Devji और Malla Raji Reddy जैसे शीर्ष माओवादी नेताओं के आत्मसमर्पण के साथ नक्सलवाद मुक्त होने की राह पर बढ़ा देश

By नीरज कुमार दुबे | Feb 23, 2026

तेलंगाना और छत्तीसगढ़ की सरहद से आई एक खबर ने दशकों से चल रहे माओवादी आंदोलन की कमर तोड़ कर रख दी है। प्रतिबंधित संगठन सीपीआई माओवादी के शीर्ष कमांडर और प्रमुख रणनीतिकार टिप्परी तिरुपति उर्फ देवजी तथा वरिष्ठ नेता मल्ला राजी रेड्डी उर्फ संग्राम का आत्मसमर्पण उस अभियान की निर्णायक कड़ी बन गया है, जिसे केंद्र सरकार ने मार्च 2026 तक नक्सलवाद के पूर्ण उन्मूलन के लक्ष्य के साथ शुरू किया था।

1983 में उसने सीपीआई एमएल पीपुल्स वार ग्रुप का दामन थामा और भूमिगत हो गया। 1983 से 1984 के बीच वह गढ़चिरोली दलम का सदस्य रहा। 1985 में एरिया कमेटी सदस्य बना और 2001 में केंद्रीय समिति में जगह पाई। 2016 में उसे केंद्रीय सैन्य आयोग का प्रभारी बनाया गया।

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देवजी को पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी के गठन का श्रेय दिया जाता है। वह संगठन की केंद्रीय समिति और पोलित ब्यूरो का सदस्य रहा तथा दक्षिण भारत जोन और सेंट्रल रीजनल ब्यूरो में सैन्य रणनीति का मुख्य मार्गदर्शक बना। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक 2010 के दंतेवाड़ा हमले सहित कई बड़े हमलों की साजिश से उसका संबंध रहा है। उस पर एक से ढाई करोड़ रुपये तक का इनाम घोषित था।

मई 2025 में सीपीआई माओवादी के महासचिव नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजु की मौत के बाद माना जा रहा था कि देवजी ने संगठन की कमान संभाली। ऐसे समय में उसके आत्मसमर्पण ने संगठन के नेतृत्व को लगभग शून्य में ला खड़ा किया है।

वहीं मल्ला राजी रेड्डी उर्फ संग्राम लगभग 76 वर्ष का अनुभवी माओवादी नेता है। वह पेद्दापल्ली जिले के मुथारम मंडल के सथराजपल्ली गांव का निवासी है। 1975 में उसने नक्सली आंदोलन का रास्ता चुना और संगठन में विभिन्न अहम पदों पर रहा। उसके सिर पर भी एक करोड़ रुपये का इनाम था।

राजी रेड्डी कई नामों से जाना जाता रहा और संगठन के केंद्रीय समिति सह पोलित ब्यूरो सदस्य के रूप में सक्रिय था। वह उन अंतिम शीर्ष नेताओं में था जिसकी तलाश सुरक्षा बलों को थी। उसके साथ सोलह अन्य कैडर का आत्मसमर्पण माओवादी ढांचे के तेजी से सिमटते दायरे का संकेत है।

हम आपको बता दें कि 17 फरवरी को छत्तीसगढ़ तेलंगाना सीमा पर नाम्बी और कर्रेगुट्टा पहाड़ियों में सीआरपीएफ के नेतृत्व में केजीएच 2 नाम से व्यापक अभियान शुरू हुआ था। खुफिया ब्यूरो और विशेष खुफिया शाखा ने परिवार और परिचितों के जरिये भी दबाव बढ़ाया। तेलंगाना के डीजीपी बी शिवाधर रेड्डी ने 15 फरवरी को खुले मंच से भूमिगत नेताओं से मुख्यधारा में लौटने की अपील की थी और राज्य की सरेंडर एंड रिहैबिलिटेशन योजना के तहत मदद का आश्वासन दिया था।

बताया जाता है कि पिछले दो दिनों से देवजी और राजी रेड्डी पुलिस के संपर्क में थे। अंतत: रविवार तड़के कोमाराम भीम आसिफाबाद जिले में विशेष खुफिया ब्यूरो के समक्ष उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। 

बताया जाता है कि अक्टूबर 2025 में तेलंगाना के ही मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ सोनू ने गढ़चिरौली में 60 कैडर के साथ आत्मसमर्पण कर अस्थायी रूप से सशस्त्र संघर्ष त्यागने और युद्धविराम की बात कही थी। उसके रुख का कुछ वरिष्ठ नेताओं ने विरोध किया और माना जाता है कि देवजी सशस्त्र संघर्ष जारी रखने के पक्ष में था। यह वैचारिक विभाजन संगठन को भीतर से कमजोर करता रहा। अब जब स्वयं देवजी ने हथियार डाल दिए तो यह संकेत है कि जमीन पर हालात बदल चुके हैं।

देखा जाये तो पिछले एक वर्ष में देशभर में 2793 कैडर ने आत्मसमर्पण किया, जिनमें 1590 केवल बस्तर क्षेत्र से थे। 2025 में 1040, 2024 में 881, 2023 में 376 और 2022 में 496 आत्मसमर्पण दर्ज हुए। केवल तेलंगाना में पिछले दो वर्षों में 588 माओवादी नेता और कैडर सामान्य जीवन में लौटे हैं।

हम आपको याद दिला दें कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट ऐलान किया था कि 31 मार्च तक देश से माओवादी उग्रवाद पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा। उनका यह बयान जमीनी हकीकत पर आधारित दिखता है। तीन वर्षों में व्यापक अभियान, सटीक खुफिया समन्वय, राज्यों के बीच तालमेल और पुनर्वास नीति के संयोजन ने माओवाद की रीढ़ तोड़ दी है। सुरक्षा बलों ने साफ संदेश दिया था कि या तो आत्मसमर्पण करें या तीव्र अभियान में समाप्त कर दिए जाएंगे। देवजी और राजी रेड्डी का आत्मसमर्पण उसी संदेश की परिणति है।

अब जब माओवादी संगठन के शीर्ष चार केंद्रीय समिति सदस्य में से दो ने हथियार डाल दिए, तो यह माना जा सकता है कि माओवादी आंदोलन अपने अंतिम दौर में है। अमित शाह का संकल्प अब लगभग साकार होता दिख रहा है। दशकों तक खून और हिंसा से दागदार रहे इलाकों में अब शांति, विकास और लोकतांत्रिक मुख्यधारा की उम्मीद मजबूत हुई है।

-नीरज कुमार दुबे

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