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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[सावन में Greater Noida के इस प्राचीन शिव मंदिर का दर्शन हैं बेहद खास, भक्तों की भीड़ लगी रहती है!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/visit-bisrakh-shiv-mandir-in-greater-noida-this-sawan]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सावन का महीना भगवान शिव को अति प्रिय है। श्रावण मास को बेहद ही पवित्र माना जाता है। इस दौरान श्रद्धालु व्रत व पूजा-अर्चना करते हैं। सावन के दौरान भक्तजन भगवान शिव के मंदिरों का दर्शन करने जरुर जाते हैं। अगर आप दिल्ली-एनसीआर में रहते हैं, तो एक बार नोएडा के इस मंदिर में घूमने जरुर जाएं।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">ग्रेटर नोएडा में प्रसिद्ध प्रचीन शिव मंदिर है, जिसे सावन के महीने में भक्तों के दर्शन के लिए बेहद खास माना जाता है। तो चलिए इस लेख में हम आपको बताते हैं यह मंदिर कहां है और क्यों खास है?</span></div><div><br></div><div><b>ग्रेटर नोएडा में कहां है भोलेनाथ का सबसे खास मंदिर?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">भगवान शिव का यह मंदिर ग्रेटर नोएडा के बिसरख गांव में स्थित है। मंदिर का नाम प्राचीन शिव मंदिर है, जिसका संबंध रावण से जोड़कर देखा जाता है। दरअसल, बिसरख गांव को रावण का जन्मस्थल माना जाता है। वाल्मीकि रामायण के ग्रंथों के अनुसार रावण के पिता ऋषि विश्रवा और माता कैकेसी का आश्रम इसी गांव में था। इस कारण से इस मंदिर को शिव पूजा के लिए बेहद खास माना गया है, क्योंकि रावण भगवान भोलेनाथ के सबसे बड़े भक्त में से एक हैं।</span></div><div><br></div><div><b>कहां पर स्थित प्राचीन शिव मंदिर?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">यह मंदिर ग्रेटर नोएडा वेस्ट के बिसरख जलालपुर गांव में सेक्टर-1 स्थित है। यहां पर पहुंचना आसान है, आइए आपको बताते हैं कैसे यहां पर पहुंचे-</span></div><div><br></div><div>- यदि आप दिल्ली से आ रही हैं, तो नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे या&nbsp; NH-9 के रास्ते से यहां से जा सकती है। यहां पर पहुंचने पर आपको करीब 1 से 1.5 घंटे का समय लग सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- अगर आप नोएडा से आने का प्लान कर रहे हैं, तो सेक्टर 62, सेक्टर 71 या गौर सिटी से कैब या ऑटो लेकर यहां पहुंचा जा सकता है। यदि आप मेट्रो से जाने का प्लान बना रही हैं, तो आप 52 या 59 मेट्रो स्टेशन पर उतरकर ऑटो लें सकती हैं।</div><div><br></div><div>- दरअसल, मेट्रो का सबसे नजदीकी मेट्रो स्टेशन नोएडा सेक्टर 52 है। यहां से ऑटो या कैब लेकर बिसरख गांव पहुंच सकती हैं। दूरी करीब 11 किमी की है, जिसमें आपको 30 से 45 मिनट लग सकते हैं।</div><div><span style="font-size: 1rem;"><b>प्राचीन शिव मंदिर से जुड़ी खास जानकारी</b></span></div><div><span style="font-size: 1rem;">इस मंदिर में आपको प्राचीन शिवलिंग पर चढ़ाने का अवसर प्राप्त होगा। सावन के दौरान यहां पर ज्यादा भीड़ रहती है इसिलए सुबह आने वाले भक्त जरुर ध्यान दें। इस मंदिर में आपके पूरे शिव परिवार की प्रतिमाओं के साथ-साथ अन्य देवताओं की प्रतिमा के दर्शन करने का मौका मिलेगा।</span></div><div><br></div><div>- मंदिर सुबह 5 बजे से लेकर 12 बजे तक खुला रहता है।</div><div><br></div><div>&nbsp;- शाम को 4 बजे से लेकर रात 9 बजे तक आप दर्शन कर सकते हैं।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 17:46:20 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/visit-bisrakh-shiv-mandir-in-greater-noida-this-sawan</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Sawan 2026 Special: नागपंचमी और महाशिवरात्रि पर खुलने वाले ये Unique Temples, जानें इनकी पौराणिक परंपराएं]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/rare-shiva-temples-in-mp-nagchandreshwar-and-someshwar]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>श्रावण मास भगवान शिव को अति प्रिय है। कल यानी 30 जुलाई 2026 से सावन का महीना शुरु होने जा रहा है। इस महीने का इंतजार शिवभक्त लंबे समय से करते हैं। देशभर के शिवालयों में भक्तों की लंबी-लंबी लाइनें देखने को मिलती है।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">कुछ भक्तजन जलाभिषेक करने जाते हैं, तो कई लोग अपनी मनोकामना को लेकर भगवान भोलेनाथ के दरबार में पहुंच सकती हैं। क्या आप भी सावन में भगवान शिव के अनोखे मंदिरों के दर्शन करना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए है।</span></div><div><br></div><div><b>भगवान शिव के अनोखे मंदिर</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">भारत में भगवान शिव के हजारों मंदिर हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी मंदिर हैं जो अपनी अनोखी परंपराओं के लिए अलग पहचान रखते हैं। इन्हीं में से दो मंदिर ऐसे हैं जिनके कपाट पूरे साल बंद रहते हैं। सिर्फ साल में एक बार इनके कपाट खोले जाते हैं। बता दें कि, एक मंदिर के कपाट सावन में खुलते हैं। दूसरे के कपाट भगवान शिव के ही खास त्योहार पर खोले जाते हैं। आइए आपको इन दोनों मंदिर के बारे में बताते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">मध्य प्रदेश के उज्जैन जिला में स्थित महाकालेश्वर मंदिर परिसर में तीसरी मंजिल पर भगवान नागचंद्रेश्वर का भी मंदिर है। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इसके कपाट सिर्फ साल में एक बार नाग पंचमी के दिन 24 घंटे के लिए खोले जाते हैं। जबकि पूरा साल यह मंदिर बंद रहता है।</span></div><div><br></div><div><b>क्यों है यह मंदिर इतना खास?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">इस मंदिर में भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की दुर्लभ प्रतिमा है। यहां भगवान शिव नाग की शय्या पर हैं। ऐसी प्रतिमा बहुत कम जगह देखने को मिलती है। माना जाता है कि नाग पंचमी के दिन यहां दर्शन करने और पूजा करने से भगवान शिव और नाग देवता का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यहां आने वाले श्रद्धालु मानते हैं सच्चे मन से प्रार्थना करने पर उनकी मनोकामनाएं जरुर पूर्ण होती हैं। वैसे इस मंदिर के दर्शन के कालसर्प दोष दूर हो जाता है।</span></div><div><br></div><div><b>कैसे पहुंचें उज्जैन के नागचंद्रेश्वर मंदिर?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">यहां जाने के लिए आपको उज्जैन पहुंचना होगा। सबसे पहले आप उज्जैन जंक्शन मेन रेलवे स्टेशन पहुंच जाए। वहां से मंदिर मात्र 2 से 3 किलोमीटर की दूरी पर है, जहां से ऑटो या ई-रिक्शा आसानी से मिल जाएगा। फ्लाइट से आने के लिए आपको इंदौर के देवी अहिल्याबाई होल्कर एयरपोर्ट पर उतरना होगा, जो कि उज्जैन से करीब 53 किलोमीटर दूर है। यहां से आप बस या ट्रैक्सी लेकर पहुंच सकते हैं। इसके अलावा आप बस या प्राइवेट कार से भी उज्जैन पहुंच सकते हैं। उज्‍जैन के नागचंद्रेश्वर मंदि‍र इस तरह पहुंच सकते हैं-</span></div><div><br></div><div>- नागचंद्रेश्वर मंद‍िर के ल‍िए आपको महाकाल मंदिर के लिए ऑटो या टैक्सी ले सकते हैं।</div><div><br></div><div>&nbsp;- महाकालेश्वर मंदिर परिसर में सबसे ऊपरी मंजिल पर नागचंद्रेश्वर मंदिर मौजूद है।</div><div><br></div><div>&nbsp;- नागपंचमी के दौरान यहां काफी भीड़ देखने को मिलती है।&nbsp;</div><div><br></div><div><b>रायसेन का सोमेश्वर महादेव मंदिर</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">एमपी के रायसेन जिले की पहाड़ियों पर स्थित है सोमेश्वर महादेव मंदिर, जो अपनी अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है। यह मंदिर ऊंचाई पर बना हुआ और यहां पर पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को चढ़ाई करनी पड़ती है।</span></div><div><br></div><div><b>कब खुलते हैं सोमेश्वर महादेव मंदिर के कपाट?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">यहां के लोकल के अनुसार, इस मंदिर के कपाट महाशिवरात्रि के दिन कुछ घंटों के लिए खोले जाते हैं। इसी समय भक्तजन पूजा और दर्शन के लिए आते हैं। वरना पूरे साल यह मंदिर बंद रहता है।</span></div><div><br></div><div><b>मंदिर बंद रहने पर भी पहुंचते हैं श्रद्धालु</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">जब यह मंदिर बंद रहता है, तो तभी श्रद्धालु यहां आना नहीं छोड़ते है। लोग मंदिर के बाहर से ही भगवान शिव को प्रणाम करते हैं और अपनी श्रद्धा को दर्शाते हैं। यहां पर आने वाले कई श्रद्धालुओं अपनी मनोकामना मांगते समय मंदिर के प्रवेश द्वार पर कलावा बांधते हैं। कहा जाता है कि इच्छा पूरी होने पर भक्त यहां पर दोबारा आकर कलावा खोलते हैं। वैसे यह यह स्थानीय परंपरा है।</span></div><div><br></div><div><b>कैसे पहुंचें रायसेन के सोमेश्वर महादेव मंदिर?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">- यह मंदिर मध्य प्रदेश के रायसेन में स्थित है। इसलिए आपको रायसेन पहुंचना होगा।</span></div><div><br></div><div>&nbsp;- एमपी की राजधानी भोपाल से रायसेन करीब 45 किलोमीटर दूर है।</div><div><br></div><div>&nbsp;- रेलवे स्टेशन भोपाल जंक्शन से आप रायसेन के लिए टैक्सी ले सकती हैं।</div><div><br></div><div>&nbsp;- जब आप रायसेन पहुंचेगी तो आपको किले के निचले हिस्से (तलहटी) तक जाना होगा। उधर से मंदिर तक जाने के लिए पैदल चढ़ाई करनी पड़ती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- वैसे मंदिर साल में एक बार महाशिवरात्रि पर खोला जाता है, बाकी समय आप किले के बाहर दर्शन कर सकते हैं। सावन के दौरान आप रायसेन का किला देख सकती हैं।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 17:53:49 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/rare-shiva-temples-in-mp-nagchandreshwar-and-someshwar</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Ram Lalla Shringar: Ayodhya Ram Mandir में Ram Lalla की पोशाक का रहस्य, क्यों Navgraha के अनुसार बदलते हैं वस्त्रों के रंग]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/the-mystery-behind-ram-lalla-attire-at-ayodhya-ram-mandir]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अयोध्या के राम मंदिर में विराजमान रामलला के राजसी ठाठ हैं। हर रोज रामलला के वस्त्र बदले जाते हैं। रामलला हर रोज अलग-अलग रंग की पोशाकें पहन रहे हैं। वहीं रामलला की पोशाकें भक्तों को भी काफी आकर्षक लगती हैं। प्राप्त जानकारी के मुताबिक रामलला की पोषाकों के रंगों का चयन ग्रहों के मुताबिक किया गया है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि रामलला का श्रृंगार रोज अलग रंग के कपड़ों से क्यों होता है और इसका क्या महत्व है।</div><div><br></div><h2>रामलला की पोषाकें</h2><div>बता दें कि रामलला के अधिकतर वस्त्र बंगाल, राजस्थान, उड़ीसा, कश्मीर और आंध्र के सिल्क के बनते हैं। रामलला सोमवार को सफेद, मंगलवार को लाल, बुधवार का हरा, बृहस्पति वार को पीला, शुक्रवार को क्रीम, शनिवार को नीला और रविवार को गुलाबी रंग के कपड़े पहनते हैं। रोजाना नई धोती और दो पटका पहनते हैं। इसमें एक पटका छोटा और दूसरा बड़ा होता है। पटकों पर गुलाबी रंग की छपाई होती है। कुल मिलाकर यह पूरी तरह से भारतीय परंपरागत परिधान हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/simhachalam-temple-only-24-hours-of-actual-darshan" target="_blank">Simhachalam Temple में साल में सिर्फ 24 घंटे होते हैं असली दर्शन, Akshaya Tritiya पर हटती है चंदन की परत</a></h3><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>आयोध्या में विराजमान रामलला अपने बाल रूप में हैं। इसलिए रामलला को नजर लगने का डर लगा रहता है। इस कारण रामलला को नवग्रह से बचाने के लिए उनकी पोशाक में नवरत्न जड़े गए हैं। भगवान श्रीराम के बाल स्वरूप को किसी की नजर न लगे, इस कारण उनको खास तरह की पोशाकें पहनाई जाती हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 14:54:16 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/the-mystery-behind-ram-lalla-attire-at-ayodhya-ram-mandir</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Simhachalam Temple में साल में सिर्फ 24 घंटे होते हैं असली दर्शन, Akshaya Tritiya पर हटती है चंदन की परत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/simhachalam-temple-only-24-hours-of-actual-darshan]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आंध्र प्रदेश का सिंहाचलम मंदिर भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार को समर्पित है। यह मंदिर बेहद दिव्य और अद्भुत है। आपको जानकर हैरानी होगी कि भगवान नरसिंह की मूर्ति से साल में सिर्फ 24 घंटे के लिए 'चंदन की परत' हटाई जाती है। तभी यह मंदिर दर्शन के लिए खुलता है। ऐसे में भक्त साल में सिर्फ 24 घंटे के लिए भगवान नरसिंह के असली विग्रह के दर्शन कर सकते हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको इस मंदिर से जुड़ी कुछ अनोखी बातों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनको जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे।&nbsp;</div><div><br></div><h2>कहां स्थित है दिव्य धाम</h2><div>आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में सिंहाचलम मंदिर स्थित है। यह मंदिर आस्था और वास्तुकला का अनोखा और अद्भुत संगम है। विशाखापट्टनम से लगभग 16 किमी दूर वराह लक्ष्मी नरसिम्हा मंदिर सिंहाचल पर्वत की चोटी पर स्थित है। माना जाता है कि भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद ने स्वयं इस मंदिर का निर्माण कराया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/amazing-sight-in-canada-shivarpanam-temple-houses-450-shivlingas-know-history" target="_blank">Famous Temple: Canada में अद्भुत नज़ारा, Shivarpanam Temple में स्थापित हैं 450 शिवलिंग, जानिए इस शिव धाम की पूरी History</a></h3><div><br></div><h2>क्यों लगाया जाता है चंदन का लेप</h2><div>भगवान विष्णु को नरसिंह अवतार उग्रता और वीरता का प्रतीक है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक हिरण्यकशिपु का वध करने के बाद जब भगवान नरसिंह का क्रोध बहुत बढ़ गया, तो सभी देवताओं की भगवान नरसिंह को शांत कराने की कोशिश असफल रही।</div><div><br></div><div>जिसके बाद भगवान नरसिंह अपने परम भक्त प्रह्लाद की प्रार्थना पर शांत हुए और सिंहाचलम पर्वत पर प्रकट हुए। भगवान नरसिंह की उग्रता और तेज को कम करने के लिए उनको चंदन से शीतल रखा जाता है। यही वजह है कि साल भर भगवान नरसिंह चंदन से ढके रहते हैं, जिससे कि उनका स्वरूप सौम्य रहे।</div><div><br></div><h2>जानें कब खुलता है यह मंदिर</h2><div>बता दें कि चंदन की मोटी परत से ढके रहने की वजह से भगवान नरसिंह की मूर्ति एक शिवलिंग के आकार में दिखती है। सिर्फ अक्षय तृतीया के पावन दिन पर यह चंदन हटाया जाता है। जिसको 'निजरूप दर्शन' या 'चंदनोत्सव' भी कहा जाता है। सिर्फ इसी दिन भक्त भगवान के असली विग्रह को देख पाते हैं। अक्षय तृतीया के दिन इस मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। वहीं नरसिंह जयंती पर भी भक्त मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>क्या है मंदिर की खासियत</h2><div>आमतौर पर आपको भगवान नरसिंग के अन्य मंदिरों में भगवान का उग्र रूप देखने को मिलेगा। लेकिन सिंहाचलम मंदिर में भगवान नरसिंह मां लक्ष्मी के साथ बेहद सौम्य और शांत मुद्रा में विराजमान हैं। वहीं मंदिर की वास्तुकला में चोल, चालुक्य और कलिंग शैलियों का मिश्रण देखने को मिलेगा।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 16:26:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/simhachalam-temple-only-24-hours-of-actual-darshan</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Famous Temple: Canada में अद्भुत नज़ारा, Shivarpanam Temple में स्थापित हैं 450 शिवलिंग, जानिए इस शिव धाम की पूरी History]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/amazing-sight-in-canada-shivarpanam-temple-houses-450-shivlingas-know-history]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत देश में तमाम प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कनाडा में एक ऐसा मंदिर है, जहां पर 1-2 नहीं बल्कि पूरे 450 शिवलिंग हैं। यह स्थल आपके मन को शांति से भर देगा। कनाडा में स्थित भगवान शिव को समर्पित यह शिवर्पणम मंदिर है। इस मंदिर में 450 शिवलिंग हैं। ऐसे में अगर आप भी कनाडा घूमने का प्लान कर रहे हैं, तो आपको इस मंदिर के दर्शन जरूर करना चाहिए। यह एक बेहद शांत और सुंदर मंदिर है। तो आइए जानते हैं इस मंदिर की खासियत के बारे में...</div><div><br></div><h2>450 शिवलिंगों वाला मंदिर</h2><div>वैसे तो कनाडा में कई हिंदू मंदिर हैं। लेकिन इनमें छिपा हुआ रत्न शिवर्पणम मंदिर है। यह मंदिर मॉन्ट ट्रेम्बलेंट क्षेत्र में स्थित है। टोरंटो से यहां पहुंचने में 6 घंटे का समय और मॉन्ट्रियल से एक घंटे का समय लगता है। यह मंदिर पहाड़ों और ताजी हवा से घिरा हुआ है। ऐसा नजारा आपको अन्य देशों में देखने को नहीं मिलेगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/with-pen-in-hand-and-messengers-at-her-side-how-bemata-in-ujjain-decide-fate-of-newborn" target="_blank">Bemata Goddess: हाथ में कलम और दूतों का साथ, Ujjain में विराजमान Bemata कैसे तय करती हैं नवजात का Destiny</a></h3><div><br></div><h2>मंदिर की विशेषता</h2><div>इस मंदिर की विशेषता यह है कि इसमें काले पत्थर से निर्मित 450 शिवलिंग हैं। यह शिवलिंग मंदिर परिसर में करीने से स्थापित हैं। केंद्र में विशाल शिवलिंग है और एक छोटा फव्वारा भी हैं। यह फव्वारा चारों और पानी छिड़कता है। इससे स्थान का जादुई वातावरण और भी बढ़ जाता है। शिवलिंग के अलावा यहां पर काले पत्थर से निर्मित भगवान शिव की एक मूर्ति और नंदी बैल की मूर्ति है।</div><div><br></div><h2>आध्यात्मिक यात्रा के लिए</h2><div>शिवर्पणम मंदिर के अलावा कनाडा के होप शहर में आशा महाकालेश्वर मंदिर है। इस स्थान की स्थापना शर्मिला नारायण ने की थी। यहां 8 फुट ऊंचा शिवलिंग औक 1008 छोटे शिवलिंग हैं। मंदिर में गौशाला भी है।</div><div><br></div><div>दो प्रमुख भगवान शिव मंदिरों और अन्य कई हिंदू मंदिरों के साथ, कनाडा हिंदू भक्तों के लिए भी एक आध्यात्मिक यात्रा के लिए एकदम सही जगह है।</div><div><br></div><div>ऐसे में अगर आप भी अपने परिवार या दोस्तों के साथ कनाडा घूमने का प्लान बना रहे हैं। तो आपको इन शांत और खूबसूरत जगहों पर जाना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 13:27:34 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/amazing-sight-in-canada-shivarpanam-temple-houses-450-shivlingas-know-history</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Bemata Goddess: हाथ में कलम और दूतों का साथ, Ujjain में विराजमान Bemata कैसे तय करती हैं नवजात का Destiny]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/with-pen-in-hand-and-messengers-at-her-side-how-bemata-in-ujjain-decide-fate-of-newborn]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>क्या आपने विधाता माता के बारे में जानते हैं। अगर आपका जवाब न है, तो आज हम आपको विधाता माता के बारे में बताने जा रहे हैं। विधाता माता को अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग नामों से जाना जाता है। विधाता माता को भय माता, बेमाता, विधात्री देवी, छठी मैया या फिर षष्ठी माता के रूप में जाना जाता है। लोक मान्यताओं के मुताबिक बच्चे के जन्म के छठे दिन ही विधाता देवी बच्चे के भाग्य का लेखा-जोखा लिखती हैं।</div><div><br></div><h2>उज्जैन स्थित है मंदिर</h2><div>महाकाल की नगरी उज्जैन में विधाता देवी का फेमस मंदिर है। विधाता देवी का मंदिर पटनी बाजार के पास मगरमुहा की गली में स्थित है। इसका इतिहास करीब 1500 साल पुराना माना जाता है। इस मंदिर में विधाता देवी की करीब ढाई फीट ऊंची खड़ी अवस्था में मूर्ति विराजित है। इसको एक स्वयंभू मूर्ति माना जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/shani-sade-sati-and-dhaiyya-reduced-chant-vedic-mantras-and-shani-stotra-on-saturday" target="_blank">Shani Dev Mantra: Shani Sade Sati और ढैय्या का कष्ट होगा कम, शनिवार को जरूर जपें ये विशेष Vedic Mantras और शनि स्त्रोत</a></h3><div><br></div><div>विधाता देवी के उल्टे हाथ में कपाल है। तो वहीं उनके सीधे हाथ में कलम है। इनके आसपास दो दूत भी विराजमान हैं। एक दूत का नाम चित्र और दूसरे का नाम गुप्त है। माना जाता है कि जब भी किसी बच्चे का जन्म होता है, तो विधाता देवी के यही दोनों दूत माता को इसकी जानकारी देते हैं।</div><div><br></div><h2>बच्चों के साथ आते हैं श्रद्धालु</h2><div>देवी भागवत और दुर्गा सप्तशती सहित अवंतिका पुराण में विधाता माता का उल्लेख मिलता है। विधाता माता का पौराणिक नाम विद्यात्तय है। धार्मिक मान्यता है कि विधाता माता बच्चे के जन्म के छठे दिन उसका भाग्य लिखती हैं। यही वजह है कि विधाता माता के मंदिर में दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। मंदिर में विधाता माता के दर्शन करते हैं, जिससे कि उनके बच्चे को सौभाग्य की प्राप्ति हो सके।</div><div><br></div><h2>जानें कैसे मिली मूर्ति</h2><div>बताया जाता है कि एक भक्त को माता ने सपने में दर्शन दिए थे, सपने में इस स्थान पर मूर्ति होने के संकेत मिले थे। जब उस स्थान पर खुदाई की गई तो वहां पर विधाता देवी की मूर्ति निकली। जिसके बाद इसी स्थान पर मूर्ति की स्थापना की गई और फिर मंदिर का निर्माण करवाया गया। तभी से यहां पर यह मंदिर स्थित है।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 09:23:30 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/with-pen-in-hand-and-messengers-at-her-side-how-bemata-in-ujjain-decide-fate-of-newborn</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Shani Dev Mantra: Shani Sade Sati और ढैय्या का कष्ट होगा कम, शनिवार को जरूर जपें ये विशेष Vedic Mantras और शनि स्त्रोत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/shani-sade-sati-and-dhaiyya-reduced-chant-vedic-mantras-and-shani-stotra-on-saturday]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में हर दिन किसी न किसी देवी-देवता को समर्पित होता है। ठीक इसी तरह शनिवार का दिन न्याय के देवता शनिदेव को समर्पित होता है। ऐसे में अगर आप शनिदेव की साढ़ेसाती, ढैय्या या फिर शनि दोष से परेशान हैं। तो आपको शनिदेव के कुछ मंत्रों का जाप करना चाहिए। </div><div>&nbsp;</div><div>इससे शनिदेव की कृपा होती है और साढ़ेसाती, शनि दोष और ढैय्या के कष्टों से भी मुक्ति मिलती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि साढ़े साती और शनि दोष को दूर करने के लिए शनिवार को किन मंत्रों का जाप करना चाहिए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-shiva-pleased-with-unwavering-devotion-of-nag-vasuki-and-honored-him-by-wearing-neck" target="_blank">Nag Vasuki की अनन्य भक्ति से प्रसन्न हुए Lord Shiva, गले में धारण कर दिया सम्मान</a></h3><div><br></div><h2>शनि मूल मंत्र</h2><div>ॐ शं शनैश्चराय नमः।</div><div><br></div><h2>शनि बीज मंत्र</h2><div>ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः।</div><div><br></div><h2>शनि गायत्री मंत्र</h2><div>ॐ सूर्यात्मजाय विद्महे मृत्युरूपाय धीमहि तन्नः सौरिः प्रचोदयात्॥</div><div><br></div><h2>शनि प्रणाम मंत्र</h2><div>ॐ नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।</div><div>छाया मार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम्‌॥</div><div><br></div><h2>शनि वैदिक मंत्र</h2><div>ॐ शन्नोदेवीर भिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये शंय्योरभिस्त्रवन्तुनः।</div><div><br></div><h2>शनि एकाक्षरी मंत्र</h2><div>शं॥</div><div><br></div><h2>साढ़ेसाती मंत्र</h2><div>ऊँ त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम्।</div><div>उर्वारुक मिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मा मृतात्।।</div><div><br></div><div>ॐ शन्नोदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।संयोरभिश्रवन्तु न:। ऊँ शं शनैश्चराय नमः।।</div><div>ऊँ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामिशानश्चराम।।</div><div><br></div><div>ॐ शन्नोदेवीरभिस्ताय आपो भवन्तु पीतये</div><div>शनयोरभिस्रवन्तु नः, ॐ समं शनैश्चराय नमः।</div><div>ॐ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजं</div><div>छायामार्तण्डसंभूतं तम नमामि शनैश्चरम।</div><div><br></div><h2>जानें शनि दोष से मुक्ति पाने के उपाय</h2><div>अगर आप भी शनि दोष, ढैय्या और साढ़ेसाती के कष्टों से परेशान हैं, तो आप इन कुछ विशेष उपायों को अपनाकर राहत पा सकते हैं।</div><div><br></div><div>हर शनिवार को सुबह स्नान आदि करने के बाद पीपल के पेड़ की जड़ में जल अर्पित करना चाहिए और पेड़ की 7 बार परिक्रमा करें। यह उपाय शनि दोष के प्रभाव को कम करता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>शनिवार को शनिदेव की विधिविधान से पूजा-अर्चना करना चाहिए और श्रद्धा से 'शनि स्तुति' का पाठ करना चाहिए।</div><div><br></div><div>धार्मिक मान्यता यह भी है कि शनि देव हनुमान जी के भक्तों को कष्ट नहीं पहुंचाते हैं। इसलिए शनिवार को हनुमान जी की पूजा करें और नियमित रूप से हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए।&nbsp;</div><div><br></div><div>शनिदेव की कृपा पाने के लिए हर शनिवार को अपने सामर्थ्य के मुताबिक काले तिल, काले रंग के कपड़े, साबुत उड़द, सरसों का तेल और गुड़ आदि का दान करना चाहिए।</div><div><br></div><div>ऐसे कार्यों या आचरण से दूर रहना चाहिए, जिससे शनिदेव रुष्ट हों। गरीबों, असहायों और बुजुर्गों आदि का अपमान नहीं करना चाहिए।</div><div><br></div><div>वहीं अच्छे कर्म करने वाले लोगों पर शनिदेव की हमेशा कृपा बनी रहती है। इसलिए अपने कर्मों को अच्छा रखना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 24 Jul 2026 12:08:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/shani-sade-sati-and-dhaiyya-reduced-chant-vedic-mantras-and-shani-stotra-on-saturday</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Nag Vasuki की अनन्य भक्ति से प्रसन्न हुए Lord Shiva, गले में धारण कर दिया सम्मान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-shiva-pleased-with-unwavering-devotion-of-nag-vasuki-and-honored-him-by-wearing-neck]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भगवान शिव का रूप जितना ज्यादा रहस्यमयी है, उतना ही आकर्षक भी है। भगवान शिव अपने शरीर में भस्म, जटाओं में गंगा, माथे पर चंद्रमा और गले में नाग धारण करते हैं। भगवान शिव के इन सभी चीजों को धारण करने के पीछे अलग-अलग मान्यताएं हैं। असल में महादेव न सिर्फ मनुष्यों बल्कि अन्य जीवों पर भी अपनी कृपा और आशीर्वाद बनाए रखते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि भगवान शिव अपने गले में नाग को धारण करते हैं।</div><div><br></div><div>भगवान शिव एक ऐसे देवता हैं, जो समाज की बहिष्कृत चीजों को अपने साथ जोड़ते हैं। सांप को भगवान शिव ने अपने गले में धारण कर उसको सम्मान दिया। श्मशान की भस्म को अपने तन का लिबास बना लिया। कैलाश पर्वत को महादेव ने अपना घर बना लिया। तो आइए जानते हैं भगवान शिव ने अपने गले में सांप क्यों धारण किया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/chanting-powerful-mantras-bring-special-blessings-from-lord-hari" target="_blank">Lord Vishnu Mantras: गुरुवार को Lord Vishnu की पूजा से दूर होगा Guru Dosha, इन Powerful Mantras के जाप से बरसेगी श्रीहरि की विशेष कृपा</a></h3><div><br></div><h2>शिवजी ने क्यों धारण किया सांप</h2><div>धार्मिक कथाओं के मुताबिक नागराज वासुकी भगवान शंकर के परम भक्त थे। वह हमेशा भगवान शिव की पूजा-उपासना में लीन रहते थे। धार्मिक शास्त्रों के मुताबिक समुद्र मंथन के समय नागराज वासुकी ने रस्सी का किया था। जिससे सागर को मथा गया था। नागराज वासुकी की भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव ने उनको नागलोक का राजा बना दिया। साथ ही भगवान शिव ने अपने गले में आभूषण की तरह लिपटे रहने का वरदान दिया।</div><div><br></div><h2>क्या मिलता है संकेत</h2><div>भगवान शिव के विषैले सांप को अपने गले में धारण करना इस ओर भी संकेत देता है कि अगर दुर्जन भी अच्छे कर्म करें, तो ईश्वर उसको जरूर स्वीकार करते हैं। ऐसे में व्यक्ति को सिर्फ अच्छे कर्म करना चाहिए, चाहे उनका स्वभाव कैसा भी हो।</div><div><br></div><h2>यहां भी मिलता है उल्लेख</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक समुद्र मंथन के अलावा एक अन्य स्थान पर भी वासुकी नाग का वर्णन मिलता है। जब भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय वासुदेव कंस की जेल से उनको गोकुल लेकर जा रहे थे। तब यमुना में एक भयंकर तूफान आया। ऐसे में नागराज वासुकी ने भगवान श्रीकृष्ण और वासुदेव को सुरक्षित यमुना पार कराने में सहायता की थी।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 13:20:30 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-shiva-pleased-with-unwavering-devotion-of-nag-vasuki-and-honored-him-by-wearing-neck</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Lord Vishnu Mantras: गुरुवार को Lord Vishnu की पूजा से दूर होगा Guru Dosha, इन Powerful Mantras के जाप से बरसेगी श्रीहरि की विशेष कृपा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/chanting-powerful-mantras-bring-special-blessings-from-lord-hari]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में गुरुवार का दिन भगवान विष्णु और बृहस्पति देव को समर्पित है। गुरुवार को भगवान विष्णु की पूजा करने से व्यक्ति के सभी दुख-दर्द दूर होते हैं। वहीं अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में गुरु दोष है, तो भगवान विष्णु और बृहस्पति देव की पूजा और उपासना करनी चाहिए। गुरुवार को व्रत करने से व्यक्ति के जीवन की सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं। वहीं घर में धन की कमी नहीं रहती है। वहीं इस दिन भगवान विष्णु के साथ मां लक्ष्मी की पूजा करना शुभ होता है।</div><div><br></div><div>धार्मिक मान्यता है कि रोजाना भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि रोजाना भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करने से सभी संकटों से मुक्ति मिलती है और धन-वैभव की प्राप्ति होती है। तो आइए जानते हैं इन मंत्रों के बारे में...</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/divine-commencement-of-the-lord-jagannath-rath-yatra-in-puri" target="_blank">Puri में Lord Jagannath Rath Yatra का दिव्य आगाज, 100 यज्ञों के पुण्य फल और मोक्ष की अद्भुत परंपरा</a></h3><div><br></div><h2>श्रीहरि विष्णु के पवित्र मंत्र</h2><div><br></div><div>ॐ नमो भगवते वासुदेवाय</div><div><br></div><div>श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे।</div><div>हे नाथ नारायण वासुदेवाय।।</div><div><br></div><div>ॐ नारायणाय विद्महे। वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।।</div><div><br></div><div>ॐ विष्णवे नम:</div><div><br></div><div>ॐ हूं विष्णवे नम:</div><div>&nbsp;</div><div>ॐ नमो नारायण। श्री मन नारायण नारायण हरि हरि।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><h2>लक्ष्मी विनायक मंत्र</h2><div>दन्ताभये चक्र दरो दधानं,</div><div>कराग्रगस्वर्णघटं त्रिनेत्रम्।</div><div>धृताब्जया लिंगितमब्धिपुत्रया</div><div>लक्ष्मी गणेशं कनकाभमीडे।।</div><div><br></div><h2>धन-वैभव और संपन्नता का मंत्र</h2><div>ॐ भूरिदा भूरि देहिनो, मा दभ्रं भूर्या भर। भूरि घेदिन्द्र दित्ससि।&nbsp;</div><div>ॐ भूरिदा त्यसि श्रुत: पुरूत्रा शूर वृत्रहन्। आ नो भजस्व राधसि।</div><div><br></div><div>ॐ अं वासुदेवाय नम:</div><div>ॐ आं संकर्षणाय नम:</div><div>ॐ अं प्रद्युम्नाय नम:</div><div>ॐ अ: अनिरुद्धाय नम:</div><div>ॐ नारायणाय नम:</div><div><br></div><h2>श्रीहरि का पंचरूप मंत्र</h2><div>ॐ ह्रीं कार्तविर्यार्जुनो नाम राजा बाहु सहस्त्रवान। यस्य स्मरेण मात्रेण ह्रतं नष्‍टं च लभ्यते।।</div><div><br></div><div>भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की कृपा और आशीर्वाद पाने के लिए रोजाना इन मंत्रों का जाप करना चाहिए। इन मंत्रों का जाप करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं। धन-वैभव और संपन्नता की प्राप्ति होती है। लेकिन इन मंत्रों का जाप करते समय इस बात का ध्यान रखें कि मंत्रों का उच्चारण साफ और शुद्ध होना चाहिए। वरना इसका फल नहीं मिलता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 11:07:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/chanting-powerful-mantras-bring-special-blessings-from-lord-hari</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Puri में Lord Jagannath Rath Yatra का दिव्य आगाज, 100 यज्ञों के पुण्य फल और मोक्ष की अद्भुत परंपरा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/divine-commencement-of-the-lord-jagannath-rath-yatra-in-puri]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को ओडिशा के पुरी नामक स्थान और गुजरात के द्वारका पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा बड़ी धूमधाम से निकाली जाती है। इस उत्सव के दौरान श्रद्धालुओं का भक्ति भाव देखते ही बनता है क्योंकि जिस रथ पर भगवान सवारी करते हैं उसे घोड़े या अन्य जानवर नहीं बल्कि श्रद्धालुगण ही खींच रहे होते हैं। पुरी में श्री जगदीश भगवान को सपरिवार विशाल रथ पर आरुढ़ कराकर भ्रमण करवाया जाता है फिर वापस लौटने पर यथास्थान स्थापित किया जाता है। यह उत्सव अद्वितीय होता है। इस अवसर पर देश विदेश से लाखों श्रद्धालु यहां एकत्र होते हैं।</div><div><br></div><div>भगवद भक्त इस दिन व्रत रखते हैं और उत्सव मनाते हैं। पुरी में जिस रथ पर भगवान की सवारी चलती है वह विशाल एवं अद्वितीय है। वह 45 फुट ऊंचा, 35 फुट लंबा तथा इतना ही चौड़ाई वाला होता है। इसमें सात फुट व्यास के 16 पहिये होते हैं। इसी तरह बालभद्र जी का रथ 44 फुट ऊंचा, 12 पहियों वाला तथा सुभद्रा जी का रथ 43 फुट ऊंचा होता है। इनके रथ में भी 12 पहिये होते हैं। प्रतिवर्ष नए रथों का निर्माण किया जाता है। भगवान मंदिर के सिंहद्वार पर बैठकर जनकपुरी की ओर रथयात्रा करते हैं। जनकपुरी में तीन दिन का विश्राम होता है जहां उनकी भेंट श्री लक्ष्मीजी से होती है। इसके बाद भगवान पुनः श्री जगन्नाथ पुरी लौटकर आसनरुढ़ हो जाते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-grand-celebration-of-faith-tradition-and-spiritual-consciousness" target="_blank">आस्था, परम्परा, आध्यात्मिक चेतना का विराट उत्सव</a></h3><div>दस दिवसीय यह रथयात्रा भारत में मनाए जाने वाले धार्मिक उत्सवों में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। भगवान श्रीकृष्ण के अवतार 'जगन्नाथ' की रथयात्रा का पुण्य सौ यज्ञों के बराबर माना जाता है। यात्रा की तैयारी अक्षय तृतीया के दिन श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण के साथ ही शुरू हो जाती है। जगन्नाथ जी का रथ 'गरुड़ध्वज' या 'कपिलध्वज' कहलाता है। रथ पर जो ध्वज है, उसे 'त्रैलोक्यमोहिनी' या ‘नंदीघोष’ रथ कहते हैं। बलराम जी का रथ 'तलध्वज' के नाम से पहचाना जाता है। रथ के ध्वज को 'उनानी' कहते हैं। जिस रस्सी से रथ खींचा जाता है वह 'वासुकी' कहलाता है। सुभद्रा का रथ 'पद्मध्वज' कहलाता है। रथ ध्वज 'नदंबिक' कहलाता है। इसे खींचने वाली रस्सी को 'स्वर्णचूडा' कहते हैं।</div><div><br></div><div>रथयात्रा आरंभ होने से पहले पुराने राजाओं के वंशज पारंपरिक ढंग से सोने के हत्थे वाली झाडू से ठाकुर जी के प्रस्थान मार्ग को साफ करते हैं। इसके बाद मंत्रोच्चार एवं जयघोष के साथ रथयात्रा शुरू होती है। सर्वप्रथम बलभद्र का रथ तालध्वज प्रस्थान करता है। थोड़ी देर बाद सुभद्रा की यात्रा शुरू होती है। अंत में लोग जगन्नाथ जी के रथ को बड़े ही श्रद्धापूर्वक खींचते हैं। लोग मानते हैं कि रथयात्रा में सहयोग से मोक्ष मिलता है, अत: सभी श्रद्धालु कुछ पल के लिए रथ खींचने को आतुर रहते हैं। जगन्नाथ जी की यह रथयात्रा गुंडीचा मंदिर पहुंचकर संपन्न होती है। 'गुंडीचा मंदिर' वहीं पर स्थित है जहां विश्वकर्मा जी ने तीनों देव प्रतिमाओं का निर्माण किया था। यह भगवान की मौसी का घर भी माना जाता है। यहां भगवान एक सप्ताह प्रवास करते हैं और इस दौरान यहीं पर उनकी पूजा की जाती है। आषाढ़ शुक्ल दशमी को जगन्नाथ जी की वापसी यात्रा शुरू होती है। शाम तक रथ जगन्नाथ मंदिर पहुंच जाते हैं लेकिन प्रतिमाओं को अगले दिन ही मंत्रोच्चार के साथ मंदिर के गर्भगृह में फिर से स्थापित किया जाता है।</div><div><br></div><div>- शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 18:33:47 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/divine-commencement-of-the-lord-jagannath-rath-yatra-in-puri</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Baidyanath Dham से Mehandipur Balaji तक, शारीरिक कष्टों के उपचार और Spiritual Peace के लिए विख्यात हैं ये 7 पावन स्थल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/from-baidyanath-dham-to-mehandipur-balaji-these-sites-renowned-for-healing]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत में मंदिरों को सिर्फ पूजा-पाठ का स्थान नहीं बल्कि आशा, मानसिक शांति और आध्यात्मिक शक्ति का केंद्र माना जाता है। अलग-अलग हिस्सों में कुछ खास मंदिर हैं। जो मानसिक तनाव, सेहत संबंधी समस्याओं, संतान प्राप्ति और रोग मुक्ति की लोक मान्यताओं से जुड़े हैं। लाखों की संख्या में भक्त इन मंदिरों में मानसिक बल, आशीर्वाद और आध्यात्मिक संतुलन प्राप्त करने के लिए जाते हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको 7 ऐसे मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां पर भक्त आरोग्य और अच्छी सेहत की प्रार्थना करते हैं।</div><div><br></div><h2>नैना देवी मंदिर</h2><div>हिमाचल प्रदेश में स्थित नैना देवी मंदिर प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यहां पर मां सती की आंख गिरी थी। इस कारण इस स्थान को नैना देवी कहा जाता है। नैना देवी को ज्ञान, दृष्टि और दिव्य दर्शन की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/gupt-navratri-begins-on-july-15-learn-secret-of-worshipping-10-mahavidyas" target="_blank">Gupt Navratri 2026: 15 जुलाई से शुरू हो रही है गुप्त नवरात्रि, जानें 10 Mahavidyas की पूजा का रहस्य</a></h3><div><br></div><div>यहां आने वाले भक्तों का मानना है कि आंखों से जुड़ी समस्याओं में देवी का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। वहीं मानसिक स्पष्टता और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।</div><div><br></div><h2>मेहंदीपुर बालाजी मंदिर</h2><div>राजस्थान के दौसा जिले में स्थित यह मंदिर हनुमान जी के बाला जी रूप को समर्पित है। यह भारत के खास और चर्चित आध्यात्मिक केंद्रों में से एक है।</div><div><br></div><div>बालाजी आने वाले श्रद्धालुओं का मानना है कि यहां पर दर्शन करने से चिंता, मानसिक तनाव, डर, बुरी नजर और मानसिक कष्ट दूर होते हैं। मंदिर का प्रसाद घर न ले जाने वाली परंपरा भी फेमस है।</div><div><br></div><h2>बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग</h2><div>झारखंड में स्थित बैद्यनाथ शिवलिंग देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। वैद्यनाथ शब्द का अर्थ चिकित्सकों के स्वामी से है। भगवान शिव के इस रूप के दर्शन और पूजन से रोग और कष्ट दूर होते हैं।</div><div><br></div><div>यहां आने वाले भक्तों का मानना है कि वैद्यनाथ दर्शन करने से दीर्घकालिक रोगों से छुटकारा मिलता है। वहीं यहां दर्शन करने से मानसिक संतुलन, शारीरिक पीड़ा में राहत और आध्यात्मिक शांति की प्राप्ति होती है।</div><div><br></div><h2>काशी विश्वनाथ मंदिर</h2><div>यूपी के वाराणसी शहर में स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर को भारत के सबसे प्राचीन और पूजनीय शिव मंदिरों में से एक है। भक्तों का मानना है कि यहां पर भगवान शिव के समक्ष सच्ची प्रार्थना करने से सेहत, दीर्घायु और आध्यात्मिक शांति मिलती है।</div><div><br></div><h2>गर्भरक्षाम्बिगई मंदिर</h2><div>दक्षिण भारत के तमिलनाडु में स्थित गर्भरक्षाम्बिगई का मंदिर फेमस है। यहां पर देवी गर्भरक्षाम्बिगई की पूजा होती है। यहां पर आने वाले श्रद्धालुओं का मानना है कि मंदिर में दर्शन करने से सुरक्षित गर्भावस्था, संतान प्राप्ति और स्वस्थ प्रसव में आसानी होती है। दंपत्ति के बीच यह मंदिर काफी फेमस है।</div><div><br></div><h2>झंडेवालान मंदिर</h2><div>नई दिल्ली में मौजूद झंडेवालन मंदिर मां आदिशक्ति को समर्पित है। यहां पर दर्शन करने आने वाले श्रद्धालुओं के बीच मान्यता है कि जिन भी लोगों पर बुरी नजर होती है। उनके मंदिर में पूजा करने से यह समस्या दूर हो जाती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 14:46:21 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/from-baidyanath-dham-to-mehandipur-balaji-these-sites-renowned-for-healing</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Jagannath Rath Yatra 2026: क्या वाकई प्रेमी जोड़ों के लिए अशुभ है जगन्नाथ मंदिर के दर्शन? जानिए क्या कहती है पौराणिक मान्यता!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/why-couples-avoid-puri-jagannath-temple]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ओडिशा में स्थित जगन्नाथ मंदिर अपने चमत्कार के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। दूर-दूर से देश-दुनिया के लोग पुरी जगन्नाथ मंदिर का दर्शन करने आते हैं। माना जाता है कि जो भक्त सच्चे मन से इस मंदिर के दर्शन करने आता है उनकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">वैसे आपने भी जगन्नाथ मंदिर संबंधित कई सारे चमत्कार की कहानी जरुर सुनी होगी, जहां पर भगवान ने भक्तों की मनोकामनाएं जरुर पूर्ण होती है। हालांकि शायद ही आप जानते होंगे कि इस मंदिर में शादी से पहले प्रेमी जोड़े दर्शन के लिए नहीं जा सकते हैं। क्या आपने इसके पीछे की मान्यता के बारे में सुना है, क्या है इसकी पौराणिक कथा? आइए आपको इस लेख में बताते हैं भगवान जगन्नाथ मंदिर में प्रेमी जोड़ो का जाना वर्जित क्यों हैं।</span></div><div><br></div><div><b>जगन्नाथ मंदिर में क्यों प्रेमी जोड़ा का जाना मना है?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">दरअसल, पुरी के जगन्नाथ मंदिर में अविवाहित प्रेमी जोड़े या फिर जिन जोड़ों की शादी तय हो चुकी है लेकिन, हुई नहीं है उन लोगों के लिए दर्शन करने के लिए नहीं जाना चाहिए। असल में इसके पीछे एक पुरानी धार्मिक कथा है। लोककथाओं व मान्यताओं के अनुसार, एक बार राधा रानी जगन्नाथ भगवान के दर्शन करने के लिए पुरी पहुंची थी। हालांकि, राधा रानी को मंदिर के पुजारियों ने बाहर ही रोक दिया। पुजारियों ने कहा कि मंदिर में सिर्फ भगवान और उनकी पत्नियां ही प्रवेश कर सकती हैं। जब राधा रानी ने यह बात सुनी तो उन्हें काफी बुरा लगा। फिर राधा रानी ने उन्हें श्राप दिया कि यदि ऐसा है जो भी प्रेमी जोड़ा इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आएगा उनके प्रेम में बाधा आ जाएगी। इस श्राप के चलते आज भी भगवान जगन्नाथ मंदिर में प्रेमी जोड़े दर्शन के लिए एक साथ नहीं जाएंगे।</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><a href="https://www.prabhasakshi.com/touristplaces/delhi-ncr-rath-yatra-jagannath-temples-guide" target="_blank">इसे भी पढ़ें:पुरी नहीं जा पा रहे? Delhi-NCR के इन Jagannath मंदिरों में करें रथ यात्रा के दर्शन</a><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><b style="font-size: 1rem;">क्या जगन्नाथ रथ यात्रा में शामिल हो सकते हैं प्रेमी जोड़ा?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">पुरी में कल यानी 16 जुलाई से रथ यात्रा शुरु हो रही है। ऐसे में आपके मन में भी काफी सवाल आ रहे होगे। जी हां! जगन्नाथ रथ यात्रा में प्रेमी जोडे़ शामिल हो सकते हैं। बस प्रेमी जोड़े सिर्फ मंदिर में भगवान के दर्शन नहीं कर सकते हैं। लेकिन वह रथ यात्रा में शामिल हो सकते हैं। आज भी वहां के लोग इस परंपरा को मान रहे है। लेकिन मंदिर की तरफ से कोई भी रोक नहीं लगाई जाती है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, अविवाहित जोड़े यहां शादी से पहले आते हैं, तो उनके रिश्तों में समस्या आ सकती है।&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 15 Jul 2026 11:22:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/why-couples-avoid-puri-jagannath-temple</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Gupt Navratri 2026: 15 जुलाई से शुरू हो रही है गुप्त नवरात्रि, जानें 10 Mahavidyas की पूजा का रहस्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/gupt-navratri-begins-on-july-15-learn-secret-of-worshipping-10-mahavidyas]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में चैत्र और शारदीय नवरात्रि के अलावा दो 'गुप्त नवरात्रि' भी पड़ती हैं। गुप्त नवरात्रि शक्ति साधना का बेहद रहस्यमय और प्रभावशाली पर्व माना जाता है। माघ और आषाढ़ माह में आने वाली इन नवरात्रि को तांत्रिक और अघोरी के लिए खास मानी जाती है। इन नवरात्रि में अघोरी और तांत्रिक अपनी साधना को सिद्ध करने के लिए 'दस महाविद्याओं' की पूजा-उपासना करते हैं। गुप्त नवरात्रि में की जाने वाली साधना बेहद खास और प्रभावशाली मानी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि गुप्त नवरात्रि में दस महाविद्याओं या विशेष देवियों की पूजा-आराधना करने से जातक को मनचाहा फल प्राप्त होता है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><h2>कब है गुप्त नवरात्रि</h2><div>हर साल आषाढ़ माह की प्रतिपदा तिथि से गुप्त नवरात्रि की शुरूआत होती है। इस बार 15 जुलाई 2026 से गुप्त नवरात्रि की शुरूआत हो रही है। वहीं इसकी समाप्ति 23 जुलाई 2026 को होगी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/know-secret-of-amarnath-story-when-ganesha-not-allowed-to-listen-to-amarnath-story" target="_blank">Amarnath Story का यह रहस्य जानते हैं आप? जब अमर कथा सुनने की इजाजत Ganesha को भी नहीं थी</a></h3><div><br></div><h2>दस महाविद्याएं</h2><div>गुप्त नवरात्रि के दौरान 9 दुर्गा की जगह पर 10 देवियों की विशेष रूप से पूजा-अर्चना की जाती है।</div><div>&nbsp;</div><div>मां काली</div><div><br></div><div>मां तारा</div><div><br></div><div>मां त्रिपुर सुंदरी</div><div>&nbsp;</div><div>मां भुवनेश्वरी</div><div>&nbsp;</div><div>मां छिन्नमस्ता</div><div><br></div><div>मां त्रिपुर भैरवी</div><div>&nbsp;</div><div>मां धूमावती</div><div>&nbsp;</div><div>मां बगलामुखी</div><div>&nbsp;</div><div>मां मातंगी</div><div>&nbsp;</div><div>मां कमला</div><div>&nbsp;</div><h2>गुप्त नवरात्रि पूजन विधि और सावधानियां</h2><div>बता दें कि गुप्त नवरात्रि की पूजा को 'गुप्त' रखा जाता है। जितना ज्यादा इसको गुप्त रखा जाता है, फल उतना ही ज्यादा मिलता है।</div><div><br></div><div>गुप्त नवरात्रि की साधना विशेष रूप से मध्यरात्रि, निशिथ काल में करना अच्छा माना जाता है।</div><div><br></div><div>अगर संभव हो तो 9 दिन तक अखंड ज्योति जलाना चाहिए।</div><div><br></div><div>मनोकामना के मुताबिक संबंधित देवी के मंत्रों का जाप करना चाहिए।</div><div><br></div><div>गुप्त नवरात्रि के 9 दिनों तक सात्विक आहार लेना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 14:40:01 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/gupt-navratri-begins-on-july-15-learn-secret-of-worshipping-10-mahavidyas</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Amarnath Story का यह रहस्य जानते हैं आप? जब अमर कथा सुनने की इजाजत Ganesha को भी नहीं थी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/know-secret-of-amarnath-story-when-ganesha-not-allowed-to-listen-to-amarnath-story]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में भगवान शिव और मां पार्वती की अमरकथा से जुड़ी एक रोचक कहानी सुनने को मिलती है। श्री अमरनाथ जी श्राइन बोर्ड ने लिखा है कि सदियों पर भगवान शिव से माता पार्वती ने पूछा कि उन्होंने मुंड माला कब और क्यों धारण करना शुरू किया। जिस पर भगवान शिव ने जवाब देते हुए कहा कि जब भी देवी पार्वती का जन्म होता है, तो वह अपनी माला में एक और सिर जोड़ लेते हैं।</div><div><br></div><div>तब देवी पार्वती ने कहा कि मैं बार-बार मरती हूं, लेकिन आप अमर हैं। इसलिए मुझे अपनी अमरता का कारण बताइए। जिस पर भगवान शिव-शंकर ने उत्तर देते हुए कहा कि पार्वती इसके लिए आपको अमर कथा सुननी होगी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/amazing-facts-related-to-puri-jagannath-dha-why-birds-do-not-fly-over-temple" target="_blank">Jagannath Temple Significance: Puri के Jagannath Dham से जुड़े 5 Amazing Facts, क्यों मंदिर के ऊपर से नहीं उड़ते पक्षी</a></h3><div><br></div><h2>अमरकथा सुनाने से पहले क्या-क्या त्यागा</h2><div>जब भगवान शिव जी माता पार्वती को अमरकथा सुनाने को तैयार हो गए। तो शिव-पार्वती ऐसी जगह के लिए चल पड़े, जहां पर अन्य कोई अमर कथा को न सुन सके। अमरकथा सुनाने के लिए उन्होंने अमरनाथ गुफा को चुना। लेकिन इससे पहले भगवान शिव ने अपने प्रिय भक्त और वाहन नंदी को पहलगाम में छोड़ दिया।</div><div><br></div><div>वहीं अपने नागों को शेषनाग झील के किनारे छोड़ दिया। उन्होंने भगवान गणेश को महागुण पर्वत पर छोड़ा और जीवन के पंच तत्वों को पंजतरणी में त्याग दिया। जिनके वह स्वामी हैं। इन सभी को त्यागने के बाद भगवान शिव ने माता पार्वती के साथ अमरनाथ गुफा में प्रवेश किया और समाधि ले ली।</div><div><br></div><h2>दो कबूतरों ने सुनी अमरता की कथा</h2><div>कोई भी अमरता से जुड़ा वृत्तांत न सुन पाए, यह सुनिश्चित करने के लिए भगवान शिव ने कालाग्नि को पैदा किया। कालाग्नि को गुफा के अंदर और इसके आसपास के सभी जीवों को नष्ट करने के लिए आग फैलाने का आदेश दिया। फिर भगवान शिव में मां पार्वती को अमरता का रहस्य बताना शुरू किया।</div><div><br></div><div>लेकिन संयोगवश एक कबूतर के जोड़े ने अमरता का वृत्तांत सुन लिया और वह अमर हो गए। माना जाता है कि आज भी कई तीर्थयात्री उन पवित्र कबूतरों के जोड़े को वहां देखने का दावा करते हैं। वहीं तीर्थयात्री भी यह देखकर हैरान हो जाते हैं कि इतने ठंडे और पहाड़ी क्षेत्र में यह पक्षी जीवित कैसे रहते हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 11:02:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/know-secret-of-amarnath-story-when-ganesha-not-allowed-to-listen-to-amarnath-story</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Jagannath Temple Significance: Puri के Jagannath Dham से जुड़े 5 Amazing Facts, क्यों मंदिर के ऊपर से नहीं उड़ते पक्षी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/amazing-facts-related-to-puri-jagannath-dha-why-birds-do-not-fly-over-temple]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में भगवान जगन्नाथ की पूजा का अधिक महत्व माना जाता है। भगवान जगन्नाथ का पावन धाम जिसको धरती का बैकुंठ भी कहा जाता है, वह ओडिशा के पुरी में स्थित है। सात प्राचीन पुरियों में एक इस पावन धाम में भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलभद्र के साथ विराजमान हैं। समुद्र के किनारे स्थित इस महाधाम की सिर्फ वास्तुकला नहीं बल्कि इससे जुड़े तमाम रोचक रहस्य भी हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको जगन्नाथ मंदिर और इससे जुड़ी रथ यात्रा से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>लकड़ी से बनी है मूर्तियां</h2><div>जगन्नाथ पुरी धाम में भगवान जगन्नाथ को श्रीकृष्ण का स्वरूप माना जाता है। यहां पर भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलभद्र के साथ मंदिर के गर्भगृह में विराजमान हैं। मंदिर में तीनों भगवान की मूर्तियां लकड़ी की बनी हैं, जिनको हर 12 साल में बदला जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/ujjain-yatra-incomplete-if-you-not-visit-84-mahadev-temples-know-route-map" target="_blank">84 Mahadev Temples in Ujjain: Ujjain Yatra होगी अधूरी, अगर नहीं किए 84 महादेव के दर्शन; जानें Route Map और महत्व</a></h3><div><br></div><h2>अधूरी मूर्तियों की होती है पूजा</h2><div>हिंदू मान्यता के मुताबिक जब भगवान विश्वकर्मा से राजा इंद्रदयुम्न ने भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों को बनाने का निवेदन किया। तो भगवान विश्वकर्मा ने यह शर्त रखी कि वह बंद कमरे में मूर्तियों को बनाएंगे और उस कमरे में कोई भी प्रवेश नहीं करेगा। माना जाता है कि जब जिज्ञासावश राजा इंद्रदयुम्न ने कमरे के पट खोल दिए, तो भगवान विश्वकर्मा अधूरी मूर्ति छोड़कर चले गए। तब से लेकर आज तक भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और भगवान बलभद्र की अधूरी मूर्तियों की पूजा की जाती है।</div><div><br></div><h2>जगन्नाथ की रथयात्रा</h2><div>हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के साथ रथ यात्रा पर बाहर निकलते हैं। यह रथ यात्रा जगन्नाथ मंदिर से शुरू होकर गुंडिचा मंदिर तक जाती है। फिर भगवान जगन्नाथ 9 दिनों बाद वापस अपने धाम को लौटकर आते हैं।</div><div><br></div><h2>मंदिर का मुकुट है सुदर्शन चक्र</h2><div>जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर लगे सुदर्शन चक्र को मंदिर का चमत्कारी मुकुट भी कहा जाता है। आप इसको जिस भी तरफ से देखेंगे, यह आपको अपनी ओर घूमा हुआ नजर आएगा। मंदिर के शिखर पर बने सुदर्शन चक्र के दर्शन करना बेहद पुण्यदायी माना जाता है।</div><div><br></div><h2>हवा के विपरीत लहराता है ध्वज</h2><div>भगवान जगन्नाथ धाम के ऊपर लहराता हुआ ध्वज अपने आप में विशेष है। भगवान के मंदिर का यह ध्वज रोजाना बदला जाता है। यह परंपरा आज भी है। इस मंदिर के ध्वज की यह खासियत है कि यह हमेशा हवा के विपरीत लहराता है।</div><div><br></div><h2>भगवान जगन्नाथ का भोग</h2><div>भगवान जगन्नाथ की रसोई भी बेहद खास है। यहां पर रोजाना भगवान के लिए विशेष रूप से तमाम तरह के भोग बनकर तैयार किए जाते हैं। जिसको आप चढ़ाए जाने के बाद ही मंदिर परिसर से प्राप्त कर सकते हैं।</div><div><br></div><h2>कैसे पकता है भगवान जगन्नाथ का भोग</h2><div>भगवान जगन्नाथ का भोग बेहद पवित्रता के साथ रोजाना मिट्टी के बर्तन में पकाया जाता है। मंदिर परिसर में स्थित रसोई में चूल्हे पर मिट्टी के बर्तन एक के ऊपर एक रखे जाते हैं। वहीं सबसे ऊपर रखे बर्तन का भोग सबसे पहले पकता है और जो नीचे वाली मटकी होती है, उसका भोग सबसे आखिरी में पकता है।</div><div><br></div><h2>कम नहीं पड़ता महाप्रसाद</h2><div>जब भोग को भगवान जगन्नाथ के लिए रसोई से मंदिर की ओर ले जाया जाता है। तो उस रास्ते के बीच में कोई भी नहीं आता है। वहीं यहां के महाप्रसाद की एक खासियत यह भी है कि यहां पर कितने ही भक्त आएं, लेकिन भोग समाप्त नहीं होता है। धार्मिक मान्यता है कि जगन्नाथ धाम पर हर पल मां अन्नपूर्णा और मां लक्ष्मी की कृपा रहती है। वहीं यहां पर कभी खाना बचता भी नहीं है।</div><div><br></div><h2>मंदिर के ऊपर से नहीं गुजरते पक्षी और जहाज</h2><div>भगवान जगन्नाथ धाम मंदिर के ऊपर के एक भी पक्षी या जहाज नहीं गुजरता है। वहीं जगन्नाथ मंदिर की कभी भी परछाई नहीं बनती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 11:47:38 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/amazing-facts-related-to-puri-jagannath-dha-why-birds-do-not-fly-over-temple</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[84 Mahadev Temples in Ujjain: Ujjain Yatra होगी अधूरी, अगर नहीं किए 84 महादेव के दर्शन; जानें Route Map और महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/ujjain-yatra-incomplete-if-you-not-visit-84-mahadev-temples-know-route-map]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सर्दी का मौसम हो या गर्मी है, कुछ महिलाओं को घूमना बेहद पसंद होता है। वहीं महिलाएं अलग-अलग जगहों को एक्सप्लोर करती हैं। अगर आप भी इन्हीं महिलाओं में से एक हैं और आपको भी घूमना-फिरना काफी पसंद है। तो यह खबर आपके लिए है। आज हम आपको एक ऐसी जगह के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां पर आप कुल 84 महादेव के दर्शन कर सकते हैं और इस जगह का बेहद महत्व भी माना जाता है।</div><div><br></div><h2>उज्जैन में मौजूद है 84 महादेव</h2><div>उज्जैन को बाबा महाकाल की नगरी कहा जाता है। यहां पर हर कोई ज्योतिर्लिंग और काल भैरव के दर्शन के लिए जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपको उज्जैन में एक नहीं बल्कि 84 महादेव के दर्शन करने को मिल सकता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको उज्जैन के सभी 84 महादेव के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/accurate-recitation-of-vishnu-sahasranama-open-doors-to-success-know-benefits" target="_blank">Vishnu Sahasranama का अचूक पाठ खोलेगा Success के द्वार, जानें इसके चमत्कारी Benefits और नियम</a></h3><div><br></div><h2>उज्जैन के 84 महादेवों के नाम</h2><div>वहीं 84 महादेवों में सबसे पहले अगस्तेश्वर महादेव आते हैं। फिर गुहेश्वर, डमरुकेश्वर महादेव, ढुंढेश्वर महादेव, स्वर्णजालेश्वर महादेव, त्रिविष्टपेश्वर महादेव, धारकेश्वर महादेव, दशमुखेश्वर महादेव, करभेश्वर महादेव, कंटकेश्वर महादेव, कंडुकेश्वर महादेव, सिंहेश्वर महादेव, प्रहादकेश्वर महादेव, राजेंद्रेश्वर महादेव, कोटिश्वर महादेव, विमलेश्वर महादेव, अंधकेश्वर महादेव, नीलकंठेश्वर महादेव, कपालमोचन महादेव, अनादि सिद्धेश्वर महादेव, अनादि कल्पेश्वर महादेव, शुक्रेष्वर महादेव, संगमेश्वर महादेव, हाटकेश्वर महादेव, मुकुटेश्वर महादेव, जटेश्वर महादेव, च्यवनेश्वर महादेव, अप्सरेश्वर महादेव, वरुणेश्वर महादेव, दशपुरेश्वर महादेव, नागचंद्रेश्वर महादेव, कुट्टुम्बेश्वर महादेव, महाकालेश्वर महादेव, जटाश्रृंगेश्वर महादेव, कर्कटेश्वर महादेव, घटकेश्वर महादेव, रामेश्वर महादेव, कलकलेश्वर महादेव, अर्धनारीश्वर महादेव, सौरीश्वर महादेव, कुबेरेश्वर महादेव और कुंटेश्वर महादेव।</div><div><br></div><h2>आखिरी में लोमशेश्वर महादेव</h2><div>लोकेश्वर महादेव, तिलभांडेश्वर महादेव, गर्गेश्वर महादेव, गोपेश्वर महादेव, नुकुलेश्वर महादेव, विश्वेश्वर महादेव, चंद्रेश्वर महादेव, यमेश्वर महादेव, इंद्रेश्वर महादेव, सागरेश्वर महादेव, प्रयागेश्वर महादेव, सिद्धेश्वर महादेव, मार्कंडेश्वर महादेव। गंगाधरेश्वर महादेव, वीरेश्वर महादेव, कुरुक्षेत्रेश्वर महादेव, नारदेश्वर महादेव, मातृकेश्वर महादेव, रुद्रेश्वर महादेव, दशरथेश्वर महादेव, रामेश्वर महादेव (द्वितीय), पवनकेश्वर महादेव, लकुलीश्वर महादेव, दुर्वासेश्वर महादेव, पिंगलेश्वर महादेव, कायावरोहणेश्वर महादेव, चिंतामणेश्वर महादेव, अर्केश्वर महादेव, विष्णुकेश्वर महादेव, आंगारकेश्वर महादेव, कुटिकेश्वर महादेव, समीश्वर महादेव, कपिलासंगमेश्वर महादेव, अमृतेश्वर महादेव, कर्णेश्वर महादेव, ऋणमुक्तेश्वर महादेव (कर्ज मुक्ति के लिए विशेष प्रसिद्ध), स्थावरेश्वर महादेव,&nbsp; ब्रह्मेश्वर महादेव, जलेश्वर महादेव, आनंदेश्वर महादेव, कंठेश्वर महादेव और अंत में लोमशेश्वर महादेव। बता दें कि यह सभी उज्जैन शहर और उसके आसपास 84 महादेव मंदिर मौजूद हैं।</div><div><br></div><h2>रूट मैप की लें सहायता</h2><div>उज्जैन में स्थानीय गाइड और स्थानीय प्रशासन की ओर से रूट मैप मिलता है। जोकि अगस्तेश्वर महादेव से शुरू होता है और लोमशेश्वर महादेव तक जाता है। आप इस आसानी से इस मैप का इस्तेमाल करके 84 महादेव के दर्शन कर सकती हैं। आपको इन सभी महादेव के दर्शन करने में 2 से 3 दिन का समय लगता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 12:02:15 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/ujjain-yatra-incomplete-if-you-not-visit-84-mahadev-temples-know-route-map</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Vishnu Sahasranama का अचूक पाठ खोलेगा Success के द्वार, जानें इसके चमत्कारी Benefits और नियम]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/accurate-recitation-of-vishnu-sahasranama-open-doors-to-success-know-benefits]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>विष्णु सहस्रनाम भगवान श्रीहरि विष्णु के एक हजार नामों का संग्रह है। जिसको महाभारत के शांति पर्व में बताया गया है। हिंदू धर्म में विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ बेहद पवित्र और फलदायी माना गया है। इसका पाठ करने से न सिर्फ व्यक्ति को आध्यात्मिक शांति मिलती है, बल्कि जीवन में आने वाली हर तरह की बाधा का निवारण होता है। </div><div>&nbsp;</div><div>महाभारत में विष्णु सहस्त्रनाम का उल्लेख मिलता है। बता दें कि जब भीष्म पितामह मृत्युशैया पर लेटे थे, तब उन्होंने विष्णु सहस्रनाम का महत्व युधिष्ठिर को समझाया था।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ न सिर्फ आध्यात्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसके जरिए से आत्मा और परमात्मा का मिलन संभव है। भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का यह सरल और प्रभावी उपाय है।</span></div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/why-goddess-lakshmi-called-chanchala-learn-this-big-secret-about-goddess-of-wealth" target="_blank">Hindu Mythology: क्यों कहलाती हैं मां लक्ष्मी 'चंचला'? जानें Goddess of Wealth से जुड़ा यह बड़ा Secret</a></h3><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है और रोजाना इसका पाठ करने से न सिर्फ विचार बल्कि कर्म भी शुद्ध होते हैं।</div><div><br></div><div>विष्णु सहस्त्रनाम के पाठ से मानसिक तनाव और निगेटिविटी दूर होती है। इससे घर में शांति का वातावरण और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।</div><div><br></div><div>शास्त्रों के अनुसार, इसका पाठ करने से स्वास्थ्य लाभ और दीर्घायु प्राप्त होती है। इसके रोजाना पाठ से शारीरिक और मानसिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।</div><div><br></div><div>हिंदू धर्म में भगवान श्रीहरि को सृष्टि का पालनहार माना गया है। विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की कृपा से जीवन में धन, समृद्धि और सौभाग्य का आगमन होता है।</div><div><br></div><div>जो भी व्यक्ति विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ करता है, उसको जीवन-मरण के बंधन से मुक्ति मिलती है। इससे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।</div><div><br></div><h2>नियम</h2><div>धार्मिक शास्त्रों में विष्णु सहस्त्रनाम के पाठ के विशेष नियम बताए गए हैं। इन नियमों का पालन करने से पाठ का प्रभाव ज्यादा होता है।</div><div><br></div><div>विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने से पहले स्नान कर लें और साफ कपड़े पहनें। क्योंकि मन और शरीर दोनों की पवित्रता जरूरी है।</div><div><br></div><div>सुबह के समय विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना सबसे अच्छा माना गया है। इसको शांत और स्वच्छ स्थान पर बैठकर करें। अगर संभव हो तो भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के सामने बैठकर इसका पाठ करें।</div><div><br></div><div>विष्णु सहस्त्रनाम पाठ शुरू करने से पहले श्रीहरि का ध्यान करते हुए मन में संकल्प लें। पाठ करते समय मंत्रों का उच्चारण शुद्ध और स्पष्ट होना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 12:07:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/accurate-recitation-of-vishnu-sahasranama-open-doors-to-success-know-benefits</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Hindu Mythology: क्यों कहलाती हैं मां लक्ष्मी 'चंचला'? जानें Goddess of Wealth से जुड़ा यह बड़ा Secret]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/why-goddess-lakshmi-called-chanchala-learn-this-big-secret-about-goddess-of-wealth]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में मां लक्ष्मी को धन, वैभव और समृद्धि की देवी माना जाता है। हर व्यक्ति यह चाहता है कि उनके घर-परिवार पर मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मां लक्ष्मी को 'चंचला' क्यों कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथों में मान्यताओं में मां लक्ष्मी को चंचला कहने के पीछे एक विशेष कारण बताया गया है। मान्यता के मुताबिक जिस घर में परिश्रम, स्वच्छता, दान-पुण्य और धर्म का पालन होता है, वहां पर मां लक्ष्मी का वास होता है। वहीं जिस घर में अहंकार, आलस, कलह और अनैतिक कार्य बढ़ जाते हैं, वहां पर मां लक्ष्मी वास नहीं करती हैं। इसी वजह से मां लक्ष्मी को चंचला कहा जाता है।</div><div><br></div><h2>चंचल मन से की गई मां लक्ष्मी की तुलना</h2><div>संस्कृत भाषा में 'चंचला' का अर्थ होता है, जो एक स्थान पर स्थिर न रहे, जैसे कि हमारा मन। आपने अक्सर लोगों से यह सुना होगा कि मन बहुत चंचल होता है। हमारा मन गतिशील रहता है। मां लक्ष्मी को चंचला नाम देने के पीछे की वजह यह है कि धन और संपत्ति कभी भी स्थायी नहीं होती है। जीवन में धन का आना-जाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया होती है। आज जो व्यक्ति धनवान है, वह भविष्य में आर्थिक समस्याओं में घिर सकता है। वहीं कठिन परिस्थितियों में रहने वाला समय में धनी और समृद्ध बन सकता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/india-city-of-thousand-temples-know-why-this-city-so-special" target="_blank">City of Thousand Temples: भारत की 'City of Thousand Temples', जानिए क्यों है इतनी खास यह नगरी</a></h3><div><br></div><div>वहीं पुराणों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि समुद्र मंथन के समय मां लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। मां लक्ष्मी ने भगवान श्रीहरि विष्णु को अपना पति चुना और क्षीर सागर में वास करने लगीं। वहीं भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनहार माना जाता है और वह संतुलन बनाए रखने का काम करते हैं। इसलिए माना जाता है कि लक्ष्मी भी उस स्थान पर ज्यादा समय रहती हैं, जहां पर अनुशासन, संतुलन और सद्गुण मौजूद होते हैं।</div><div><br></div><h2>लक्ष्मी प्राप्ति के सूत्र</h2><div>रोजाना घर की पहली रोटी गाय को और आखिरी रोटी कुत्ते को देना चाहिए। ऐसा करने से भाग्य का द्वार खुलता है और मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।</div><div><br></div><div>हर शुक्रवार को नियमित रूप से श्रीसूक्त या लक्ष्मी सूक्त का पाठ करना चाहिए। ऐसा करने से मां लक्ष्मी का उस स्थान पर स्थायी वास होता है।</div><div><br></div><div>रोजाना सुबह उठकर सबसे पहले मुख्यद्वार पर गृहलक्ष्मी को एक लोटा जल डालना चाहिए। इससे मां लक्ष्मी के घर आने का मार्ग प्रशस्त होता है।</div><div><br></div><div>घर में पूजा के दौरान घी का जो दीपक जलाया जाता है, उसमें रुई की बत्ती की जगह मौली का इस्तेमाल करना चाहिए। क्योंकि मां लक्ष्मी को लाल रंग अतिप्रिय है।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 13:28:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/why-goddess-lakshmi-called-chanchala-learn-this-big-secret-about-goddess-of-wealth</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[City of Thousand Temples: भारत की 'City of Thousand Temples', जानिए क्यों है इतनी खास यह नगरी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/india-city-of-thousand-temples-know-why-this-city-so-special]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हमारे यहां भारत में घूमने-फिरने के लिए एक से बढ़कर एक जगहें मौजूद हैं। वहीं भारत घुमक्कड़ों से भरा हुआ है। आमतौर पर लोग पहाड़ों और बीच पर जाना पसंद करते हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों में स्प्रिचुअल टूरिस्म का क्रेज लोगों में काफी देखने को मिल रहा है। बता दें कि भारत में कुछ ऐसी जगहें भी हैं, जहां पर सिर्फ घूमना नहीं बल्कि इतिहास और आध्यात्मिकता को महसूस करना भी है।</div><div><br></div><div>अक्सर धार्मिक जगहों के बारे में बात करते हुए मथुरा-काशी का जिक्र होता है। वहीं भारत में एक ऐसी जगह भी है, जिसको हजार मंदिरों वाली नगरी कहा जाता है। यह जगह कांचीपुरम में है। जोकि साउथ इंडिया में हैं। जो भी यहां आता है, तो इसकी खूबसूरती का जिक्र करते नहीं थकता है।</div><div><br></div><h2>हजार मंदिरों की नगरी</h2><div>कांचीपुरम को हजारों मंदिरों का शहर इसलिए कहा जाता है, क्योंकि पुराने समय में यहां पर करीब 1000 मंदिर थे। यह मंदिर अलग-अलग राजवंशों, चोल, पल्लवों और विजयनगर के समय में बनवाए गए थे। आज भी यहां पर 100 से अधिक बड़े और खूबसूरत मंदिर देखने को मिलेंगे। यह मंदिर अपनी नक्काशी और वास्तुकला के लिए दुनियाभर में फेमस है।</div><div><br></div><h2>क्यों खास है यहां के मंदिर</h2><div>कांचीपुरम में जितने भी मंदिर है, वह सिर्फ पूजा के लिए नहीं बल्कि कला और इतिहास का जीता-जागता उदाहरण है।</div><div><br></div><h2>कैलाशनाथर मंदिर</h2><div>यह मंदिर शहर का सबसे पुराना मंदिर है। यहां के पत्थरों की नक्काशी काफी ज्यादा खूबसूरत हैं।</div><div><br></div><h2>एकम्बरेश्वर मंदिर</h2><div>एकम्बरेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है।</div><div><br></div><h2>कामाक्षी अम्मन मंदिर</h2><div>कामाक्षी अम्मन मंदिर की गिनती शक्तिपीठों में होती है।</div><div><br></div><h2>सुकून का होगा एहसास</h2><div>अगर आप भी कांचीपुरम जाती हैं, तो आपको यहां पर सुकून का एहसास होगा। यहां पर भीड़ काफी कम होती है और हर ओर मंदिरों की घंटियों की आवाजें सुनाई देती है। यह अपने आप में एक आध्यात्मिक अनुभव है। आप आराम से यहां पर मंदिरों के दर्शन कर सकते हैं। कांचीपुरम में यहां की संस्कृति को करीब से महसूस कर सकती हैं। वहीं अगर आपको भीड़भाड़ ज्यादा पसंद नहीं है, तो आप यहां पर जा सकती हैं।</div><div><br></div><h2>शॉपिंग करें</h2><div>कांचीपुरम का नाम आते ही कांजीवरम साड़ी का जिक्र जरूर होता है। यहां की रेशमी साड़ियां बहुत फेमस है। इन साड़ियों के डिजाइन देखने लायक होती है और यहां पर घूमने के अलावा शॉपिंग का भी मजा ले सकती हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 16:16:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/india-city-of-thousand-temples-know-why-this-city-so-special</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Puri का 'चमत्कार'! एक ही आग पर रखे 7 बर्तनों में सबसे ऊपर वाला खाना पहले कैसे पकता है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/jagannath-divine-kitchen-top-pot-cooks-first]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत ही नहीं, दुनिया भर में भगवान जगन्नाथ यात्रा लोकप्रिय है। हर साल ओडिशा में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली जाती है। जब रथ यात्रा शुरु होती है, तो लाखों भक्त ओडिशा पहुंच जाते हैं। यहां पर श्रृद्धालुओं को रथ यात्रा के साथ-साथ कई और चीजें आकर्षित करती हैं और वो है जगन्नाथ मंदिर में बनने वाला महाप्रसाद।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">इस प्रसाद से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जिन्हें जानकर लोग हैरान भी हो जाते हैं। सबसे खास बात यह है कि यहां खाना मिट्टी के बर्तनों में पकाया जाता है। ये सभी बर्तन एक के ऊपर एक करके रखे जाते हैं। तो चलिए बिना देर किए आपको इस लेख में जगन्नाथ मंदिर की रसोई से जुड़ी खास बातें बताने जा रहे हैं।</span></div><div><br></div><div><span style="font-size: 1rem;"><b>दुनिया के सबसे बड़े किचन में से एक है ये रसोई</b></span></div><div><span style="font-size: 1rem;">दरअसल, जगन्नाथ मंदिर की रसोई को दुनिया की सबसे बड़ी मंदिर रसोइयों में गिना जाता है। यहां की रसोई मंदिर परिसर के साउथ ईस्ट में है। वहीं, रसोई में करीब 150 फीट&nbsp; लंबी, 100 फीट चौड़ी और लगभग 20 फीट ऊंची है। इसमें कुल 32 कमरे हैं और इसके अंदर लगभग 250 मिट्टी के चूल्हे बने हुए हैं। यहां हर दिन करीब 600 रसोइए और 400 लोगों मिलकर भगवान के लिए प्रसाद की तैयारी करते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>मिट्टी के बर्तन में बनता है प्रसाद</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">बता दें कि , इस रसोई की सबसे खास बात यही है कि इसका पारंपरिक तरीका है। यहां भोजन बनाने के लिए मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल किया जाता है। वहीं, चूल्हे के लिए लकड़ी की आग तैयारी की जाती है और फिर चावल, दाल, सब्जियां और दूसरे व्यंजन मिट्टी के बर्तनों में ही पकाए जाते हैं। माना जाता है कि यहां मां लक्ष्मी स्वयं खाना बनाती हैं।</span></div><div><br></div><div><b>एक के ऊपर एक रखे जाते हैं बर्तन</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">यहां पर महाप्रसाद बनाते समय मिट्टी के कई बर्तन एक-दूसरे के ऊपर रख दिए जाते हैं। खासतौर पर लोग यही सोचते हैं कि नीचे रखा बर्तन पहले पकेगा,क्योंकि आग के पास यही सबसे करीब है, लेकिन यहां एक अलग ही बात देखने को मिलती है। माना जाता है कि परंपरा के अनुसार, यहां सबसे ऊपर रखा बर्तन पहले पकता है।</span></div><div><br></div><div><b>भगवान जगन्‍नाथ को लगता है छप्पन भोग</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;जगन्नाथ प्रभु को 56 प्रकार के व्यंजनों को छप्पन भोग या महाप्रसाद कहा जाता है। भक्तजन इसे सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि भगवान का आशीर्वाद मानते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>भगवान को भोग लगाने के बाद बनता है महाप्रसाद</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">सबसे पहले रसोई में भोग तैयार होता है फिर भगवान जगन्नाथ को अर्पित किया जाता है। इसके बाद इसे देवी विमला को समर्पित किया जाता है। इसके बाद ये भोजन महाप्रसाद कहलाता है। अब इस भोग को श्रद्धालुओं में बांटा जाता है।&nbsp;</span></div>]]></description>
      <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 17:08:55 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/jagannath-divine-kitchen-top-pot-cooks-first</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Jagannath Rath Yatra का रहस्य: Puri के इस मंदिर में दर्शन से क्यों मिलता है मोक्ष का वरदान?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/secret-of-jagannath-rath-yatra-why-one-get-blessing-of-salvation-by-visiting-this-temple-in-puri]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए हर साल लाखों भक्त पहुंचते हैं। मान्यता है कि जगन्नाथ धाम के दर्शन करने मात्र से जातक को उनकी कृपा प्राप्त होती है। वहीं ओडिशा के पुरी में सिर्फ जगन्नाथ मंदिर ही नहीं बल्कि गुंडिचा मंदिर भी है। यहां पर भगवान जगन्नाथ विश्राम के लिए आते हैं, इसको उनकी मौसी का घर भी कहा जाता है। गुंडिचा मंदिर जगन्नाथ धाम से करीब 3 किमी दूर स्थित है।</div><div><br></div><div>हर साल भव्य और विशाल रथ यात्रा के दौरान गुंडिचा मंदिर सबसे अहम पड़ाव माना जाता है। इस बार 16 जुलाई 2026 से जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरूआत होगी। मान्यता है कि रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के दर्शन मात्र से ही व्यक्ति को जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/the-doors-will-be-closed-during-winter-know-why-god-worshipped-in-joshimath" target="_blank">Badrinath Dham Update: शीतकाल में बंद होंगे कपाट, जानें क्यों Joshimath में होती है भगवान की पूजा</a></h3><div><br></div><h2>गुंडिचा मंदिर क्यों है खास</h2><div>हिंदू परंपराओं के अनुसार, रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा भव्य रथों पर सवार होकर अपनी मौसी यानी की गुंडिचा मंदिर जाते हैं। इस दौरान भगवान यहां पर 7 दिनों तक रुककर विश्राम करते हैं। इस कारण पुरी के सबसे खास मंदिरों में गुंडिचा मंदिर शामिल है। हर श्रद्धालु जगन्नाथ भगवान के दर्शन करने के बाद गुंडिचा मंदिर जरूर आते हैं।</div><div><br></div><h2>आध्यात्मिक महत्व</h2><div>धार्मिक आस्था के अनुसार, भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान गुंडिचा मंदिर के दर्शन करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। वहीं कई पौराणिक और स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक जो भी भक्त पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ भगवान के रथ के दर्शन करता है या फिर रस्सी खींचता है। वह व्यक्ति पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त हो जाता है।</div><div><br></div><h2>जानें रथ यात्रा का महत्व</h2><div>पुरी में जगन्नाथ रथ यात्रा को देश के सबसे विशाल और धार्मिक आयोजनों में से एक माना जाता है। इस दौरान दुनियाभर से लाखों भक्त भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में शामिल होते हैं। वहीं भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ, भाई बलभद्र का तालध्वज और सुभद्र का दर्पदलन रथ विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है।</div><div><br></div><div>जगन्नाथ रथ यात्रा इस बात का भी संदेश देती है कि भगवान सिर्फ मंदिरों तक ही सीमित नहीं हैं। बल्कि वह खुद भक्तों के बीच आकर उनको दर्शन देते हैं। यही कारण है कि गुंडिचा मंदिर और जगन्नाथ रथ यात्रा दोनों को ही भक्ति और आध्यात्म का प्रतीक माना जाता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 24 Jun 2026 15:38:33 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/secret-of-jagannath-rath-yatra-why-one-get-blessing-of-salvation-by-visiting-this-temple-in-puri</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Badrinath Dham Update: शीतकाल में बंद होंगे कपाट, जानें क्यों Joshimath में होती है भगवान की पूजा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/the-doors-will-be-closed-during-winter-know-why-god-worshipped-in-joshimath]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हर साल सर्दियों के मौसम की शुरूआत में बद्रीनाथ धाम के कपाट बंद हो जाते हैं। क्योंकि इस क्षेत्र में भारी बर्फबारी होती है और मौसम बेहद सर्द हो जाता है। कपाट बंद होने की डेट हर साल दशहरा के बाद घोषित की जाती है। यह एक अहम धार्मिक घटना होती है। जब मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं, तब भगवान बद्री विशाल की पूजा की जाती है। ऐसे में अब आपने मन में यह सवाल होगा कि बद्रीनाथ के कपाट बंद हो जाते हैं, तो बद्री विशाल की पूजा कहां होती है।</div><div><br></div><div>प्राप्त जानकारी के मुताबिक बर्फबारी के दौरान भगवान बद्री विशाल के पूजा को स्थानातंरित कर दिया जाता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि कपाट बंद होने के बाद बद्री विशाल की पूजा कहां होती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/5-divine-facts-of-tirupati-balaji-temple-which-even-science-surprised-by-do-you-know" target="_blank">Famous Temple: Tirupati Balaji Temple के 5 Divine Facts, जिनके आगे विज्ञान भी हैरान, क्या आप जानते हैं</a></h3><div><br></div><h2>कहां होती है बद्रीविशाल की पूजा</h2><div>बता दें कि जब बद्रीनाथ धाम के कपाट शीतकाल के लिए बंद हो जाते हैं, तो भगवान बद्री विशाल की पूजा की व्यवस्था को उनके शीतकालीन गद्दी स्थल पर स्थानांतरित कर दी जाती है। सर्दियों में बद्री विशाल की पूजा जोशीमठ स्थित श्री नरसिंह मंदिर में की जाती है। इस दौरान बद्रीनाथ मंदिर से भगवान के प्रतिनिधि के तौर पर कुबेर जी और उद्धव जी की डोली भी जोशीमठ लाई जाती है।</div><div><br></div><div>सदियों पुरानी इस परंपरा का पालन करते हुए मुख्य पुजारी और अन्य लोग एक विशेष धार्मिक यात्रा के तहत भगवान की गद्दी को जोशीमठ लेकर जाते हैं। वहीं इस दौरान श्रद्धालु श्री नरसिंह मंदिर में बद्री विशाल की पूजा और दर्शन कर सकते हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 16:49:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/the-doors-will-be-closed-during-winter-know-why-god-worshipped-in-joshimath</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Famous Temple: Tirupati Balaji Temple के 5 Divine Facts, जिनके आगे विज्ञान भी हैरान, क्या आप जानते हैं]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/5-divine-facts-of-tirupati-balaji-temple-which-even-science-surprised-by-do-you-know]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देश भर में कई ऐसे फेमस मंदिर हैं, जो अपने अपने आप में कई तरह के रहस्यों को समेटे हुए है। ऐसा ही एक मंदिर आंध्र प्रदेश राज्य के चित्तूर में तिरुमला पर्वत पर बसा तिरुपति बालाजी का मंदिर है। यह भगवान वेंकटेश्वर स्वामी को समर्पित है। तिरुपति बालाजी मंदिर दुनिया के सबसे अमीर और प्रमुख हिंदू तीर्थ स्थलों में से शामिल है। तिरुमला का तिरुपति बालाजी मंदिर अपनी आस्था के अलावा गहरे तथ्यों के लिए भी पूरी दुनिया में विख्यात है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको तिरुपति बालाजी मंदिर से जुड़े कुछ रोचक तथ्यों के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>मंदिरों में बालों का दान</h2><div>तिरुपति बालाजी मंदिर में दान करने की अनोखी परंपरा है। यहां पर बालों का दान किया जाता है। माना जाता है कि भगवान विष्णु के धन और समृद्धि के देवता कुबेर देव जी से उधार लिया था। भगवान विष्णु ने कुबेर देव को वचन दिया था कि कलियुग का जब अंत होगा, तब तक पूरा उधार चुका दिया जाएगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/secret-of-kamakhya-shaktipeeth-know-why-mother-court-closed-during-ambubachi-fair" target="_blank">Ambubachi Mela 2026: कामाख्या शक्तिपीठ का सबसे बड़ा रहस्य, जानें Ambubachi Fair में क्यों बंद हो जाता है मां का दरबार</a></h3><div><br></div><div>उसी उधार को चुकाने के लिए यहां पर आने वाले श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने पर बालों का दान करते हैं। तिरुपति मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा बाल का दान ऋण की किस्त का प्रतीक माना जाता है।</div><div><br></div><h2>चावल-दही प्रिय भोग</h2><div>दक्षिण भारत का तिरुपति बालाजी मंदिर जहां भगवान विष्णु की पूजा श्रीवेंकटेश्वर स्वामी के रूप में की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, इस स्थान को कलयुग में श्रीविष्णु का निज निवास भी माना जाता है।</div><div><br></div><div>मंदिर में आने वाले भक्तों की माने तो यहां मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है। बात जब वेंकटेश्वर स्वामी को भोग लगाने की आती है, तब प्रसाद के रूप में लड्डू या छप्पन तरह के पकवान नहीं, बल्कि दही-चावल का भोग लगाया जाता है।</div><div><br></div><h2>मंदिर की प्रतिमा से जुड़े रहस्य</h2><div>तिरुपति बालाजी मंदिर की मूर्ति भव्य होने के साथ काफी अहम भी है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक प्रतिमा के पीछे से हमेशा समुद्र की लहरों की आवाजें आती हैं। जिन भी श्रद्धालुओं ने इसको कान लगाकर सुनने की कोशिश की, उनको समुद्र की लहरों की आवाज सुनाई देती है।</div><div><br></div><div>इस मंदिर में मौजूद भगवान वेंकटेश्वर को मां लक्ष्मी और भगवान श्रीहरि विष्णु दोनों के ही वस्त्र पहनाए जाते हैं। क्योंकि मूर्ति को मां लक्ष्मी और श्रीविष्णु का अवतार माना जाता है।</div><div><br></div><h2>वेंकटेश्वर स्वामी के असली बाल</h2><div>बता दें कि तिरुपति बालाजी मंदिर में मौजूद भगवान वेंकटेश्वर स्वामी की मूर्ति पर लगे बाल असली हैं। जोकि आपस में बिगड़ते या उलझते नहीं हैं। यह बाल हमेशा काले और चमकदार दिखाई देते हैं। इसके अलावा गर्मी के मौसम में श्री वेंकटेश्वर स्वामी की प्रतिमा को पसीना भी आता है। जोकि काफी रोचक होने के अलावा उनकी मौजूदगी का भी एहसास दिलाता है।</div><div><br></div><h2>चमत्कारी दीपक</h2><div>तिरुपति बालाजी मंदिर में हमेशा एक दीपक जलता रहता है। इस दीपक में कभी भी तेल या घी का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। लेकिन इसके बाद भी यह दीपक जलता रहता है। यह दीपक आज भी मंदिर में आने वाले हर भक्त के लिए रहस्य बना हुआ है।</div><div><br></div><div>पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक त्रेतायुग में स्वयं भगवान ब्रह्मा ने इस दीपक को जलाया था। तब से यह दीपक बिना किसी रुकावट के लगातार जल रहा है। जिसको अनंत काल का भी प्रतीक माना जाता है।</div><div><br></div><h2>मंदिर में रखी छड़ी का रहस्य</h2><div>तिरुपति बालाजी मंदिर के मुख्य द्वार पर दरवाजे के दाईं ओर एक छड़ी है। इस छड़ी को लेकर कई लोक मान्यताएं हैं। माना जाता है कि बाल रूप में इसी छड़ी से बालाजी की पिटाई हुई थी। जिस कारण उनकी ठोड़ी पर चोट लग गई थी। तब से लेकर आज तक हमेशा उनकी ठोड़ी पर चंदन का लेप लगाया जाता है। जिससे कि उनका घाव सही हो जाए।</div><div><br></div><div>तिरुपति बालाजी मंदिर से जुड़े चमत्कारों और रहस्यों का मुख्य स्त्रोत वराह पुराण, स्कंद पुराण, मंदिर के शिलालेख और सदियों से चली आ रही स्थानीय धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 10:56:09 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/5-divine-facts-of-tirupati-balaji-temple-which-even-science-surprised-by-do-you-know</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ambubachi Mela 2026: कामाख्या शक्तिपीठ का सबसे बड़ा रहस्य, जानें Ambubachi Fair में क्यों बंद हो जाता है मां का दरबार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/secret-of-kamakhya-shaktipeeth-know-why-mother-court-closed-during-ambubachi-fair]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत अपनी संस्कृति और कलाओं के साथ-साथ अपनी आध्यात्म और धार्मिक मान्यताओं के लिए जाना जाता है। खासकर हिंदू धर्म में आस्था से जुड़े कई चमत्कार देखने को मिलते हैं। यहां कई ऐसे मंदिर हैं, जो अपना रहस्यों के लिए जाने जाते हैं। ऐसा ही एक मंदिर पूर्वोत्तर भारत के असम में स्थित है, जो कामाख्या देवी मंदिर है और इसको एक दिव्य और चमत्कारी जगह कहा जाता है। हर साल यहां जून के महीने में आध्यात्म, आस्था और रहस्य का अनूठा संगम देखने को मिलता है। जिसको दुनिया 'अंबुबाची मेला' कहती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि इस बार यह मेला कब शुरू होगा और इस मेले की क्या खासियत है।</div><div><br></div><h2>रहस्यों से भरा मां का दरबार</h2><div>असम के गुवाहाटी शहर की नीलाचल पहाड़ियों पर मां कामाख्या का यह पावन धाम मौजूद है। हिंदू धर्म की सभी 51 शक्तिपीठों में मां कामाख्या मंदिर का सबसे खास और ऊंचा स्थान माना गया है। मंदिर की मान्यता है कि यहां बाकी मंदिरों की तरह किसी देवी की मूर्ति नहीं है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/unique-temple-in-visakhapatnam-where-narasimha-resembles-shivalinga-learn-secret-story-behind-it" target="_blank">Famous Temple: Visakhapatnam का अनोखा मंदिर, जहां शिवलिंग जैसे दिखते हैं नरसिंह, जानें इसके पीछे की 'Secret Story'</a></h3><div><br></div><div>मूर्ति की जगह पर यहां एक प्राकृतिक रूप से निर्मित शिला की पूजा होती है। जिसका आकार योनि के समान है। माना जाता है कि देवी सती के योनि का भाग यहां पर गिरा था, जिसके बाद यहां पर शक्तिपीठ बना था।</div><div><br></div><h2>कब लगेगा अंबुबाची मेले</h2><div>अंबुबाची मेला यहां पर होने वाला एक अहम पर्व है। इस मेले से प्राचीन और गहरी धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं। माना जाता है कि हर साल मेले के दौरान मां कामाख्या अपने मासिक धर्म से गुजरती हैं। इसी वजह से देवी मां को पूरा आराम दिया जाता है और मंदिर के मुख्य कपाट को तीन दिनों के लिए पूरी तरह बंद कर दिया जाता है।</div><div><br></div><div>इन तीन दिनों में मंदिर के अंदर किसी भी तरह का पूजा-पाठ, आरती या अन्य कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं होता है। वहीं चौखे दिन शुद्धिकरण अनुष्ठान करने के बाद ही मंदिर के कपाट भक्तों के लिए खोले जाते हैं। इस साल 22 जून 2026 से अंबुबाची मेले की शुरूआत होने जा रही है, जोकि 26 जून तक चलेगा।</div><div><br></div><div>बता दें कि अंबुबाची मेले से जुड़ी कई मान्यताएं हैं। माना जाता है कि मंदिर का पट बंद करते समय यहां पर एक सफेद कपड़ा रखा जाता है, जोकि 3 दिन बाद मंदिर खुलने पर पूरी तरह से लाल हो जाता है। वहीं प्रसाद के रूप में भक्तों को यही 'अंगवस्त्र' यानी लाल कपड़े का टुकड़ा दिया जाता है। जिसको लोग मां कामाख्य का परम आशीर्वाद मानते हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 14:37:18 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/secret-of-kamakhya-shaktipeeth-know-why-mother-court-closed-during-ambubachi-fair</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Famous Temple: Visakhapatnam का अनोखा मंदिर, जहां शिवलिंग जैसे दिखते हैं नरसिंह, जानें इसके पीछे की 'Secret Story']]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/unique-temple-in-visakhapatnam-where-narasimha-resembles-shivalinga-learn-secret-story-behind-it]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार को समर्पित एक दिव्य मंदिर सिंहाचलम मंदिर है। बता दें कि यहां पर भगवान नरसिंह की मूर्ति से सिर्फ 24 घंटे के लिए 'चंदन की परत' हटाई जाती है। वहीं तभी यह मंदिर दर्शन के लिए खुलता है। इस मंदिर को भगवान नरसिंह का घर कहा जाता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको मंदिर से जुड़ी कुछ अनोखी बातों के बारे में बताने जा रहे हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>कहां है यह दिव्य धाम</h2><div>आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में सिंहाचलम मंदिर स्थित है। जोकि आस्था और वास्तुकला का एक अद्भुत संगम है। वराह लक्ष्मी नरसिम्हा मंदिर विशाखापट्टनम से करीब 16 किमी दूर है। जोकि सिंहाचल पर्वत की चोटी पर स्थित है। इस वजह से मंदिर को सिंहाचलम मंदिर के नाम से जाना जाता है। बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण खुद प्रह्लाद ने कराया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mystery-of-panch-kedar-linked-to-mahabharata-period-visit-here-liberates-one-from-sins" target="_blank">Mysterious Temples: Mahabharat काल से जुड़ा है Panch Kedar का रहस्य, यहां दर्शन से मिलती है पापों से मुक्ति</a></h3><div><br></div><h2>चंदन का लेप</h2><div>भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार को वीरता और उग्रता का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक हिरण्यकश्यपु का वध करने के बाद भगवान नरसिंह का क्रोध बेहद बढ़ गया था। ऐसे में सभी देवताओं को उनको शांत कराने का प्रयास असफल रहा।</div><div><br></div><div>तब भगवान नरसिंह अपने परम भक्त प्रह्लाद की प्रार्थना पर शांत हुए और सिंहाचलम पर्वत पर प्रकट हुए थे। भगवान नरसिंह के तेज और उग्रता को कम करने के लिए उनको चंदन से शीतल रखा जाता है। यही वजह है कि वह साल भर तक चंदन से ढके रहते हैं, जिससे उनका स्वरूप सौम्य बना रहे।</div><div><br></div><h2>कब खुलता है मंदिर</h2><div>चंदन की मोटी परत से ढके रहने की वजह से भगवान नरसिंह की मूर्ति शिवलिंग के आकार में दिखती है। वहीं सिर्फ अक्षय तृतीया के मौके पर ही चंदन हटाया जाता है। जिसको 'निजरूप दर्शन' या 'चंदनोत्सव' कहा जाता है। श्रद्धालु इस दिन भगवान के असली विग्रह हो देख पाते हैं।</div><div><br></div><div>ऐसे में इस मंदिर में अक्षय तृतीया के मौके पर भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है। वहीं नरसिंह जयंती के मौके पर यहां श्रद्धालु पहुंचते हैं।</div><div><br></div><h2>जानें मंदिर की खासियत</h2><div>आमतौर पर भगवान नरसिंह के अन्य मंदिरों में आपको उनका उग्र रूप देखने को मिलेगा। लेकिन सिंहाचलम मंदिर में भगवान माता लक्ष्मी के साथ बेहद शांत और सौम्य मुद्रा में विराजमान हैं। अगर मंदिर के वास्तुकला की बात की जाए, तो इस मंदिर में चालुक्य, चोल और कलिंग शैलियों का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलेगा।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 11:12:22 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/unique-temple-in-visakhapatnam-where-narasimha-resembles-shivalinga-learn-secret-story-behind-it</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Jagannath Rath Yatra: 42 पहिए, बिना धातु का इस्तेमाल, कैसे बनते हैं ये 3 भव्य रथ?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/jagannath-rath-yatra-chariots-an-analysis-of-sacred-design]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">भारत में व्रत, त्योहारों और संस्कृतियों का समावेश है। यहां पर हर एक त्योहार की विशेष खासियत है। विविधताओं से भरा हुआ भारत में कई सारे त्योहारों को उत्साह के साथ मनाया जाता है। ऐसा ही हर साल ओडिशा के पुरी में निकलने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक पर्व के रुप में मानी जाती है।&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा भव्य रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर तक जरुर पहुंचती हैं। दरअसल, रथ यात्रा का मुख्य आकर्षण केवल भगवानों के दर्शन तक सीमित नहीं होता है, बल्कि इन विशाल रथों का निर्माण और उनकी अनोखी बनावट भी लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र माना जाता है। असल में हर साल इन तीनों रथों का निर्माण नए सिरे से किए जाता है। आइए आपको बताते हैं रथ यात्रा के तीनों रथों की अनोखी संरचना के बारे में विस्तार से।</span></div><div><br></div><div><b>कब शुरू होता है जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए रथ का निर्माण?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा के लिए रथों का निर्माण कार्य अक्षय तृतीया से आरंभ किया जाता है, जिसे सनातन परंपरा में बेहद मंगलकारी दिन माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस शुभ तिथि पर शुरू किए गए कार्यों में सफलता और समृद्धि प्राप्त होती है। यही कारण है कि रथ निर्माण की शुरुआत इसी दिन की जाती है। इस पावन अवसर पर वैदिक मंत्रोच्चार, पूजा-अर्चना और हवन के साथ रथ निर्माण का शुभारंभ किया जाता है।</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">फिर मंदिर के पुजारी पूजा-अर्चना करके मुख्य कारीगरों को माला अर्पित करते हैं। इसके बाद तीनों रथों का निर्माण एक साथ शुरु किया जाता है और करीब एक ही समय पर पूरा भी किया जाता है। इन तीनों रथों का सबसे जरुरी हिस्सा इसके पहिए होते हैं। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के तीनों रथों के लिए कुल 42 पहिए बनाए जाते हैं। इन पहियों को तैयार करने के बाद उन्हें रथ के मुख्य ढांचे में लगाया जाता है।</span></div><div><br></div><div><b>अलग-अलग तरह से रथों की सजावट होती</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">इन रथों की सजावट काफी अलग-अलग होती है। असल में जगन्नाथ रथ यात्रा के रथों की खूबसूरती उनकी कलात्मक सजावट में छिपी होती है। ओडिशा की पारंपरिक मंदिर वास्तुकला से प्रेरित नक्काशी रथों पर की जाती है। रथ की लकड़ी पर उकेरे गए डिजाइन और रंग-बिरंगी पेंटिंग इन रथों की भव्य रुप प्रदान करते हैं। रंथों के ऊपर लगाए जाने वाले विशाल कपड़े के छत्र लाल, पीले, हरे&nbsp; और काले रंगों से सजाया जाता है। इन कपड़ों पर पारंपरिक कढ़ाई की जाती है, जो रथों की सुंदरता को और अधिक बढ़ा देता है।</span></div><div><br></div><div><b>नंदीघोष- भगवान जगन्नाथ का रथ</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष के नाम से प्रसिद्ध है। यह तीनों रथों में सबसे भव्य माना जाता है और इसकी ऊंचाई करीब 45 फीट तक होती है। इस विशाल रथ को 16 बड़े पहियों से सजाया जाता है। रथ पर मुख्य रूप से लाल और पीले रंग का आकर्षक संयोजन देखने को मिलता है। वहीं, इसे आगे बढ़ाने वाले घोड़े सफेद रंग के होते हैं, जो पवित्रता और दिव्यता का प्रतीक माने जाते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>लालध्वज- भगवान बलभद्र का रथ</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">भगवान बलभद्र के रथ को तालध्वज कहा जाता है। इसकी ऊंचाई भी करीब 45 फीट होती है और इसके 14 पाहिए होते हैं। इस रथ को लाल और हरे रंग से सजाया जाता है। इसके घोड़े काले रंग के होते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>दर्पदलन- देवी सुभद्रा का रथ</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">देवी सुभद्रा का रथ दर्पदलन या देबदलन होता है। इसकी ऊंचाई करीब 44 फीट 6 इंच होती है। वहीं, इसमें 12 पहिए होते हैं। रथ का प्रमुख रंग लाल और काला होता है। इसे खींचने के लिए घोड़े का रंग लाल होता है।</span></div><div><br></div><div><b>बिना कील के बनाया जाता है रथ</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">इन रथ की सबसे खास बात यह है कि इनमें किसी भी प्रकार का धातु इस्तेमाल नहीं होता है बल्कि इनमें केवल लड़कियों का इस्तेमाल किया जाता है। इसके निर्माण में लकड़ी के हिस्सों को आपस में जोड़ने के लिए खांचे और लकड़ी की खूंटियों का इस्तेमाल किया जाता है। जिससे इसकी सरचना और भी खूबसूरत बन जाती है।&nbsp;</span></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 17:51:17 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/jagannath-rath-yatra-chariots-an-analysis-of-sacred-design</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mysterious Temples: Mahabharat काल से जुड़ा है Panch Kedar का रहस्य, यहां दर्शन से मिलती है पापों से मुक्ति]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mystery-of-panch-kedar-linked-to-mahabharata-period-visit-here-liberates-one-from-sins]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में पंचकेदार की तीर्थयात्रा को बेहद पवित्र माना जाता है। पंच केदार की यात्रा को मन, शरीर और आत्मा की शुद्धि का एक आध्यात्मिक मार्ग माना गया है। पंच केदार उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय में स्थित है। पंच केदार की उत्पत्ति महाभारत काल की एक कथा से जुड़ी है। पौराणिक कथा के मुताबिक कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद पापों से छुटकारा पाने के लिए पांडव हिमालय पहुंचे। लेकिन भगवान शिव पांडवों से नाराज थे। जिस कारण महादेव पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे। इसलिए भगवान शिव बैल का रूप धारण करके धरती में लुप्त हो गए।</div><div><br></div><div>धार्मिक मान्यता है कि मुताबिक जब भगवान शिव बैल रूप में धरती में समाए तो उनके शरीर के अलग-अलग हिस्से हिमालय के पांच अलग-अलग स्थानों पर प्रकट हुए। इन्हीं 5 स्थानों पर पांडवों द्वारा भगवान शिव की पूजा की गई। जिसको पंच केदार के नाम से जाना जाता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको पंच केदार और इसके महत्व के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/the-amazing-story-of-somnath-temple" target="_blank">Somnath Mandir की अद्भुत कहानी: जब चंद्रमा को मिला श्राप, Lord Shiva ने ऐसे की रक्षा</a><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></h3><div><br></div><h2>केदारनाथ</h2><div>पंचकेदार में केदारनाथ मंदिर सबसे प्रमुख माना जाता है। यहां पर बैल रूपी अवतार की पीठ का हिस्सा प्रकट हुआ था। केदारनाथ को आस्था का बड़ा केंद्र माना जाता है और हर साल भारी संख्या में श्रद्धालु केदारनाथ मंदिर आते हैं। यहां पर भगवान शिव की पूजा करने से जातक को पापों से मुक्ति मिलती है और शुभ फल की प्राप्ति होती है।</div><div><br></div><h2>तुंगनाथ</h2><div>धार्मिक मान्यता के अनुसार तुंगनाथ में भगवान शिव का हाथ प्रकट हुआ था। यह मंदिर सबसे ऊंचाई पर स्थित है। पांडवों ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तुंगनाथ मंदिर का निर्माण किया जाता है। माना जाता है कि यहां पर भगवान शिव के दर्शन से व्यक्ति को मन की शांति मिलती है।</div><div><br></div><h2>रुद्रनाथ</h2><div>रुद्रनाथ में भगवान शंकर का मुख प्रकट हुआ था। यहां पर भगवान शिव की पूजा नीलकंठ के रूप में की जाती है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक इस मंदिर में साधना करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।</div><div><br></div><h2>मध्यमहेश्वर</h2><div>मध्यमहेश्वर में भगवान शिव की नाभि प्रकट हुई थी। पांडवों ने महादेव की आराधना की थी। इसको शांति और मोक्ष का केंद्र माना जाता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक जो भी भक्त मध्यमहेश्वर मंदिर में स्थित भगवान शिव की पूजा करता है। उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और भगवान शिव की कृपा प्राप्त करता है।</div><div><br></div><h2>कल्पेश्वर</h2><div>बता दें कि जहां पर कल्पेश्वर मंदिर है, उसी स्थान पर भगवान शिव की जटाएं प्रकट हुई थीं। कल्पेश्वर एक मात्र ऐसा केदार है, जिसके कपाट भक्तों के लिए पूरे साल खुले रहते हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 12:36:14 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mystery-of-panch-kedar-linked-to-mahabharata-period-visit-here-liberates-one-from-sins</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Somnath Mandir की अद्भुत कहानी: जब चंद्रमा को मिला श्राप, Lord Shiva ने ऐसे की रक्षा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/the-amazing-story-of-somnath-temple]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>गुजरात के पश्चिम−दक्षिण छोर पर सागर के तट पर स्थित पाटन जिसे प्रभासपात्तन भी कहा जाता है में स्थित है सोमनाथ मंदिर। यहां भगवान शिव का स्वयंभू ज्योतिर्लिंग है। यह भारत के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख है। स्कन्दपुराण के प्रभासखण्ड में सोमनाथ की महिमा निरूपित है। प्रभासपाटन की चार वस्तुएं प्रसिद्ध हैं− नदी, नारी, अश्व तथा भगवान सोमनाथ का दर्शन। स्कन्दपुराण के अनुसार, दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियां थीं। उन सबके पति चन्द्रमा थे। इनमें रोहिणी सर्वाधिक सुन्दरी होने के कारण चन्द्रमा को अत्यधिक प्रिय थी। चन्द्रमा सदैव उसी के साथ रहते थे। उपेक्षित पत्नियों ने चन्द्रमा की शिकायत दक्ष प्रजापति से की।</div><div><br></div><div>दक्ष के समझाने पर चन्द्रमा ने समस्त पत्नियों के साथ एक−सा व्यवहार करने का वचन दिया, लेकिन उनकी रोहिणी के प्रति आसक्ति पूर्व की भांति बनी रही। वे अन्य पत्नियों की उपेक्षा करते ही रहे। दुखी पत्नियां पुनः अपने पिता दक्ष के पास पहुंचीं और उन्हें अपनी व्यथा−कथा तथा उपेक्षा से परिचित कराया। दक्ष प्रजापति चन्द्रमा पर कुपित हो उठे। अत्यधिक क्रोधित होकर उन्होंने चंद्रमा को शाप दे दिया कि तू निस्तेज हो जाएगा और क्षयरोग से पीड़ित रहेगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/why-hanuman-garhi-so-important-in-ayodhya-learn-this-secret-related-to-lord-ram-visit" target="_blank">Hanuman Garhi Temple: Ayodhya में क्यों है हनुमान गढ़ी का इतना महत्व? जानें Lord Ram के दर्शन से जुड़ा ये रहस्य</a></h3><div>चन्द्रमा शक्तिहीन तथा निस्तेज होते गये। उनकी कांति मलिन हो गई। संसार में अंधेरा छाने लगा। चन्द्रमा की बीमारी से पशु, पक्षी, मनुष्य तथा देवता सभी चिंतित हो गये। देवताओं ने दक्ष से चन्द्रमा को शापमुक्त करने का निवेदन किया। दक्ष का क्रोध अभी तक शांत नहीं हुआ था, अतष्ः उन्होंने चंद्रमा को शाप से मुक्त नहीं किया। निर्बल तथा कांतिहीन चन्द्रमा ने दक्ष से वचनभंग करने के लिए क्षमा मांगी। दक्ष ने उनसे कहा कि तुम प्रभासपाटन जाकर शिव की आराधना करो। केवल वे ही तुम्हें निरोग कर सकते हैं।</div><div><br></div><div>चन्द्रमा ने प्रभासपाटन जाकर अनेक वर्षों तक शिवजी की आराधना की। चन्द्रमा की तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने कहा कि मैं तुम्हें पूर्ण शक्ति तो नहीं दे सकता, लेकिन महीने में पंद्रह दिनों तक तुम नित्य बढ़ते रहोगे तथा शेष पंद्रह दिनों में तुम्हारी शक्ति का क्रमशः नित्य क्षय होता रहेगा। कृतज्ञता प्रकट करते हुए चन्द्रमा ने प्रभासपाटन में स्वर्ण का मंदिर निर्माण करने का संकल्प लिया। ब्रह्माजी ने प्रभासपाटन में भूमि कुरेदी तो वहां कागदी नींबू के आकार का एक शिवलिंग स्वयं प्रकट हो गया। उस स्थान को दूध तथा मधु से ढककर उप पर ब्रह्मशिला रखी गई। उस पर ब्रह्मा के निर्देशों के अनुसार चन्द्रमा तथा उनकी प्रिय पत्नी रोहिणी ने शिवलिंग की स्थापना की।</div><div><br></div><div>भागवत, महाभारत आदि में अनेक स्थानों पर प्रभासपाटन का उल्लेख है। यहीं प्राची, सरस्वती, कपिला तथा हिरण्या नदियों का संगम हुआ है। यहीं यदुवंशियों का पारस्परिक युद्ध द्वारा संहार हुआ था। इसके निकट ही बालक तीर्थ है। इस स्थान पर पेड़ के नीचे लेटे हुए श्रीकृष्ण के तलुवे में भील का प्राणघातक तीर लगा था। यह स्थान देहोत्सर्ग कहलाता है। इसी स्थान के निकट बलरामगुका है। श्रीकृष्ण के भाई शेषावतार बलराम अपना कार्य पूरा कर इसी गुफा द्वारा पाताललोक गये थे।</div><div><br></div><div>-शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 18:00:59 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/the-amazing-story-of-somnath-temple</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Hanuman Garhi Temple: Ayodhya में क्यों है हनुमान गढ़ी का इतना महत्व? जानें Lord Ram के दर्शन से जुड़ा ये रहस्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/why-hanuman-garhi-so-important-in-ayodhya-learn-this-secret-related-to-lord-ram-visit]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देश भर में हनुमान जी को समर्पित कई मंदिर है। इस मंदिरों का अपना विशेष महत्व है। इन्हीं मंदिरों में अयोध्या का हनुमान गढ़ी मंदिर शामिल है। यह मंदिर आस्था का केंद्र है और एक ऊंचे टीले पर स्थित है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को 76 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। हनुमान गढ़ी मंदिर में हनुमान जी के दर्शन करने के बाद ही रामलला के दर्शन का शुभ फल प्राप्त होता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक हनुमान जी इस मंदिर में रक्षक के रूप में वास करती है।</div><div><br></div><div>हनुमान गढ़ी मंदिर में आने पर भक्तों को खास ऊर्जा और शांति का अनुभव होता है। किसी खास मौके पर मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको हनुमान गढ़ी मंदिर से जुड़े रहस्य के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/troubled-by-wrath-of-rahu-and-ketu-visiting-6-temples-in-india-provide-relief-from-all-troubles" target="_blank">Rahu Ketu Temples: Rahu-Ketu के प्रकोप से हैं परेशान? India के इन 6 मंदिरों में दर्शन से मिलेगा हर संकट से छुटकारा</a></h3><div><br></div><h2>पौराणिक कथा</h2><div>पौराणिक कथा के मुताबिक भगवान श्रीराम ने रावण की लंका पर विजय प्राप्त की और जब अयोध्या वापस आए, तो प्रभु श्रीराम, माता सीता और भाई लक्ष्मण के आने का उत्साह मनाया जा रहा था। भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ और राम जी ने सभी को विदा किया। लेकिन हनुमान जी अयोध्या को छोड़कर नहीं जाना चाहते थे।</div><div><br></div><h2>राम जी ने दी हनुमान जी को ये जगह</h2><div>हनुमानजी की भक्ति और प्रेम से प्रसन्न होकर भगवान श्रीराम ने हनुमान जी को अयोध्या में रहने के लिए एक जगह दी। यह स्थान एक ऊंचे टीले पर मौजूद थी। जहां पर हनुमान गढ़ी मंदिर को बनाया गया था। धार्मिक मान्यता के मुताबिक ऊंचे टीले पर होने के कारण हनुमान जी को यहां से पूरी अयोध्या नगरी दिखती थी। राम जी ने रहने के लिए यह स्थान देते हुए हनुमान को यह वचन दिया कि अयोध्या मेरा दर्शन तब तक पूरा नहीं माना जाएगा, जब तक की हनुमान गढ़ी के दर्शन नहीं किए जाएंगे।</div><div><br></div><h2>मनोकामनाएं होती हैं पूरी</h2><div>इस प्रसंग का वर्णन स्कंद पुराण में देखने को मिलता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक हनुमान गढ़ी मंदिर में हनुमान जी के दर्शन मात्र से भक्तों के सभी पाप नष्ट होते हैं और उनकी हर मनोकामना पूरी होती है। वहीं व्यक्ति को हनुमान जी की कृपा प्राप्त होती है। हनुमान गढ़ी मंदिर में हनुमान जी को चोला अर्पित करने से सभी दोष की समस्या से छुटकारा मिलता है।</div><div><br></div><div>हनुमान गढ़ी मंदिर में माता अंजनी की गोद में बाल हनुमान की प्रतिमा विराजमान है। इस मंदिर में दर्शन के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं। वहीं यूपी सरकार की ऑफिशियल वेबसाइट के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण राजा विक्रमादित्य द्वारा कराया गया है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को 76 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 16:02:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/why-hanuman-garhi-so-important-in-ayodhya-learn-this-secret-related-to-lord-ram-visit</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Famous Temple: Ujjain में Mahakal के पास है यह Special शक्तिपीठ, जहां दर्शन से हर मनोकामना होती है पूरी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/this-special-shaktipeeth-located-near-mahakal-in-ujjain-where-every-wish-fulfilled-by-visiting-it]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पूरे भारत में अलग-अलग स्थानों पर मां सती के शक्तिपीठ हैं। मां सती के अंगों से 51 शक्तिपीठ बने, जिसमें उज्जैन का हरसिद्धि माता मंदिर भी शामिल है। हरसिद्ध माता मंदिर महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के पास स्थित है। नवरात्रि या किसी खास मौके पर मंदिर में भव्य नजारा देखने को मिलता है। ज्यादा संख्या में भक्त हरसिद्ध माता मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको हरसिद्ध माता मंदिर से जुड़ी कथा और कई महत्वपूर्ण जानकारी देने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>हरसिद्धि माता शक्तिपीठ मंदिर</h2><div>धार्मिक मान्यता के मुताबिक जिस-जिस स्थान पर माता सती के शरीर के अंग गिरे थे, वह सभी स्थान शक्तिपीठ में बदल गए। जिस स्थान पर देवी सती की दाहिनी कोहनी गिरी थी, उस स्थान पर हरसिद्ध माता मंदिर बना। यह मंदिर शक्ति का केंद्र माना जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/troubled-by-wrath-of-rahu-and-ketu-visiting-6-temples-in-india-provide-relief-from-all-troubles" target="_blank">Rahu Ketu Temples: Rahu-Ketu के प्रकोप से हैं परेशान? India के इन 6 मंदिरों में दर्शन से मिलेगा हर संकट से छुटकारा</a><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></h3><div><br></div><h2>कथा</h2><div>उज्जैन के पवित्र स्थलों में शामिल हरसिद्धि माता शक्तिपीठ मंदिर में महालक्ष्मी और महासरस्वती की मूर्ति विराजमान है। इन मूर्ति के बीच में मां अन्नपूर्णा की मूर्ति है। इसके अलावा मंदिर में श्रीयंत्र भी स्थापित है। जिसके विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। शिव पुराण के मुताबिक जब भगवान शिव मां सती के जलते हुए शरीर को उठाकर जा रहे थे। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े कर दिए। मां सती की दाहिनी कोहनी इस स्थान पर गिरी थी। जिसके बाद यहां पर हरसिद्धि माता शक्तिपीठ बना।</div><div><br></div><div>स्कंद पुराण में बताया गया है कि कैसे देवी चंडी हरसिद्धि की उपाधि मिली। पौराणिक कथा के मुताबिक जब भगवान शिव और मां पार्वती एक साथ कैलाश पर एकांत में थे, तो उस दौरान दो राक्षसों में शिव-पार्वती के पास आने की कोशिश की। उन राक्षसों के नाम चंड और मुंड थे। महादेव ने राक्षसों को मारने के लिए देवी चंडी को बुलाया और देवी चंडी ने राक्षसों का अंत किया। इससे भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और उनको 'सब पर विजय पाने वाली' की उपाधि प्रदान की।</div><div><br></div><div>बता दें कि मराठा काल के समय इस मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया था। मंदिर में दो स्तंभ हैं और रोजाना शाम को इन स्तंभों पर दीपक जलाए जाते हैं। इस दौरान मंदिर का दिव्य और भव्य नजारा देखने को मिलता है। मंदिर में दर्शन और पूजन के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 15 Jun 2026 12:36:28 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/this-special-shaktipeeth-located-near-mahakal-in-ujjain-where-every-wish-fulfilled-by-visiting-it</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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