लोकसभा चुनाव 2024 में नरेंद्र मोदी के सामने विपक्ष का चेहरा कौन?

By डॉ. आशीष वशिष्ठ | Mar 05, 2024

अगले कुछ दिनों में चुनाव आयोग लोकसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा करेगा। राजनीतिक दल चुनाव मैदान में कूद चुके हैं। देश का राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। भाजपानीत एनडीए का चेहरा नरेंद्र मोदी हैं। ऐसे में अहम प्रश्न है कि मोदी के सामने विपक्ष का चेहरा कौन होगा? क्या विपक्ष चुनाव मैदान में उतरने से पहले किसी एक चेहरे पर सहमति बना पाएगा? या फिर विपक्ष बिना चेहरे के ही मोदी को चुनौती देगा? विपक्ष अभी तक यह तय नहीं कर पाया है कि मोदी के सामने कौन विपक्ष को चेहरा कौन होगा।

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इंडी अलायंस पिछले दस महीने में आधा दर्जन बैठकों के बाद भी किसी एक चेहरे के नाम पर सहमति नहीं बना पाया। विपक्ष का हर नेता स्वयं को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार समझता है। 2014 के बाद जब से नरेंद्र मोदी की अगुवाई में नई बीजेपी सामने आई तब से देश में चेहरा आधारित चुनाव का नया दौर शुरू हुआ। नरेंद्र मोदी के सामने विकल्प कौन? यह विपक्ष का सबसे अनसुलझा सवाल रहा। बीता साल भी विपक्ष ने इसी के जवाब में निकाल दिया। विपक्ष ने 27 दलों का इंडी अलांयस भी बनाया तब भी उसमें एक आम चेहरा सामने नहीं ला पाया।

वहीं अगर पिछले कुछ सालों का रिकार्ड देखें तो जिस राज्य में विपक्ष ने विधानसभा चुनाव में मजबूत चेहरा रखा वहां उसे विजय हासिल हुई। लेकिन केंद्र में आकर वह ऐसा करने में विफल रहा। बीती 19 दिसंबर को इंडी अलांयस की मीटिंग में यह मसला उठा और कुछ नेताओं ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का नाम आगे किया लेकिन इसमें सफलता नहीं मिली। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने जोर देकर कहा कि विपक्षी दलों के लिए पहली प्राथमिकता आम चुनाव जीतना और फिर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम तय करना होगा। उन्होंने कहा, ‘‘आवश्यक सदस्यों के बिना पीएम उम्मीदवार के बारे में चर्चा निरर्थक है।’’ खड़गे के गैर-प्रतिबद्ध रुख ने संकेत दिया कि गठबंधन का चेहरा नामित करने का मुद्दा विवादास्पद बना हुआ है। जबकि तमाम आंकड़े और सर्वेक्षण बताते हैं कि आजकल मतदाता चुनाव में नेतृत्व की स्पष्टता वाले दल की ओर अधिक जाना पसंद करते हैं।

ऐसे में विपक्ष के लिए इस अनसुलझे प्रश्न की तलाश सबसे अधिक है। मुकाबला तो साफ तौर पर घोषित उम्मीदवारों के बीच होता है। जब विपक्ष ने किसी को अपना चेहरा घोषित ही नहीं कर पाया, ऐसे में आमजन में यह संदेश गया कि विपक्ष के पास मोदी का मुकाबला करने वाला कोई नाम और चेहरा नहीं है। बिना किसी चेहरे के विपक्ष अपनी आधी लड़ाई शुरू होने से पहले ही हार चुका है।

इंडी अलांयस के गठन के पहले ही दिन से कांग्रेस बड़ी चालाकी से गठबंधन के संयोजक के मुद्दे पर हीलाहवाली करती रही। सीट बंटवारे को लेकर भी उसका रूख कभी साफ नहीं रहा। वास्तव में कांग्रेस ने बड़ी चालाकी से नीतीश कुमार के बनाए मंच पर अपना वर्चस्व और प्रभुत्व स्थापित कर लिया। और रणनीति के तहत वो संयोजक के नाम की घोषणा जैसे अहम मुद्दे को बैठक दर बैठक टालती रही। गठबंधन में संयोजक ही प्रधानमंत्री पद का चेहरा होता। कांग्रेस यह नहीं चाहती थी कि राहुल गांधी के अलावा कोई दूसरा चेहरा गठबंधन की ओर से घोषित किया जाए। हालांकि कांग्रेस की चालाकी को नीतीश, केजरीवाल और ममता भांप गए। इसलिए इन तीन नेताओं ने कांग्रेस के रवैये की आलोचना करने से परहेज नहीं किया।

नीतीश तो गठबंधन से अलग हो गए। ममता ने मल्लिकार्जुन का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाकर राहुल और अन्य संभावित प्रत्याशियों का रास्ता रोकने का काम किया। केजरीवाल कांग्रेस के साथ आए भी तो अपनी शर्तों पर। कांग्रेस ने झुककर आप से सीटों का बंटवारा किया। ममता अकेले चुनाव लड़ने का संदेश दे ही चुकी है। मतलब साफ है कि गठबंधन में कोई किसी को आगे बढ़ता देखना नहीं चाहता। विपक्ष का हर नेता स्वयं को प्रधानमंत्री पद का दावेदार मानता है। और वो प्रधानमंत्री पद के लिए अपना रास्ता साफ रखना चाहता है।

देष की जनता विपक्षी नेताओं के चाल चरित्र और सत्ता की लोलुपता को बड़े ढंग से देख रही है। जनता को पता है कि एक ओर प्रधानमंत्री मोदी जैसे ऊर्जावान और निस्वार्थ व्यक्ति है, जो अहर्निशं देश और देशवासियों के कल्याण और विकास के बारे में सोचता है। और दूसरी ओर एक ऐसा गठबंधन है, जिसके अधिकांश नेता अपना वर्तमान और अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित करने के लिए जोड़ तोड़ कर रहे हैं। उन्हें मोदी को अपने सत्ता सुख के लिए हराना है।

विपक्ष देश की जनता को कभी यह नहीं बताता कि वो मोदी को हटाकर उनके लिए क्या करेंगे? देश के विकास का उनका मॉडल क्या है? उन्होंने देश के प्रगति का कौन सा रोडमैप तैयार किया है? विपक्ष मुफ्त की सौगातों और न पूरे होने वाले वायदे देकर सत्ता हासिल करने की कोशिशों  में जुटा है। मोदी सरकार के हर काम की आलोचना और अड़चन को ही विपक्ष अपना धर्म और कर्तव्य मानता है। उसके पास कोई देश को आगे बढ़ाने का कोई माडल, रोडमैप और ब्लूप्रिंट नहीं है। देशवासी सब कुछ देख रहे हैं। पिछले दस वर्षों में देश में जो परिवर्तन और विकास हुआ है, उसे विपक्ष के नेता अपने बयानों की चादर से ढक नहीं सकते। सरकारी योजनाओं से करोड़ो देशवासी लाभन्वित हुए हैं। सरकारी कार्यप्रणाली में निष्पक्षता और पारदर्शिता का प्रतिशत बढ़ा है।  

प्रधानमंत्री मोदी पिछले दो महीने में कई अवसरों पर अपने तीसरे कार्यकाल का जिक्र कर चुके हैं। बीती 3 मार्च को पीएम मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट की बैठक हुई। मौजूदा सरकार की यह आखिरी कैबिनेट बैठक थी। करीब 11 घंटे चली मीटिंग में विजन डॉक्यूमेंट विकसित भारत 2047, अगले 5 साल की योजनाओं और सरकार के तीसरे कार्यकाल के दौरान पहले 100 दिन की रणनीति पर चर्चा हुई। जहां एक ओर विपक्ष के कई बड़े नेता अपने लिए सुरक्षित सीटें और गठबंधन में सीटों के बंटवारे को लेकर उलझे हुए हैं। वहीं पीएम मोदी तीसरे कार्यकाल की रणनीति तय कर रहे हैं। पीएम मोदी के आत्मविश्वास से अंदर ही अंदर समूचे विपक्ष में घबराहट है।

पिछले वर्ष पांच राज्यों के चुनाव में मोदी की गारंटी विपक्ष के वायदों पर भारी पड़ी थी। देशवासियों ने मोदी की गारंटी पर भरोसा किया। इंडी अलांयस भी मोदी को हराने के लिए कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रहा। कांग्रेस तो अपना स्तर गिराकर समझौते और गठबंधन करने से भी परहेज नहीं कर रही है। लेकिन अहम सवाल यह है कि प्रधानमंत्री मोदी के छवि, कद और नेतृत्व के सामने क्या विपक्ष की बिना चेहरे वाली रणनीति कामयाब हो पाएगी?

इसमें कोई दो राय नहीं है कि मोदी के चेहरे के सामने में विपक्ष की बिना चेहरे वाली एकजुटता जरूरी कमजोर नजर आएगी। लेकिन, इससे उसके असफल होने की गारंटी नहीं है। यदि विपक्ष सत्ता विरोधी लहर को भुनाने में कामयाब होता है और सरकार की नाकामियों को जनता के बीच ले जाने में सफल रहता है तो फिर उसे फायदा होगा। लेकिन, यदि सत्ता विरोधी लहर नजर नहीं आती है तो फिर मोदी के चेहरे का फायदा फिर भाजपा को मिलेगा।

डॉ. आशीष वशिष्ठ

स्वतंत्र पत्रकार

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