सोशल मीडिया के इस युग में पुस्तकों से विमुख हो गयी है आज की पीढ़ी

By देवेन्द्रराज सुथार | Apr 23, 2020

किताबें झांकती हैं बंद आलमारी के शीशों से, बड़ी हसरत से तकती हैं, महीनों अब मुलाकातें नहीं होती, जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं, अब अक्सर गुजर जाती है कंप्यूटर के पर्दों पर....। गुलजार साहब की ये कविता किताबों के उस दौर की याद दिलाती है जब किताबें जीवन का अभिन्न अंग हुआ करती थी। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन के द्वारा पढ़ने, प्रकाशन और कॉपीराइट को बढ़ावा देने के लिए प्रतिवर्ष 23 अप्रैल को विश्व पुस्तक दिवस आयोजित किया जाता है। ज्ञातव्य है कि 23 अप्रैल 1564 को शेक्सपीयर का निधन हुआ था। शेक्सपीयर एक ऐसे लेखक थे जिनकी कृतियों का अनुवाद विश्व की समस्त भाषाओं में हुआ है। इन्होंने अपने जीवन काल में करीब 35 नाटक और 200 से अधिक कविताएं लिखीं। साहित्य जगत में शेक्सपीयर को जो स्थान प्राप्त है उसी को देखते हुए यूनेस्को ने 1995 और भारत सरकार ने 2001 में 23 अप्रैल के दिन को विश्व पुस्तक दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की है।

 

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बदलते युग में तकनीक की घुसपैठ के कारण किताबों के पठन में भारी गिरावट देखने को मिली है। अधिकतर युवा अब फेसबुक, वाट्सएप तथा इंटरनेट पर अपना समय गुजारना पसंद करते हैं। किताबें अब केवल ड्राइंग रूम में सजावट का सामान बनकर रह गई हैं। किताबों के प्रति तेज गति से हो रहा मोहभंग चिंताजनक है। गौरतलब है कि 24 राज्यों के 26 जिलों में 'असर' (एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट) द्वारा किए गए सर्वे में आश्चर्यजनक नतीजे बताते हैं कि इन राज्यों के साठ-साठ गांवों में किए गए सर्वे में यह बात निकलकर आई कि वहां 94 फीसदी लोगों के पास मोबाइल और करीब 74 के पास टेलीविजन है। लेकिन किताबें और मैगजीन के मामले में यह आंकड़ा बेहद निराशाजनक है। केवल 10 फीसदी लोगों के घरों में ही किताबें और मैगजीन मिली हैं। दुनियाभर की 285 यूनिवर्सिटी में ब्रिटेन और इटली की यूनिवर्सिटी ने संयुक्त अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला है कि जो छात्र डिजिटल तकनीक का अधिकतम उपयोग करते हैं, वे पढ़ाई के साथ पूरी तरह नहीं जुड़ पाते और फिसड्डी साबित होते हैं। ज्यादा इंटरनेट के इस्तेमाल से उन्हें अपेक्षित परिणाम नहीं मिलता और उनमें अकेलेपन की भावना घर कर जाती है। अध्ययन में 25 प्रतिशत छात्रों ने बताया कि उन्होंने दिनभर में 4 घंटे ऑनलाइन बिताए जबकि 70 प्रतिशत ने एक से तीन घंटे तक इंटरनेट का इस्तेमाल किया। इनमें 40 प्रतिशत छात्रों ने सोशल नेटवर्किंग का इस्तेमाल किया जबकि 30 प्रतिशत ने सूचना के लिए इसका इस्तेमाल किया। इंटरनेट की लत से कई तरह की क्षमता प्रभावित होती है। जैसे, उत्तेजना नियंत्रण, भविष्य की योजना और शैक्षिक वातावरण में बेहतर तालमेल नहीं बना पाना आदि। इसलिए इंटरनेट की लत से प्रभावित छात्रों को पढ़ाई में ज्यादा मुश्किल नजर आई जबकि ऐसे छात्र जो इंटरनेट से दूर रहे वे ज्यादा सफल रहे। 

 

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निःसंदेह किताबों को लेकर यह हताशा का माहौल हमारे पिछड़ जाने का संकेत है। किताबों से दिनोंदिन बढ़ती दूरी हमें नैतिक पतन, भौतिकवाद एवं आत्ममुग्ध आधुनिकता से ग्रस्त कर रही है। सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं साहित्यिक जैसे तमाम क्षेत्रों का ज्ञान हमें किताबों से ही मिलता है। किताबें अमर है और जो हमारे व्यक्तित्व का निर्माण कर हमें जीवन जीने की कला सिखाती है। यही नहीं किताबें एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ज्ञान हस्तांतरित करने का सशक्त माध्यम भी है। किताबों से बुद्धि का विकास का होता है तथा हम महान लोगों से चिर-परिचित होकर उनके पदचिन्हों पर चलने की प्रेरणा लेते हैं। दरअसल किताबें सोच बनाने व बदलने का माद्दा रखती है। किताबें हमें अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों काल की जानकारी देती है। किताबें मनुष्य की सच्ची मित्र है जो प्रत्येक परिस्थिति में बखूबी साथ निभाती है। एक अच्छी किताब हमें सफलता के शिखर तक पहुंचा सकती है। अतः आवश्यक है कि हम किताबों के पठन की परंपरा को बरकरार रखें। मोबाइल, टीवी और कंप्यूटर पर समय व्यतीत करने के बजाय उसका उपयोग किताबों से ज्ञान अर्जित करने में करें। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि आज के दौर में किताबों की कीमत में काफी वृद्धि हुई है। अब किताबें रियाहती दरों पर मिलनी मुश्किल है। बढ़ती महंगाई से किताबों का सुनहरा संसार भी अछूता नहीं है। आम आदमी के बजट से बाहर होती किताबों के मूल्य में उछाल किताबों के प्रति उदासीनता की वजह है। सच्चाई है कि बाजारवाद के कारण किताबों में अश्लीलता ने पांव पसारे हैं। यह साहित्य सामग्री युवाओं को लक्ष्य से विचलित कर रही है। इस तरह की साहित्य सामग्री पर रोक लगनी चाहिए तथा इनका प्रकाशन बंद होना चाहिए। किताबों के चयन और लेखन दोनों पर विचार-विमर्श आज समय की मांग है।  


- देवेन्द्रराज सुथार


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