मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण के खिलाफ संतों का शंखनाद, क्या हिंदू धर्मस्थलों को मुक्त करेंगी राज्य सरकारें?

By नीरज कुमार दुबे | Nov 24, 2021

देशभर के मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने के लिए साधु-संत अपना अभियान छेड़ चुके हैं और इस अभियान को संघ परिवार का भी समर्थन हासिल है इसलिए माना जा सकता है कि मोदी सरकार जल्द ही इस मुद्दे पर फैसला ले सकती है। आगामी पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए महत्वपूर्ण हैं और हिंदुत्व की लहर पर सवार पार्टी कभी नहीं चाहेगी कि उसका आधार वोटर उससे नाराज हो। उत्तराखण्ड में भी जिस तरह से देवस्थानम बोर्ड को भंग करने की मांग को लेकर चारों धामों के तीर्थ पुरोहितों ने राज्य सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है उसको देखते हुए लग रहा है कि जल्द ही वहां कोई बड़ा निर्णय हो सकता है।

दरअसल, संघ परिवार ने अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण का अभियान सफल होने के बाद अब मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने का मुद्दा आगे बढ़ाने का निर्णय किया है और इससे आम जनमानस को जोड़ा जा रहा है। विश्व हिन्दू परिषद इस अभियान को लेकर राज्यों से मंदिरों की रिपोर्ट तैयार करने और प्रबुद्धजनों के विचार एकत्रित करने के अभियान पर लगा हुआ है। यह कार्य पूरा हो जाने के बाद सरकार के समक्ष एक बार फिर प्रमुखता से यह मांग रखी जायेगी। एक ओर जहां संघ परिवार मिशन को अपने तरीके से पूरा करने में लगा हुआ है वहीं दूसरी ओर संत समाज ने भी सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति बनाते हुए अपना अभियान छेड़ दिया है। हाल ही में अखिल भारतीय संत समिति की बैठक हुई जिसमें देश के विभिन्न इलाकों से संत, महंत, पीठाधीश्वर, योगी, आचार्य मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर, पंडितगण, मठाधिपति, आचार्य और सनातन धर्म के विद्वान पहुँचे। इस सम्मेलन के दौरान 'मठ मंदिर मुक्ति आंदोलन' का शंखनाद किया गया।

इस सम्मेलन में अखिल भारतीय संत समिति के अध्यक्ष और माँ कालिका सिद्ध पीठ कालिका मंदिर के महंत श्रीसुरेंद्र नाथ अवधूत महाराज ने कहा कि मठ मंदिरों का प्रबंधन राज्य सरकारें तत्काल धर्माचार्यों को सौंप दें वरना पूरे देश में आंदोलन किया जायेगा। महंत ने आरोप लगाते हुए कहा कि सरकारें केवल मंदिरों का अधिग्रहण करती हैं, मस्जिद या चर्च का नहीं। सम्मेलन में अन्य कई संतों ने भी प्रमुखता से अपनी बात को रखा और कुछ ने तो सवाल भी उठाया कि यदि सरकार मंदिर को जनता की संपत्ति समझती है तो पुजारियों को वेतन क्यों नहीं देती? सम्मेलन में यह भी सवाल उठाया गया कि यदि मस्जिदें मुस्लिमों की निजी संपत्ति हैं, तो मौलवियों को सरकारी खजाने से वेतन क्यों दिया जाता है? संतों ने साल 2014 में आये सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का हवाला भी दिया जिसमें अदालत ने तमिलनाडु के नटराज मंदिर को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने वाले आदेश में कहा था कि मंदिरों का संचालन और व्यवस्था भक्तों का काम है सरकारों का नहीं।

दूसरी ओर, जहाँ तक बात उत्तराखण्ड के देवस्थानम बोर्ड को भंग करने की है तो आपको बता दें कि अपनी मांग को लेकर आंदोलन को और धार देते हुए चारों धामों के तीर्थ पुरोहितों ने उत्तराखंड सरकार के मंत्रियों के आवासों का घेराव किया। उन्होंने देवस्थानम बोर्ड के गठन के प्रावधान वाले अधिनियम को वापस लेने के लिए राज्य सरकार पर दबाव बनाने के वास्ते मुख्य रूप से कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल के आवास के बाहर धरना दिया तथा ‘शीर्षासन’ भी किया। इस दौरान मंत्री उनियाल अपने घर से बाहर आए और पुरोहितों से बातचीत की। उन्होंने पुरोहितों से 30 नवंबर तक इंतजार करने को कहा और संकेत दिया कि इसके बाद इस संबंध में कोई बड़ा निर्णय लिया जा सकता है।

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हम आपको बता दें कि पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्रित्व काल में 2019 में गठित चारधाम देवस्थानम बोर्ड का चारों धामों- बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री के तीर्थ पुरोहित शुरू से ही विरोध कर रहे हैं और इसे भंग किए जाने की मांग को लेकर आंदोलनरत हैं। उनका मानना है कि बोर्ड का गठन उनके पारंपरिक अधिकारों का हनन है। देखा जाये तो इस बात के आसार प्रबल हैं कि सरकार इस फैसले को वापस ले लेगी क्योंकि विधानसभा चुनाव के नजदीक आने के अलावा केंद्र सरकार द्वारा नए कृषि कानूनों को वापस लिए जाने के बाद तीर्थ पुरोहितों की उम्मीदें बढ़ गयी हैं इसीलिए वह अपना आंदोलन तेज कर रहे हैं। बहरहाल, संत समाज भी उत्तराखण्ड सरकार के संभावित फैसले पर नजर लगाये हुए है क्योंकि यदि देवस्थानम बोर्ड भंग किया जाता है तो मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने के अभियान में यह विजय की शुरुआत होगी।

-नीरज कुमार दुबे

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