथ कर्मों की अनंत श्रृँखला का सूत्रधार होता है। और यही कर्म श्रृँखला जीव के बार-बार जन्म और मरने का कारण बनती है। वहीं इसी स्थान पर अगर हम कर्म करें ही न। कर्म से परे ही हट जाएं। तो शायद हम सहजता से ही कर्म बँधनों से निजात पा सकते हैं। लेकिन क्षमा कीजिएगा, अभी जो हमने कहा कि हम कर्म ही न करें, तो वास्तव में क्या यह संभव है? निश्चित ही इसका ऊत्तर नहीं में है। कारण कि जीव की उत्पत्ति ही ऐसी है, कि वह कर्म किए बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता। 

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भले ही बाहर से ‘सेवा कार्य’ व ‘कर्म’ एक से भासित हों। लेकिन तब भी उनकी वृति व प्रवृति भिन्न-भिन्न होते हैं। ठीक वैसे, जैसे ताला और चाबी, भले ही एक ही धातु से बने हों, लोहे से बने हों। लेकिन तब भी दोनों की प्रवृति भिन्न-भिन्न है। अर्थात ताला बँधन में बाँध देता है। और चाबी बँधनों को खोल देती है। इसलिए श्रीहनुमान जी अथवा कोई भी पूर्ण आध्यात्मिक विभूति स्वयं से प्रेरित कोई भी कर्म अथवा क्रिया नहीं करती। अपितु प्रत्येक क्रिया को प्रभु कार्य समझ कर ही करते हैं। श्रीहनुमान जी एवं सुरसा दोनों ही अपनी-अपनी वाणी में ‘राम काजु’ शब्द का ही प्रयोग करते हैं। राम जी की सेवा और स्वयं से प्रेरित कर्मों के हमारे दैनिक जीवन में बड़े चिंतन योग्य प्रभाव हैं। जैसे श्रीराम काज हमें सदैव उत्साह देगा। हमें थकायेगा नहीं। हमें नकारात्मकता की और नहीं जाने देगा। जबकि कर्म बँधन हमें थकाता है। शोक व निराशा से घेर हमें अवसाद के गहन कुएँ में धकेल देता है। सेवा कार्य में असफलता मिले, तो हम स्वयं को दोष देते हैं। और ईश्वर से बार-बार क्षमा याचना करते हैं। जबकि कर्म बँधन में असफलता का ठीकरा हम, सदैव दूसरों पर फौड़ते हैं। हम सदा अशाँत व अस्थिर रहते हैं। जिसका परिणाम यह होता है, कि ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना, यह मानव, सबसे निकृष्ट योति का पात्र बन जाता है। इसलिए श्रीहनुमान जी का द्वारा नन्हां-नन्हां दिखने वाला कृत्य भी हमें सुंदर जीवन जीने की कला से सराबोर होता है। श्रीहनुमान जी सुरसा से मिलने के पश्चात आगे निकलते हैं, तो उन्हें आगे कौन मिलता है। क्या वह कोई देव है, अथवा अप्सरा या कोई राक्षसी। यह जानने के लिए, पढ़ेंगे अगला अंक---(क्रमशः)---जय श्रीराम।

- सुखी भारती

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