By कमलेश पांडे | Jan 10, 2026
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दृष्टिगत राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) जो केंद्र में सत्तारूढ़ है, के बीच जिस तरह की सियासी जंग छिड़ी हुई है; केंद्र व राज्य की प्रशासनिक मिशनरियों के दुरूपयोग की बातें सुनी जा रही हैं, उससे साफ है कि दिल्ली की तत्कालीन सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (आप) के मुखिया अरविंद केजरीवाल की ही तरह पश्चिम बंगाल की मौजूदा मुखिया ममता बनर्जी को उनके पद से हटाकर ही भाजपा रहेगी।
यही वजह है कि भाजपा ने मशहूर चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को शह प्रदान करने वाली कंपनी आई-पैक की नकेल कसने का निश्चय किया है और अपनी प्रशासनिक प्रभाव वाली मिशनरी ईडी को उसके पीछे लगा दिया है, जैसा कि आरोपी लगते आये हैं। तभी तो टीएमसी और ईडी के बीच कोयला तस्करी से जुड़े आई-पैक छापों पर विवाद तेज हो गया है, जहां ममता बनर्जी ने केंद्रीय एजेंसी पर चुनावी डेटा चोरी का आरोप लगाया है। वहीं, ईडी का दावा है कि ममता ने जांच में बाधा डाली और महत्वपूर्ण दस्तावेज ले लिए। देखा जाए तो यह विवाद 2026 बंगाल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले केंद्र-राज्य टकराव को उभार रहा है।
बताते चलें कि ईडी ने 7-8 जनवरी 2026 को कोलकाता और दिल्ली में आई-पैक (टीएमसी की चुनावी सलाहकार फर्म) के 10 ठिकानों पर छापे मारे, जो कोयला घोटाले से जुड़े हैं। इससे विचलित हुईं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद ही छापे स्थल पहुंचीं और अपनी पार्टी की जरूरत वाली दस्तावेज बचाकर ले गईं, जिसे ईडी ने बाधा बताते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दायर की। वहीं, टीएमसी ने भी कोर्ट में ईडी पर राजनीतिक डेटा चुराने का केस ठोका, जबकि कोलकाता पुलिस ने ईडी के खिलाफ दो मामले दर्ज किए।
इस प्रकार उक्त विवाद का राजनीतिक प्रभाव स्पष्ट है। कुलमिलाकर यह विवाद टीएमसी को 'केंद्र की साजिश' का शिकार दिखाने में मदद कर रहा है, जो उसके वोट बैंक को एकजुट कर सकता है। जबकि भाजपा इसे भ्रष्टाचार उजागर करने का मौका मान रही है, खासकर पुराने घोटालों (स्कूल जॉब्स, पीडीएस) के बाद। वहीं अन्य विपक्षी दल जैसे कांग्रेस और आप टीएमसी का समर्थन कर रहे हैं, जबकि सीपीआई(एम) इसे स्टेज्ड ड्रामा बता रहा है।
इससे पुनः यह सवाल उठता है कि आखिर चुनाव से ठीक पहले शुरू हुआ यह राजनीतिक और प्रशासनिक ड्रामा किसके पक्ष में जाएगा? शायद टीएमसी के पक्ष में, क्योंकि इस विवाद से भी ममता की 'संघर्षरत नेता' की छवि मजबूत हो रही है। वहीं, जिस तरह से नई दिल्ली में टीएमसी सांसदों के प्रदर्शन से इंडिया गठबंधन को मजबूती मिली है, उससे साफ है कि चुनावी डेटा चोरी का नैरेटिव मुस्लिम-दलित वोटों को पुनः लोकसभा चुनाव 2024 की तरह ही एकजुट कर सकता है। क्योंकि टीएमसी को वोट एकीकरण में मदद मिलेगी, उसकी केंद्र-विरोधी नैरेटिव मजबूत होगी। यह बात दीगर है कि यदि कोर्ट में हार मिली तो इससे उनकी छवि को धक्का पहुंचेगा।
हालांकि, भाजपा के पक्ष में सकारात्मक बात यह है कि यदि ईडी कोयला घोटाले में ठोस सबूत लाती है, तो टीएमसी नेताओं (अभिषेक बनर्जी से जुड़े केस) पर दबाव बनेगा और भाजपा 'विकास vs भ्रष्टाचार' पर हमला बोल सकेगी। वहीं, कोर्ट फैसला भाजपा को नैतिक ऊंचाई दे सकता है। यदि ऐसा हुआ तो, जैसा कि दिल्ली का अनुभव चुगली कर रहा है कि केजरीवाल के बाद ममता का सियासी शिकार करके ही भाजपा दम लेगी। क्योंकि भाजपा भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक्सपोजर पा जाएगी और राज्य सरकार पर दबाव बनाने में सफल होगी, जबकि जोखिम यह है कि उसपर एजेंसी दुरुपयोग का आरोप पुष्ट होगा, जिससे जनता का मूड बदला तो उसे लेने के देने भी पड़ सकते हैं।
सुलगता सवाल है कि आखिर इस विवाद का चुनावी प्रभाव पश्चिम बंगाल पर कितना होगा? तो जवाब होगा कि टीएमसी-ईडी विवाद पश्चिम बंगाल के अप्रैल 2026 विधानसभा चुनावों पर सीमित, लेकिन लक्षित प्रभाव डाल सकता है, खासकर करीबी सीटों (लगभग 90) पर जहां वोट अंतर कम है। यह केंद्र-राज्य टकराव को तेज कर टीएमसी को 'पीड़ित' की छवि दे रहा है, लेकिन लंबे समय तक भ्रष्टाचार के आरोपों से उसकी साख को नुकसान पहुंचा सकता है।
जहां तक टीएमसी पर प्रभाव की बात है तो इस विवाद से टीएमसी का कोर वोट बैंक (मुस्लिम-दलित) एकजुट हो सकता है, क्योंकि ममता की 'साजिश के खिलाफ लड़ाई' वाली इमेज मजबूत हुई है। वहीं नई दिल्ली प्रदर्शन और इंडिया गठबंधन का समर्थन मिलने से राज्य में सहानुभूति पैदा कर 5-10 सीटें बचा सकता है। हालांकि, कोयला घोटाले जैसे पुराने केस दोहराने से शहरी/मध्यम वर्ग में असंतोष बढ़ेगा।
जहां तक भाजपा पर प्रभाव की बात है तो भाजपा को भ्रष्टाचार उजागर करने का नैरेटिव मिला है, जो उसके 'परिवर्तन' एजेंडे को मजबूत करेगा, विशेषकर आदिवासी/हिंदू बहुल क्षेत्रों में। यदि कोर्ट ईडी के पक्ष में फैसला देता है, तो 10-15 सीटों पर फायदा संभव; वोटर लिस्ट SIR विवाद के साथ मिलकर ध्रुवीकरण तेज करेगा। जबकि जोखिम यह है कि एजेंसी दुरुपयोग का आरोप विपक्ष को मजबूत बनाएगा। जहां तक कुल चुनावी प्रभाव की बात है तो कुल 294 सीटों में यह विवाद 20-30 सीटों तक सीमित रह सकता है, क्योंकि बंगाल में स्थानीय मुद्दे (बेरोजगारी, SIR, बांग्लादेश तनाव) हावी हैं।
सवाल है कि इस विवाद से प्रभावित 90 विधानसभा सीटें कौन-कौन सी हैं तो जवाब होगा कि टीएमसी-ईडी विवाद से प्रभावित 90 विधानसभा सीटों का विश्लेषण वोटर लिस्ट विवाद (SIR योजना से 56 लाख नाम हटने) से जुड़ा है, न कि सीधे ईडी छापों से। ये वे सीटें हैं जहां वोटर अंतर कम (5,000 से कम) है और नाम हटने से टीएमसी का वोट बैंक प्रभावित हो सकता है। प्रभावित क्षेत्र यानी 90 सीटें मुख्यतः दक्षिण बंगाल (हावड़ा, हुगली), उत्तर बंगाल (कूचबिहार, जलपाईगुड़ी), और कोलकाता उपनगरीय इलाकों में हैं। ईडी विवाद इनमें टीएमसी को सहानुभूति दे सकता है, जबकि भाजपा भ्रष्टाचार फोकस बढ़ाएगी। इस विवाद से प्रभावित होने वाली प्रमुख सीटें निम्नलिखित हैं: पहला, दक्षिण 24 परगना (30+ सीटें): बासिरहाट उत्तर, हरिर्पाड़ा, बस्ती हावड़ा – मुस्लिम बहुल, नाम हटने से 7.5% प्रभाव। दूसरा, उत्तर 24 परगना (20 सीटें): बिद्हन्नागर, राजारहाट, बारीसपुर– शहरी, मध्यम वर्ग असंतोष। तीसरा, हुगली-हावड़ा (15-20): चंद्रताल, सिंगुर, पानतड़स– 2021 के करीबी मुकाबले। चतुर्थ, उत्तर बंगाल (15): माथाभांगा, तुलराम, फाल्टा– आदिवासी/राजबंशी प्रभावित। इससे साफ है कि नो रिस्क, नो गेन की सियासत जारी रहेगी।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक