Chai Par Sameeksha: Loksabha में इस बार का हंगामा क्यों सबसे अलग था? क्या PM के खिलाफ कोई साजिश थी?

By अंकित सिंह | Feb 09, 2026

प्रभासाक्षी की साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह हमने देश के संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच चल रहे बवाल पर चर्चा की। हमेशा की तरह कार्यक्रम में मौजूद रहे प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे। नीरज दुबे ने कहा कि देश का बजट सत्र चल रहा है। संसद चल रहा है। एक दिन के लाखों में खर्च होते हैं। लेकिन अफसोस है कि लोकतांत्रिक देश होने के बावजूद भी हमारा सांसद नहीं चल पा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि इसके लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही जिम्मेदार है।

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नीरज दुबे ने कहा कि संसद सत्र से पहले सर्दलीय बैठक होती है। कार्य मंत्रणा समिति की भी बैठक होती है। इस दौरान इन बातों पर चर्चा होती है कि संसद के दौरान कौन-कौन से मुद्दे को उठाना है। हालांकि जो बातें बैठकों में होती है उस पर न सत्ता पक्ष और ना ही विपक्ष अमल करते हैं। हो-हल्ला शुरू हो जाता है। ऐसे में जनता के मुद्दे पीछे हो जाते हैं और सवाल ईगो पर आ जाता है। उन्होंने कहा कि जिन नियमों के तहत कांग्रेस एक ऐसी पुस्तक पर चर्चा की मांग कर रही है जो प्रकाशित हो नहीं हुआ है। अगर नियम में ऐसा कुछ नहीं है तो फिर चर्चा कैसे हो सकती है। नियम इस सरकार ने नहीं बनाए हैं। नियम पहले से ही बने हुए हैं।

नीरज दुबे ने यह भी कहा कि जब प्रधानमंत्री को बोलना था, तब कांग्रेस के महिला नेता उनके कुर्सी के पास पहुंच जाते हैं। स्पीकर की जिम्मेदारी है कि सदन सुचारू रूप से चले। इसको लेकर वह काम करें। हालांकि, स्पीकर के पास तमाम खुफिया सूचनाएं मिल जाती हैं और यही कारण है कि प्रधानमंत्री को लेकर उनके पास कुछ सूचनाएं गई होंगी। तभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उन्होंने संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई चर्चा का जवाब नहीं देने की अपील की थी। उन्होंने कहा कि कई बार हमने देखा है कि संसद के भीतर सुरक्षा में चूक हुई है। यही कारण है कि स्पीकर भी काफी सतर्क रहते हैं। 

नीरज दुबे ने कहा कि संसद भारत के लोकतंत्र का मंदिर है। वहां नियमों के हिसाब से हर चीज होना चाहिए। हर चीज नियम के हिसाब से हो इसकी जिम्मेदारी स्पीकर और अध्यक्ष के पास होती है। लेकिन विपक्ष अगर चाहता है कि सब कुछ उसके मुताबिक हो तो यह संभव नहीं है और अगर प्रधानमंत्री को घेरने की कोशिश होती है या योजना बनाई जाती है तो यह बिल्कुल लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। इससे विपक्ष की सोच पर कई सवाल खड़े होते हैं।

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