क्या वाकई गांधी मुक्त हो पाएगी कांग्रेस?

By अभिनय आकाश | Jul 04, 2019

14-15 अगस्त 1947 की आधी रात को दुनिया सो रही थी तब हिन्दुस्तान अपनी नियति से मिलन कर रहा था। कांग्रेस आज़ादी की लड़ाई का दूसरा नाम बन चुकी थी। उस कांग्रेस के सबसे बड़े नेता थे पंडित जवाहर लाल नेहरू। आज़ादी के उस दौर के पांच साल के भीतर कांग्रेस का सत्ता से साक्षात्कार हुआ। लेकिन नियति से हाथ मिलाने के 72 साल बाद आज वही पार्टी अपनी रहनुमाई और दिन संवारने की उम्मीद में नेहरू-गांधी परिवार से इतर नजरें टिकाई बैठी है। 

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एक साल 7 महीने और 17 दिन तक अध्यक्ष रहने वाले राहुल ने साल 2013 में जयपुर की कड़कड़ाती हुई गर्मी के बीच जब कांग्रेस कार्यसमिति के दौरान सत्ता को जहर बताने वाला भाषण दिया था तो कई कार्यकर्ताओं की आंखे नम हो गई थी। लेकिन उस वक्त वो ये नहीं जानते थे कि राहुल इस जहर को पीने की बजाय मैदान छोड़ भागना पसंद करेंगे। गांधी परिवार के चिराग ने उस वक्त कांग्रेस को अंधेरे में छोड़ा है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कांग्रेस मुक्त भारत की परिकल्पना से इतर सोच रहे हैं। ऐसे में राहुल ने खुद को तो कांग्रेस के शीर्ष पद से अलग कर लिया है लेकिन क्या कांग्रेस पार्टी खुद को गांधी परिवार के खूंटे से अलग कर पाएगी। इसके लिए इतिहास के कुछ तथ्यों को टटोलना बेहद जरूरी है। नेहरू-गांधी परिवार ने आजादी के बाद करीब 40 साल तक पार्टी के शीर्ष पद पर स्‍थान हासिल किया है। जवाहर लाल नेहरू ने तीन साल के लिए, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने आठ-आठ साल जबकि सोनिया गांधी ने 19 साल तक अध्‍यक्ष पद की बागडोर अपने हाथ में रखी और राहुल ने करीब दो साल। पिछले दो दशक को देखें तो पार्टी के अध्यक्ष रहे पीवी नरसिम्हा राव के बाद कोई ऐसा गैर गांधी नेता नहीं हुआ, जिसका राष्ट्रीय स्तर पर जनाधार और स्वीकार्यता हो। पीवी नरसिम्हा राव का कार्यकाल बिना किसी हस्तक्षेप के पूरा हुआ था। इसके बाद सीताराम केसरी को हटा पार्टी की कमान सोनिया गांधी को सौंप दी गई। 19 वर्षों तक अध्यक्ष पद पर रहने वाली सोनिया ने न सिर्फ कांग्रेस को फिर से जीवंत किया था बल्कि 2004 और 2009 के चुनाव में शीर्ष पर भी लेकर गई थी। अप्रैल 1998 में जब सोनिया गांधी ने जब कांग्रेस की कमान संभाली, तब भी पार्टी की सियासी हालत कमजोर थी। कांग्रेस की हालत दिन-ब-दिन बुरी होती देख सोनिया ने न सिर्फ जिस जिम्मेदारी को संभाला बल्कि दो लोकसभा चुनाव में पार्टी की सरकार भी बनाई। उस वक्त करिश्माई नेता अटल बिहारी वाजपेयी और अपनी रथयात्रा से भाजपा को सत्ता का शिखर हासिल करवाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी की सशक्त जोड़ी सोनिया के सामने थी। लेकिन राहुल ने मोदी और शाह की अपराजय माने जाने वाली जोड़ी जैसी थ्योरी को अपने इस कदम से और बल दिया है। 

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बहरहाल, नए अध्यक्ष की तलाश करती पार्टी कमान के लिए हिंदी भाषी क्षेत्र से होना जरूरी है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि पार्टी उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में अपने अस्तित्व को संघर्ष कर रही है। कांग्रेस के संविधान के तहत जब किसी कारण वश अध्यक्ष का इस्तीफा हो जाता है तो वरिष्ठ महासचिव को इसकी जिम्मेदारी दी जाती है। तब तक जब स्थायी रूप में अध्यक्ष का चुनाव नहीं हो जाता है। ऐसे में 90 वर्षीय मोतीलाल वोरा के अंतरिम अध्यक्ष बनने के कयास लगाए जा रहे हैं और कई नाम मीडिया के जरिए भी सामने आ रहे हैं। लेकिन इस पर अंतिम मुहर कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में ही लगेगा।

- अभिनय आकाश

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