Prabhasakshi Exclusive: क्यों हो रही है Europe में एक और युद्ध की आहट ? Japan में ऑफिस खोल कर Asia में क्यों घुस रहा है NATO ?

By नीरज कुमार दुबे | Jun 01, 2023

प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क के खास कार्यक्रम शौर्य पथ में इस सप्ताह ब्रिगेडियर श्री डीएस त्रिपाठी जी (सेवानिवृत्त) से हमने जानना चाहा कि क्या यूरोप में एक और युद्ध की आहट देखी जा रही है? जिस तरह कोसोवो में नाटो के सैनिकों की पिटाई हुई है, वह क्या दर्शाता है? इसके अलावा जापान में संपर्क कर्यालय खोलने जा रहे नाटो के इस कदम को क्या एशिया के सुरक्षा तंत्र में यूरोपीय दखल नहीं माना जाना चाहिए? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि जहां तक एशिया के सुरक्षा तंत्र में यूरोपीय दखल की बात है तो इस पर विवाद होना तय है। उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) की हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मौजूदगी ऐसा कदम है जो क्षेत्रीय संघर्ष तथा तनाव को बढ़ाएगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि नाटो को यूरोपीय उपनिवेशवाद तथा साम्राज्यवाद के उसके इतिहास से अलग नहीं किया जा सकता, जिसने आधुनिक एशिया को आकार दिया तथा आज वह चीनी राष्ट्रवाद में अहम भूमिका निभाता है। नाटो ने 2022 में घोषणा की थी कि चीन सहयोगियों के ‘‘हितों, सुरक्षा तथा मूल्यों’’ के लिए ‘‘चुनौती’’ है। अब हाल में नाटो ने तर्क दिया कि यू्क्रेन के खिलाफ युद्ध में चीन का रूस को संभावित सहयोग, चीन को यूरोप के लिए सैन्य खतरा बनाता है। अब नाटो जापान में एक संपर्क कर्यालय खोल रहा है और यह जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड तथा दक्षिण कोरिया के साथ साझेदार है। यह एशिया के सुरक्षा तंत्र में यूरोपीय दखल को गहरा करने का पहला कदम हो सकता है। जापान का तर्क है कि यूक्रेन युद्ध ने दुनिया को अस्थिर कर दिया है और उसने चीन को रोकने के लिए नाटो को हिंद प्रशांत में आमंत्रित किया है। हालांकि नाटो पर गैर पश्चिमी देशों में ज्यादा भरोसा नहीं किया जाता।

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ब्रिगेडियर श्री डीएस त्रिपाठी जी (सेवानिवृत्त) ने कहा कि दूसरी ओर कोसोवो में सर्बिया के प्रदर्शनकारियों के हमले में नाटो के शांतिरक्षक सैनिकों के घायल होने की खबर की बात करें तो यह विवाद इसलिए खड़ा हुआ क्योंकि नाटो ने फैसला किया है कि वह 700 अतिरिक्त सैनिकों को भेजेगा। फिलहाल नाटो के 3800 शांतिरक्षक सैनिक कोसोवो में तैनात हैं। इसके चलते सर्बिया ने अपनी सेना को सर्वोच्च अलर्ट पर कर दिया है। दरअसल, कोसोवो में 1998 से ही विवाद चल रहा है जब जातीय अल्बानी विद्रोहियों ने सर्बिया के शासन के खिलाफ विद्रोह कर दिया था। इस विद्रोह के खिलाफ उस समय सर्बिया ने बहुत क्रूर अभियान चलाया था जिसमें 13 हजार से ज्यादा लोग मारे गये थे। उन्होंने कहा कि बताया जाता है कि मारे गये लोगों में ज्यादातर अल्बानिया के नागरिक थे। इस घटनाक्रम के बाद नाटो ने 1999 में हस्तक्षेप किया और सर्बिया को कोसोवो के इलाके से पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया। इसके बाद वहां पर शांतिरक्षक सैनिकों की तैनाती की गई। सर्बिया ने कोसोवो को देश के रूप में मान्यता देने से इंकार कर दिया है।

ब्रिगेडियर श्री डीएस त्रिपाठी जी (सेवानिवृत्त) ने कहा कि कोसोवो में विवाद इसलिए भी होता रहता है क्योंकि अल्बानियाई लोगों की बहुलता होने के बावजूद देश के उत्तरी इलाके में बड़ी संख्या में सर्बिया मूल के लोग भी रहते हैं। नया विवाद तब शुरू हुआ जब एक स्थानीय चुनाव में अल्बानिया मूल का व्यक्ति चुन लिया गया। इस चुनाव का सर्बिया मूल के लोगों ने बहिष्कार किया था। जब निर्वाचित प्रतिनिधि स्थानीय निकाय की इमारत में घुसे तो सर्बिया के लोगों ने तगड़ा विरोध किया। इसके बाद कोसोवो पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े जिससे भगदड़ मच गयी। यहां यह जानना भी जरूरी है कि सर्बिया को चीन और रूस का पूरा समर्थन है। यूक्रेन के खिलाफ लड़ाई में सर्बिया रूस के साथ खड़ा है। हाल ही में इस प्रकार की भी रिपोर्टें आईं कि चीन ने कई बड़े घातक हथियार सर्बिया को दिये हैं।

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