World Lupus Day: क्यों महिलाओं के लिए 'साइलेंट किलर' है Lupus? जानें Hormones का पूरा खेल

By दिव्यांशी भदौरिया | May 11, 2026

आज है  World Lupus Day मनाया जा रहा है। यह प्रकार से ऐसी ऑटोइम्यून बीमारी है, जो पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को ज्यादा प्रभावित करती है। इस बीमारी का खतरा सबसे ज्यादा महिलाओं को होता है। खासतौर पर इस बीमारी के बारे में लोगों को कुछ पता ही नहीं है और इसके संकेतों पर ध्यान भी नहीं जाता है। अगर समय रहते हुए इस पर ध्यान दिया जाए तो इस बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है। सही समय पर इस बीमारी का पता लग जाए तो इस शरीर के अंगों तक पहुंचने से पहले इसे रोकने पर ध्यान दिया जाए, तो ट्रीटमेंट आसान हो जाता है। यह बीमारी महिलाओं को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। आइए आपको बताते हैं किन लक्षणों से पर ध्यान देना जरुरी है। 

    - ल्यूपस के शुरुआती संकेतों पर ध्यान देना जरुर दें। यदि इसे समय रहते हुए ध्यान न दिया जाए, तो यह किडनी, हार्ट और बाकी अंगों को प्रभावित कर सकता है।

 - इसका सबसे बड़ा लक्षण जोड़ों का दर्द है। उंगलियों, कलाई और घुटनों के आसा-पास सूजन और दर्द ल्यूपस का संकेत हो सकता है।

 - ल्यूपस आर्थराइटिस पर जोड़ों में विकृति पैदा नहीं करती है। यह न तो रुमेटीइड है और न ही ऑस्टियोआर्थराइटिस है।

 - इसके अतिरिक्त चेहरे पर आने वाले लाल रैशेज भी इसका संकेत हो सकते हैं। आमतौर पर नाक और गालों पर आने वाले बटरफ्लाई रैश इसके शुरुआती लक्षण माने जाते हैं।

 - ये रैशेज, हाथ, पैर और शरीर के बाकी अंगों पर भी हो सकते हैं। वहीं, ये रैशेज सूरज की रोशनी में ज्यादा दिक्कत देते हैं। 

 - यदि आपके बाल तेजी से झड़ रहे है और स्कैल्प पर भी रैशेज नजर आते हैं, तो इसे भी नजरअंदाज न करें। इसके अतिरिक्त ओरल अल्सर, बुखार, वजन कम होना और गर्दन के पास लिम्फ नोड्स में सूजन रहना, ये इसी बीमारी के संकेत हैं।

 - उंगलियों और नाखूनों के आसपास की त्वचा का रंग बदलना भी सही नहीं है। हाई ब्लड प्रेशर और पफीनेस पर ध्यान देना जरुरी है।

महिलाओं में क्यो ज्यादा होता है ल्यूपस का खतरा?

 रिसर्च के अनुसार, ल्यूपस महिलाओं को सबसे अधिक परेशान करता है। इतना ही नहीं, इसका खतरा टीनएज से लेकर 30 साल तक की महिलाओं में होता है। महिलाओं में एस्ट्रोजन का लेवल रिप्रोडक्टिव सालों में ज्यादा होता है और इसके उतार-चढ़ाव के चलते इम्यून सिस्टम प्रभावित करता है। इसके अलावा, प्रेग्नेंसी और पीरियड्स में होने वाला हार्मोनल इंबैलेंस होता है। वैसे जेनेटिक कारणों से भी हो सकता है। 

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