मोदी-ट्रंप के सार्थक संवाद से क्या राह बदलेगी?

By ललित गर्ग | Sep 19, 2025

नई दिल्ली में भारत-अमेरिकी व्यापार वार्ता की बाधाओं को दूर करने पर दोनों पक्षों के बीच सकारात्मक बातचीत के दौरान करीब तीन महीने बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को फोन करके जन्मदिन की बधाई देते हुए रूस-यूक्रेन युद्धविराम का समर्थन करने के लिए आभार जताना, दोनों देशों के बीच रिश्तों में आई तल्खी को कम करने की कोशिश मानी जानी चाहिए। मोदी और ट्रंप के बीच हुई इस बातचीत ने दोनों देशों के रिश्तों में नई आशा और सकारात्मकता का संचार किया है। क्योंकि अमेरिका के एकतरफा टैरिफ और कुछ तीखे बयानों के बावजूद भारत ने संयम बरता एवं तीखी प्रतिक्रिया की बजाय मसले के सुलझने का इंतजार करते हुए विवेक एवं समझदारी का परिचय दिया। भारत पर थोपे गए ट्रंप के 50 प्रतिशत टैरिफ को लेकर अमेरिका में साफ तौर पर दो विरोधी स्वर सुनाई पड़ रहे हैं। ऐसे माहौल में जरूरी हो गया है कि दोनों देशों के बीच शीर्ष स्तर पर संवाद जारी रहे। इसी बात को अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने स्वीकार करते हुए यह उम्मीद जताई थी कि आखिरकार अमेरिका और भारत साथ आएंगे, यही मौजूदा वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है। मोदी एवं ट्रंप का ताजा संवाद इसी की निष्पत्ति बना है। यह संवाद मोदी के 75वें जन्मदिवस के अवसर पर हुआ और इसमें अतीत की कई कड़वाहटों को पीछे छोड़कर भविष्य की संभावनाओं पर ध्यान केंद्रित किया गया। दरअसल, दोनों नेताओं की बातचीत का बड़ा कारण शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में रूस, चीन और भारत के शीर्ष नेताओं की गर्मजोशी भी बना, उससे ट्रंप की चिंताएं बढ़ी थी, इस बैठक के बाद ही पहली बार ट्रंप के रुख में नरमी के संकेत मिले थे। उसके बाद दस सितंबर को फिर ट्रंप ने कहा कि भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं की बाधाओं को दूर करने पर बातचीत जारी है। ताजा वार्ता ने यह संदेश दिया कि भारत और अमेरिका के रिश्ते किसी एक घटना या परिस्थिति पर निर्भर नहीं, बल्कि दीर्घकालीन रणनीति और साझा हितों की नींव पर खड़े हैं।

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भारत और अमेरिका का रक्षा सहयोग पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ा है। अमेरिका ने भारत को महत्वपूर्ण रक्षा तकनीक उपलब्ध कराई है और संयुक्त सैन्य अभ्यासों से सुरक्षा साझेदारी मजबूत हुई है। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए भारत-अमेरिका का रक्षा सहयोग न केवल द्विपक्षीय है, बल्कि पूरे क्षेत्रीय संतुलन के लिए अहम है। चीनी मनमानी पर नियंत्रण के लिए अमेरिका को खासतौर पर भारतीय सहयोग की जरूरत है। इसी मकसद से क्वॉड का गठन किया गया, जिसे अमेरिकी सरकार ने तवज्जो भी दी। लेकिन, ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी की वजह से क्वॉड के भविष्य पर सवाल उठने लगे हैं। वहीं, वॉशिंगटन में यह भी चिंता बनी कि पिछले दो दशकों में भारत-अमेरिका रिश्तों में जो प्रगति हुई थी, वह ट्रंप की महत्वाकांक्षाओं एवं अतिश्योक्तिपूर्ण हरकतों से पिछले कुछ दिनों में बेकार होती हुई दिख रही थी। लेकिन देर आये दुरस्त आये की कहावत के अनुसार दोनों शीर्ष नेताओं की बातचीत से अब अंधेरे छंटते हुए दिख रहे हैं। अमेरिका चाहता है कि भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में संतुलन कायम रखने में और बड़ी भूमिका निभाए, वहीं भारत अपनी सामरिक स्वतंत्रता बनाए रखते हुए सहयोग को और गहरा करना चाहता है।

भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में अमेरिका एक अहम सहयोगी बन सकता है। अमेरिका से तरलीकृत प्राकृतिक गैस और कच्चे तेल का आयात बढ़ रहा है। यह न केवल ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था को भी नई गति देगा। तकनीकी क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच साझेदारी मजबूत है। सूचना प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष अनुसंधान और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में सहयोग आने वाले दशकों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। अमेरिका में बसे भारतीय मूल के लोग दोनों देशों के बीच सेतु का कार्य कर रहे हैं। चाहे राजनीति हो, शिक्षा, स्वास्थ्य या तकनीक-भारतीय-अमेरिकी समुदाय का योगदान उल्लेखनीय है। यह समुदाय भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों को भावनात्मक और सांस्कृतिक आधार देता है। ट्रंप और मोदी की बातचीत में भारतीय प्रवासी समुदाय की प्रशंसा भी हुई, जिसने दोनों देशों के बीच विश्वास और निकटता को और बढ़ाया।

भारत और अमेरिका दोनों आतंकवाद से प्रभावित रहे हैं। 9/11 की घटना ने अमेरिका को और 26/11 ने भारत को गहरे जख्म दिए। यही कारण है कि आतंकवाद के खिलाफ दोनों का दृष्टिकोण काफी हद तक समान है। हाल की बातचीत में आतंकवाद को समाप्त करने और सुरक्षा सहयोग को बढ़ाने पर भी जोर दिया गया। अफगानिस्तान और मध्य-एशिया की परिस्थितियों को देखते हुए भारत और अमेरिका का सहयोग वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए निर्णायक हो सकता है। ट्रंप और मोदी की बातचीत ने यह साबित किया है कि अतीत के मतभेद रिश्तों का अंत नहीं, बल्कि नए संवाद का अवसर बन सकते हैं। व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, तकनीक और आतंकवाद जैसे क्षेत्रों में सहयोग दोनों देशों के लिए लाभकारी है। आज जब दुनिया वैश्विक महामारी, आर्थिक संकट, युद्ध की विभीषिका और भू-राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रही है, भारत और अमेरिका की साझेदारी नई दिशा और स्थिरता का संकेत देती है। 

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार-वार्ता में बेशक व्यवधान आए हों, पर भारत और यूरोपीय संघ के बीच जिस गति से वार्ता हो रही है, उससे वर्ष के अंत तक दोनों में व्यापार समझौता होने की पूरी उम्मीद है। असल में दोनों देशों के बीच पांच दौर की व्यापार वार्ता हो चुकी है, लेकिन 50 फीसदी टैरिफ लगाए जाने के बाद छठे दौर की प्रस्तावित वार्ता रुक गई थी, जो बीते मंगलवार से फिर पटरी पर लौट आई है। दरअसल, ट्रंप प्रशासन चाहता है कि भारत अपने कृषि एवं डेयरी क्षेत्र को अमेरिकी कंपनियों के लिए पूरी तरह से खोले, लेकिन भारत के लिए यह संभव नहीं है, क्योंकि यह उसके किसानों व मछुआरों के हितों के खिलाफ है। भारत पहले ही कह चुका है कि वह किसानों, डेयरी उत्पादकों एवं एमएसएमई के हितों से कोई समझौता नहीं करेगा।

दोनों देशों के बीच पिछले एक दशक में द्विपक्षीय व्यापार लगभग दोगुना हो गया है और इसे 2030 तक 500 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन यह तभी संभव था, जब मौजूदा गतिरोध खत्म हो और इसके लिए बातचीत ही रास्ता है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा बने रहने के लिए भारत दूसरे देशों के साथ भी मुक्त व्यापार समझौते कर रहा है। भले ही डोनाल्ड ट्रंप पर अधिक भरोसा नहीं कर सकते, लेकिन सवाल यह है कि अब उनकी तरफ से दिखाई जा रही नरमी को क्या एक संकेत माना जाए कि इससे कोई नई राह निकलेगी। अड़ियल रुख अपनाने के बजाय अमेरिका को भारतीय नजरिया समझने की जरूरत थी, अब अमेरिका भारत का नजरिया समझने को तत्पर हुआ है तो निश्चित ही इसके दूरगामी परिणाम आयेंगे।

- ललित गर्ग

लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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