By अंकित सिंह | Sep 11, 2026
अशोक सिद्धार्थ ने राजनीति से संन्यास लेने का ऐलान किया, लेकिन इससे BSP में उनके दामाद आकाश आनंद की जगह नहीं बच पाई। गुरुवार को मायावती ने अपने भतीजे को पार्टी से निकाल दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि आनंद ने बहुजन आंदोलन से ज़्यादा परिवार के प्रति वफ़ादारी को अहमियत दी। यह फ़ैसला 3 सितंबर को आनंद को राष्ट्रीय समन्वयक के पद से हटाए जाने के एक हफ़्ते बाद आया। मायावती ने पार्टी में उनकी सक्रिय भूमिका में वापसी को सिद्धार्थ के राजनीति से पूरी तरह हटने से जोड़ा था। जब यह घोषणा हुई, तो उन्होंने कहा कि यह बहुत देर से आया है।
इस माहौल में, आकाश के छोटे भाई ईशान आनंद द्वारा मायावती के बयान को तुरंत रीपोस्ट करने की खबर अहम हो जाती है। मायावती ने हाल ही में ईशान को पार्टी में अहम ज़िम्मेदारियाँ सौंपी हैं। जहाँ आकाश का पहले वाले पोस्ट को रीपोस्ट न करना आलोचना का विषय बना, वहीं मायावती के रुख का समर्थन करने के लिए ईशान की तत्परता दोनों भाइयों के बीच एक बड़ा अंतर दिखाती है। अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी के सभी पदों से हटाने के चार दिन बाद, मायावती ने सोमवार को अपने छोटे भतीजे ईशान आनंद को पार्टी के संगठन में एक अहम पद पर नियुक्त किया। BSP के पदाधिकारियों का कहना है कि लखनऊ में हुई पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद ईशान की बढ़ती भूमिका को लेकर अटकलें तेज़ हो गईं; इस बैठक में ईशान भी मौजूद थे। पार्टी के पदाधिकारियों का मानना है कि वह मायावती के उत्तराधिकारी हो सकते हैं और उनकी हालिया नियुक्ति इसी बात का संकेत है।
BSP में चल रही उथल-पुथल और पार्टी के हालात काफी अहम हैं और यह मामला सिर्फ़ परिवार के झगड़े से कहीं बढ़कर है। पार्टी ने 2022 में उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से सिर्फ़ एक सीट जीती थी और 2024 में राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से एक भी सीट नहीं जीत पाई, जबकि उसका वोट शेयर गिरकर 9.39% रह गया। मायावती की पार्टी को उत्तर प्रदेश के 2022 के चुनाव में 12% के आसपास वोट मिले थे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर आज़ाद एक युवा दलित नेता के तौर पर उभरकर सामने आए हैं जो पार्टी के लिए चुनौती बन सकते हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव करीब आ रहे हैं और आज़ाद, BSP के लिए कड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं।
मायावती बहुत ही कम लोगों पर भरोसा करती हैं। मायावती ने आकाश आनंद को पार्टी से निकलते हुए आजाद शब्द का भी इस्तेमाल किया जिसके बाद इस बात की चर्चा तेज हो गई की क्या बसपा को तोड़ने की भी कोशिश हुई है। मायावती की दलित राजनीति को लेकर चंद्रशेखर रावण और उनकी पार्टी आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) काफी सक्रिय है। ऐसे में मीडिया में ऐसी अटकलें हैं कि शायद मायावती को इस बात का संदेह होने लगा था कि उनके कोर वोटर पर कोई सेंधमारी करने की कोशिश कर रहा है और इसमें पार्टी के ही लोग भूमिका निभा रहे हैं।
यह बात सही है कि पिछले चार चुनाव को देखकर तो मायावती को सियासी रूप से कुछ खास सफलता नहीं मिली है। 2027 के चुनाव में भी मायावती की पार्टी को कितनी सफलता मिलेगी, इस बात का अंदाजा लगा पाना मुश्किल है। क्या 2022 में 12% के आसपास उनकी पार्टी को जो वोट मिला था, उसे भी मायावती हासिल कर पाएगी या नहीं कर पाएगी इस पर भी संदेह है। मायावती आज भी पुरानी राजनीतिक तौर तारीको पर ज्यादा विश्वास कर रही हैं। जबकि राजनीति में कई बड़े बदलाव आ चुके हैं। कुछ राजनीतिक विश्लेषक तो मायावती की पार्टी को उत्तर प्रदेश की राजनीति में लगभग खत्म सा मान लिया है। वह समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर आक्रामक रहती हैं लेकिन भाजपा पर शांत ही रही हैं। उनकी पार्टी फिलहाल अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि मायावती की पार्टी कितनी ताकत अपनी विधानसभा चुनाव में दिख पाती है।
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