दिल्ली पुलिस Vs वकील में क्यों आया किरण बेदी के नाम का जिक्र?

By अभिनय आकाश | Nov 05, 2019

तीस हजारी कोर्ट में एक मामूली बात पर पुलिस और वकीलों के बीच भिड़ंत हो गई, बाद में वकीलों ने आगजनी की और पुलिस को फायरिंग करनी पड़ी. बस इसी वजह से ये विवाद बढ़ता चला गया जो कि एक कोर्ट से दूसरी कोर्ट और एक शहर से दूसरे शहर तक पहुंच गया. अब दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर पुलिस जवान इंसाफ के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं और अपनी मांग को लेकर अड़े हैं। इसी मामले को लेकर दिल्ली की सभी जिला अदालतों में आज भी वकील हड़ताल पर हैं। किसी भी कोर्ट में जज के सामने वकील न तो खुद पेश हो रहे हैं और न ही मुवक्किल को कोर्ट परिसर के अंदर जाने दिया जा रहा है। वकीलों की मांग है कि तीस हजारी कोर्ट में हमला करने वाले पुलिसकर्मियों को तुरंत गिरफ्तार किया जाए। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने एक चिट्ठी लिखकर सभी बार एसोसिएशन से शांति बनाए रखने की अपील की है।

वहीं दिल्ली पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक ने भी पुलिसवालों से कहा है कि ये हमारे लिए परीक्षा की घड़ी है, सभी जवान शांति बनाए रखें और अपनी ड्यूटी पर वापस लौटें। हम कानून के रखवाले हैं और हमें अनुशासन में रहना है। लेकिन यहां दिल्ली पुलिस कमिश्नर को हमारा कमिश्नर कैसा हो किरण बेदी जैसा हो जैसे नारे से रूबरू होना पड़ा। आखिर खाकी बनाम काले कोट विवाद में किरण बेदी का नाम अचानक से क्यों सामने आ गया। अमूल्य पटनायक की अपील के बाद भी पुलिसकर्मीयों संतुष्ट नहीं देखाई दे रहा है। पुलिसवालों का कहना है कि उनकी बातें नहीं सुनी गई। जिसके बाद किरण बेदी के दौर की बाते दशकों बाद सुर्खियों में आ गई। दरअसल, जिस मुखरता के साथ किरण बेदी के कार्यकाल के दौरान पुलिस की बातें रखती थी। उसके बाद ही उसका नाम पुलिसवालों द्वारा लिया गया। 

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किरण बेदी के नाम से कौन वाखिफ़ नहीं। 9 जून 1947 को अमृतसर में जन्मीं देश की पहली लेडी आईपीएस ऑफिसर का तमगा इनके नाम है। किरण बेदी ने महिलाओं के लिए वो रास्ता खोला, जो आज भी हिस्ट्री की गोल्डन बुक्स में दर्ज़ है। दिल्ली चुनावों में चीफ़ मिनिस्टर पद की दावेदार रहीं किरण बेदी वर्तमान में पुद्दुचेरी की उपराज्यपाल हैं। किरण बेदी ने तिहाड़ जेल और कैदियों की दशा को सुधारने के लिए जो कदम उठाए, वो जेलरों के लिए आज भी मिसाल है। उन्होंने साबित किया कि अगर कैदियों से मानवीय बर्ताव करते हुए उन्हें सुधार का मौका दिया जाए, तो वे समाज के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं। कानून को सभी नागरिकों के लिए समान मानते हुए अपना कर्तव्य निभाते हुए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की गाड़ी को भी क्रेन से उठवा दिया। तभी से किरण बेदी 'क्रेन बेदी' के नाम से विख्यात हुईं। 

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लेकिन वर्तमान दौर में शहर की सबसे निचली अदालत से देश की सबसे ऊंची अदालत तक आठ-आठ अदालतों वाली दिल्ली में वकीलों और पुलिसवालों के बीच की लड़ाई ने इंसाफ को ही शर्मिंदा कर दिया। जिन दो लोगों के कंधो पर कानून की जिम्मेदारी है वो दिल्ली को ऐसा नाटक दिखा रहे हैं कि बस पूछिए ही मत। ऐसे में कानून के दो रखवालों की भिड़ंत से नुकसान तो देश का ही होगा। ये दोनों पक्षों को समझना जरूरी है।  

1988 की घटना जब किरण बेदी और वकील आमने-सामने थे

1988 की जिस घटना जिसकी शुरुआत एक वकील की गिरफ्तारी से हुई थी। दिल्ली पुलिस ने वकील राजेश अग्नहोत्री को चोरी के इल्जाम में गिरफ्तार किया था। अग्निहोत्री को हथकड़ी पहनाकर ले जाया गया, जिससे वकील समुदाय का गुस्सा भड़क उठा। उन्होंने बेदी के दफ्तर के बाहर विरोध प्रर्दशन किया। उस समय वह डीसीपी नॉर्थ थीं। वकीलों का कहना था कि गिरफ्तारी के जायज कारण होने के बावजूद एक वकील को हथकड़ी नहीं लगाई जानी चाहिए। पुलिस ने वकीलों की भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज किया। इससे वकील समुदाय और भड़क उठा। किरण बेदी से हुए बबाल के बाद वकीलों ने खुद को दमखम वाला साबित करने के लिए अदालतों में ताले डलवा दिए। उस जमाने में ढींगरा तीस हजारी अदालत में एडिशनल डिस्ट्रक्टि सेशन जज थे। उस दौर को याद करते हुए उन्होंने कहा, ‘मेरी अदालत (मेट्रोमोनियल कोर्ट) खुली रही। मैं अपनी अदालत में रोजाना बैठकर फैसले सुनाता रहा। मेरी अदालत में जब हड़ताली वकील पहुंचे तो मैंने उन्हें दो टूक बता-समझा दिया, ‘हड़ताल वकीलों की है अदालतों की नहीं’।’

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