Trump ने ग्रीनलैंड कब्जाया तो खुश क्यों होंगे पुतिन? वजह जानकर चौंक जाएंगे आप

By अभिनय आकाश | Jan 22, 2026

अगर लगेगी आग तो आएंगे कई घर जद में, एक यहां पर सिर्फ हमारा ही मकान थोड़े ही है। राहत इंदौरी का मशहूर शेर है। पिछले साल अमेरिकी की सत्ता संभालने के साथ ही लगातार डोनाल्ड ट्रंप अपने फैसलों के जरिए सभी को चौंका रहे हैं।  ट्रंप सवेरे कुछ बोलते है, शाम को कुछ सोचते है औऱ रात को कुछ और ही करते है। उनके सोचने, समझने और कहने व करने में कोई कनेक्शन अमूमन होता नहीं है। ट्रंप ने जब वेनेजुएला जैसे देश पर स्ट्राइक कर उसके राष्ट्रपति को पत्नी सहित बेड़ियों में जकड़कर अपने देश में ले आए तो उस वक्त यूरोप ने इस पूरे मुद्दे पर चुप्पी साधी रखी। लेकिन ट्रंप तो ट्रंप हैं और वो खामोश कहा बैठने वाले थे। उनका अगला टारगेट ग्रीनलैंड बना। रोज उस पर नए नए बयान सामने आने लगे। यूरोप सहित नाटो का ट्रंप कभी मजाक बनाते तो कभी धमकाते नजर आए। लेकिन इस बार यूरोपिय देशों ने हिम्मत जुटाकर ग्रीनलैंड के मुद्दे पर ट्रंप के खिलाफ खिलाफत का बिगूल फूंक दिया। अमेरिका के ग्रीनलैंड पर कब्जे की चाह को लेकर नाटो में लड़ाई छिड़ गई है। फ्रांस जैसे यूरोपियन नाटो मेंबर्स इससे नाराज हो गए हैं। ग्रीनलैंड की स्वायत्ता को लेकर यूके, फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन और डेनमार्क ने एक जॉइंट स्टेटमेंट भी रिलीज किया था।  ईयू मेंबर्स जैसे यूके, नॉर्वे और कनाडा ने अमेरिका की धमकियों की निंदा की है।  ऑपरेशन आर्कटिक सिक्योरिटी के अंतर्गत आर्मी पर्सनल भी डिप्लॉय कर दिए हैं। लेकिन आपने वो पुरानी कहावत तो खूब सुनी होगी कि दो बिल्लियों की लड़ाई में रोटी बंदर ले जाता है। यूरोप और अमेरिका के बीच छिड़ी जंग का सीधा फायदा रूस को होगा। सोवियत यूनियन के डिसोल्यूशन में अमेरिका ने अहम भूमिका निभाई थी। उस दौरान सोवियत यूनियन में दशकों तक अमेरिका डिसोल्यूशन प्रोग्राम चला रहा था और फिर टूट गया था। 

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पुतिन ने किया साफ, हमारा कोई लेना देना नहीं 

अमेरिका और ग्रीनलैंड को लेकर चल रहा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस बीच रूस ने भी इस मामले में अपनी एंट्री ले ली है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड को पाने की कोशिशों ने एक ओर जहां डेनमार्क को असमंजस में डाल दिया है और उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) की एकजुटता को भी झकझोर दिया है वहीं रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि उनका इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है। पुतिन ने  राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक में कहा कि इससे हमारा कोई लेना-देना नहीं है कि ग्रीनलैंड के साथ क्या होता है। उनका यह बयान टेलीविजन पर प्रसारित किया गया। रूस के राष्ट्रपति ने कहा कि यूं तो डेनमार्क ने ग्रीनलैंड को हमेशा एक उपनिवेश की तरह माना है और उसके प्रति क्रूर नहीं, तो काफी कठोर रवैया तो अपनाया ही है लेकिन यह बिल्कुल अलग मामला है और मुझे संदेह है कि अभी किसी की इसमें रुचि होगी। पुतिन ने कहा कि इससे हमारा कोई लेना-देना नहीं है। मुझे लगता है कि वे इसे आपस में सुलझा लेंगे। उन्होंने जिक्र किया कि 1917 में डेनमार्क ने इस द्वीप समूह को अमेरिका को बेच दिया था। पुतिन ने इस बात का भी जिक्र किया कि 1867 में रूस ने अलास्का को 72 लाख अमेरिकी डॉलर में अमेरिका को बेच दिया था।

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अमेरिका–यूरोप तनाव पर रूस की खुशी


अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ते तनाव को रूस अपने लिए एक मौके के रूप में देख रहा है। माना जा रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप की योजनाओं के साथ मॉस्को का सहयोग एक सोच-समझी रणनीति का हिस्सा है। इसका मकसद पश्चिमी देशों की एकता को कमजोर करना और अमेरिका का ध्यान दूसरी दिशाओं में उलझाए रखना है। यह रणनीति कुछ हद तक सफल भी होती दिख रही है। ट्रंप ने अपने सहयोगी देशों के कड़े विरोध के बावजूद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की खुले तौर पर तारीफ की। उन्होंने शी को “अद्भुत व्यक्ति” बताया और कहा कि उन्होंने “बेहद शानदार काम” किए हैं और वे “दुनिया भर में सम्मानित” हैं। साथ ही ट्रंप ने यह भी दोहराया कि उनके संबंध शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दोनों के साथ हमेशा अच्छे रहे हैं। इसी सप्ताह जब ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को हासिल करने की कोशिशों को लेकर अमेरिका और यूरोप के बीच तनाव बढ़ा, तो रूस में अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं। रूसी अधिकारियों, सरकारी समर्थन वाले मीडिया और क्रेमलिन समर्थक ब्लॉगर्स ने इस पर खुशी, तंज और कुछ हद तक सतर्कता के साथ प्रतिक्रिया दी। कुछ लोगों ने ट्रंप के कदम को ऐतिहासिक बताया, जबकि दूसरों का कहना था कि इससे यूरोपीय संघ और नाटो कमजोर होते हैं, जो रूस के लिए फायदेमंद हो सकता है। कई विश्लेषकों का मानना है कि इससे पश्चिमी देशों का ध्यान रूस–यूक्रेन युद्ध से भी कुछ हद तक हटता है, जो मॉस्को के हित में जाता है।

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रूस, चीन ने कहा- ग्रीनलैंड के लिए हम खतरा नहीं

ग्रीनलैंड पर धमकी के बीच चीन ने कहा कि अपने हित साधने के लिए अमेरिका 'चीनी खतरे' को बहाने के रूप में इस्तेमाल करना बंद करे। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों पर कानून आधारित अंतरराष्ट्रीय ही मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की बुनियाद है और इसे बनाए रखा जाना चाहिए। ने भी कहा कि ग्रीनलैंड के आसपास की 'गंभीर भू-राजनीतिक स्थिति' रूस पर हमारी नजर है। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने साफ किया कि ग्रीनलैंड के मामलो में दखल देने में रूस की दिलचस्पी नहीं है। अमेरिका भी जानता है कि रूस की ग्रीनलैंड पर कब्जे की कोई योजना नही है। लावरोव ने यह भी कहा कि हमारे विचार से ग्रीनलैंड डेनमार्क का प्राकृतिक हिस्सा नहीं है। यह न तो नॉर्वे का प्राकृतिक हिस्सा था और न ही डेनमार्क का। यह औपनिवेशिक जीत का हिस्सा है। ट्रंप ग्रीनलैंड पर कब्जे के लिए रूस और चीन को खतरा बता रहे हैं। इसको लेकर वहां के विदेश मंत्री सरगे लावो ने बयान दिया है और ग्रीनलैंड को लेकर बड़ी बात कही है। 20 जनवरी 2026 को लावरोव ने मास्को में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि रूस का ग्रीनलैंड के मामलों में दखल देने का कोई इरादा नहीं है। साथ ही उन्होंने कहा कि अमेरिका को पता है कि मास्को का खुद ग्रीनलैंड पर कब्जा करने का कोई प्लान नहीं है। रूस किसी के अधिकार को चुनौती नहीं देता लेकिन खुद को भी नजरअंदाज करने की अनुमति नहीं दे सकता। रूसी डिप्लोमेसी के अनुसार साल 2025 के परिणामों पर आयोजित कॉन्फ्रेंस में लावरोव ने पश्चिम के भीतर संकट की प्रवृत्तियों के बारे में बात की जिसमें ग्रीनलैंड इसका नया उदाहरण है क्योंकि यह नाटो देशों में बहुत ज्यादा तनाव पैदा कर रहा है। उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक से पश्चिमी देश अंतरराष्ट्रीय कानून के मूल स्वरूप का सक्रिय रूप से विरोध कर रहे हैं। रूस ग्रीनलैंड के आसपास की गंभीर भू राजनीतिक स्थिति पर नजर रख रहा है।

विदेश मंत्री लाबरोव के मुताबिक ग्रीनलैंड ना तो नॉर्वे का प्राकृतिक हिस्सा था और ना ही डेनमार्क का। यह एक औपनिवेशक जीत का हिस्सा है। यह दूसरी बात है कि वहां के लोग इसके आदि हो गए हैं और सहज महसूस करते हैं। इसके साथ ही उन्होंने रूस की ताकत पर बात की और चुनौती भरे अंदाज में कहा कि रूस किसी को भी अपने कानूनी अधिकारों की अनदेखी नहीं करने देगा। उन्होंने आगे कहा कि रूस हमेशा अपने हितों की रक्षा करेगा। किसी के भी कानूनी अधिकारों को चुनौती नहीं देगा। लेकिन वह अपने कानूनी अधिकारों को भी हल्के में नहीं लेगा। 

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ट्रम्प अभी एक साथ कई फ्रंट को खोलने से बच रहे हैं 

पिछले कई महीनों से ग्रीनलैंड पर सैन्य कब्जे का बयान दे रहे ट्रम्प ने दावोस में यूटर्न लिया है। कारण अब तक ट्रम्प वेनेजुएला, ईरान, क्यूबा जैसे देशों के साथ वन टू वन की स्थिति में थे। लेकिन ग्रीनलैंड में यदि वे सेना का इस्तेमाल कर हमला करते हैं तो यूरोप के 27 देशों से अमेरिका को सैन्य मोर्चे पर आमना-सामना करना पड़ सकता है। ट्रम्प अभी कई फ्रंट नहीं खोलना चाहते हैं। एक अन्य कारण यूरोप की कथित एकता भी है। ये बड़ी से अस्थायी सी है। क्योंकि ब्रिटेन ईयू में नहीं है। ब्रिटेन अमेरिका के साथ अलग से ट्रेड डील कर चुका है। ब्रिटेन पर अभी अमेरिका का बेस लाइन 10 फीसदी टैरिफ ही है। जबकि ट्रम्प ग्रीनलैंड के मुद्दे पर ईयू पर 10% और जून से अतिरिक्त 25% टैरिफ का ऐलान कर चुके हैं। इटली की पीएम मेलोनी ने अब तक ट्रम्प के खिलाफ टैरिफ को लेकर कोई बड़ा बयान जारी नहीं किया है।

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