By नीरज कुमार दुबे | Aug 10, 2026
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट अब साफ सुनाई देने लगी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले सप्ताहांत दिल्ली दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात कर उत्तर प्रदेश के चुनावी समीकरण और रणनीति पर चर्चा की। प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद योगी ने इसे ‘सुशासन के मार्ग पर लगातार आगे बढ़ने’ के लिए प्रेरणा देने वाला बताया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस मुलाकात को सिर्फ शिष्टाचार भेंट के तौर पर नहीं देखा जा रहा।
नई व्यवस्था में प्रदेश महामंत्री दिलीप पटेल को अवध, अभिजात मिश्रा को गोरखपुर, प्रदेश उपाध्यक्ष रमेश सिंह को काशी और गीता शाक्य को बृज क्षेत्र की जिम्मेदारी दी गई है। राम प्रताप चौहान को पश्चिम तथा शंकर लोधी को कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र का प्रभारी बनाया गया है। भाजपा ने इस बार सात की जगह आठ प्रदेश महामंत्री बनाए हैं। इसमें राजेश चौधरी को युवा मोर्चा, संजय राय को ओबीसी मोर्चा, धर्मेंद्र सिंह को अनुसूचित मोर्चा, कामेश्वर सिंह को महिला मोर्चा, प्रियंका रावत को अनुसूचित जनजाति मोर्चा, देवेश कोरी को अल्पसंख्यक मोर्चा और शंकर गिरि को किसान मोर्चे की जिम्मेदारी दी गई है।
यह बदलाव महज संगठनात्मक फेरबदल नहीं माना जा रहा। भाजपा की रणनीति साफ तौर पर हर सामाजिक वर्ग और हर क्षेत्र में अपनी राजनीतिक पकड़ को चुनाव से पहले मजबूत करने की दिखाई दे रही है। मोर्चों और क्षेत्रीय समितियों के जरिए पार्टी अपने संदेश को गांव और बूथ तक पहुंचाने की तैयारी में है। नौ अगस्त से शुरू हुई तिरंगा यात्रा को भी इसी व्यापक जनसंपर्क अभियान की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। लखनऊ में आयोजित तिरंगा यात्रा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी ने भाजपा के चुनावी सक्रियता के संकेत और मजबूत कर दिए हैं।
संगठन के बाद अगला बड़ा सवाल उम्मीदवारों का है। पार्टी के भीतर विधानसभा सीटों पर संभावित उम्मीदवारों को लेकर शुरुआती मंथन आरम्भ हो चुका है। खास तौर पर मौजूदा विधायकों का रिपोर्ट कार्ड तैयार कराया जा रहा है। उनके कामकाज, क्षेत्र में सक्रियता और जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता का आकलन सर्वे के जरिए किए जाने की बात सामने आ रही है।
यानी सिर्फ विधायक होना टिकट की गारंटी नहीं होगा। जिस विधायक के खिलाफ स्थानीय स्तर पर नाराजगी होगी या जिसका प्रदर्शन कमजोर माना जाएगा, उसके स्थान पर नया चेहरा उतारने का विकल्प खुला रहेगा। भाजपा इस बार युवाओं को बड़ी संख्या में मौका देने की तैयारी में बताई जा रही है और इनमें महिलाओं की भी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी हो सकती है। यही वजह है कि आने वाले महीनों में कई मौजूदा विधायकों के टिकट पर संशय बना रह सकता है।
इसी बीच भाजपा के भीतर एक और दिलचस्प सवाल उठ रहा है। एक-दो लोकसभा सांसद विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जता रहे हैं, जबकि कुछ सांसद अपने परिजनों के लिए टिकट मांग रहे हैं। ऐसे में भाजपा के सामने परिवारवाद से खुद को दूर रखने की चुनौती भी होगी।
उम्मीदवारों के साथ ही एनडीए के भीतर सीट बंटवारे का सवाल भी जल्द महत्वपूर्ण होने वाला है। भाजपा के सहयोगी दलों को मोटे तौर पर अपने संभावित हिस्से का अंदाजा पहले से है, लेकिन पिछली बार चुनाव बाद एनडीए में शामिल हुए सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर के साथ सीटों को लेकर औपचारिक बातचीत अहम होगी। राजभर की पार्टी पहले ही ज्यादा सीटों पर अपनी दावेदारी के संकेत देती रही है।
एनडीए के दूसरे सहयोगी भी अपनी राजनीतिक ताकत के आधार पर अधिक सीटों के लिए मोलभाव करना चाह रहे हैं। ऐसे में भाजपा के सामने चुनौती यह होगी कि सहयोगियों को पर्याप्त राजनीतिक स्पेस देते हुए अपनी सीटों और संगठनात्मक वर्चस्व में संतुलन कैसे कायम रखा जाए। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन पहले ही साफ कर चुके हैं कि भाजपा 2027 का चुनाव एनडीए सहयोगियों के साथ लड़ेगी और गठबंधन को मजबूत रखते हुए सत्ता में वापसी का लक्ष्य है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा ने नेतृत्व को लेकर कोई भ्रम नहीं छोड़ा है। नितिन नबीन पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि 2027 के विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ ही भाजपा का चेहरा होंगे और पार्टी उनके नेतृत्व में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने के लक्ष्य के साथ मैदान में उतरेगी।
यही वजह है कि योगी भी सत्ता में हैट्रिक लगाकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया इतिहास रचने के लिए पूरी ताकत झोंकते दिखाई दे रहे हैं। देखा जाये तो भाजपा के लिए यह चुनाव केवल सरकार बचाने की लड़ाई नहीं बल्कि योगी मॉडल को जनादेश दिलाने की परीक्षा भी है।
दूसरी ओर समाजवादी पार्टी लगातार पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक राजनीति के जरिए भाजपा को चुनौती देने की कोशिश कर रही है। ऐसे में भाजपा भी संगठन में ओबीसी, दलित, महिला, युवा और किसान मोर्चों को सक्रिय करके सामाजिक समीकरणों को साधने की तैयारी में है। चुनावी राजनीति जैसे-जैसे गर्म होगी, संवेदनशील मुद्दों पर भाजपा और विपक्ष के बीच टकराव भी बढ़ने के आसार हैं।
भाजपा की रणनीति केवल संगठन और टिकट तक सीमित नहीं रहने वाली। बताया जा रहा है कि शारदीय नवरात्रि से उत्तर प्रदेश में केंद्रीय मंत्रियों के दौरे बढ़ाए जाएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी राज्य में अधिक से अधिक कार्यक्रम कराने की योजना है। यानी आने वाले महीनों में यूपी भाजपा का चुनावी अभियान संगठन, सरकार और केंद्रीय नेतृत्व, तीनों मोर्चों पर एक साथ दिखाई देगा।
देखा जाये तो राजनीतिक संदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि भाजपा 2027 की लड़ाई को समय से पहले शुरू करना चाहती है। संगठन में नए चेहरों की एंट्री, विधायकों का रिपोर्ट कार्ड, संभावित टिकटों पर सर्वे, युवाओं और महिलाओं को अवसर, एनडीए में सीटों का गणित और मोदी-योगी की जोड़ी को केंद्र में रखकर अभियान, इन सभी कड़ियों को जोड़ें तो भाजपा की चुनावी रणनीति की तस्वीर सामने आती है।
अब असली परीक्षा यह होगी कि भाजपा अपने संगठनात्मक अनुशासन और सामाजिक समीकरणों को कितनी कुशलता से वोट में बदल पाती है। विपक्ष की पीडीए राजनीति के सामने भाजपा का सामाजिक विस्तार कितना असरदार साबित होता है, सहयोगी दल कितनी सीटों पर संतुष्ट होते हैं और मौजूदा विधायकों में कितनों को दोबारा मौका मिलता है, इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश की चुनावी पटकथा तय करेंगे।
फिलहाल इतना तय है कि योगी के दिल्ली दौरे और भाजपा की नई संगठनात्मक नियुक्तियों के साथ उत्तर प्रदेश में मिशन-2027 की उलटी गिनती तेज हो चुकी है। अब लखनऊ से लेकर दिल्ली तक हर राजनीतिक कदम की निगाह 2027 के लखनऊ पर होगी।
-नीरज कुमार दुबे