रोजगार बढ़ाने के मोर्चे पर योगी आदित्यनाथ की सरकार तेजी से कर रही काम

By ललित गर्ग | Feb 09, 2021

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने युवाओं के बिखर गये सपनों, टूट गयी आशाओं एवं निराशा की स्थितियों पर विराम लगाते हुए युवाओं की ऊर्जा को प्रदेश-निर्माण में खपाने का नया खाका खींचना शुरू कर दिया है। यह एक सराहनीय कदम है और बेहद जरूरी भी है क्योंकि कोरोना के विषम काल में घर लौटे लाखों युवाओं ने नौकरियां गंवाई हैं। प्रदेश सरकार ने ऐसे 10 लाख युवाओं को काम पर लगाने और काम देने लायक बनाने की तैयारी का संकल्प लेकर युवाओं की मुर्झायी मुस्कान को लौटाने का अभिनव उपक्रम किया है। इन्हें एक साल के अंदर कौशल विकास केंद्रों की मदद से हुनरमंद बनाया जाएगा। युवा ना केवल लीड करेंगे, निर्माण को साकार करेंगे बल्कि विकास को नये पंख लगायेंगे। जाहिर है राष्ट्र का वर्तमान राजनीतिक शीर्ष नेतृत्व इस युवा आबादी को देखकर ना केवल इस पर रश्क करेगा बल्कि इसे अपना गर्व भी मानेगा। यकीनन इसमें कोई संशय भी नहीं होना चाहिए कि युवा हमारी शक्ति है और आने वाले समय का आधार है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में कहा भी है कि जब पूरे विश्व पटल की तरफ देखते हैं, भारत के युवा मन को देखते हैं तो ऐसा लगता है कि आज भारत सच्चे में एक अवसरों की भूमि है। अनेक अवसर हमारा इंतजार कर रहे हैं।

कोरोना महामारी के कारण चौपट हो चुकी अर्थ-व्यवस्था एवं लगातार रोजगार छिनने के बढ़ते आंकड़ों के बीच सभी राज्य-सरकारों एवं केन्द्र सरकार के सामने युवाओं को रोजगार देना प्राथमिकता होना ही चाहिए। प्रश्न है कि नये रोजगार देने के वायदों को पूरा करने के लिये फण्ड कहां से आएगा? समस्या बड़ी है और समाधान की राह भी बड़ी ही चुननी होगी, सफल नेतृत्व ऐसी ही बाजीगरी एवं करिश्माई तौर-तरीकों का खेल है, जो जितना साहस एवं हौसलों से जितने बड़े निर्णय करता है, वह उतना ही अपने नेतृत्व में जादू दिखाता है, इस दृष्टि से योगी आदित्यनाथ जादुई करतब दिखाते रहे हैं। उनकी मंशा एवं दृष्टिकोण स्पष्ट एवं पारदर्शी है कि वे प्रदेश के विकास में युवाओं की सक्रिय सहयोगिता के साथ रोजगार के नये अवसरों की प्रस्तुति चाहते हैं।

उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में रोजगार का निर्णय भले ही एक राजनीतिक निर्णय माना जाये, लेकिन यही कुशल एवं प्रभावी नेतृत्व का सशक्त आधार भी है। युवाओं के दर्द को समझने और उस पर योगी का निरंतर ध्यान देना अकारण नहीं है। ऐसा नहीं है कि पूर्ववर्ती सरकारों ने युवाओं को तराशने को प्राथमिकता पर नहीं रखा। वर्ष 2017 से पूर्व के चार वर्षों में व्यावसायिक शिक्षा व कौशल विकास विभाग ने 3.71 लाख युवाओं को ट्रेनिंग दी थी। योगी राज में प्रशिक्षण पाने वालों का आंकड़ा इससे दोगुना (सात लाख) हो गया। ऐसी उपलब्धियां ही योगी सरकार के शासन को अनूठा एवं प्रभावी बनाती हैं। इसके दृष्टिगत 10 लाख युवाओं को ट्रेनिंग का लक्ष्य कठिन बेशक है, नामुमकिन कतई नहीं। लॉकडाउन में घर लौटे 38 लाख प्रवासियों के कौशल को प्रमाणित करके सरकार अपनी क्षमता का सबूत पहले दे भी चुकी है। ताजा लक्ष्य भी मजबूत इंफ्रांस्टक्चर पर टिका है। इसकी बुनियाद राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान यानी आइटीआइ बनेंगे।

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आज भारत में युवाओं की संख्या विश्व में सबसे अधिक है। विश्व का हर पांचवां युवा भारत में रहता है, इस युवा शक्ति को अच्छी तरह से शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण दिया जाये तो इनको न केवल अच्छा रोजगार मिलेगा बल्कि यह देश के आर्थिक विकास में भी अच्छा योगदान दे सकते हैं, कोरोना से ध्वस्त हुई अर्थ-व्यवस्था को पटरी पर ला सकते हैं लेकिन जिस तरह से पिछले कुछ समय से देश में पर्याप्त रोजगार का सृजन नहीं हो रहा है और विशेषकर युवाओं के बीच बेरोजगारी बढ़ रही है, इसके परिणास्वरूप कई नई समस्याएं उभर रही हैं। कोरोना महामारी ने इस समस्या को अधिक गहराया है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की रिपोर्ट के मुताबिक आर्थिक विकास के संकुचन के दौरान वेतनभोगी नौकरियां सबसे अधिक प्रभावित हो रही हैं। वेतनभोगी नौकरियां आर्थिक विकास या उद्यमशीलता में वृद्धि के साथ बढ़ती हुई भी दिखाई नहीं दे रही हैं, जो अधिक चिन्ता का विषय है। इससे स्पष्ट होता है कि आज के युवाओं में बेरोजगारी के कारण असंतोष फैल रहा है। यह स्थिति सरकारों के लिये रोजगार के मुद्दे पर अधिक संवेदनशील होने की आवश्यकता को उजागर कर रही है।

बेरोजगारी की समस्या विश्वव्यापी समस्या है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर जैसे कई विकसित देश भी बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे हैं और वे संरक्षणवाद और स्थानीय लोगों को रोजगार देने के लिए वीजा नीतियों में बदलाव कर रहे हैं। हालांकि केंद्र सरकार ने युवाओं के लिए नए रोजगार सृजन करने के लिए ‘स्टार्टअप’ और ‘स्टैंडअप’ जैसी योजनाएं भी लागू की हैं लेकिन परिणाम अपेक्षा के अनुकूल नहीं निकल रहा है क्योंकि फंड और अच्छे स्किल्ड लोगों की कमी के कारण ज्यादातर ‘स्टार्टअप’ आज बंद हो गए हैं। वर्तमान सरकार की सबसे महत्वपूर्ण योजना ‘मेक इन इंडिया’ भी नई नौकरियों का सृजन करने में असफल रही है। ऐसे जटिल समय में देश में सर्विस सेक्टर को भी बढ़ावा देने की जरूरत है, जहां भविष्य में नई नौकरियों के सृजन की सम्भावना ज्यादा है।

कुछ दिनों पहले नीति आयोग के सदस्य विबेक देबरॉय ने यही बात कही ‘आने वाले समय में ज्यादातर रोजगार सर्विस सेक्टर में होगा न कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में’, जिसमें टूरिज्म, हॉस्पिटैलिटी, हेल्थ केयर, नवीकरणीय ऊर्जा, शिक्षा, टेलिकॉम और बैंकिंग प्रमुख क्षेत्र हो सकते हैं। अगर सरकार ने जल्द इस दिशा में सकारात्मक कदम नहीं उठाए तो देश के जिस युवा वर्ग को देश का ‘डेमोग्रफिक डिविडेंट’ कहा जाता है, वह कहीं देश के लिए ‘डेमोग्रफिक डिजास्टर’ न बन जाए। आज नरेन्द्र मोदी सरकार एवं राज्य-सरकारों का लक्ष्य सिर्फ देश-प्रदेश की आर्थिक विकास दर ही नहीं बल्कि नए रोजगार का सृजन करना भी होना चाहिए। इससे ही देश की आर्थिक विकास दर अपने आप तेज होगी। पिछले 20 वर्षों में देश की आर्थिक विकास दर काफी अधिक होने के बाद भी नए रोजगार का बहुत कम सृजन हुआ, जिसके कारण ही इस अवधि को ‘जॉबलेस ग्रोथ पीरियड’ भी कहा जाता है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार इन स्थितियों को गंभीरता से लेते हुए जो कदम उठा रही है, निश्चित ही उनके सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे, अन्य राज्यों एवं केन्द्र सरकार को भी इससे प्रेरणा लेनी चाहिए। इस पटरी पर लौटती अर्थव्यवस्था एवं सरकारों की प्रथम प्राथमिकता रोजगार ही होना चाहिए। अन्यथा भीतर-ही-भीतर युवाओं में पनप रहा असंतोष एवं आक्रोश किसी बड़ी क्रांति एवं विद्रोह का कारण न बन जाये?

-ललित गर्ग

(लेखक, पत्रकार, स्तंभकार)

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