भारतीय किसानों के लिए US से बेहतर क्यों है EU की Mother of All Deals? समझिए इस मेगा ट्रेड एग्रीमेंट का पूरा गणित

By अभिनय आकाश | Jan 26, 2026

ग्रीनलैंड पर अमेरिकी राष्ट्रपति की नजर टिकी हो और यूरोप अपनी सुरक्षा को लेकर बेचैन हो तभी भारत और यूरोपीय संघ एक ऐसा रक्षा समझौता कर रहा है जो आने वाले सालों में वैश्विक शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल सकता है। दरअसल फ्रांस के साथ राफेल लड़ाकू विमान निर्माण डील को हरी झंडी मिलने के बाद अब भारत और यूरोपीय संघ एक बेहद अहम सिक्योरिटी और डिफेंस पार्टनरशिप एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने जा रहे हैं।  इस मुक्त व्यापार समझौते को 'मदर ऑफ ऑल डील्स' कहा जा रहा है यानी सभी समझौतों से बढ़कर। भारत-EU मिलकर ग्लोबल GDP का करीब एक चौथाई बनाते हैं और दोनों के पास 1.9 अरब के करीब की विशाल आबादी है। यह समझौता केवल इन दोनों के लिए ही नहीं, आज की वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए पूरी दुनिया की जरूरत है। 

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21 जनवरी को, 27 देशों के इस समूह के सांसदों ने 334 के मुकाबले 324 मतों से व्यापार समझौते को यूरोपीय न्यायालय में भेजने का फैसला किया। यह फैसला किसानों के विरोध प्रदर्शनों के बाद लिया गया। कृषि में उपयोग होने वाली सामग्रियों (जैसे उर्वरक, बिजली, सिंचाई का पानी, ऋण या कृषि मशीनरी) पर कुल सब्सिडी 2022-24 में औसतन 47.9 अरब डॉलर रही। यह ओईसीडी द्वारा निगरानी किए गए 54 देशों में से किसी भी देश से अधिक थी। हालांकि, पीएम-किसान जैसी योजनाओं के माध्यम से भारत में किसानों को दी जाने वाली प्रत्यक्ष आय सहायता और अन्य भुगतान, जो 7.9 अरब डॉलर थे, यूरोपीय संघ (58.6 अरब डॉलर) और अमेरिका (22 अरब डॉलर) की तुलना में काफी कम थे। वस्तु बाजार मूल्य समर्थन और भी अधिक चौंकाने वाला है, जिसका वार्षिक औसत मूल्य 2022-24 के दौरान भारत के लिए चौंका देने वाला -129 अरब डॉलर आंका गया। कृषि उत्पादों पर घरेलू भंडारण, आवागमन और विपणन संबंधी विभिन्न प्रतिबंधों के साथ-साथ समय-समय पर लगाए गए निर्यात प्रतिबंधों का प्रभाव यह है कि आंतरिक परिवहन और अन्य शुल्कों को घटाने के बाद भारत में कृषि उत्पाद की कीमतें सीमा (निर्यात समता) कीमतों से भी नीचे गिर जाती हैं।

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उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा है कि बहुपक्षीय व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय कानून और लोकतंत्र जैसे मूल्य चुनौती के दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में भारत को यूरोप ऐसे साझेदार के रूप में देख रहा है, जिससे संतुलन स्थापित करने में मदद मिल सकती है। यूरोपीय कमिशन की अध्यक्ष ने दबाव डालकर नहीं, बल्कि मर्जी से सहयोग की बात कही है। यह लाइन आज के संदर्भमें और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, खासकर अमेरिका को लेकर। 

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