By अंकित सिंह | Feb 04, 2022
बात 2018 की है। 2019 में होने वाले आम चुनाव को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक दल फूंक-फूंक कर कदम उठा रहे थे। दिल्ली की सत्ता के लिए उत्तर प्रदेश की राजनीति बेहद अहम है। यही कारण है कि 2018 के राज्यसभा चुनाव के लिए भाजपा ने जातीय समीकरण को साधते हुए कई बड़े चौंकाने वाले फैसले लिए। उन्हीं में से एक नाम कांता कर्दम जाटव का है। भाजपा ने कांता कर्दम जाटव को राज्यसभा भेजने का फैसला लिया। भाजपा के इस दांव से कई राजनीतिक विश्लेषकों को आश्चर्य भी हुआ। लेकिन दावा किया गया कि पार्टी ने यह फैसला काफी सोच समझ कर लिया है। जाहिर सी बात है कि कांता कदम के जरिए भाजपा जाटव वोट पर अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी थी।
कांता कर्दम फिलहाल भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं। उन्हें 2018 में राज्यसभा का सदस्य बनाया गया था। वह भारतीय जनता पार्टी की सदस्य हैं। कांता कर्दम का जन्म 4 फरवरी 1965 को हापुड़ में हुआ था। राज्यसभा के लिए पार्टी से टिकट मिलने से पहले कांता कर्दम की पहचान राष्ट्रीय स्तर की नहीं थी। उत्तर प्रदेश में भी उनकी लोकप्रियता कुछ खास क्षेत्रों में ही थी। लेकिन भाजपा ने 2018 में कांता कर्दम को आगे कर मायावती के खिलाफ बड़ा दांव खेला। दरअसल, कांता कर्दम जाटव समाज से आती हैं। मायावती का भी वोट बैंक जाटव समाज में काफी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटव समाज की जनसंख्या भी अच्छी खासी है। यही कारण है कि 2019 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा ने कांता कर्दम को राज्यसभा भेजने का निर्णय लिया। हालांकि कांता कर्दम और उनके पति वीर सिंह कर्दम भाजपा के काफी पुराने कार्यकर्ता रहे हैं।
वर्तमान में कांता कर्दम उत्तर प्रदेश भाजपा में उपाध्यक्ष भी हैं। उन्हें आक्रमक दलित नेता माना जाता है। कांता कर्दम को 2018 में भाजपा ने मेरठ से मेयर पद का उम्मीदवार बनाया था। हालांकि वह हार गईं। बावजूद इसके भाजपा ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाया। कांता कर्दम के जरिए भाजपा मेरठ से लेकर सहारनपुर तक दलितों को साधने की कोशिश कर रही है। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को इससे मदद तो मिली ही साथ ही साथ 2022 के चुनाव में भी कांता कर्दम को पार्टी में काफी आगे रखा हुआ है।