By अशोक मधुप | Mar 24, 2026
धार्मिक स्थलों को बंदरों से क्यों नही मिलती मुक्ति। सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि इन स्थानों पर आने वाले श्रृद्धालु कब तक इनके आंतक झेलते रहेंगे? कब तक इनका शिकार होते रहेंगे?
निवर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी दो बार वृंदावन आए। आश्रय सदन में वृद्ध विधवा माताओं से मुलाकात करने आए थे। राष्ट्रपति पद पर रहते प्रणब मुखर्जी पहली बार 16 नवंबर 2014 को अक्षयपात्र में चंद्रोदय मंदिर के भूमि पूजन में आए तो दूसरी बार 18 नवंबर 2015 को चैतन्य महाप्रभु के वृंदावन आगमनोत्सव के पांच सौ वे वर्ष पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम में आए थे। राष्ट्रपति पद पर रहते ज्ञानी जैल सिंह 1987 में वृंदावन आए और रंगजी मंदिर में दर्शन करने पहुंचे थे 1957 में देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद वृंदावन आए। उप राष्ट्रपति पद पर रहते 1985 में आर वेंकटरामन, 1993 में डॉ. शंकरदयाल शर्मा, 1959 में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन वृंदावन आ चुके हैं। राष्ट्रपति या कोई वीवीआईपी जब भी वृंदावन आता है। प्रत्येक बार उनकी सुरक्षा तो होती ही है। सबसे बड़ा काम होता है वीवीआईपी को यहां के झपटमार बदंर से बचाना। ये बंदर झपटामार कर श्रद्धालु का चश्मा उतारते और किसी ऊंची जगह पेड़ या दीवार पर जाकर बैठ जाते हैं। ये चश्मा तभी लौटाते हैं जब उन्हें खाने के लिए फ्रूटी, केला या दूसरे खाने के सामान दिए जाएं। वीवीआईपी दौरे को देखते हुए प्रशासन लंगूरों के जगह−जगह कट आउट लगवाता है। माना जाता है कि लंगूर से बंदर डरतें हैं। उन्हें डराने के लिए ऐसा किया जाता है। कुछ जगह लंगूर भी लाकर बांध दिए जाते हैं। राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु की सुरक्षा से लेकर रूट पर व्यवस्थाओं को दुरस्त करने के लिए जिला प्रशासन ने रात दिन एक कर दिया। राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु के दौरे को देखते एक प्रशासन ने लंगूरों के जगह−जगह कट आउट लगवाए।
लेखक को चित्रकूट में हनुमान गढ़ी जाने का अवसर मिला। वहां रास्ते में बंदर और लंगूर मिलते और आपके कपड़े और बैग पकड़कर रोक लेते हैं। वे आपके बैग और जेब से खाने का सामान प्रसाद आदि निकालकर ही आपको आगे जाने देते हैं। शुक्रताल में तो हनुमान धाम में बंदरों को भगाने के लिए लंगूर बांधा हुआ था। बंदर उसके अभयस्त हो गए थे। उन्हें पता था कि रस्सी में बंधे लंगूर की पंहुच कहां तक हैं। बदंर आते और लंगूर की पंहुच की दूरी से अगल रहकर लौट जाते।
प्रश्न है कि वीवीआईपी के आने पर ही क्यों बंदरों को रोकने की व्यवस्था होती है। देश के आम आदमी को भी वीवीआईपी क्यों नही समझा जाता। उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी तो सरकार की है। उसके लिए क्यों नही ऐसी व्यवस्थाएं होती। बंदर हम हिंदुओं की श्रद्धा है। हम उसे पवित्र मानते हैं। पूजनीय मानते है। इतना होने पर भी उसके भोजन की व्यवस्था क्यों नही करते। अयोध्या में बड़ी तादाद में बंदर है। हनुमान गढ़ी पर मैंने बंदरों को फूलों की माला तोड़कर उसमें भोजन के अंश तलाशते देखा है। इसी शहर में डस्टविन से भोजन खोजते बंदर मुझे मिलें हैं। हमारी समाज सेवी संस्थाए क्यों नही इनके भोजन की जरूरत पूरी करती। बंदरों की संख्या लगातार बढ़ रही है। बढती बंदरों की जनसंख्या को भोजन चाहिए। भोजन ने मिलने वह निरीह प्राणी अपना पेट भरने के लिए कुछ तो करेगा।
बंदरों के आतंक के कारण कई शहरों में तो महिलाओं और बच्चों का छतों पर जाना कठिन हो गया है। शहरों की नही अब तो जंगल में भी इनकी बढ़ती आबादी किसानों के लिए संकट बन चुकी है। भोजन के अभाव में बंदर खेतों की फसल तोड़कर खा रहे हैं। गेंहू की बाली खा जाते है। बोए गए गन्ने के बीज जमीन से निकाल कर वे अपनी उदरपूर्ति कर रहे हैं। किसान फसल की रक्षा को लेकर परेशान हैं। अब तो किसानों ने खेतों की रक्षा के लिए नौकर रखने शुरू कर दिए हैं।
आज बंदरों का आंतक धार्मिक स्थलों के साथ अन्य स्थानों पर भी बढ़ता जा रहा है। शहरी आबादी के साथ किसान भी परेशान है। आज जरूरी हो गया है कि सरकार द्वारा बंदरों की आबादी कम करने के लिए अभियान चलाया जाए। बंदरों के ग्रुप लीडर की नसंबदी कराकर उनकी आबादी नियंत्रित की जाए। जनता के शोर मचाने पर बंदरों का पकड़कर जंगलों में छोड़ा जाना कोई स्थायी निदान नही है। ये जंगल और वनों से लौटकर फिर आबादी की ओर आ जाते हैं। बढ़ती बंदरों की आबादी को भोजन चाहिए। भोजन न मिलने पर उन्हें भी पेट भरना है। जैसे आदमी अपनी भोजन की जरूरत पूरी करने के लिए दूसरे साधन ढ़ूंढ़ता है। वैसे ही आज बंदर कर रहे हैं। तीर्थ स्थलों पर चश्मा छीन रहे हैं तो कुछ जगह श्रद्धालुओं को पकड़कर उनके बैग से भोजन ले रहे हैं। गांव और शहरों में भोजन के लिए कपड़े उठाकर ले जाना आम बात है। ये उठाए गए कपड़े तब छोड़ते हैं, जब उन्हें खाने की सामग्री मिल जाए।
अशोक मधुप
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)