By अभिनय आकाश | Jun 05, 2026
वो बोलता है तो हिंदुत्व की छवि दिखती है। दहाड़ता है तो विरोधियों के होश उड़ जाते हैं। उसे गुस्सा आता है तो पूछिए ही मत। कोई सिंघम बुलाता है तो कोई साउथ के फायरब्रांड छवि वाला योगी कहता है। इस्तीफा दिया, वर्दी उतारी और राजनीति में ली एंट्री। कांटो भरी राह पर चलते हुए कमल का फूल खिलाने का संकल्प भी लिया। लेकिन फिर क्या हुआ ऐसा कि अन्नमलाई ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया। हम बात उस शख्स की कर रहे हैं जिसने आज तक कोई भी चुनाव नहीं जीता है। वो न तो तभी विधायक चुने गए और न ही कभी सांसद बन पाए। इसके बावजूद उन्होंने अपनी आक्रमक राजनीति से सभी को हैरान करके रखा है। हम कुपुस्वामी अन्नामलाई की कर रहे हैं। बिना कोई चुनाव जीते कोई नेता का कद इतना बड़ा कैसे हो गया कि बीजेपी उन्हें जाने नहीं देना चाहती थी। वो भी उस राज्य में जहां राजनीति हमेशा फिल्मी सितारों और बड़े पर्दे के ईर्द गिर्द घूमती रही। आखिर अन्नामलाई में ऐसा क्या है जो उन्हें तमिलनाडु की राजनीति में इतना जरूरी चेहरा बनाता है। इसका जवाब जानने के लिए हमें उनकी जड़ों को देखना होगा जहां से उनका सफर शुरू हुआ। वो जमीन जिसने उन्हें एक आम लड़के से लाइफलाइट किरदार बना दिया।
26 जुलाई 2016 की बात है। कर्नाटक के उड्डपी जिले के पुलिस मुख्यालय के बाहर आम लोग प्रदर्शन कर रहे थे। खूब भीड़ थी। पुलिस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। लेकिन लोगों का ये प्रदर्शन वहां के एसपी अन्नामलाई कोप्पास्वामी के समर्थन और उनके तबादले के विरोध में था। लेकिन अगर ऐसा एक बार हुआ होता तो की बड़ी बात नहीं थी। 16 अक्टूबर 2018 को कर्नाटक के चिकमंगलूर जिले के पुलिस मुख्यालय के बाहर भी ऐसा ही प्रदर्शन हुआ। इस बार भी इसी एसपी के समर्थन और तबादले का मुद्दा था। लोगों का कहना था कि ऐसा ईमानदार अफसर मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। अन्नामलाई को लेकर कहना है कि वो जहां भी जाते हैं लोगों के चहेते बन जाते हैं।
तमिलनाडु बीजेपी के अध्यक्ष के अन्नामलाई की पदयात्रा को पिछले वर्ष जुलाई में जब गृह मंत्री अमित शाह ने रामेश्नरम में हरी झंडी दिखाई थी तो दिल्ली में बैठे कई विश्लेषकों को लगा भी नहीं होगा कि इससे प्रदेश में पिछले सात दशकों से हावी द्रविड़ राजनीति पर कोई प्रभाव पड़ेगा। मीडिया की तरफ से भले ही एनमनएन मक्कल को उतनी कवरेज न मिली हो लेकिन फिर भी इसकी वजह से बीजेपी राज्य की राजनीति में एक ताकत के रूप में मजबूती से उभर कर सामने आई है
भारत में बीजेपी ने कई ऐसे राज्यों में जीत दर्द की, जिसे कुछ बरस पहले तक असंभव सा माना जाता था। चाहे वो बंगाल, कर्नाटक या फिर केरल तक में बीजेपी ने अपना पॉलिटिकल फुटप्रिंट बढ़ाया। लेकिन एक राज्य ऐसा भी था जहां बीजेपी बार-बार कोशिश करने के बाद भी दीवार से ही टकरा रही थी। तमिलनाडु बीजेपी के लिए केवल एक चुनावी राज्य नहीं अपितु वो किला था जिसे दशकों से कोई तोड़ नहीं पा रहा था। लेकिन फिर तमिलनाडु बीजेपी को एक ऐसा चेहरा मिला, जिसने पहली बार इस पूरे इकोसिस्टम को सीधे चैलेंज किया। तमिलनाडु की राजनीति को समझना कभी इतना दिलचस्प नहीं रहा। पिछले 60 सालों से यहां दो ही पार्टियों का दबदबा रहा है। सत्ता कभी डीएमके के पास तो कभी एआईएडीएमके के हाथों में आ जाती। तीसरे दल के लिए यहां कोई जगह बची ही नहीं। लेकिन साउथ के सुपरस्टार थलापति विजय ने 2026 में इस परंपरा को तोड़ दिया। पहली बार तमिलनाडु बीजेपी डिफेंसिव नहीं लग रही थी। पहली बार बीजेपी कार्यकर्ताओें उत्साह दिख रहा था। पहली बार तमिलनाडु में बीजेपी सिर्फ सोशल मीडिया पार्टी नहीं ग्राउंड पार्टी बन रही थी। तमिलनाडु में बीजेपी सालों से जहां 2-3% वोट शेयर के आसपास फंसी हुई थी। वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर बढ़कर सीधे 11.2 प्रतिशत पहुंच गया। अन्नामलाई के नेतृत्व में लग रहा था कि बीजेपी तमिलनाडु में कुछ बड़ा करने वाली है। बीजेपी सपोटर्स को लगने लगा था कि जिस राज्य को असंभव माना जाता था वहां फाइनली दरवाजा खुल रहा है। सच्चाई ये भी है कि तमिलनाडु में आज तक इतनी पॉपुलैरिटी किसी हिदुत्ववादी नेता को मिली ही नहीं है। लेकिन अचानक विधानसभा चुनाव से ठीक पहले गठबंधन धर्म के लिए बीजेपी ने बड़ा निर्णय लिया और अन्नामलाई को राज्य के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया। उन्हें उम्मीदवार तक नहीं बनाया गया। नतीजा क्या निकला बीजेपी फिर से 2 % वोट शेयर के आसपास सिमट गई। सबसे दिलचस्प बात ये रही कि डीएमके के खिलाफ जो माहौल अन्नामलाई ने बनाया, उसका फायदा जोसफ विजय ले गए। यानी अन्नामलाई ने बैटल फील्ड तैयार किया, माहौल बनाया लेकिन आखिरी बॉल पर छक्का मारकर गेम अपने नाम किसी और ने कर लिया।
बीजेपी में वो पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री बीएल संतोष के खास आदमी माने जाते हैं। जब वह दिल्ली आए तो सबसे पहले उनकी मुलाकात बीएल संतोष से हुई। बीएल संतोष ही उनको लेकर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के पास ले गए। लंबी बैठक हुई और बातें हुई। अन्ना मलाई का पूरी बातें बताई गई। यह फीडबैक केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को भी दिया गया। फिर उनकी मुलाकात अमित शाह से भी होती है। और अमित शाह से जो उनकी मुलाकात हुई है, उस फोटो को गौर से देखिएगा। अमित शाह के बारे में यह कहा जाता है कि जिनसे भी उनकी बनती है यानी जिनसे उनके कंफर्ट जोन होते हैं, अच्छे रिश्ते होते हैं तो वो उनके चेहरे पर दिख जाता है। इस तस्वीर में देखिए मुस्कुराते हुए नजर आते हैं अमित शाह एक किताब हाथ में लिए हुए अन्नामलई के सामने। लोगों को लगा अन्नामलई बीजेपी में ही रुक जाएंगे। बीजेपी भी ऐसा चाहती है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस भी ऐसा ही चाहता है और अन्नामलाई के दिल के एक कोने में भी अभी भी बीजेपी ही थी। जो खबर है उसके अनुसार अमित शाह से जब मिले अन्नामलाई तो उन्होंने तमिलनाडु के बारे में सारा कुछ बताया कि क्या सिचुएशन है वो क्या करना चाहते हैं वगैरह आप तस्वीरें देखिए तो अन्नामलाई एक कागज दे रहे हैं उनको और वहां पर वो सारा पॉइंट बाय पॉइंट कुछ अमित शाह हंस रहे हैं पढ़ के मुस्कुरा उनके चेहरे पर मुस्कान है अब जब ये पढ़ा अमित शाह ने तो वहां से भेजा बीएल संतोष जी के पास जो कि ऑर्गेनाइजेशन सेक्रेटरी है और वहां से वहीं पे नितिन नवीन को बुलाया गया और फिर बैठक हुई बड़े सौहार्दपूर्ण माहौल में एक सवा घंटे बैठक हुई और उसके बाद इन्होंने अपना इस्तीफा सौंप दिया और हैंडशक हो गया।
अगर वह जिस तरह की राजनीति करते हैं तो अभी नहीं है। तो एक ऐसी पार्टी बनाया जाए जो बीजेपी नहीं हो लेकिन नेशनलिस्ट हो थोड़ा सा हिंदूवादी हो लेकिन वो द्रविड़ियन कल्चर में पड़ा-बड़ा पार्टी हो। उस पार्टी का स्पेस अभी भी खाली था। अब अन्नामलाई वही पार्टी बनाने जा रहे हैं। इन्होंने साफ-साफ कहा है कि तमिलनाडु की संस्कृति में रचा बसा थोड़ा सा नेशनलिस्ट, थोड़ा सा हिंदूवादी, लेकिन नॉर्थ इंडियन हिंदूवादी से थोड़ा सा अलग। नविजय की पार्टी द्रविडियन लेकिन डीएमके से थोड़ी कम और क्रिश्चियन टच के साथ सेकुलर वोटर्स का साथ जबकि अन्नामलाई की पार्टी तमिलनाडु कल्चर एंड हेरिटेज के साथ हिंदू और नेशनलिस्ट। एक वैसे वोटर को टारगेट करने की कोशिश है जो परंपरागत रूप से डीएमके के वोटर थे या कांग्रेस के वोटर थे। लेकिन डीएमके के मुकाबले थोड़ा सा सॉफ्ट है। दूसरा एक ऐसा वोट जो बीजेपी के मुकाबले थोड़ा सा सॉफ्ट है। ये स्पेस फिल करना है तमिलनाडु में और दोनों एक्सट्रीमिस्ट पार्टियों को अंदर थोड़ा सा साइड लाइन करना है। सीधे वाम शासन से बंगाल में बीजेपी का आना बहुत मुश्किल था। उस पूरी प्रक्रिया के लिए जरूरी था कि पहले कम्युनिस्ट हटे तब टीएमसी टाइप की एक पार्टी है जो हो तो सेक्यूलर लेकिन कम्युनिस्टों जितनी नहीं हो और तब फिर एक सामान्य प्रक्रिया के तहत तब बीजेपी आई। तमिलनाडु की जमीन बहुत गर्म है और उस गर्म जमीन पर बीजेपी के पांव नहीं रख सकती। तो थोड़ी सी जमीन ठंडी करने के लिए दो ऐसी पार्टियां बने जो स्थान को भर सके। जयललिता की मौत के बाद एआईएडीएम का हाल किसी से छिपा नहीं है। स्टालिन के राजनीतिक संयास के बाद डीएमके का हाल क्य़ा होगा पता नहीं क्य़ोंकि उदयनिधि से पार्टी कितनी संभल पाएगी इसका पता नहीं। बिहार के उदाहरण से भी इसे समझ सकते हैं। लालू के बाद तुरंत बीजेपी का आना मुश्किल था। लेकिन बीजेपी के आने के लिए जरूरी था कि बीच में नीतीश रहे जो कि लालू की तरह नहीं रहे लेकिन बीजेपी की तरह ना रहे थोड़ा सा मध्यम मार्ग कम्युनिस्ट और बीजेपी के बीच में टीएमसी जैसी रही। पंजाब में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिल सकता है। पंजाब में बिल्कुल एक एक्सट्रीम के बाद बिल्कुल एक राइट नहीं आएगा। बीच में एक ऐसी पार्टी चाहिए। एक बार कांग्रेस आ जाए तब बीजेपी के लिए राह आसान हो जाती है।