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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[Pauri Garhwal के Dhari Devi Temple में दिन में तीन बार स्वरूप बदलती है मां काली की प्रतिमा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/dhari-devi-temple-in-uttarakhand-revered-as-guardian-of-char-dham]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>देवभूमि उत्तराखंड में एक ऐसा मंदिर है, जहां पर एक ऐसा मंदिर है, जो बेहद प्रसिद्ध है। धारी देवी मंदिर, मुख्य रूप से मां काली को समर्पित है। यह मंदिर क्षेत्र में पूजनीय होने के साथ-साथ भारत के अन्य हिस्सों में भी काफी प्रसिद्धि प्राप्त कर रहा है। धारी देवी मंदिर को चार धाम का रक्षक भी कहा जाता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको इस मंदिर से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनको जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे।</p><h2>कहां स्थित है मंदिर</h2><p>उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में श्रीनगर और रुद्रप्रयाग के बीच कलियासौड़ में अलकनंदा नदी के किनारे धारी देवी मंदिर के पास है। यह प्राचीन और रहस्यमयी मंदिर है। वहीं धारी माता को देवी कालीसौर के रूप में भी जाना जाता है। इनका आशीर्वाद पाने के लिए भक्त दूर-दूर से इस मंदिर के दर्शन के लिए आते हैं। वहीं मंदिर के पास एक प्राचीन गुफा भी मौजूद है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/maa-gayatri-manifested-through-act-of-creation-and-resolve-of-lord-brahma" target="_blank" rel="noopener">Goddess Gayatri: सृष्टि रचना और ब्रह्माजी के संकल्प से हुआ था मां गायत्री का प्राकट्य, ऐसे बनीं वेदमाता</a></p><h2>दिन में तीन बार रूप बदलती है मूर्ति</h2><p>स्थानीय लोगों का मानना है कि मंदिर में स्थित धारी देवी की प्रतिमा दिन में 3 बार अपना रूप बदलती है। सुबह के समय छोटी बालिका, दिन में महिला और शाम को उनका स्वरूप बूढ़ी महिला के रूप में दिखाई देता है।</p><h2>जानें क्यों प्रसिद्ध है मंदिर</h2><p>पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक एक बार भीषण बाढ़ की वजह से मंदिर बह गया था और धारी देवी की मूर्ती धारो नामक गांव के पास एक चट्टान के पास रुक गई थी। वहीं गांव वालों को मूर्ति से विलाप की आवाज सुनाई दी और इस आवाज ने उनको मूर्ति को स्थापित किए जाने के निर्देश दिए। तब गांव वालों ने मिलकर फिर उसी स्थान पर धारी माता की मूर्ति को स्थापित किया।</p><p>वहीं अन्य मान्यता के अनुसार, साल 2013 में केदारनाथ बाढ़ से ठीक पहले किसी काम के कारण धारी देवी मंदिर को स्थानांतरित किया गया था। स्थानीय लोगों का मानना है कि धारी देवी के प्रकोप की वजह से ही बाढ़ आई थी। फिर बाद में उसी जगह पर मंदिर का निर्माण कर देवी की मूर्ति को स्थापित किया। इसलिए धारी देवी मंदिर की इतनी अधिक मान्यता है।</p><h2>मंदिर की खासियत</h2><p>धारी देवी मंदिर में देवी को 'उत्तराखंड की रक्षक देवी' और चारों धाम की संरक्षक के रूप में पूजा जाता है।</p><p>इस मंदिर को 108 शक्ति स्थलों में से एक माना जाता है।</p><p>धारी देवी की मूर्ति का सिर्फ ऊपरी आधा भाग पूजनीय है। वहीं रुद्रप्रयाग के कालीमठ में मूर्ति का निचला हिस्सा पूजा जाता है।</p><p>धारी देवी के दर्शन किए बगैर चार धाम यात्रा अधूरी मानी जाती है।</p><p>हर साल नवरात्रि के मौके पर देवी कालीसौर की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 05 Oct 2026 16:20:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/dhari-devi-temple-in-uttarakhand-revered-as-guardian-of-char-dham</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Shaktipeeth Jwala Ji: हिमाचल प्रदेश के Jwala Devi Temple में बिना तेल-बाती जलती हैं 9 पवित्र ज्वालाएं]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/jwala-devi-temple-in-kangra-features-nine-natural-eternal-flames]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>51 शक्तिपीठ में मां ज्वाला देवी मंदिर भी शामिल है। ज्वाला देवी मंदिर भगवान शिव और शक्ति को समर्पित है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब देवी सती के शरीर को भगवान विष्णु ने अपने चक्र से 51 टुकड़े किए थे, तो यह अंग जहां-जहां गिरे थे वहां-वहां पर शक्तिपीठ बन गए। माना जाता है कि ज्वाला देवी मंदिर में देवी सती की जीव गिरी थी। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित मां ज्वाला देवी मंदिर प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको ज्वाला देवी मंदिर के कुछ रोचक रहस्यों के बारे में बताने जा रहे हैं।</p><h2>जानिए मंदिर से जुड़ा रोचक रहस्य</h2><p>सदियों से ज्वाला देवी मंदिर में बिना तेल बाती और ईंधन के प्राकृतिक रूप से 9 ज्वालाएं जल रही हैं। 9 ज्वालाओं में प्रमुख ज्वाला वह है, जो चांदी के जाला के बीच में हैं और इसको महाकाली कहा जाता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/maa-gayatri-manifested-through-act-of-creation-and-resolve-of-lord-brahma" target="_blank" rel="noopener">Goddess Gayatri: सृष्टि रचना और ब्रह्माजी के संकल्प से हुआ था मां गायत्री का प्राकट्य, ऐसे बनीं वेदमाता</a></p><p>वहीं अन्य 8 ज्योतियां अन्नपूर्णा, हिंगलाज, चण्डी, विंध्यवासिनी, सरस्वती, महालक्ष्मी, अंबिका और अंजी देवी ज्वाला देवी मंदिर में वास करती हैं।</p><h2>पौराणिक कथा</h2><p>इस मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा के मुताबिक भक्त गोरखनाथ यहां पर मां की आराधना करते थे। वह देवी मां के परम भक्तों में से एक थे। एक बाद गोरखनाथ को काफी तेज भूख लगी और उन्होंने माता से कहा कि आप यहां आग जलाकर पानी गर्म करो, वह भिक्षा लेकर आते हैं।</p><p>गोरखनाथ के कहने पर माता ने आग जला दी, लेकिन काफी समय बीत जाने के बाद भी गोरखनाथ वापस नहीं लौटे। माना जाता है कि तब से माता अग्नि जलाकर यहां पर गोरखनाथ का इंतजार कर रही हैं। धार्मिक मान्यता है कि सतयुग आने पर ही गोरखनाथ मंदिर लौटेंगे और तब तक यह ज्वाला इसी तरह से जलती रहेगी।</p><h2>जानें मंदिर का चमत्कारी कुंड</h2><p>वहीं ज्वाला देवी शक्तिपीठ मंदिर क पास एक चमत्कारी कुंड भी है। जिसको गोरख डिब्बी कहा जाता है। इस कुंड को देखने में लगता है कि मानो कुंड का पानी काफी तेज खौल रहा है, लेकिन जब पानी को आप स्पर्श करते हैं, तो आपको पानी ठंडा लगेगा।</p><h2>अकबर का घमंड हुआ था चूर</h2><p>बताया जाता है कि एक बार मुगल सम्राट अकबर ने लोहे के ढक्कन से आग को ढककर और पानी से इसको बुझाने की कोशिश की थी। लेकिन अकबर अपने प्रयासों में बुरी तरह से असफल हुआ था। जिसके बाद उसने मंदिर में सोने का एक छाता भेंट दिया था। लेकिन देवी मां की शक्ति के प्रति अकबर के संदेह की वजह से सोना एक अज्ञात धातु में बदल गया था। इस घटना के बाद से मुगल शासक अकबर ने मन में ज्वाला देवी के प्रति आस्था और भी ज्यादा मजबूत हो गई थी।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 05 Oct 2026 11:09:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Pitru Paksha: गया के अलावा Kashi, Haridwar और Ujjain में भी कर सकते हैं पिंडदान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/best-sacred-places-in-india-other-than-gaya-for-pitru-paksha-pind-daan]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भाद्रपद की पूर्णिमा से पितृ पक्ष की शुरुआत हो चुकी है और इसका समापन अमावस्या के दिन होता है। पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों को तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान किए जाते हैं। अगर आप भी पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए तर्पण के साथ ही पिंडदान कराने की योजना बना रहे हैं, तो यह लेथ आपके लिए है।</p><p>पिंडदान के लिए आपको गया जाने की कोई जरुरत नहीं है। अब आप भारत में गया के अलावा भी कई फेमस जगहें , जहां आप श्राद्ध और पिंडदान कर सकते हैं। &nbsp;आइए आपको इन जगहों के बारे में बताते हैं।</p><p><strong>कुरुक्षेत्र, हरियाणा</strong></p><p>जैसा कि कुरुक्षेत्र को हमेशा महाभारत से जोड़कर देखा गया है, जबकि यहां ब्रह्म सरोवर, सन्निहित सरोवर और 48 कोस कुरुक्षेत्र में पिंडदान कराए जाने का भी बेहद ही खास महत्व माना जाता है।</p><p><strong>कैसे पहुंचें?</strong></p><p>यहां पर पहुंचने के लिए सबसे पहले आप कुरुक्षेत्र जंक्शन जाएं। इसके बाद ब्रह्म सरोवर, सन्निहित सरोवर और 48 कोस कुरुक्षेत्र का रास्ता महज, 3-4 किलोमीटर का ही रह जाता है, जिसके लिए बस, ऑटो-रिक्शा या गाड़ी लेना सबसे बेहतरीन ऑप्शन है।</p><p><strong>काशी, उत्तर प्रदेश</strong></p><p>हिंदू धर्म काशी यानी वारणसी को मोक्ष का द्वार कहा जाता है। इसी कारण से यह भोलेनाथ की इस नगरी में पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान कराया जाता है। यहां पर पिशाच मोचन कुंड स्थल इसके लिए खास है, जहां पिंडदान के साथ ही त्रिपिंडी श्राद्ध और पूर्वजों से संबंधित अन्य अनुष्ठान किए जाते हैं।</p><p><strong>कैसे पहुंचें?</strong></p><p>आप वाराणसी एयरपोर्ट या वाराणसी रेलवे स्टेशन तक पहुंचकर, वहां से अपनी सुविधा के अनुसार टैक्सी या ऑटो ले सकते हैं। वैसे यहां पर पिशाच मोचन कुंड की दूरी करीब 5 किलोमीटरर है।</p><p><strong>हरिद्वार, उत्तराखंड</strong></p><p>उत्तराखंड में हरिद्वार एक ऐसा स्थान है, जहां पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए अनुष्ठान किए जाते हैं। आपको बता दें कि, हरिद्वार में गंगा के किनारे जो नारायणी शिला मंदिर है, वहां आप पिंडदान कर सकते हैं।</p><p><strong>कैसे पहुंचें?</strong></p><p>अगर आप हरिद्वार में पिंडदान करने का सोच रहे हैं, तो इसके लिए आपको हरिद्वार रेलवे स्टेशन सबसे नजदीक पड़ता है। रेलवे से यह मार्ग देश के कई बड़े शहरों के सड़क मार्ग से भी जुड़ा हुआ है। इसके अलावा, फ्लाइट से आने के लिए आपको देहरादून जा सकते हैं।</p><p><strong>उज्जैन, मध्य प्रदेश</strong></p><p>महाकाल की नगरी उज्जैन पितृकर्म के लिए बेहद खास मानी जाती है। यहां पर सिद्धवट, गयाकोठा मंदिर, राम घाट औऱ नृसिंह घाट पितरों की शांति के लिए पूजा &nbsp;व पिंडदान किए जाते हैं।</p><p><strong>कैसे पहुंचें?</strong></p><p>अगर आप ट्रेन जाना चाहते हैं, तो सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन उज्जैन है। वहीं, आप फ्लाइट से जाना चाहते है, तो इंदौर का देवी अहिल्याबाई होलकर एयरपोर्ट तक आना होगा। यह उज्जैन से करीब 53 किलोमीटर की दूरी पर है। वहीं, सड़क मार्ग से भी उज्जैन जा सकते हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 28 Sep 2026 11:40:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/best-sacred-places-in-india-other-than-gaya-for-pitru-paksha-pind-daan</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Saraswati Mantra: Maa Saraswati के इन चमत्कारी Mantras के जाप से मिलेगी बुद्धि और ज्ञान में अपार सफलता]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/goddess-saraswati-mantras-for-higher-intellect-and-success-in-studies]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हिंदू धर्म में देवी सरस्वती को कला और ज्ञान की देवी माना जाता है। देवी सरस्वती को वेदों की माता भी कहा जाता है। देवी सरस्वती का स्वरूप निर्मल चांद की ओर जिनके मुख पर दिव्य चमक है। पीत और श्वेत रंग के वस्त्र पहने और उनको कमल के फूल पर विराजमान और हाथों में वीणा धारण किए दिखाया जाता है। हिंदू मान्यताओं के मुताबिक जो भी व्यक्ति नियमित रूप से मां के मंत्रों का जाप सच्चे मन से करता है, उसको मां सरस्वती की विशेष कृपा प्राप्त होती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको देवी सरस्वती के कुछ खास मंत्रों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनका जप करने से आप स्वयं में बड़ा बदलाव महसूस कर सकेंगे।</p><h2>दर्शन, रहस्यवाद या उससे जुड़े विषय</h2><p>जो भी व्यक्ति रहस्यवाद, दर्शन या इससे जुड़े किसी भी तरह के विषयों का अध्ययन कर रहा होता है, उनके लिए यह मंत्र मस्तिष्क में महान विचारों को धारण करने और उन पर सोचने-समझने की क्षमता प्रदान करता है। इस मंत्र से व्यक्ति की मेधा और बुद्धि दोनों को जागृत करता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/maa-gayatri-manifested-through-act-of-creation-and-resolve-of-lord-brahma" target="_blank" rel="noopener">Goddess Gayatri: सृष्टि रचना और ब्रह्माजी के संकल्प से हुआ था मां गायत्री का प्राकट्य, ऐसे बनीं वेदमाता</a></p><p>मंत्र- ऊं ब्रह्म ज्ञानायै नम:</p><p>इस मंत्र का अर्थ है कि मैं ब्रह्मांड में मौजूद उस चेतन बुद्धि की शक्ति को नमन करते हैं। यह मंत्र देवी सरस्वती के उस शक्ति रूप को वर्णित करता है, जोकि खुद ब्रह्मांड की बुद्धि के पीछे मौजूद हैं।</p><h2>खगोल, भौतिकी, रसायन विज्ञान या संबंधित विषय</h2><p>जो भी व्यक्ति खगोल, भौतिकी या अलग-अलग तरह के रसायन विज्ञान और अन्य तरह के विषयों का अध्ययन करता है, उनको इस मंत्र का जाप करना चाहिए।</p><p>मंत्र - ऊं महा विद्यायै नम:</p><p>इस मंत्र का अर्थ है कि महान ज्ञान के पीछे स्थित और इससे उत्पन्न करने वाली शक्ति को नमन करते हैं। मां सरस्वती को महान ज्ञान और उसकी अनुभूति के पीछे स्थित शक्ति के रूप में इस मंत्र को वर्णित किया जाता है।</p><h2>धार्मिक विषयों से जुड़े लोगों के लिए</h2><p>जो भी लोग धर्म के विचारों और ग्रंथों में गहराई से उतारने की कोशिश करते हैं। जिससे किसी भी धर्म या संस्कृति के शास्त्रों के गहरे अर्थ को समझने का प्रयास करते हैं। यह मंत्र धार्मिक विषयों से जुड़े लोगों की बौद्धिक क्षमताओं को भी अधिक तेज बनाने का काम करता है।</p><p>मंत्र- वेदानां मातरं पश्य मत्सथां देवीं सरस्वती।</p><p>इस मंत्र का अर्थ है कि देखो, वेदों की माता मां सरस्वती मुझमें निवास करती हैं।</p><p>इन तीनों मंत्रों में मां सरस्वती को ब्रह्मांड में मौजूद बुद्धि, ज्ञान को उत्पन्न करने वाली शक्ति और अंदर निवास करने वाली वेदों की मां के रूप में पुकारा गया था।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 25 Sep 2026 17:49:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/goddess-saraswati-mantras-for-higher-intellect-and-success-in-studies</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Goddess Gayatri: सृष्टि रचना और ब्रह्माजी के संकल्प से हुआ था मां गायत्री का प्राकट्य, ऐसे बनीं वेदमाता]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/maa-gayatri-manifested-through-act-of-creation-and-resolve-of-lord-brahma]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हिंदू धर्म में कई देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। वहीं सभी देवी-देवताओं की पूजा का अपना अलग-अलग महत्व होता है। लेकिन सभी देवी-देवताओं में मां गायत्री को सबसे विशेष माना जाता है, और यही वजह है कि इनको देवताओं की देवी कहा जाता है। देवी गायत्री के जन्म की कहानी थोड़ी अद्भुत और सामान्य देवियों से थोड़ा अलग है। गायत्री देवी आदि शक्ति का स्वरूप है और दिव्य चेतना के रूप में इनका प्राकट्य हुआ था।</p><h2>जानें कैसे हुआ देवी गायत्री का जन्‍म</h2><p>धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक सृष्टि की रचना के लिए भगवान ब्रह्मदेव को जिस शक्ति की जरूरत थी, उसी शक्ति का स्त्रीरूप देवी गायत्री के रूप में प्रकट हुआ था। वहीं कुछ कथाओं में बताया जाता है कि देवी गायत्री ने ब्रह्माजी के शरीर के बाएं भाग से जन्म लिया था। वहीं कुछ कथाओं में देवी सावित्री, देवी सरस्वती और देवी गायत्री को एक ही परम शक्ति के अलग-अलग स्वरूप बताए गए हैं। वहीं दूसरी ओर एक अन्य धार्मिक कथा के मुताबिक देवी गायत्री का संबंध सूर्य देव से हैं। देवी गायत्री को सूर्य मंडल के मध्य स्थित दिव्य चेतना या फिर शक्ति के रूप में पूजा जाता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/wound-on-marble-horse-at-rajasthan-kalki-temple-healing-mysterious-belief-associated-it" target="_blank" rel="noopener">Rajasthan के Kalki Temple में संगमरमर के घोड़े का भर रहा घाव, जुड़ी है रहस्यमयी मान्यता</a></p><h2>यज्ञ से जुड़ी कथा</h2><p>एक लोकप्रिय कथा के मुताबिक ब्रह्माजी को एक यज्ञ करना था। लेकिन यज्ञ में ब्रह्माजी की पत्नी सावित्री समय से नहीं पहुंची। वहीं यज्ञ की पूर्णता के लिए एक योग्य स्त्री की जरूरत हुई, तब एक दिव्य शक्ति का प्राकट्य हुआ, जिसको गायत्री कहा गया और ब्रह्मा जी ने देवी गायत्री से विवाह करके उस यज्ञ को पूर्ण किया।</p><h2>क्यों कहा जाता है 'वेदमाता'</h2><p>माना जाता है कि सभी ग्रंथों, वेदों और मंत्रों की उत्पत्ति देवी गायत्री से हुई है। मां गायत्री के अंदर चारों वेदों का ज्ञान है, इस कारण उनको वेदमाता भी कहा जाता है। देवी गायत्री की पूजा सिर्फ आम मनुष्य ही नहीं बल्कि देवता भी करते हैं। इसलिए मां गायत्री को सिर्फ देवी नहीं बल्कि ज्ञान, चेतना, विवेक और आध्यात्मिक प्रकाश की शक्ति के रूप में भी देखा जाता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 24 Sep 2026 15:06:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Hanuman Mantra: Sankatmochan Hanuman की पूजा में इन 6 Mantras का जप बदल सकता है आपकी जिंदगी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-hanuman-mantras-for-positive-energy-and-protection-from-enemies]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर किसी के पास कोई न कोई परेशानी जरूर है। वहीं हिंदू धर्म में हनुमान जी को 'संकटमोचन' कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जो भी जातक सच्चे मन से हनुमान जी की पूजा-अर्चना करता है, तो उसके जीवन से बड़े से बड़े संकट पल भर में दूर हो जाते हैं। ऐसे में अगर आपके जीवन में भी बीमारी, तनाव, करियर संबंधी परेशानी या किसी अनजाने डर से परेशान रहते हैं, तो आपको हनुमान जी के कुछ खास मंत्रों का जप करना चाहिए। इन मंत्रों का जप करने से आपकी पूरी जिंदगी बदल सकती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको हनुमान जी के 6 चमत्कारी मंत्र के बारे में बताने जा रहे हैं और साथ ही इन मंत्र जप से होने वाले फायदों के बारे में बताने जा रहे हैं।</p><h2>डर और निगेटिविटी दूर करने के लिए मंत्र<br>&nbsp;</h2><p>ॐ दक्षिणमुखाय पच्चमुख हनुमते करालबदनाय।</p><p>अगर किसी व्यक्ति को रात में डर लगता है, मन में हमेशा घबराहट होती है या फिर बुरे सपने आते हैं। तो मंगलवार को इस मंत्र का जप करना चाहिए। इस मंत्र का जप करने से हर तरह की निगेटिविटी एनर्जी से एक कवच की तरह हमारी रक्षा करता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/wound-on-marble-horse-at-rajasthan-kalki-temple-healing-mysterious-belief-associated-it" target="_blank" rel="noopener">Rajasthan के Kalki Temple में संगमरमर के घोड़े का भर रहा घाव, जुड़ी है रहस्यमयी मान्यता</a></p><h2>जोश और सकारात्मक ऊर्जा के लिए मंत्र</h2><p>नारसिंहाय ॐ हां हीं हूं हौं हः सकलभीतप्रेतदमनाय स्वाहा।</p><p>जब आपको ऐसा महसूस हो कि शरीर में ऊर्जा की कमी है या फिर आप पर निराशा हावी हो रही है, तो कम से कम 21 बार इस मंत्र का जप करें। इस मंत्र का जप करने से आपके अंदर फौरन एक नया जोश और गजब की सकारात्मकता महसूस होगी।</p><h2>शत्रुओं से रक्षा और आत्मविश्वास के लिए मंत्र</h2><p>ॐ पूर्वकपिमुखाय पच्चमुख हनुमते टं टं टं टं टं सकल शत्रु सहंरणाय स्वाहा।</p><p>अगर अक्सर लोग बिना बात के ही आपके दुश्मन बन जाते हैं, तो मंगलवार या शनिवार को इस मंत्र का जाप करना चाहिए। इस मंत्र के जाप से न सिर्फ आपके अंदर आत्मविश्वास आता है, बल्कि बना मतलब के बने विरोधी भी शांत रहते हैं।</p><h2>नौकरी और तरक्की में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए मंत्र</h2><p>मर्कटेश महोत्साह सर्वशोक विनाशन।</p><p>अगर किसी व्यक्ति को खूब मेहनत करने के बाद भी आपको करियर में वह मुकाम हासिल नहीं हो रहा है, जिसके आप हकदार हैं, तो हर मंगलवार को इस मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए। इस मंत्र का जाप करने से व्यापार और नौकरी से जुड़ी रुकावटें दूर होती हैं।</p><h2>हर मनोकामना पूरी करने वाली चौपाई</h2><p>मंगल भवन अमंगलहारी द्रवहु सो दशरथ अजिर विहारी।</p><p>यह रामचरितमानस की चौपाई है, अगर कोई व्यक्ति रोजाना इस चौपाई का पाठ करते हैं, तो शारीरिक और मानसिक दोनों तरह के कष्टों से मुक्ति मिलती है।</p><h2>सफलता और रोग मुक्ति के लिए मंत्र</h2><p>ऊं हं हनुमते नम:</p><p>भले ही यह मंत्र छोटा है, लेकिन इसका असर उतना ही बड़ा है। रोजाना सुबह स्नान आदि करने के बाद इस मंत्र का जाप करने से बीमारियां दूर होती हैं और कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 23 Sep 2026 10:53:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-hanuman-mantras-for-positive-energy-and-protection-from-enemies</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Rajasthan के Kalki Temple में संगमरमर के घोड़े का भर रहा घाव, जुड़ी है रहस्यमयी मान्यता]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/wound-on-marble-horse-at-rajasthan-kalki-temple-healing-mysterious-belief-associated-it]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भगवान विष्णु ने धरती को अधर्म से बचाने के लिए और धर्म की रक्षा के लिए कई बार अवतार लिया। ऐसा ही एक अवतार कल्कि अवतार है। माना जाता है कि कल्कि अवतार लेकर भगवान विष्णु कलियुग का अंत करेंगे। लेकिन भगवान विष्णु के अंतिम अवतार कल्कि के जन्म को लेकर कई रहस्य देखने को मिलते हैं। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, जब धरती पर पाप और अधर्म अपने चरम पर होगा, तो इसको खत्म करने और धर्म की स्थापना के लिए भगवान विष्णु कलियुग में कल्कि अवतार लेगें।</p><p>माना जाता है कि भगवान विष्णु का कल्कि का जन्म आम मनुष्य के तौर पर होगा। भले ही अभी तक भगवान विष्णु कलियुग का अंत करने के लिए कल्कि रूप में धरती पर अवतरित नहीं हुए हैं, लेकिन उनके आने से पहले ही भगवान कल्कि के एक मंदिर का निर्माण हो चुका है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/goddess-parvati-asked-lord-shiva-to-make-the-patient-lion-her-divine-vehicle" target="_blank" rel="noopener">Devi Bhagavata Purana: सालों के इंतजार के बाद ऐसे बना शेर मां दुर्गा का दिव्य वाहन</a></p><h2>भगवान कल्कि का दिव्य मंदिर</h2><p>राजस्थान के जयपुर में भगवान कल्कि को समर्पित एक मंदिर है, जोकि करीब 300 साल पुराना माना जाता है। यह मंदिर अपनी आध्यात्मिकता के लिए नहीं बल्कि अपने गहरे रहस्यों के लिए जाना जाता है।</p><p>कल्कि मंदिर भारत के उन मंदिरों में शामिल है, जिनका संबंध भगवान कल्कि और कलियुक के अंत से जुड़ा है। धार्मिक शास्त्रों और प्राचीन मान्यताओं के मुताबिक कलियुग के अंत में भगवान कल्कि अवतार लेंगे। वहीं इस मंदिर का करीब 18वीं शताब्दी में कराया गया था।</p><h2>किसने बनवाया कल्कि मंदिर</h2><p>प्राप्त जानकारी के मुताबिक जयपुर शहर के संस्थापक महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने कल्कि मंदिर का निर्माण कराया था। इस मंदिर में भगवान कल्कि के अलावा उनके घोड़े की भी पूजा की जाती है।</p><p>वहीं कई धार्मिक ग्रंथों में इस बात का जिक्र मिलता है कि भगवान कल्कि अपने दिव्य और श्वेत घोड़े पर सवार होकर कलियुग का अंत करेंगे और भगवान कल्कि के घोड़े का नाम देवदत्त होगा।</p><p>राजस्थान के इस मंदिर में न सिर्फ भगवान कल्कि बल्कि उनका घोड़ा भी रहस्य का केंद्र है। मंदिर के गर्भगृह में मुख्य मूर्ति के साथ घोड़े की मूर्ति भी है।</p><h2>चमत्कारी मान्यताएं</h2><p>इस मंदिर की हैरान करने वाली बात यह है कि मंदिर के प्रवेश द्वार पर घोड़े की मूर्ति है, जोकि एक अलग सफेद संगमरमर की है। घोड़े की मूर्ति के पिछले बाएं पैर में दरार है। जिसको स्थानीय लोग घाव मानते हैं।</p><p>माना जाता है कि जब घोड़े के पैर की दरार भर जाएगी, तब भगवान कल्कि पृथ्वी पर अवतरित होंगे। वहीं यहां के स्थानीय पुजारी और लोगों का मानना है कि सालों से यह घाव भर रहा है।</p><p>वहीं हैरान करने वाली बात यह भी है कि अभी तक धरती पर कल्कि भगवान नहीं आए हैं, लेकिन भारत में कई कल्कि मंदिर हैं और इन मंदिरों में विधि-विधान से भगवान कल्कि की पूजा-अर्चना की जाती है।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 22 Sep 2026 12:13:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/wound-on-marble-horse-at-rajasthan-kalki-temple-healing-mysterious-belief-associated-it</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Thanjavur के Brihadeeswarar Temple के शिखर की परछाई जमीन पर क्यों नहीं पड़ती]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/thanjavur-brihadeeswarar-temple-shikhara-casts-no-shadow-on-the-ground]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भारत में कई प्राचीन मंदिर हैं, जिनकी अपनी-अपनी कहानियां हैं। देश के करीब सभी मंदिर गणित, विज्ञान और वास्तुकला की ऐसी अद्भुत मिसाले हैं, जिनको देखकर इंजीनियर और वैज्ञानिक भी हैरान रह जाते हैं। ऐसा ही एक मंदिर तमिलनाडु के तंजावुर शहर में है। भगवान शिव को समर्पित यह बृहदेश्वर मंदिर बेहद अद्भुत है। आमतौर पर अधिकतर मंदिरों के शिखर की परछाई धूप के कारण जमीन दिखाई देती है। लेकिन बृहदेश्वर मंदिर के शिखर की परछाई कभी जमीन पर नहीं पड़ती है।</p><h2>रहस्यमयी बृहदेश्वर मंदिर</h2><p>भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय और यूनेस्को की विश्व धरोहर लिस्ट के मुताबिक 11वीं शताब्दी में राजा राजराज चोल ने बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण कराया था। यह मंदिर मजबूत ग्रेनाइट पत्थरों से बना है। उस समय जब क्रेन जैसी आधुनिक मशीनें नहीं होती थीं, तो चोल कालीन कारीगरों की सहायता से पत्थरों को सैकड़ों फीट ऊपर लेकर जाकर मंदिर का निर्माण कराया गया था। 1000 साल पुराने और शानदार मंदिर की बनावट इतनी गजब की है कि इस मंदिर के शिखर यानी की गुंबद की परछाई कभी जमीन पर नहीं पड़ती है। इस रहस्य को लेकर वैज्ञानिक आज भी हैरान हैं।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/goddess-parvati-asked-lord-shiva-to-make-the-patient-lion-her-divine-vehicle" target="_blank" rel="noopener">Devi Bhagavata Purana: सालों के इंतजार के बाद ऐसे बना शेर मां दुर्गा का दिव्य वाहन</a></p><h2>मंदिर के शिखर की परछाई से जुड़ा रहस्य</h2><p>बृहदेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यह मंदिर पूरे भारत में फेमस है और इसका मुख्य रहस्य मंदिर के शिखर से जुड़ा है। इस मंदिर का शिखर करीब 216 फीट ऊंचा है। इस शिखऱ के ऊपरी हिस्से पर 80 टन के एक पत्थर से बना कलश रखा है। दिन के समय जब सूर्य ठीक सिर के ऊपर होता है या फिर धूप ढलती है, तो इसके मुख्य शिखर की परछाई मंदिर परिसर के जमीन पर नहीं गिरती है।</p><h2>जानें क्या है वैज्ञानिकों और आर्किटेक्ट्स की राय</h2><p>सिविल इंजीनियरिंग और ऐतिहासिक वास्तुकला में इसके बार में बताया गया है। वैज्ञानिकों और आर्किटेक्ट्स की मानें, तो बृहदेश्वर मंदिर को खास गणितीय और ज्यामितीय कोणों के आधार पर डिजाइन किया गया है। मंदिर का चबूतरा काफी चौड़ा है और शिखर की बनावट एक खास कोण में बनाई गई है। इस अलग और अद्भुत संरचना के कारण मंदिर के शिखर की परछाई जमीन तक नहीं आती है और मंदिर के आधार में ही समा जाती है।</p><h2>बिना सीमेंट और केमिकल के बना है मंदिर</h2><p>बृहदेश्वर मंदिर के निर्माण में चूना, सीमेंट या फिर अन्य किसी तरह के जोड़ने वाले केमिकल का इस्तेमाल नहीं किया गया है। यहां पर पत्थरों को आपस में जोड़ने के लिए पजल लॉक या इंटरलॉकिंग तकनीक का यूज किया गया है।</p><p>मंदिर के प्रांगण में बाहर की ओर नंदी महाराज की मूर्ति स्थापित है। एक बड़े पत्थर को तराशकर इस मूर्ति का निर्माण किया गया है। इसको भारत की दूसरी सबसे बड़ी नंदी प्रतिमा माना जाता है। यह मंदिर 'ग्रेट लिविंग चोल टेम्पल्स' का हिस्सा है और यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल है।</p><h2>ऐसे पहुंचे बृहदेश्वर मंदिर</h2><p>बृहदेश्वर मंदिर जाने के लिए सबसे नजदीकी एयरपोर्ट तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है।</p><p>रेलवे स्टेशन की बात की जाए, तो सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन तंजावुर जंक्शन पड़ेगा।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 21 Sep 2026 14:05:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/thanjavur-brihadeeswarar-temple-shikhara-casts-no-shadow-on-the-ground</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Devi Bhagavata Purana: सालों के इंतजार के बाद ऐसे बना शेर मां दुर्गा का दिव्य वाहन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/goddess-parvati-asked-lord-shiva-to-make-the-patient-lion-her-divine-vehicle]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हिंदू धर्म में मां दुर्गा को असीम दिव्य शक्ति और ऊर्जा की सर्वोच्च देवी के रूप में पूजा जाता है। देवी दुर्गा को आदि शक्ति, जगत जननी और ब्रह्मांड की माता माना जाता है। जोकि ज्ञान और बुराई को खत्म करके धर्म की रक्षा करती हैं। भारत में देवी दुर्गा को समर्पित कई मंदिर हैं, जहां पर मां दुर्गा की पूजा होती है। वहीं मां दुर्गा का दिव्य वाहन शेर है, जिस पर मां दुर्गा सवार होती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शक्तिशाली शेर मां दुर्गा का वाहन कैसे बना। आज हम इस आर्टिकल के जरिए इस पौराणिक कथा के बारे में बताने जा रहे हैं।<br>&nbsp;</p><h2>भूखा शेर बना मां दुर्गा का वाहन</h2><p>महर्षि व्यास द्वारा रचित 'श्रीमद् देवीभागवत पुराण' मां दुर्गा की उत्पत्ति और उनके कर्तव्यों को समर्पित है। शेर की मां दुर्गा के वाहन बनने की कहानी तब शुरू होती है, जब देवी पार्वती भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए घोर तपस्या कर रही थीं।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/rameshwaram-temple-history-architecture-and-sacred-ramayana-legends" target="_blank" rel="noopener">South India का काशी है Rameswaram Jyotirlinga, जहां 22 Teertham में प्रायश्चित स्नान करते हैं भक्त</a></p><p>कई सालों की तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव देवी पार्वती को पत्नी रूप में स्वीकार कर लेते हैं। इसी बीच तपस्या के प्रभाव से देवी पार्वती का रंग काला पड़ गया था। एक दिन भगवान शिव देवी पार्वती को काली कह देते हैं, यह बात देवी पार्वती को अच्छी नहीं लगती है और वह नाराज होकर फिर से तपस्या करने चली जाती हैं।</p><h2>भगवान शिव का आशीर्वाद</h2><p>पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब मां पार्वती तपस्या कर रही थीं, उस दौरान वहां पर एक शेर घूमते-घूमते आ गया। मां को खाने की इच्छा रखने वाला शेर मां पार्वती का तप पूरा होने का इंतजार करता है। समय बीतता जाता है और शेर तपस्या खत्म होने का इंतजार करता है। जब सालों बीत जाते हैं और शेर का देवी पार्वती का इंतजार करता रहा, तब देवी को खाने की इच्छा के साथ वह देवी पार्वती के पास जाता है, लेकिन देवी के तप के तेज से वह पीछे हट जाता है। कई बार कोशिश करने के बाद भी शेर उनके पास नहीं जा पाता है और कोने में बैठ जाता है। फिर मां पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव वहां प्रकट होते हैं और देवी पार्वती से वरदान मांगने को कहते हैं।</p><p>मां पार्वती कहती हैं कि उनको पहले की तरह गोरा रंग वापस मिल जाए। महादेव उनकी इच्छा पूरी करती हैं। आशीर्वाद मिलने ही देवी पार्वती नहाने चली जाती हैं। उनसे स्नान करते ही शरीर से एक अन्य देवी प्रकट होती हैं, जिनका नाम कौशिकी पड़ता है। नहाने के समय देवी पार्वती के शरीर से काला रंग निकल जाता है और पहले की तरह उनका रंग साफ हो जाता है। जिस वजह से मां पार्वती का नाम गौरी पड़ जाता है। जब देवी पार्वती की नजर शेर पर पड़ती है, जो उनको खाने के इंतजार में एक कोने में बैठा था।</p><p>तो मां पार्वती भगवान शिव के पास जाती हैं और उनसे वरदान मांगती हैं कि इस शेर ने उनको खाने के लिए सालों तक इंतजार किया है। जितना तप मैंने किया, उतना ही तब इस शेर ने भी किया है। इस वजह से आप इस शेर को वरदान के रूप में मेरी सवारी बना दीजिए। शिव मां पार्वती की इस बात से खुश हो जाते हैं और शेर को देवी पार्वती की सवारी बना देते हैं। तभी से देवी पार्वती का नाम शेरावाली और मां दुर्गा पड़ा।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 19 Sep 2026 14:06:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/goddess-parvati-asked-lord-shiva-to-make-the-patient-lion-her-divine-vehicle</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Lord Ganesha का स्त्री स्वरूप हैं Devi Vinayaki, इस वजह से प्रकट हुआ था यह दिव्य रूप]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/goddess-vinayaki-the-female-form-of-lord-ganesha-history-and-significance]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हिंदू धर्म में गणेश भगवान को प्रथम पूज्य देवता माना जाता है। वहीं किसी भी शुभ व मांगलिक कार्य की शुरूआत से पहले भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की जाती है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, बुद्धि, समृद्धि और शुभता का देवता माना जाता है। धार्मिक ग्रंथों में भगवान गणेश के कई स्वरूपों का वर्णन मिलता है। ऐसा ही एक अनोखा स्वरूप देवी विनायकी का है। जिनको भगवान गणेश का स्त्री स्वरूप माना जाता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको देवी विनायकी से जुड़ी कुछ खास बातों के बारे में बताने जा रहे हैं और साथ ही यह भी जानेंगे कि श्री गणेश के इस स्‍वरूप की प्रतिमाएं और चित्र कहां-कहां पाए जाते हैं।</p><h2>इन नामों से जानी जाती हैं देवी विनायकी</h2><p>अलग-अलग स्थानों पर भगवान गणेश के इस स्त्री स्वरूप को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। इनको विनायकी, गणेश्वरी, गणेशानी, गजाननी जैसे नामों से भी जाना जाता है। वहीं देवी विनायकी का स्वरूप देखने में भगवान गणेश से मिलता है। लेकिन इनका स्वरूप स्त्री का होता है।</p><p>देवी विनायकी से जुड़ी मान्यताओं में इनको गणेश और शक्ति का मिलाजुला स्वरूप माना जाता है। वहीं भारत के कुछ प्राचीन मंदिरों में देवी के इस अनोखे स्वरूप की प्रतिमाएं भी हैं।</p><h2>राजस्थान से लेकर दक्षिण भारत तक हैं प्रमाण</h2><p>राजस्थान के खेड़ में देवी विनायकी की प्राचीन मूर्ति को काफी पुराना माना जाता है। वहीं ओडिशा के हीरापुर में 64 योगिनी मंदिर में भी आपको देवी विनायकी का स्वरूप देखने को मिलता है। यह मंदिर अपनी प्राचीन योगिनी सिद्धियों के लिए जाना जाता है।</p><p>इसके अलावा दक्षिण भारत में देवी विनायकी की पूजा-अर्चना होती है। तमिलनाडु के कन्याकुमारी क्षेत्र में स्थित थानुमालयन मंदिर में देवी विनायकी का प्राचीन रूप है। यह मंदिर करीब 1300 साल पुराना बताया जाता है।</p><h2>देवी विनायकी की पौराणिक कथा</h2><p>पौराणिक कथा में अंधक नामक राक्षस का वर्णन मिलता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक अंधक मां पार्वती को अपनी पत्नी बनाना चाहता था। मां पार्वती की रक्षा के लिए महादेव ने अंधक राक्षस पर प्रहार किया।</p><p>लेकिन जब अंधक की रक्त की बूंदे धरती पर गिरती थीं, तो उनसे नए राक्षस उत्पन्न होने लगते थे। जिससे अंधक की शक्ति बढ़ती जा रही थी। इस स्थिति को देखते हुए देवी-देवताओं ने अपनी शक्तियों का आह्वान किया।</p><h2>कैसे प्रकट हुआ विनायकी स्वरूप</h2><p>बता दें कि देवी-देवताओं की शक्तियों से तमाम मातृ शक्तियां प्रकट हुईं। जिसके बाद महादेव ने अंधक से युद्ध किया और गणपति ने भी अपने मातृ शक्ति स्वरूप में अंधक का सामना किया। पौराणिक कथा में बताया जाता है गणपति ने अंधक का वध किया और उसके रक्त की बूंदों को धरती पर गिरने से रोक दिया।</p><p>इसी के बाद से देवी विनायकी का स्वरूप लोकप्रिय हुआ। उनको भगवान गणेश की स्त्री शक्ति या स्त्री का स्वरूप माना जाता है। यही कारण है कि कुछ स्थानों पर विशेष रूप से देवी विनायकी की पूजा होती है।</p><h2>देवी विनायकी का स्वरूप</h2><p>देवी विनायकी की प्रतिमा में भगवान गणेश से मिलते-जुलते कई प्रतीक दिखाई देते हैं। हाथी के मुख और स्त्री के शरीर की वजह से यह स्वरूप बेहद अनोखा माना जाता है। देवी विनायक से जुड़ी मान्यताएं भारत की प्राचीन धार्मिक और शाक्त परंपराओं की विविधता को दिखाता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 18 Sep 2026 14:47:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/goddess-vinayaki-the-female-form-of-lord-ganesha-history-and-significance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[South India का काशी है Rameswaram Jyotirlinga, जहां 22 Teertham में प्रायश्चित स्नान करते हैं भक्त]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/rameshwaram-temple-history-architecture-and-sacred-ramayana-legends]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>तमिलनाडु के रामानाथपुरम जिले के रामेश्वरम में रामेश्वर मंदिर स्थित है। रामेश्वरम मंदिर 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से 11वें नंबर पर आता है। रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम द्वीप पर बसा है। जो उत्तर भारत में काशी की मान्यता है, वही दक्षिण में रामेश्वरम की भी है। रामेश्वरम को दक्षिण भारत का काशी भी कहा जाता है। वहीं रामेश्वरम को रामनाथस्वामी मंदिर कहा जाता है। यह मंदिर अपनी भव्य संरचना, जटिल मूर्तिकला, विशाल मीनारों और गलियारों के लिए जाना जाता है। वहीं मंदिर में पूजे जाने के भगवान लिंग के रूप में विराजमान हैं।</p><p>मंदिर में नंदी की भी बेहद विशाल मूर्ति मौजूद है, जोकि करीब 17.5 फीट ऊंची है। इस मंदिर में भगवान शिव के अलावा देवी विशालाक्षी, भगवान विनायक, भगवान सुब्रह्मण्य, पर्वतवर्धिनी, उत्सव प्रतिमा, सायनागृह और पेरुमल शामिल हैं।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-shiva-accepted-goddess-mansa-devi-as-his-mind-born-daughter" target="_blank" rel="noopener">Lord Shiva की मानस पुत्री और नागराज वासुकी की बहन कैसे बनीं Mansa Devi</a></p><h2>भक्तों के लिए बेहद खास</h2><p>बता दें कि यह मंदिर भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित और भगवान भोलेनाथ की पूजा को समर्पित ज्योतिर्लिंग है। यह जगह भगवान विष्णु और महादेव के भक्तों के लिए बेहद खास मानी जाती है। वहीं रामेश्वर ज्योतिर्लिंग हिंदू धर्म में 4 प्रमुख स्थलों में भी शामिल है।</p><p>मंदिर की वर्तमान संरचना का निर्माण 17वीं शताब्दी में भारत के राजाओं ने कराया था। इसमें श्रीलंका के राजाओं का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा था। माना जाता है कि भारत के सभी हिंदू मंदिरों की तुलना में रामेश्वरम मंदिर का गलियारा काफी ज्यादा लंबा है। वहीं इसके कुछ हिस्से हजारों साल पुराने बताए गए थे। लेकिन रामेश्वरम मंदिर का संबंध रामायण काल से है।</p><h2>कथा</h2><p>इस मंदिर से जुड़ी कथाओं और भारतीय महाकाव्य रामायण के मुताबिक भगवान श्रीराम ने रावण पर विजय हासिल करने के बाद प्रायश्चित के लिए महादेव की पूजा करने की सोचा। इसके लिए उन्होंने हनुमान को काशी से शिवलिंग लाने का अनुरोध किया।</p><p>जब हनुमान जी ने शिवलिंग को लाने में देरी की, तो माता सीता ने रेत से शिवलिंग बनाया, जिससे कि श्रीराम भगवान शिव की पूजा कर सकें। माना जाता है कि यह वहीं शिवलिंग है, जिसको रामलिंगम के नाम से भी जाना जाता है। जो अब रामनाथस्वामी में पूजा जाता है। वहीं काशी से हनुमान जी द्वारा लाए गए शिवलिंग को विश्वलिंगम कहते हैं।</p><p>वहीं इस मंदिर के अंदर 22 तीर्थम यानी की पवित्र जल निकाय हैं, जहां पर भक्त अपने पापों के प्रायश्चित के लिए नहाते हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 17 Sep 2026 13:19:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/rameshwaram-temple-history-architecture-and-sacred-ramayana-legends</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Trinetra Ganesh Temple: Ranthambore के Trinetra Ganesh को चिट्ठी लिखकर अपनी मनोकामना भेजते हैं श्रद्धालु]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/trinetra-ganesh-temple-in-rajasthan-attracts-devotees-with-divine-history]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले में रणथंभौर के ऐतिहासिक किले के भगवान गणेश का एक मंदिर है। यह मंदिर सिर्फ अपनी भव्यता के लिए नहीं बल्कि अनूठे रहस्य और गहरी आस्था के लिए भी जाना जाता है। यह मंदिर त्रिनेत्र गणेश मंदिर हैं, जहां पर गणपति बप्पा अपने पूरे परिवार के साथ विराजमान हैं। इस मंदिर में भक्त भगवान गणेश, उनकी पत्नियां रिद्धि-सिद्धि और पुत्र शुभ-लाभ के दर्शन करते हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको माधोपुर के त्रिनेत्र गणेश मंदिर से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में बताने जा रहे हैं।</p><h2>गणपति का अनोखा मंदिर</h2><p>वैसे तो रणथंभौर किला जंगल सफारी के लिए पॉपुलर है। लेकिन यहां पर स्थित त्रिनेत्र गणेश मंदिर हजारों-लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र है। इस मंदिर की बड़ी विशेषता यह है कि यहां पर भगवान गणेश अकेले नहीं बल्कि पूरे परिवार के साथ विराजमान हैं। इस मंदिर में बप्पा की पत्नियां रिद्धि और सिद्धि, पुत्र शुभ और लाभ व उनके वाहन मूषक भी साथ में विराजमान हैं। यही वजह है कि यह त्रिनेत्र गणेश मंदिर अन्य मंदिरों से अलग है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-shiva-accepted-goddess-mansa-devi-as-his-mind-born-daughter" target="_blank" rel="noopener">Lord Shiva की मानस पुत्री और नागराज वासुकी की बहन कैसे बनीं Mansa Devi</a></p><h2>जानें मंदिर की कहानी</h2><p>रणथंभौर के राजा हम्मीर 13वीं शताब्दी के अंत में अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध कर रहे थे। लंबे समय तक चले घेराव की वजह से किले में अनाज और अन्य जरूरी चीजों की कमी हो गई। ऐसे में राजा हम्मीर चिंतित हो उठे कि अब प्रजा का क्या होगा। उस दौरान रात में राजा को सपने में भगवान गणेश के दर्शन हुए और उनको आश्वासन दिया कि सुबह तक सब ठीक हो जाएगा। अगली सुबह किले में चमत्कार हुआ, भगवान गणेश की त्रिनेत्र प्रतिमा प्रकट हुआ और राजा हम्मीर के भंडार अनाज से भर गए। जिसके बाद युद्ध भी समाप्त हो गया। वहीं इस घटना के बाद राजा हम्मीर ने 1300 ईस्वी में इस मंदिर का निर्माण कराया था।</p><h2>महत्व</h2><p>भक्तों का मानना है कि इस मंदिर में पूरे परिवार के दर्शन मात्र से घर-परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है। भगवान गणेश का तीसरा नेत्र शक्ति और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां मंदिर में दर्शन करने से जीवन की सभी परेशानियां दूर होती हैं।</p><h2>चिट्ठी लिखने की परंपरा</h2><p>त्रिनेत्र गणेश मंदिर की एक खास और अनोखी परंपरा इसको सबसे अलग बनाती है। यहां पर श्रद्धालु बप्पा को चिट्ठी लिखते हैं। हजारों चिट्ठियां रोज मंदिर पहुंचती हैं। इन चिट्ठियों में लोग अपनी समस्याएं, इच्छाएं और दुआएं लिखकर भेजते हैं। वहीं मंदिर के पुजारी बप्पा के चरणों में इन चिट्ठियों को अर्पित कर देते हैं। माना जाता है कि सच्चे मन और श्रद्धा के साथ लिखी चिट्ठी का उत्तर बप्पा जरूर देते हैं और मनोकामना पूरी करते हैं।</p><p>रणथंभौर का यह मंदिर सिर्फ पूजा-अर्चना का स्थान नहीं है। बल्कि यह विश्वास और चमत्कार का भी प्रतीक माना जाता है। यहां पर बप्पा को परिवार सहित देखकर अनुभव होता है कि परिवार और आस्था का बंधन की जीवन को पूर्ण बनाता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 16 Sep 2026 12:17:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/trinetra-ganesh-temple-in-rajasthan-attracts-devotees-with-divine-history</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ganesh Utsav पर Delhi-NCR में दर्शन के लिए Noida के ये प्रसिद्ध मंदिर हैं बेहद खास]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/noida-ganesha-temples-to-visit-during-ganesh-utsav-celebrations]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>गणेशोत्सव की धूम हर जगह देखने को मिल रही है। अगर आप दिल्ली-एनसीआर में रहते हैं, तो इस खास अवसर पर नोएडा के इन मंदिरों के दर्शन जरुर करें। यहां पर आपको मंदिर की सुंदर सजावट देखने को मिल जाएगी, तो कहीं सुबह-शाम आरती और पूजा के लिए भक्तों की भीड़ देखने को मिलेगी।</p><p>यदि आप गणेश उत्सव के समय नोएडा में किसी ऐसे मंदिर की तलाश कर रहे हैं, तो यह लेख आपके लिए है। आइए आपको इस लेख में नोएडा के सबसे लोकप्रिय गणेश मंदिरों के बारे में बताते हैं।</p><p><strong>नोएडा सेक्टर-62 का श्री विनायक मंदिर</strong></p><p>वैसे नोएडा का यह श्री विनायक मंदिर भगवान गणेश जी समर्पित है। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है इसकी वास्तुकला। प्रवेश द्वार पर की गई नक्काशी इसे दूसरे मंदिरों से खास बनाती हैं। गणेश उत्सव के समय यहां पर पूजा के साथ ही धार्मिक अनुष्ठान और आरती भी होती है।</p><p><strong>कैसे पहुंचें?</strong></p><p>- लोकेशन- सेक्टर-62 के इंडस्ट्रियल एरिया में, मुख्य डी-सर्कल के पास।</p><p>- नजदीकी मेट्रो स्टेशन- सेक्टर-62, इलेक्ट्रॉनिक सिटी मेट्रो स्टेशन से ऑटो या ई-रिक्शा लेकर पहुंचा जा सकता है।</p><p><strong>वरसिद्धि विनायगर मंदिर, सेक्टर-22</strong></p><p>इस दौरान आप नोएडा में गणेश जी का कोई मंदिर सर्च कर रहे हैं, तो ऐतिहासिक महत्व और अलग मूर्ति के लिए जाना जाता है, तो यहां पर जाना आपको अच्छा लगेगा। वैसे यहां पर गणेश चतुर्थी के मौके पर विशेष पूजा और धार्मिक कार्यक्रमों की परंपरा रही है। वैसे यहां गणेश उत्सव के समय काफी भीड़ देखने को मिलेगी।</p><p><strong>कैसे पहुंचें?</strong></p><p>- लोकेशन- G ब्लॉक, सेक्टर-22 नोएडा</p><p>- सेक्टर 22 पहुंचने के बाद, ऑटो या ई-रिक्शा से मंदिर तक आसानी से जा सकते हैं।</p><p><strong>श्री विनायक और श्री कार्तिकेय मंदिर</strong></p><p>नोएडा में स्थित यह मंदिर भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय के लिए जाना जाता है। इस मंदिर के निर्माण में भी दक्षिण भारतीय शैली का इस्तेमाल किया गया है। यहां काले पत्थर से बनी देवी-देवताओं की प्रतिमाएं मौजूद हैं, जो इस मंदिर को और भी खूबसूरत बना देती हैं।</p><p><strong>कैसे पहुंचें?</strong></p><p>- लोकेशन- C-30/2, C ब्लॉक, फेज-2 इंडस्ट्रियल एरिया, सेक्टर- 62</p><p>- नजदीकी मेट्रो स्टेशन- 62 मेट्रो स्टेशन से ऑटो या ई-रिक्शा लेकर मंदिर तक पहुंच सकते हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 15 Sep 2026 17:16:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/noida-ganesha-temples-to-visit-during-ganesh-utsav-celebrations</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Lord Shiva की मानस पुत्री और नागराज वासुकी की बहन कैसे बनीं Mansa Devi]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-shiva-accepted-goddess-mansa-devi-as-his-mind-born-daughter]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हिंदू धर्म में कई देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की जाती है। ऐसी ही एक मनसा देवी हैं, जिनको नागों की देवी कहा जाता है। मनसा देवी का भगवान शिव से गहरा रिश्ता है। हालांकि देवी मनसा के जन्म और भगवान शिव से उनके संबंध को लेकर अलग-अलग धार्मिक ग्रंथों में विभिन्न कथाएं मिलती हैं। लेकिन इसका विस्तृत विवरण ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंड के अध्याय 45 और 46 में मिलता है। इस पुराण में देवी मनसा का भगवान शिव के साथ क्या संबंध है, इस बात का जिक्र मिलता है। तो आइए जानते हैं देवी मनसा के जन्म की पौराणिक कथा और महादेव से उनके संबंध के बारे में...</p><h2>भगवान शिव की मानस पुत्री हैं मनसा देवी</h2><p>पौराणिक मान्यता के मुताबिक देवी मनसा को महादेव की मानस पुत्री कहा जाता है। मानस पुत्री का अर्थ ऐसी संतान से है, जिसका जन्म शारीरिक प्रक्रिया से न होकर मन के संकल्प से हुआ हो। इसके पीछे एक कथा सुनने को मिलती है, जिसमें इस बात का उल्लेख मिलता है कि देवी मनसा का जन्म कैसा हुआ था। धार्मिक मान्यता के मुताबिक देवी मनसा को भगवान भोलेनाथ की पुत्री और नागराज वासुकी की बहन कहा जाता है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/women-observe-the-hartalika-teej-fast-for-the-blessing-of-unbroken-marital-bliss" target="_blank" rel="noopener">Hartalika Teej 2026: अखंड सौभाग्य के लिए महिलाएं करती हैं हरितालिका तीज व्रत</a></h3><h2>देवी मनसा के जन्म की कथा</h2><p>कथा के मुताबिक जब भगवान शिव ध्यान में लीन थे, तो उनको मां पार्वती के मनोहर स्वरूप का अनुभव हुआ। इस अनुभव से उनका वीर्य जमीन पर गिरा और देवी मनसा का जन्म हुआ। देवी मनसा का जन्म होने के बाद नागों और सर्पियों ने उनकी रक्षा की। वासुकी नाग ने देवी रो अपनी पुत्री की तरह पाल-पोसकर बड़ा किया। धीरे-धीरे वह एक दिव्य और सुंदर नाग कन्या के रूप में प्रकट हुईं, जिनको आगे जाकर मनसा देवी के नाम से जाना गया।</p><h2>महादेव ने पुत्री के रूप में किया स्वीकार</h2><p>जब देवी मनसा बड़ी हुईं, तो वासुकी नाग के उनको बताया कि वह भोलेनाथ की पुत्री हैं और वासुकी उनको भोलेनाथ के पास ले गए। जब महादेव ने देवी को देखा, तो उनको अपनी मानस पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया।</p><h2>माता पार्वती ने क्‍यों दिया था श्राप</h2><p>श्रीमद् देवीभागवत पुराण के स्कंध 9 और अध्याय 48 में इसका जिक्र मिलता है। इन ग्रंथों में बताया गया कि जब देवी पार्वती ने मां मनसा को देखा, तो भगवान शिव और उनके बीच विवाद हो गया। क्योंकि मनसा देवी को देवी पार्वती अपनी सौतेली पुत्री मानती थीं। क्योंकि भगवान शिव के मन से देवी मनसा का जन्म हुआ था, इसलिए मां पार्वती के लिए उनको अपनाना आसान नहीं था। इसलिए उन्होंने देवी मनसा को श्राप दे दिया कि उनकी पूजा हमेशा अधूरी मानी जाएगी।</p><p>बता दें कि मनसा देवी को विषहरी माता के नाम से भी जाना जाता है। वहीं इनकी पूजा में दाएं हाथ की जगह बाएं हाथ का इस्तेमाल किया जाता है। वहीं हिंदू धर्म में बाएं हाथ से की गई पूजा को अधूरा माना जाता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 14 Sep 2026 15:37:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-shiva-accepted-goddess-mansa-devi-as-his-mind-born-daughter</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Unique Temple: संतान सुख और नौकरी के लिए इन प्रसिद्ध Temple में चढ़ाते हैं Resume व लौकी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/job-seekers-and-hopeful-parents-make-unique-offerings-at-indian-temple]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भारत को मंदिरों का देश भी कहा जाता है। यहां पर उत्तर से लेकर दक्षिण तक कई भव्य और प्राचीन मंदिर हैं। यह मंदिर सिर्फ पूजा-पाठ का स्थान नहीं बल्कि लोक परंपरा और अनोखी मान्यताओं के लिए भी जाने जाते हैं। भारत के हर एक मंदिर की अपनी कहानी है, जो उसको अन्य मंदिरों से अलग बनाते हैं। आमतौर पर ज्यादातर मंदिरों में मन्नत पूरी होने पर फल-फूल, मिठाई, पैसा, नारियल, सोना और चांदी चढ़ाई जाती है। लेकिन कुछ मंदिर ऐसे भी हैं, जहां पर मनोकामना पूरी होने पर बायोडाटा, तांबे-पीतल की घंटियां, हरी लौकी और लकड़ी आदि चढ़ाई जाती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको इन अनोखे मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं।</p><h2>चितई गोलू देवता मंदिर</h2><p>चितई गोलू देवता मंदिर उत्तराखंड के अल्मोड़ा से करीब 8 किमी दूर है। यह राज्य के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। यहां पर गौर भैरव के रूप में भगवान शिव के अवतार गोलू देवता की पूजा-अर्चना की जाती है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/siddhivinayak-to-trinetra-ganesh-religious-significance-of-11-famous-temples-in-india" target="_blank" rel="noopener">Famous Ganesh Temple in India: Siddhivinayak से लेकर Trinetra Ganesh तक, भारत के 11 प्रसिद्ध मंदिरों का धार्मिक महत्व</a></h3><p>गोलू देवता को न्याय का देवता भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यहां पर श्रद्धालु अपनी इच्छा और न्याय पाने के लिए कागज पर अर्जी या स्टांप पेपर लिखकर बांधते हैं। वहीं मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धालु भगवान को तांबे या पीतल की घंटियां अर्पित की जाती हैं। इस कारण इस मंदिर को घंटी वाला मंदिर भी कहा जाता है।</p><h2>महामाया माता मंदिर</h2><p>महामाया माता मंदिर राजस्थान के नागौर जिले में स्थित है। इस मंदिर को 'बच्चों वाली माता' के धाम के रूप में भी जाना जाता है। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है कि यहां पर बच्चों को होने वाली गंभीर बीमारियों का इलाज आध्यात्मिक तरीके से होता है।</p><p>जैसे अगर किसी बच्चे को देर से बोलने की समस्या, बोलने में तुतलापना, लकवा या गंभीर शारीरिक परेशानियां होती हैं, तो महामाया माता मंदिर के दरबार में ठीक होने की प्रार्थना की जाती है। इसके अलावा बच्चे के रोग खत्म होने पर मां को प्रसन्न करने के लिए लकड़ी का पालना अर्पित किया जाता है।</p><h2>शाटन देवी मंदिर</h2><p>शाटन देवी मंदिर छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के रतनपुर में स्थित है। यह मंदिर लोगों के बीच आस्था का बड़ा केंद्र है। वैसे तो इस मंदिर में हर कोई दर्शन के लिए आ सकता है। लेकिन जो लोग संतान प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, तो उनके लिए यह मंदिर बेहद खास है। इस मंदिर की अनोखी परंपरा के अनुसार, भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने पर तेंदू और लौकी की लकड़ियां चढ़ाते हैं।</p><h2>करणी माता मंदिर</h2><p>करणी माता का मंदिर राजस्थान के सीकर जिले में हैं। यहां पर नौकरी की इच्छा रखने वालों की मनोकामना पूरी होती है। करणी माता मंदिर को लेकर धार्मिक मान्यता है कि अगर कोई जातक बार-बार नौकरी या फिर इंटरव्यू में असफल हो जाता है। तो यहां पर दर्शन करने मात्र से व्यक्ति की नौकरी लग जाती है। वहीं यहां पर कई भक्त करणी माता के चरणों में सीवी भी अर्पित करते हैं, जिससे की उनकी अच्छी सी नौकरी लग जाए।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 12 Sep 2026 11:44:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/job-seekers-and-hopeful-parents-make-unique-offerings-at-indian-temple</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Famous Ganesh Temple in India: Siddhivinayak से लेकर Trinetra Ganesh तक, भारत के 11 प्रसिद्ध मंदिरों का धार्मिक महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/siddhivinayak-to-trinetra-ganesh-religious-significance-of-11-famous-temples-in-india]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वैसे तो भारत में भगवान गणेश को समर्पित हजारों मंदिर हैं। वहीं देश-विदेश में भगवान गणेश की कई प्राचीन मूर्तियां विराजमान हैं। लेकिन कुछ खास मंदिर हैं, जिनकी प्रसिद्धि और प्रताप दूर-दूर तक फैला है। इन मंदिरों में लाखों की संख्या में भक्त दर्शन और गणपति बप्पा का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आते हैं। वहीं गणेश चतुर्थी के मौके पर भगवान गणेश को समर्पित इन मंदिरों की रौनक देखते ही बनती हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको भगवान गणेश के 11 चमत्कारी मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>मनकुला विनयगर मंदिर</h2><div>पुडुचेरी का मनकुला विनायक मंदिर करीब 300 साल से अधिक पुराना है। यह भगवान गणेश का मंदिर है, जोकि बंगाल की खाड़ी के पास स्थित है। मनकुला का मतलब रेत का तालाब होता है। मनकुला विनायक मंदिर अपनी स्वर्ण रथ यात्रा और हाथियों के आशीर्वाद के लिए काफी प्रसिद्ध है। इस मंदिर में विराजमान भगवान गणेश को को वरसिद्धि विनायक के नाम से जाना जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/discover-mythological-history-of-6th-jyotirlinga-and-significance-of-silver-kavach" target="_blank">Bhimashankar Temple Facts: जानिए 6वें ज्योतिर्लिंग का पौराणिक इतिहास और चांदी के Kavach की मान्यता</a></h3><div><br></div><h2>मधुर महागणपति मंदिर</h2><div>यह मंदिर केलर कासरगोड स्थित मधु वाहिनी नदी के तट पर बना है। यह अपने त्रिस्तरीय गोपुरम और अनोखी गणेश प्रतिमा के लिए काफी फेमस है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक टीपू सुल्तान ने इस मंदिर पर एक बार आक्रमण किया था, लेकिन दैवीय हस्तक्षेप के बाद उसको छोड़ दिया। गणेश चतुर्थी के मौके पर मंदिर की दिव्यता और भव्यता देखने लायक होती है।</div><div><br></div><h2>दगडूशेठ गणपति मंदिर</h2><div>यह मंदिर कर्नाटक के बेलगावी में स्थित है। यह मंदिर भगवान गणेश की भव्य मूर्ति और सामुदायिक समारोहों के लिए काफी प्रसिद्ध है। गणपति बप्पा के दर्शन के लिए महाराष्ट्र और कर्नाटक दोनों जगहों से भक्त मंदिर आते हैं। वहीं गणेश चतुर्थी के मौके पर यहां पर हजारों की संख्या में भक्त पहुंचते हैं।</div><div><br></div><h2>अष्टविनायक मंदिर</h2><div>महाराष्ट्र का अष्टविनायक मंदिर गणपति बप्पा के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। इस मंदिर की पवित्र तीर्थयात्रा पुणे के आसपास 8 प्राचीन मंदिरों में से होकर गुजरती है। जिनमें से हर एक ही अनोखी कथा और स्वयंभू बप्पा की मूर्ति है। मोरगांव से रंजनगांव तक भक्त भक्ति में डूबकर इन मंदिरों की परिक्रमा करते हैं। वहीं पौराणिक कथाओं में भी इस मंदिर का जिक्र मिलता है।</div><div><br></div><h2>करपगा विनायक मंदिर</h2><div>तमिलनाडु के पिल्लैयारपट्टी में स्थित यह मंदिर कराईकुडी के बेहद समीप है। इस प्राचीन चट्टानी मंदिर में एक गुफा में भगवान गणेश की 6 फीट प्रतिमा तराशी गई है। स्थानीय लोगों के अनुसार, यह मंदिर करीब 1600 साल पुराना है। जोकि करपगा विनायक के नाम से फेमस है। यहां पर भी गणेश चतुर्थी के मौके पर विशेष रौनक देखने को मिलती है।</div><div><br></div><h2>गणेश टोक मंदिर</h2><div>यह मंदिर सिक्किम के गंगटोक में स्थित है। यह भगवान गणेश को समर्पित एक छोटा और प्रसिद्ध पहाड़ी मंदिर है। इस मंदिर से आपको गंगटोक शहर का पूरा मनोहर दृश्य देखने को मिलता है। नया व्यापार शुरू करने से पहले भक्त इस मंदिर में आकर बप्पा का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।</div><div><br></div><h2>कनिपकम विनायक मंदिर</h2><div>आंध्र प्रदेश के चित्तूर में स्थित कनिपकम विनायक मंदिर को 11वीं शताब्दी में बनवाया गया था। इस मंदिर का निर्माण चोल राजाओं द्वारा कराया गया था। इस मंदिर में भगवान गणेश की स्वयंभू मूर्ति स्थापित है। माना जाता है कि समय के साथ-साथ मूर्ति का भी आकार बढ़ रहा है। भक्तों का मानना है कि गणपति बप्पा ही उनके जीवन में आए किसी भी तरह के विवाद को सुलझाते हैं। इस कारण उनको वरसिद्धि विनायक के नाम से जाना जाता है।</div><div><br></div><h2>सिद्धिविनायक मंदिर</h2><div>कर्नाटक के बैंगलोर में स्थित सिद्धिविनायक मंदिर करीब 600 साल से ज्यादा पुराना है। यह मंदरि बप्पा के शक्तिशाली मंदिर के रूप में पूजा जाता है। मंदिर में विराजमान गणपति की मूर्ति की पूजा वरसिद्धि विनायक यानी की वरदान देने वाले भगवान के रूप में की जाती है। गणेश चतुर्थी के मौके पर मंदिर की दिव्यता और भव्यता देखने लायक होती है।</div><div><br></div><h2>उच्ची पिल्लयार मंदिर</h2><div>तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में 7वीं शताब्दी का रॉकफोर्ट उच्ची पिल्लयार मंदिर भगवान गणेश को समर्पित है। इस मंदिर को स्थानीय लोग पिल्लयार के नाम से भी जानते हैं। पौराणिक कहानियों के मुताबिक यह भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की कथा और रावण की विभीषण की मूर्ति छिपाने में बप्पा की अहम भूमका थी।</div><div><br></div><h2>त्रिनेत्र गणेश जी</h2><div>राजस्थान के रणथंभौर किले के अंदर बना भगवान गणेश का यह सबसे पुराना मंदिर है। इस मंदिर में स्थापित गणेश जी की मूर्ति के तीन नेत्र हैं। जिस कारण उनको त्रिनेत्र गणेश जी के नाम से भी जाना जाता है। गणपति के इस मंदिर में हर शुभ काम को करने से पहले उनको निमंत्रण भेजा जाता है।</div><div><br></div><h2>सिद्धि विनायक मंदिर</h2><div>महाराष्ट्र का सिद्धिविनायक मंदिर सबसे फेमस मंदिरों में से एक है। यहां पर बप्पा को मनोकामना पूरी करने वाले भगवान के रूप में पूजा जाता है। साल 1801 में इस मंदिर का निर्माण हुआ था। यह मंदिर पूरे भारत में काफी प्रसिद्ध है। इस मंदिर में विराजमान बप्पा की मूर्ति की सूंड दाईं ओर मुड़ी है, जिसको बेहद शक्तिशाली और दुर्लभ माना जाता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 12:39:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/siddhivinayak-to-trinetra-ganesh-religious-significance-of-11-famous-temples-in-india</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Bhimashankar Temple Facts: जानिए 6वें ज्योतिर्लिंग का पौराणिक इतिहास और चांदी के Kavach की मान्यता]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/discover-mythological-history-of-6th-jyotirlinga-and-significance-of-silver-kavach]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भगवान शिव के पवित्र 12 ज्योतिर्लिंग के दर्शन मात्र से ही तमाम बाधाएं, ग्रह दोष, बुरे विचार और नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं। सावन के महीने में द्वादश ज्योतिर्लिंगों में किसी एक भी ज्योतिर्लिंग के दर्शन करना उस समान ही पुण्य देता है, जितना की चारधाम यात्रा से मिलता है। क्योंकि इस दौरान महादेव धरती पर निवास करते हैं और जो भी भक्त सच्चे मन से उनकी प्रार्थना करते हैं, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से छठवें ज्योतिर्लिंग 'भीमाशंकर' के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>शिव महापुराण में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का श्वलोक</h2><div>सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् उज्जयिन्यां महाकालं ओम्कारममलेश्वरम् ॥</div><div><br></div><div>परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरं सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने ॥</div><div><br></div><div>वारणस्यां तु विश्र्वेशं त्रयंम्बकं गौतमीतटे हिमालये तु केदारं घृश्नेशं च शिवालये ॥</div><div><br></div><div>एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ॥</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mystery-of-gola-math-temple-in-maihar-built-by-lord-vishwakarma-in-single-night" target="_blank">Maihar के Gola Math Temple का रहस्य, एक ही रात में भगवान Vishwakarma ने किया था निर्माण</a></h3><div><br></div><h2>भीमाशंकर मंदिर का इतिहास</h2><div>त्रेतायुग में त्रिपुरसुर नामक दैत्य था। उसने भगवान शिव की पूजा कर उनसे अमरता का वरदान प्राप्त किया। महादेव की तपस्या से खुश होकर महादेव ने उसको आशीर्वाद देते हुए कहा कि कोई भी महिला या पुरुष तुमको मार नहीं सकता है। भगवान शिव के आशीर्वाद से वह तीनों लोक में जमकर खूब आतंक मचाने लगा। सभी देवता और मनुष्य उस दैत्य के आतंक से परेशान हो गए हैं।</div><div><br></div><div>जिसक बाद सभी देवता भगवान शिव के शरण में पहुंचे और महादेव ने उस दैत्य को खत्म करने का फैसला किया। फिर महादेव और मां पार्वती ने अर्धनारी नटेश्वर के रूप में एक नया रूप धारण किया। फिर कार्तिका पूर्णिमा के दिन त्रिपुरासुर को मौत के घाट उतार दिया।</div><div><br></div><div>त्रिपुरासुर दैत्य की मौत के बाद उसकी पत्नियां डाकिनी और शाकिनी ने महादेव के पास त्रिपुरासुर के बिना अपने अस्तित्व के बारे में पूछा था। तब भगवान शिव ने दोनों को अमरता का वरदान दे दिया। जो महादेव ने त्रिपुरासुर को प्रदान किया था। तब से भीमाशंकर को 'डाकिन्यांभीशंकरम' के नाम से जाना जाता है।</div><div><br></div><h2>जानें इस मंदिर से जुड़ी जानकारी</h2><div>भीमाशंकर मंदिर चारों ओर पहाड़ियों से घिरा हुआ है। मंदिर की करीब 3.5 मीटर चौड़ा और करीब 15 मीटर लंबाई में है। माना जाता है कि छत्रपति शिवजी महाराज ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। जिसके बाद इस मंदिर के शिखर को18वीं शताब्दी में नाना फडणवीस ने बनवाया था।</div><div><br></div><div>इस ज्योतिर्लिंग से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। जिसमें एक कथा यह भी है कि कुंभकर्ण के पुत्र का नाम भीम था। वह अपने पिता की मौत का बदला लेना चाहता था। जिसके लिए उसने घोर तपस्या की और ब्रह्माजी से विजय होने का वरदान प्राप्त किया। वरदान पाने के बाद उसने तीनों लोकों में आतंक मचाना शुरूकर दिया था। इसके बाद भोलेनाथ ने भीम राक्षस से युद्ध किया और उसका वध कर दिया था।</div><div><br></div><div>जिसके बाद सभी देवताओं ने भगवान से वहीं पर शिवलिंग रूप में विराजमान होने का आग्रह किया। इस आग्रह को महादेव ने स्वीकार कर लिया। तभी से इसको भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है।</div><div><br></div><div>अधिकतर समय भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग पर चांदी का श्रृंगार रूपी कवच चढ़ा होता है। जिससे ज्यादातर समय ज्योतिर्लिंग के मूल स्वरूप के दर्शन नहीं कर पाते हैं। केवल कुछ समय के लिए दिन में इसके चांदी के कवच को हटाया जाता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 09 Sep 2026 10:39:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/discover-mythological-history-of-6th-jyotirlinga-and-significance-of-silver-kavach</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Maihar के Gola Math Temple का रहस्य, एक ही रात में भगवान Vishwakarma ने किया था निर्माण]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mystery-of-gola-math-temple-in-maihar-built-by-lord-vishwakarma-in-single-night]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मध्य प्रदेश के मैहर जिले में स्थित गोला मठ मंदिर महादेव को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर अपनी अनोखी वास्तुकला के अलावा एक मंदिर एक पौराणिक मान्यता भी है। इस कारण से यह मंदिर भक्तों के बीच विशेष महत्व रखता है। वहीं सावन के महीने में और महाशिवरात्रि के मौके भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। वहीं सावन में दूर-दूर से श्रद्धालू भगवान शिव के दर्शन और जलाभिषेक के लिए मंदिर आते हैं। तो आइए जानते हैं इस मंदिर की अनोखी खासियत के बारे में...</div><div><br></div><h2>जानें भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी मान्यता</h2><div>गोला मठ मंदिर के निर्माण को लेकर स्थानीय मान्यता है कि देवताओं के शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा ने इस मंदिर का निर्माण सिर्फ एक रात में किया था। शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा ने अपनी दिव्य शिल्पकला से रातों-रात मंदिर को तैयार कर दिया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mythological-history-of-maa-katyayani-temple-and-divine-mystery-associated-with-maharaas" target="_blank">Vrindavan Shaktipeeth: मां Katyayani Temple का पौराणिक इतिहास और महारास से जुड़ा दिव्य रहस्य</a></h3><div><br></div><h2>अनूठी है वास्तुकला</h2><div>गोला मठ मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यहां के पत्थरों पर मिलने वाली संरचनाएं हैं। मंदिर के पत्थरों को बेहद खूबसूरती के साथ तराशा गया है। मंदिर की बनावट को देखकर किसी को भी इस बात पर विश्वास नहीं होगा कि इसको एक रात में बनाया गया है। स्थानीय मान्यताओं में यह कहा जाता है कि मंदिर के निर्माण में पत्थरों को ऐसे जोड़ा गया है कि यह मंदिर दिखने में असाधारण लगता है।</div><div><br></div><h2>सावन में होती है भीड़</h2><div>महादेव को समर्पित होने की वजह से सावन का महीना गोला मठ मंदिर के लिए खास महत्व रखता है। सावन के हर सोमवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं। भक्त कतारों में लगकर भगवान भोलेनाथ के दर्शन करते हैं और शिवलिंग पर जल चढ़ाकर जलाभिषेक करते हैं।</div><div><br></div><h2>प्राचीन है गोला मठ का शिवलिंग</h2><div>इस मंदिर के गर्भगृह में जो शिवलिंग है, वह काफी ज्यादा प्राचीन है। इसका जिक्र कहीं भी नहीं मिलता है कि यह शिवलिंग कैसे अवतरित हुआ। वहीं गर्भगृह के बाहर निकलते ही ठीक प्रवेश द्वार पर पत्थर के नंदी विराजमान हैं, उनकी भी मूर्ति काफी प्राचीन दिखती है। ऐसे में अगर आप भी मैहर में रहते हैं या उसके आस पास के निवासी हैं, तो आपको यहां एक बार दर्शन के लिए जरूर आना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 07 Sep 2026 11:54:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mystery-of-gola-math-temple-in-maihar-built-by-lord-vishwakarma-in-single-night</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Janmashtami Festival पर जानें क्यों 'Krishna' से पहले 'Radha' का नाम लेना माना जाता है बेहद शुभ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/radha-krishna-name-significance-janmashtami]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी 4 सितंबर को देशभर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जा रहा है। इस दिन भक्त श्रीकृष्ण की भक्ति में डूबे रहते हैं, हालांकि कान्हा का स्मरण राधा रानी का नाम लिए बिना पूरा नहीं माना जाता है। कई बार आपने लोगों के मुंह से सुना होगा,&nbsp; 'राधे-कृष्ण', 'राधे-राधे' या 'राधा-कृष्ण'।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">क्या आप जानते हैं कि भगवान कृष्ण का नाम लेने से पहले राधा का नाम क्यों लिया जाता है? इसके पीछे कई धार्मिक मान्यताएं और अद्भुत रहस्य छिपा है। आइए आपको इस बारे में विस्तार से बताते हैं।</span></div><div><br></div><div><span style="font-size: 1rem;"><b>राधा नाम से प्रसन्न होते हैं श्रीकृष्ण</b></span></div><div><span style="font-size: 1rem;">धार्मिक ग्रंथों में भगवान श्रीकृष्ण राधा रानी का नाम लेने से प्रसन्न होते हैं और हमेशा भक्तों पर कृपा बरसाते है। श्रीकृष्ण ने स्वंय राधा को अपनी आत्म बताया है और कहा कि राधा उन्हीं में वास करती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, राधा रानी को भगवान श्रीकृष्ण की शक्ति माना जाता है। जैसा कि सूर्य और उसकी किरणें कभी अलग नहीं होती है, वैसे ही राधा और कृष्ण भी एक-दूसरे के पूरक माने जाते है। राधा-कृष्ण का प्रेम साधारण नहीं है, बल्कि दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">माना जाता है कि जब भी कोई साधक राधा नाम जपता है, तो उसे श्रीकृष्ण की कृपा जरुर प्राप्त होती है।</span></div><div><br></div><div><b>राधा नाम में छिपा है प्रेम और भक्ति का भाव&nbsp;</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">असल में राधा-कृष्ण की कथा में राधा को निष्काम और पूर्ण प्रेम का प्रतीक माना गया है। उनका प्रेम किसी सांससारिक अपेक्षा से जुड़ा नहीं था, इसी कारण से कृष्ण भक्ति में राधा नाम को विशेष महत्व दिया है।</span></div><div><br></div><div><b>राधा की कृपा से ही मिलते हैं कृष्ण</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">धार्मिक मान्यता के अनुसार, राधा रानी भगवान कृष्ण की सबसे प्रिय हैं। जो साधक राधा नाम का स्मरण करता है, उस पर राधा-रानी की विशेष कृपा रहती है और इनके माध्यम से श्रीकृष्ण आपकी इच्छाओं को पूरा करते हैं। कई धार्मिक कथाओं में इस बात का भी वर्णन किया है कि श्रीकृष्ण ने राधा रानी को स्वंय ये वरदान दिया है कि उनका नाम हमेशा कृष्ण से पहले लिया जाता है।</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">जो भक्त राधा रानी की भक्ति करेगा, वो उसकी पुकार सबसे पहले सुनेंगे। इस भाव के कारण वृंदावन और बरसाना की गलियों में आज भी श्रद्धालु अभिवादन के तौर पर 'राधे-राधे' कहते हैं।&nbsp;</span></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 04 Sep 2026 12:01:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/radha-krishna-name-significance-janmashtami</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Krishna Janmashtami 2026: ऐश्वर्य एवं वैराग्य का अद्भुत संगम है श्रीकृष्ण ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/shri-krishna-is-a-magnificent-confluence-of-divine-majesty-and-detachment]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भगवान श्रीकृष्ण भारत की माटी, भारत की आत्मा और भारत के जनजीवन की धड़कन हैं। वे केवल आराधना के देवता नहीं, बल्कि जीवन को देखने की एक दृष्टि, संघर्षों से जूझने की प्रेरणा और भविष्य की ओर बढ़ने की दिशा हैं। वे ऐश्वर्य एवं वैराग्य का अद्भुत एवं निराला संगम हैं। श्रीकृष्ण के बिना भारतीय जीवन-दर्शन की कल्पना अधूरी है। जीवन के लगभग प्रत्येक आयाम-परिवार, समाज, राजनीति, प्रशासन, अर्थव्यवस्था, युद्ध, शांति, प्रेम, मित्रता, कर्तव्य, त्याग, नेतृत्व और आध्यात्मिकता में श्रीकृष्ण के विचारों और आदर्शों की छाप दिखाई देती है। इसीलिए जन्माष्टमी केवल श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं, बल्कि उनके विचारों को जीवन में उतारने का अवसर है। श्रीकृष्ण भारतीय संस्कृति के ऐसे अद्भुत एवं विलक्षण महानायक हैं, जिनके व्यक्तित्व में विरोधाभास दिखाई देने वाले अनेक गुण एक साथ समाहित हो जाते हैं। वे द्वारका के शासक हैं, लेकिन उन्हें सामान्यतः ‘राजा श्रीकृष्ण’ नहीं कहा जाता। वे ब्रजनंदन हैं, नंदलाल हैं, कन्हैया हैं, माखनचोर हैं, गोपियों के चितचोर हैं और रासरचैया हैं। यही उनकी महानता है कि सत्ता के शिखर पर पहुंचकर भी वे जनमानस से कभी दूर नहीं हुए। उनका नेतृत्व राजमहलों तक सीमित नहीं था, वह गांवों की गलियों, ग्वाल-बालों, किसानों, पशुपालकों और सामान्य जन के हृदय तक पहुंचता था।</div><div><br></div><div>श्रीकृष्ण का जीवन हमें सिखाता है कि श्रेष्ठ नेतृत्व केवल अधिकार प्राप्त करने का नाम नहीं, बल्कि जिम्मेदारी निभाने की कला है। उन्होंने सत्ता को कभी व्यक्तिगत सुख का साधन नहीं बनाया। समाज और राष्ट्र की व्यवस्था उनके लिए कर्तव्य थी और धर्म उनकी आत्मनिष्ठा। इसीलिए उन्होंने परिस्थितियों से पलायन नहीं किया। जहां प्रेम की आवश्यकता थी वहां प्रेम दिया, जहां मित्रता की आवश्यकता थी वहां मित्र बने, जहां संवाद जरूरी था वहां संवाद किया और जहां अधर्म का प्रतिकार आवश्यक हुआ वहां अत्यंत कठोर होकर सामने आए। यही संतुलन कुशल नेतृत्व की सबसे बड़ी पहचान है। आज प्रबंधन की दुनिया में निर्णय क्षमता, समय-प्रबंधन, संकट-प्रबंधन, नेतृत्व, संवाद-कौशल, मनोविज्ञान और रणनीति को सफलता की अनिवार्य शर्त माना जाता है। इन सभी क्षेत्रों में श्रीकृष्ण का जीवन असाधारण उदाहरण प्रस्तुत करता है। कुरुक्षेत्र में अर्जुन जब मोह और मानसिक द्वंद्व से घिरकर अपने कर्तव्य से विमुख होने लगे, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें केवल युद्ध के लिए प्रेरित नहीं किया, बल्कि जीवन का विराट दर्शन दिया। उन्होंने अर्जुन को कर्म का मर्म समझाया-मनुष्य का अधिकार कर्म पर है, परिणाम पर नहीं। यह संदेश आज भी हर विद्यार्थी, कर्मचारी, उद्यमी, प्रशासक, राजनीतिज्ञ और सामान्य व्यक्ति के लिए उतना ही उपयोगी है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/shri-krishna-janmashtami-will-be-celebrated-on-september-4" target="_blank">Krishna Janmashtami 2026: 4 सितंबर को मनाई जाएगी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, 15 साल बाद रोहणी नक्षत्र में मनेगा श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव</a></h3><div>हमारी सबसे बड़ी कमजोरी अक्सर कर्म से अधिक परिणाम की चिंता होती है। परिणाम की चिंता मन को भय, तनाव और असमंजस से भर देती है। श्रीकृष्ण का कर्मयोग इस मानसिक बोझ से मुक्ति का मार्ग देता है। अपने कर्तव्य को पूरी निष्ठा, क्षमता और ईमानदारी से करना और परिणाम को व्यापक व्यवस्था पर छोड़ देना-यह जीवन-प्रबंधन का ऐसा सूत्र है जिसकी उपयोगिता कभी समाप्त नहीं हो सकती। श्रीकृष्ण की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक थी-स्थिर बुद्धि। शिशुपाल ने राजसूय यज्ञ की सभा में उन्हें लगातार अपमानित किया, फिर भी वे शांत रहे। दुर्योधन के दरबार में शांति-दूत बनकर गए और वहां भी उनका अपमान हुआ, लेकिन वे विचलित नहीं हुए। इससे हमें सीख मिलती है कि उत्तेजना में लिया गया निर्णय प्रायः समस्या बढ़ाता है, जबकि शांत मन समाधान का रास्ता खोलता है। आधुनिक परिवारों से लेकर संसद, प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय संबंधों तक, यह प्रबंधन-सूत्र आज भी उतना ही प्रासंगिक है।</div><div><br></div><div>श्रीकृष्ण केवल युद्धनीति के ज्ञाता नहीं थे, वे शांति के भी सबसे बड़े समर्थक थे। महाभारत का युद्ध उनकी पहली पसंद नहीं था। उन्होंने युद्ध रोकने के लिए हर संभव प्रयास किया। जब संवाद और न्याय की संभावनाएं समाप्त हो गईं, तभी धर्म की रक्षा के लिए युद्ध का मार्ग स्वीकार किया गया। इससे स्पष्ट होता है कि शक्ति का अर्थ हिंसा नहीं, बल्कि न्याय की रक्षा करने की क्षमता है। सच्ची शांति वही है जिसके पीछे न्याय और आत्मबल की शक्ति हो। श्रीकृष्ण का सामाजिक दृष्टिकोण भी अत्यंत व्यापक था। उन्होंने ग्रामीण जीवन, गौ-संस्कृति, प्रकृति और सामुदायिक जीवन को सम्मान दिया। गोवर्धन प्रसंग हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सामुदायिक एकता का संदेश देता है। माखन और दूध-दही के प्रसंगों को केवल बाल-क्रीड़ा के रूप में देखने के बजाय उनमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्थानीय संसाधनों की रक्षा का संदेश भी देखा जा सकता है। श्रीकृष्ण का लोकजीवन से जुड़ाव बताता है कि कोई भी राष्ट्र तभी मजबूत बन सकता है जब उसकी विकास-यात्रा गांवों, किसानों, श्रमिकों और सामान्य नागरिकों को साथ लेकर चले। उनका व्यक्तित्व एक अद्भुत समन्वय है। वे अर्जुन के सारथी हैं और साथ ही विश्वरूप के दर्शन कराने वाले योगेश्वर। वे सुदामा के मित्र हैं और अत्याचारियों के लिए सुदर्शन चक्रधारी। वे बांसुरी की मधुरता हैं तो धर्मरक्षा के लिए आवश्यक कठोरता भी। वे प्रेम हैं, करुणा हैं, नीति हैं, रणनीति हैं, त्याग हैं और कर्म हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण को किसी एक सीमा में बांधना उनके विराट व्यक्तित्व को छोटा करना होगा।</div><div><br></div><div>श्रीकृष्ण का एक महत्वपूर्ण संदेश है कि व्यक्ति को अपनी क्षमताओं का बहुआयामी विकास करना चाहिए। परंपरा में उनके द्वारा चौंसठ कलाओं के ज्ञान का उल्लेख मिलता है। इसका व्यापक संदेश यह है कि शिक्षा केवल रोजगार पाने का साधन नहीं, बल्कि व्यक्तित्व को पूर्ण बनाने की प्रक्रिया है। आज के समय में जब शिक्षा को केवल अंक, नौकरी और प्रतियोगिता तक सीमित करने का खतरा है, श्रीकृष्ण का जीवन हमें ज्ञान, कला, कौशल, सृजनशीलता और चरित्र के समन्वय की प्रेरणा देता है। श्रीकृष्ण की राजनीति सत्ता प्राप्ति की राजनीति नहीं, बल्कि लोककल्याण और धर्मस्थापना की राजनीति थी। उनके जीवन में हमें यह सूत्र मिलता है कि सत्ता पर नैतिकता का अंकुश होना चाहिए और शक्ति का उपयोग जनहित के लिए होना चाहिए। आज भारत विकसित भारत के 2047 के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। आर्थिक शक्ति, विज्ञान, तकनीक, रक्षा, शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक समरसता-हर क्षेत्र में भारत नई संभावनाओं की ओर बढ़ रहा है। ऐसे समय में श्रीकृष्ण का दर्शन हमें बताता है कि विकास केवल भौतिक समृद्धि का नाम नहीं है। विकास तब सार्थक होगा जब उसमें चरित्र होगा, कर्तव्य होगा, करुणा होगी, न्याय होगा और अंतिम व्यक्ति के जीवन में भी आशा का प्रकाश पहुंचेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आत्मनिर्भर और सशक्त भारत के निर्माण की जो व्यापक यात्रा चल रही है, उसमें श्रीकृष्ण के कर्म, कर्तव्य, रणनीति, राष्ट्रहित और लोककल्याण के आदर्शों से प्रेरणा लेने की बड़ी संभावनाएं हैं।</div><div><br></div><div>अंतरराष्ट्रीय जीवन में भी श्रीकृष्ण का संदेश महत्वपूर्ण है। आज दुनिया संघर्षों, युद्धों, अविश्वास और शक्ति-संघर्षों से जूझ रही है। ऐसे समय में श्रीकृष्ण की नीति कहती है-पहले संवाद, फिर समन्वय और अंततः न्याय की रक्षा के लिए आवश्यक शक्ति। भारत यदि विश्व में शांति, सह-अस्तित्व और मानवकल्याण का मार्ग प्रशस्त करना चाहता है तो उसे अपनी सांस्कृतिक चेतना के इस महान स्रोत से ऊर्जा लेनी होगी। श्रीकृष्ण हमें यह भी सिखाते हैं कि जीवन केवल सुख का नाम नहीं है। संघर्ष आएंगे, परिस्थितियां बदलेंगी, प्रियजन दूर होंगे, संकट सामने खड़े होंगे, लेकिन मनुष्य को अपने धर्म और कर्तव्य से विचलित नहीं होना चाहिए। यही कारण है कि गीता का संदेश किसी एक युग, धर्म या समुदाय के लिए नहीं, बल्कि समूची मानवता के लिए जीवन का मार्गदर्शन बन गया है।</div><div><br></div><div>जन्माष्टमी के अवसर पर हमें केवल मंदिरों में घंटियां नहीं बजानी हैं, बल्कि अपने भीतर के अंधकार को भी पहचानना है। हमारे भीतर का कंस अहंकार हो सकता है, लोभ हो सकता है, क्रोध हो सकता है, भय हो सकता है और स्वार्थ भी। हमारे भीतर का अर्जुन भ्रमित और कमजोर हो सकता है। ऐसे में हमें अपने भीतर के श्रीकृष्ण को जगाना होगा-विवेक के रूप में, कर्म के रूप में, साहस के रूप में, प्रेम के रूप में और सत्य के रूप में। श्रीकृष्ण कोई बीता हुआ इतिहास नहीं हैं। वे भारतीय चेतना की सतत प्रवाहित जीवन-ऊर्जा हैं। वे केवल एक महानायक नहीं, बल्कि जीवन के महाप्रबंधक हैं। केवल धर्म के उपदेशक नहीं, बल्कि कर्म की प्रेरणा हैं। केवल बांसुरी की मधुर धुन नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध उठने वाला सुदर्शन भी हैं। श्रीकृष्ण एक व्यक्ति नहीं, एक दृष्टि हैं। श्रीकृष्ण एक कथा नहीं, एक चेतना हैं। श्रीकृष्ण केवल आराध्य नहीं, जीवन को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 17:01:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/shri-krishna-is-a-magnificent-confluence-of-divine-majesty-and-detachment</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Vrindavan Shaktipeeth: मां Katyayani Temple का पौराणिक इतिहास और महारास से जुड़ा दिव्य रहस्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mythological-history-of-maa-katyayani-temple-and-divine-mystery-associated-with-maharaas]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वृंदावन की पावन धरती मां कात्यायनी का शक्तिपीठ मंदिर है। यह मंदिर आस्था और प्रेम का बड़ा केंद्र माना जाता है। यहां पर स्वयं देवी राधा और गोपियों ने तपस्या की थी। वृंदावन का नाम आते ही मन में सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण की छवि उभर आती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ब्रज भूमि की रक्षा और यहां की अधिष्ठात्री देवी मां कात्यायनी हैं। वृंदावन के राधा बाग इलाके में स्थित मां कात्यायनी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है।</div><div><br></div><div>धार्मिक मान्यता के मुताबिक जब भगवान श्रीहरि विष्णु ने अपनी सुदर्शन चक्र से मां सती के शरीर के टुकड़े किए थे, तो देवी सती के केश यानी बाल इस स्थान पर गिरे थे। जिस कारण इसको उमा शक्तिपीठ भी कहा जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/from-puri-jagannath-to-bhalka-tirth-discover-secrets-of-lord-krishna-miraculous-temples" target="_blank">Famous Krishna Temple: Puri Jagannath से Bhalka Tirth तक, जानिए श्रीकृष्ण के चमत्कारी Temples का रहस्य</a></h3><div><br></div><h2>मंदिर का निर्माण</h2><div>इस मंदिर के निर्माण का इतिहास भी किसी चमत्कार से कम नहीं है। साल 1923 में स्वामी केशवानंद महाराज द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया गया था। स्वामी जी ने 33 सालों तक हिमालय की कंदराओं में कठिन तपस्या की थी। इस दौरान उनको एक दिव्य दृष्टि मिली, जिसमें उनको वृंदावन में इस लुप्त शक्तिपीठ को ढूंढने और मंदिर को स्थापित करने का आदेश मिला। स्वामी केशवानंद ने अपने योगबल से इस स्थान को पहचाना था। आज के समय में यह मंदिर भक्तों की आस्था का बड़ा केंद्र है।</div><div><br></div><h2>मंदिर की बनावट और मां की अष्टधातु की प्रतिमा</h2><div>यह मंदिर सफेद संगमरमर से बना है, जोकि देखने में काफी भव्य लगता है। मंदिर के मुख्य द्वार पर दो सुनहरे शेर खड़े हैं, जोकि मां की शक्ति का एहसास कराते हैं। मंदिर के गर्भगृह में मां कात्यायनी की अष्टधातु की विशाल प्रतिमा है और मां की चार भुजाएं हैं। दाहिनी भुजाओं में वर और अभय मुद्रा है। वहीं बाईं भुजाओं में कमल का पुष्प और तलवार है। मां कात्यायनी के अलावा यहां पर भगवान विष्णु, भोलेनाथ, गणेश जी और सूर्य देव की मूर्तियां भी हैं। जोकि इस मंदिर को पूर्ण पंचदेव मंदिर बनाती हैं।</div><div><br></div><h2>श्रीकृष्ण ने गोपियों के लिए रचाया 'महारास'</h2><div>इस मंदिर का संबंध द्वापर युग और भगवान श्रीकृष्ण से है। श्रीमद्भागवत पुराण के मुताबिक वृंदावन की गोपियों श्रीकृष्ण को अपने पति के रूप में पाना चाहती थीं। इसलिए लिए गोपियों ने पूरे कार्तिक माह यमुना नदी के किनारे मां कात्यायनी की बालू से मूर्ति बनाकर पूजा-अर्चना की थी।</div><div><br></div><div>गोपियों की भक्ति से प्रसन्न होकर मां कात्यायनी ने उनको वरदान दिया। इस वरदान के चलते शरद पूर्णिमा की रात श्रीकृष्ण ने 16,108 रूप धारण किए थे। वहीं हर गोपी के साथ रास रचाया था। धार्मिक मान्यता है कि जो भी कुंवारे युवक-युवतियां यहां आकर मां के दर्शन करते हैं, उनके विवाह में आने वाली परेशानी दूर होती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 16:21:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Famous Krishna Temple: Puri Jagannath से Bhalka Tirth तक, जानिए श्रीकृष्ण के चमत्कारी Temples का रहस्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/from-puri-jagannath-to-bhalka-tirth-discover-secrets-of-lord-krishna-miraculous-temples]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जन्माष्टमी के मौके पर भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। इस बार 04 सितंबर 2026 को जन्माष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है। इस दौरान देश के कृष्ण मंदिरों में एक खास तरह की रौनक और उमंग देखने को मिलती है। श्रीकृष्ण को समर्पित हर मंदिर की अपनी कुछ न कुछ खासियत है। उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक भगवान श्रीकृष्ण के खूबसूरत, विशाल और प्राचीन मंदिर हैं। ऐसे में अगर आप भी इस बार जन्माष्टमी के मौके पर इन मंदिरों के दर्शन करना चाहती हैं, तो यह आर्टिकल आपके लिए है। भगवान कृष्ण के इन चमत्कारी मंदिरों में दर्शन मात्र से किस्मत बदल जाती है।</div><div><br></div><h2>द्वारकाधीश मंदिर</h2><div>गुजरात के द्वारकाधीश मंदिर को जगत मंदिर भी कहा जाता है। द्वारकाधीश मंदिर चारधाम यात्रा का मुख्य हिस्सा है। चारों धामों से यह पश्चिमी धाम है। यह मंदिर गोमती क्रीक पर स्थित है, वहीं मंदिर 43 मीटर की ऊंचाई पर बना है। द्वारकाधीश मंदिर के दर्शन के बिना गुजरात में धार्मिक यात्रा को पूरा नहीं माना जाता है। जन्माष्टमी के मौके पर द्वारकाधीश मंदिर में उमंग भरा माहौल रहता है। वहीं इस मौके पर मंदिर के बेहद खास और खूबसूरत तरीके से सजाया जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/10-famous-krishna-temples-in-country-where-every-wish-of-devotees-fulfilled-offering-prayers" target="_blank">Famous Temple: देश के 10 Famous Krishna Temples जहां दर्शन मात्र से पूरी होती है भक्तों की हर मनोकामना</a><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></h3><div><br></div><h2>बांके बिहारी मंदिर</h2><div>वृंदावन में भगवान श्रीकृष्ण ने अपना बचपन बिताया था। वृंदावन का बांके बिहारी मंदिर फेमस और प्रीचीन है। यहां पर श्रीकृष्ण को बांके बिहारी कहा जाता है। जन्माष्टमी के दिन मंदिर में मंगला आरती होती है, फिर रात 2 बजे मंदिर के पट भक्तों के लिए खुलते हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि मंगला आरती साल में एक बार होती है। श्रीकृ्ष्ण के जन्म के बाद यहां पर भक्तों को कपड़े, खिलौने और अन्य दूसरी चीजें बेची जाती हैं।</div><div><br></div><h2>द्वारकाधीश मंदिर मथुरा</h2><div>द्वारकाधीश मंदिर मथुरा का दूसरा सबसे फेमस मंदिर है। इस मंदिर में श्रीकृ्ष्ण के काले रंग की प्रतिमा की पूजा होती है। लेकिन यहां पर राधा रानी की मूर्ति सफेद रंग की है। प्राचीन मंदिर होने की वजह से इसकी वास्तुकला भी भारत की प्राचीन वास्तुकला से प्रेरित है। जन्माष्टमी के पर्व पर यहां खास रौनक देखने को मिलती है। यहां पर इस दौरान भक्तों की भारी भीड़ होती है।</div><div><br></div><h2>श्रीकृष्ण मठ मंदिर</h2><div>यह कर्नाटक का सबसे फेमस मंदिर है। यहां पर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा खिड़की के 9 छिद्रों से की जाती है। यहां पर भक्तों का तांता लगा रहता है। वहीं जन्माष्टमी पर यहां पर विशेष रौनक देखने को मिलती है। पूरे मंदिर को लाइट्स और फूलों से सजाया जाता है। जन्माष्टमी के मौके पर दर्शन के लिए आपको 3 से 4 घंटे तक इंतजार करना पड़ सकता है।</div><div><br></div><h2>जगन्नाथ पुरी</h2><div>पुरी में स्थित मंदिर में भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। जन्माष्टमी के मौके पर यहां रौनक देखने लायक होती है। वहीं यहां की रथ यात्रा का विशेष महत्व होता है। रथ यात्रा में हिस्सा लेने से लिए देश-विदेश से भक्त पुरी आते हैं। रथ यात्रा के लिए तीन रथ तैयार किए जाते हैं। सबसे आगे बलराम जी का रथ, फिर देवी सुभद्रा का रथ और अंत में भगवान श्रीकृष्ण का रथ चलता है।</div><div><br></div><h2>बेट द्वारका मंदिर</h2><div>गुजरात में एक और फेमस मंदिर है, जिसको बेट द्वारका के नाम से जानते हैं। इसका नाम भेंट द्वारका है, लेकिन गुजरात में इसको बेट द्वारका कहा जाता है। इस नगरी का नाम दो कारण से भेंट पड़ा। मान्यता है कि इस जगह पर भगवान श्रीकृष्ण की मित्र सुदामा से भेंट हुई थी। इस मंदिर में श्रीकृष्ण और सुदामा की पूजा होती है। जब सुदामा श्रीकृष्ण से भेंट करने आए थे, तो अपने साथ चावल की एक पोटली लाए थे। इन चावलों को खाकर कृष्ण जी ने सुदामा की दरिद्रता को दूर किया था। इस वजह से आप भी यहां पर चावल दान करने की परंपरा है। मान्यता है कि यहां पर चावलों का दान करने से जातक कई जन्मों तक गरीब नहीं होता है।</div><div><br></div><h2>सांवलिया सेठ मंदिर</h2><div>भगवान कृष्ण को समर्पित यह मंदिर काफी फेमस है। यहां वह व्यापारी भगवान को अपना बिजनेस पार्टनर बनाने के लिए आते हैं। जिनको व्यापार में समस्याओं का सामना करना पड़ रहा होता है। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में स्थित इस मंदिर का संबंध मीराबाई से बताया जाता है। मीरा के गिरधर गोपाल को बिजनेस पार्टनर होने के कारण सांवलिया सेठ के नाम से भी जाना जाता है। यह सांवलिया सेठ ही मीराबाई के गिरधर गोपाल हैं।</div><div><br></div><h2>गुरु वायूर मंदिर</h2><div>पीएम नरेंद्र मोदी फिर सत्ता में आने के बाद सबसे पहले 8 जून को को यहां गुरु वायूर मंदिर में दर्शन के लिए आए थे। केरल के इस मंदिर का संबंध गुजरात से माना जाता है। गुरु वायूर मंदिर में श्रीकृष्ण के बाल रूप की पूजा होती है। वहीं मंदिर में विष्णु भगवान के 10 अवतारों को भी दिखाया गया है। गुरु वायूर मंदिर को दक्षिण की द्वारका और भूलोक के बैकुंठ के नाम से भी जाना जाता है। दिन में दो बार मंदिर में भक्तों के लिए फ्री में भंडारे की व्यवस्था है। वहीं यहां पर एकादशी का पर्व शिवेली बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस मंदिर का नाम पवनदेव वायु, देवताओं के गुरु बृहस्पति और ऊर यानी पृथ्वी के नाम से मिलकर बना है।</div><div><br></div><h2>भालका तीर्थ</h2><div>सोमनाथ में स्थित भालका तीर्थ वह जगह है, जहां पर पेड़ के नीचे ध्यान मग्न बैठे भगवान श्रीकृष्ण को शिकारी द्वारा हिरण के भ्रम में तीर मार दिया गया था। भालका तीर्थ वहीं स्थान है, जहां पर श्रीकृष्ण ने पृथ्वी को छोड़ दिया था और वह स्वर्ग चले गए थे। इस जगह को कपिला, हीरान और सरस्वती नदी का संगम कहा जाता है। श्रीकृष्ण के साथ ही उस बरगद के पेड़ को यह मंदिर समर्पित है।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 11:52:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/from-puri-jagannath-to-bhalka-tirth-discover-secrets-of-lord-krishna-miraculous-temples</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Famous Temple: देश के 10 Famous Krishna Temples जहां दर्शन मात्र से पूरी होती है भक्तों की हर मनोकामना]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/10-famous-krishna-temples-in-country-where-every-wish-of-devotees-fulfilled-offering-prayers]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पूरे देश में भगवान श्रीकृष्ण के अनगिनत मंदिर हैं। जहां पर आपको हर समय भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलेगी। इनमें से कुछ मंदिर बेहद खास हैं। वहीं 04 सितंबर 2026 को पूरे देश में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाएगा। इस बार 04 सितंबर 2026 को जन्माष्टमी का पर्व पड़ रहा है। ऐसे में अगर आप भी इस जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के कुछ बेहद खास मंदिरों के दर्शन करने के बारे में सोच रही हैं। तो यह आर्टिकल आपके लिए है। आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको भगवान श्रीकृष्ण के कुछ बेहद खास मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>जगन्नाथ पुरी मंदिर</h2><div>धार्मिक पुराणों में जगन्नाथ पुरी को धरती का बैकुंठ बताया गया है। जगन्नाथ मंदिर की महिमा सिर्फ देश ही नहीं बल्कि विदेश तक फैली है। पुरी में बना भगवान जगन्नाथ का मंदिर चार धामों में से एक है। यह मंदिर करीब 800 साल से ज्यादा पुराना है। इस मंदिर के शिखर पर लगा झंडा हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता है। वहीं जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर एक सुदर्शन चद्र भी है। इस सुदर्शन चक्र को आप किसी भी दिशा से खड़े होकर देखेंगे, आपको लगेगा कि चक्र का मुंह आपकी ओर है।</div><div><br></div><h2>प्रेम मंदिर</h2><div>वृंदावन का प्रेम मंदिर भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है। रात के समय भी यहां श्रद्धालुओं की भीड़ काफी ज्यादा होती है। प्रेम मंदिर की सजावट आकर्षण का केंद्र रहता है। रात के समय प्रेम मंदिर रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगाता रहता है। वहीं रोशनी का रंग हमेशा बदलता रहता है।</div><div><br></div><h2>इस्कॉन मंदिर</h2><div>वृंदावन का इस्कॉन मंदिर भी बेहद फेमस है। इस मंदिर में राधा-कृष्ण की बेहद मनोहारी प्रतिमा है। जो भी इनकी प्रतिमा को देखता है, वह मंत्रमुग्ध हो जाता है। यह मंदिर कृष्ण-बलराम मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। साल 1975 में इस मंदिर को बनाया गया था। वृंदावन के इस्कॉन मंदिर में श्रद्धालु झूमते-गाते हुए प्रभु की भक्ति और आराधना करते हैं। इस मंदिर में दर्शन के लिए विदेशी श्रद्धालु भी भारी तादात में आते हैं।</div><div><br></div><h2>द्वारकाधीश मंदिर</h2><div>मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर की आरती विशेष होती है। द्वारकाधीश मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की सुंदर मूर्ति विराजमान है। मथुरा में पावन यमुना नदी पर कई घाट बने है। भक्त इन घाटों पर पूजा-आराधना करते हैं। साथ ही लोग नौका विहार का भी आनंद उठाते हैं।</div><div><br></div><h2>श्रीनाथ जी मंदिर</h2><div>यह मंदिर राजस्थान के नाथद्वारा में है। श्रीनाथ जी मंदिर अपनी मूर्तियों के लिए जाना जाता है। माना जाता है कि इस मंदिर में मौजूद मूर्तियों को मेवाड़ के राजा गोवर्धन की पहाड़ियों से औरंगजेब से बचाकर लाए थे। श्रीनाथ जी मंदिर 12वीं शताब्दी में बनाया गया था। यह मंदिर भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है।</div><div><br></div><h2>इस्कॉन मंदिर</h2><div>बैंगलोर का इस्कॉन मंदिर भारत के सबसे बड़े इस्कॉन मंदिर में शामिल है। यह मंदिर साल 1997 में बनवाया गया था। इस मंदिर के निर्माण का उद्देश्य देश में वैदिक और धार्मिक सभ्यताओं को बढ़ावा देने का था। वहीं बुजुर्ग और विकलांग लोगों के लिए यहां पर एलिवेटर भी लगा है।</div><div><br></div><h2>श्री रंछोद्रीजी महाराज मंदिर</h2><div>श्री रंछोद्रीजी महाराज मंदिर गुजरात के गोमती नदी के किनारे दकोर के मुख्य बाजार के बीचो-बीच है। 1772 में मंदिर की संरचना मराठा नोबेल द्वारा की गई थी। इस मंदिर में 8 गुंबद और 24 बुर्ज हैं। जोकि सोने से बनी हैं। इस मंदिर के साथ ही मां लक्ष्मी की भी मंदिर है, धार्मिक मान्यता है कि हर शुक्रवार को भगवान श्रीकृष्ण लक्ष्मी मंदिर में मां लक्ष्मी से मिलने के लिए जाते हैं।</div><div><br></div><h2>अरुलमिगु श्री पार्थसारथी स्वामी मंदिर</h2><div>यह मंदिर 8वीं सदी में बनवाया गया था। अरुलमिगु श्री पार्थसारथी स्वामी मंदिर में भक्तों का आना-जाना लगा रहता है। वहीं मंदिर में भगवान श्रीहरि विष्णु की कई तरह की मूर्तियां हैं। जोकि भक्तों को सबसे ज्यादा अपनी ओर आकर्षित करती है।</div><div><br></div><h2>बालकृष्ण मंदिर</h2><div>कर्नाटक के हंपी में स्थित बालकृष्ण मंदिर की संरचना बेहद अनोखे तरीके से की गई है। इस मंदिर को यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल किया गया है। इस मंदिर में बालकृष्ण विराजमान हैं।</div><div><br></div><h2>उडुपी श्रीकृष्ण मठ</h2><div>कर्नाटक शहर में भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित एक फेमस मंदिर है। 13वीं सदी में इस मंदिर का निर्माण कराया गया था। इस मंदिर के पास एक तालाब मौजूद है, जिसके पानी में मंदिर का प्रतिबिंब दिखता है। भक्तों के लिए यह मंदिर बेहद पवित्र माना जाता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 01 Sep 2026 16:37:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/10-famous-krishna-temples-in-country-where-every-wish-of-devotees-fulfilled-offering-prayers</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Janmashtami 2026: Delhi-NCR के इन 3 भव्य मंदिरों में होगा कृष्ण जन्मोत्सव, Mahaprasad की है विशेष व्यवस्था]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/top-3-krishna-temples-in-delhi-ncr-for-janmashtami-2026]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कृष्ण जन्माष्टमी के आने में अब ज्यादा समय बचा नहीं। जन्माष्टमी के मौके पर देशभर के कृष्ण मंदिरों को फूलों से सजाया जाता है। इस दिन भगवान कृष्ण के बाल स्वरुप की झांकी सजाई जाती है। हर साल लोग जन्माष्टमी पर अपने परिवार के साथ श्री कृष्ण मंदिर के दर्शन करने जरुर जाते हैं। कान्हा का जन्मोत्सव होने के बाद भक्तजन प्रसाद पाने की उम्मीद जरुर लगाते हैं। दिल्ली में राधा-कृष्ण के ऐसे कई मंदिर है, जहां आपको प्रसाद के तौर पर धार्मिक सामग्री और सुविधाएं देखने को मिलती हैं।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">अगर आप इस बार जन्माष्टमी पर मंदिर जाने का प्लान बना रहे हैं, तो यह लेख आपके लिए है। आज इस आर्टिकल हम आपको दिल्ली-NCR के फेमस और बड़े कृष्ण मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं।</span></div><div><br></div><div><b>नोएडा सेक्टर 33 में स्थित इस्कॉन मंदिर, नोएडा</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">अगर आप नोएडा या उसके आसपास रहते हैं, तो आप नोएडा के सेक्टर 33 में स्थित इस मंदिर के दर्शन जरुर करें। यह मंदिर काफी लोकप्रिय है। यहां पर आपको जगन्नाथ, बलदेव और सुभद्रा के भी दर्शन हो जाएंगे। मंदिर में कृष्ण जी की लीलाओं से जुड़ी तस्वीरें लगी है, जिसे देखना अच्छा लगता है।</span></div><div><br></div><div>&nbsp; - मंदिर प्रत्येक दिन भगवान का श्रृंगार बदला जाता है और इन्हें सुंदर वस्त्र पहनाए जाते हैं।</div><div><br></div><div>&nbsp;- जन्माष्टमी के अवसर पर यहां खास धार्मिक कार्यक्रम और उत्सव मनाया जाता है।</div><div><br></div><div>&nbsp;- लोकेशन- A-5, महाराजा अग्रसेन मार्ग, सेक्टर 33, नोएडा।</div><div><br></div><div>&nbsp;- यदि आप यहां नोएडा सेक्टर 18 और नोएडा सेक्टर 61 मेट्रो स्टेशन से पहुंच सकते हैं।</div><div><br></div><div>&nbsp;- इस मंदिर में Mahaprasadam की सुविधा है, जो हजारों श्रद्धालुओं को परोसा जाता है। जन्माष्टमी के समय यहां पर प्रसाद बांटा जाता है।</div><div><br></div><div><b>श्री श्री राधा पार्थसारथी मंदिर, दिल्ली</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">दिल्ली में रहने वालों के लिए इस मंदिर का दर्शन करने के लिए जा सकते हैं। ईस्ट ऑफ कैलाश में स्थित इस्कॉन मंदिर जाना चाहिए। इस मंदिर को ही श्री श्री राधा पार्थसारथी मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर की स्थापना 1998 में हुई थी। इस्कॉन मंदिर में राधा-कृष्ण के साथ ही सीता-राम और लक्ष्मण हनुमान जी के दर्शन कर सकते हैं।</span></div><div><br></div><div>&nbsp;- जन्माष्टमी के मौके पर यहां आपको कृष्ण जन्म उत्सव, आरती और कीर्तन का माहौल देखने को मिलेगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>&nbsp;- शाम की आरती के समय मंदिर का माहौल एकदम भक्तिमय होता है।</div><div><br></div><div>&nbsp;- आप यहां पर जाने के लिए नेहरू प्लेस और कैलाश कॉलोनी मेट्रो स्टेशन से जा सकती हैं, दोनों वायलेट लाइन पर हैं।</div><div><br></div><div>&nbsp;- लोकेशन- हरे-कृष्ण हिल्स, संत नगर मेन रोड, ईस्ट ऑफ कैलाश।</div><div><br></div><div>&nbsp;- यहां प्रसाद में सूजी का हलवा, पंचामृत और भगवान को चढ़ा हुआ फूलों का हार भी मिल सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div><b>श्री श्री राधा दामोदर मंदिर, गुरुग्राम</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">गुरुग्राम के सेक्टर 67 में श्री श्री राधा दामोदर मंदिर स्थित है। यह मंदिर बेहद ही सुंदर है और इस मंदिर में आपको राजस्थानी वास्तुकला की झलक भी देखने को मिलेगी।</span></div><div><br></div><div>&nbsp;- पूरा मंदिर मकराना मार्बल से बना हुआ है।</div><div><br></div><div>&nbsp;- मंदिर परिसर में गोशाला और गोविंदा रेस्टोरेंट जैसी तमाम सुविधाएं दी गई हैं।</div><div><br></div><div>&nbsp; - मंदिर में आरती और कीर्तन होते रहते हैं। जन्माष्टमी के दिन यहां का नजारा काफी भक्तिमय होता है।</div><div><br></div><div>&nbsp;- मंदिर परिसर में प्रसाद वितरण की बड़ी व्यवस्था है।</div><div><br></div><div>&nbsp;- लोकेशन- गुरुग्राम-सोहना रोड, बादशाहपुर, सेक्टर 67। आप सेक्टर 55-56 मेट्रो स्टेशन से यहां पहुंच सकती हैं।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>&nbsp;- राजीव चौक से भी यहां बस से आया जा सकता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Sun, 30 Aug 2026 16:50:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/top-3-krishna-temples-in-delhi-ncr-for-janmashtami-2026</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Radha Krishna Mythology: आखिर सुदामा के श्राप से क्यों धरा पर अवतरित हुईं बरसाना की महारानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/why-after-all-queen-of-barsana-descend-to-earth-due-to-sudama-curse]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राधा रानी को प्रेम की देवी कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की धारा, राधा जी हैं। माना जाता है कि गोलोक में एक बार श्रीकृष्ण रास करने की इच्छा में लीन थे। तब भगवान श्रीकृष्ण के बाएं भाग से दिव्य स्वरूपा श्रीराधा प्रकट हुई थीं। भगवान श्रीकृष्ण ने धरा पर अधर्म का नाश करने के लिए पृथ्वी पर अवतार लिया था। लेकिन माना जाता है कि बिना श्रीराधा के वासुदेव कृष्ण के ध्येय को दिशा नहीं मिल सकती थी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि श्रीराधा रानी एक श्राप की वजह से श्रीकृष्ण से पहले धरती पर जन्मी थीं।</div><div><br></div><h2>पतिव्रता नारी थीं श्रीराधा</h2><div>राधा रानी के बिना श्रीकृष्ण की आराधना अधूरी मानी जाती है। भले ही राधा और कृष्ण ने संग में अधिक समय नहीं बिताया हो। लेकिन दोनों एक-दूसरे के दिल में हमेशा बसे रहे। राधा रानी एक पतिव्रता नारी थीं वह अपने पति आयन के प्रति पूरी तरह समर्पित रहीं। हालांकि श्रीकृष्ण के प्रति राधा रानी का प्रेम सात्विक और निश्छल था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/maa-baglamukhi-temple-special-this-sacred-shrine-in-himachal-pradesh-become-center-of-faith" target="_blank">Famous Temple: मां बगलामुखी मंदिर क्यों है खास, Celebs और VIPs की आस्था का केंद्र बना Himachal Pradesh का यह सिद्ध धाम</a></h3><div><br></div><h2>बरसाना की महारानी</h2><div>बरसाना राधा रानी की जन्मभूमि रही है। स्कंद पुराण के मुताबिक राधा और कृष्ण की आत्मा एक है। इसी कारण उनको 'राधारमण' कहकर पुकारते हैं। पद्म पुराण में 'परमानंद' रस को श्रीराधा-कृष्ण का युगल स्वरूप माना गया है। राधा-कृष्ण की पूजा किए बगैर जीव परमानंद को प्राप्त नहीं कर सकता है। भविष्य पुराण और गर्ग संहिता के मुताबिक द्वापर युग में श्रीकृष्ण पृथ्वी पर अवतरित हुए थे।</div><div><br></div><div>वहीं महाराज वृषभानु की पत्नी कीर्ति के यहां भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन भगवती राधा अवतरित हुई। जिसके बाद भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि राधाष्टमी नाम से प्रसिद्ध हुईं। राधा और कृष्ण को पद्म पुराण में 'युगल सरकार' की संज्ञा दी गई है। शिव पुराण में भगवान श्रीकृष्ण के परम मित्र से भिन्न सुदामा गोप द्वारा राधा रानी को श्राप दिए जाने का उल्लेख मिलता है।</div><div><br></div><h2>क्या था वो श्राप</h2><div>धार्मिक शास्त्रों के मुताबिक गोलोक में निवास करने वाली श्रीराधा को एक श्राप की वजह से पृथ्वी पर आकर श्रीकृष्ण से वियोग सहना पड़ा। श्रीकृष्ण की विरजा नाम की सखी का राधा ने अपमान किया था। अपमान से दुखी होकर विरजा नदी बनकर बहने लगी। तब सुदामा ने क्रोध में आकर श्रीराधा को कड़वे शब्द कहे। जिस पर श्रीराधा ने सुदामा को दानव बनने का श्राप दिया। इसके बाद सुदामा ने भी श्रीराधा को मानव जीवन में जन्म लेने का श्राप दिया।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 27 Aug 2026 10:52:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/why-after-all-queen-of-barsana-descend-to-earth-due-to-sudama-curse</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Famous Temple: मां बगलामुखी मंदिर क्यों है खास, Celebs और VIPs की आस्था का केंद्र बना Himachal Pradesh का यह सिद्ध धाम]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/maa-baglamukhi-temple-special-this-sacred-shrine-in-himachal-pradesh-become-center-of-faith]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बगलामुखी देवी का मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के बनखंडी में स्थित है। इसको पीतांबरा देवी के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू धर्म में देवी बगलामुखी का विशेष महत्व है और वह 10 महाविद्याओं में शामिल हैं। बगलामुखी को युद्ध की देवी भी कहा जाता है और तंत्र-साधना के लिए मां की पूजा होती है। धार्मिक मान्यता है कि जो भी जातक शत्रु और अज्ञात भय से परेशान होता है, वह मां बगलामुखी की पूजा करने से इन परेशानियों से मुक्त हो जाता है। वहीं जो व्यक्ति रोजाना बगलामुखी मां की चालीसा का पाठ करता है, वह अपने शत्रुओं पर विजय पाता है।</div><div><br></div><h2>बगलामुखी मंदिर</h2><div>यह मंदिर मां बगलामुखी को समर्पित है। मां बगलामुखी को 8वीं महाविद्या भी कहा जाता है। इनसे पीला रंग जुड़ा है, इसलिए इनका एक नाम पीतांबरा देवी भी है। धार्मिक मान्यता के मुताबित बगलामुखी मंदिर में पूजा-अर्चना करने मात्र से शत्रुओं की शक्ति कम होती है और वह असहाय हो जाते हैं। इस मंदिर में की जाने वाली पूजा कानूनी मामलों में जीत दिलाने के लिहाज से बेहद शक्तिशाली मानी जाती है। अक्सर भक्त इस धाम में आकर पंडितों से घरेलू कलह, अदालती मामलों, जमीन-जायदाद की समस्याओं और ग्रहों को शांत करने के शांति यज्ञ या सुझाव आदि लेते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-mahadev-himself-resides-in-madhya-pradesh-historic-matangeshwar-temple" target="_blank">Famous Temple: मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक Matangeshwar Temple में साक्षात महादेव, जानिए मंदिर का रोचक इतिहास</a></h3><div><br></div><div>मंदिर की मान्यता काफी ज्यादा है। यहां पर बड़े-बड़े सेलिब्रिटी दर्शन के लिए आते हैं। यहां पर गोविंदा, शिल्पा शेट्टी, कंगना रनौत और एकता कपूर जैसे सितारे बगलामुखी माता के मंदिर में हवन और पूजा करते हुए दिखाई देते हैं। सेलिब्रिटीज के लिए यहां VIP दर्शन की विशेष व्यवस्था की जाती है।</div><div><br></div><div>गर्मियों की छुट्टियों में मां बगलामुखी मंदिर में हजारों की संख्या में भक्त पहुंचते हैं। खासकर पंजाब राज्य के श्रद्धालुओं में मां के प्रति गहरी आस्था है। भक्तों को मां बगलामुखी मंदिर में आकर एक अलग ही सुकून मिलता है। वहीं इस मंदिर में आम भक्तों से लेकर सेलिब्रिटी और नेता भी दर्शन करने आते हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 26 Aug 2026 14:24:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/maa-baglamukhi-temple-special-this-sacred-shrine-in-himachal-pradesh-become-center-of-faith</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Famous Temple: मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक Matangeshwar Temple में साक्षात महादेव, जानिए मंदिर का रोचक इतिहास]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-mahadev-himself-resides-in-madhya-pradesh-historic-matangeshwar-temple]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वैसे तो मध्य प्रदेश में कई फेमस मंदिर हैं, जिनकी अपनी-अपनी खासियत है। लेकिन आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जोकि साधारण नहीं है। मध्य प्रदेश में स्थित इस मंदिर की खासियत जानकर आप भी हैरान रह जाएंगी। यहां फेमस शिव मंदिर में एक ऐसा शिवलिंग है, जो हर साल 1 इंच बढ़ता है। ऐसे में अगर आप भी इस रहस्यमयी मंदिर के बारे में जानना चाहती हैं, तो यह आर्टिकल आपके लिए है। हम आपको इस मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>MP का मतंगेश्वर महादेव मंदिर</h2><div>मध्य प्रदेश के खुजराहो में एक फेमस शिव मंदिर है। यह कोई साधारण मंदिर नहीं है। बल्कि यहां स्थिति महादेव मंदिर में स्थापित शिवलिंग हर साल थोड़ा-थोड़ा बढ़ता है। यहां मंदिर में मौजूद पीतल-कास्य से ढका शिवलिंग करीब 9 फीट ऊंचा है। महादेव मंदिर की बनावट ऊंचे चबूतरे जैसी है। इस मंदिर के ऊपर बने ऊंचे-ऊंचे 'शिखर' कैलाश पर्वत का प्रतीक माने जाते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mystery-behind-narmadeshwar-shivling-why-every-stone-from-narmada-river-considered-lord-shiva" target="_blank">Narmadeshwar Shivling के पीछे का रहस्य, क्यों Narmada River का हर पत्थर माना जाता है शिव स्वरूप</a></h3><div><br></div><h2>10वीं शताब्दी में हुआ था निर्माण</h2><div>यूनेस्को के मुताबिक मतंगेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण 10वीं शताब्दी में हुआ था। इसको चंदेल वंश के राजा हर्षदेव के शासनकाल में बनवाया गया था। यह खुजराहो के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। यहां पर महाशिवरात्रि के मौके पर 3 दिनों तक भव्य मेला लगता है। यहां पर इस दौरान भोलेनाथ का जलाभिषेक और विशेष श्रृंगार होता है।</div><div><br></div><h2>कब जाना रहेगा सही</h2><div>अगर आप भी मंदिर दर्शन का प्लान बना रही हैं। तो सुबह सबसे पहले मतंगेश्वर मंदिर में दर्शन करें। फिर टिकट लेकर आसपास के ऐतिहासिक मंदिरों को एक्सप्लोर करें। यहां पर जाने का बेस्ट समय अक्तूबर से मार्च तक का है। वहीं सावन में भी यहां का मौसम सुहावना रहता है। मंदिर और ऐतिहासिक जगहों के अलावा आसपास आपको लोकल वेंडर्स और छोटे कैफे से आप बुंदेलखंडी खाने का लुत्फ उठा सकती हैं।</div><div><br></div><h2>कैसे पहुंचे मतंगेश्वर महादेव मंदिर</h2><div>अगर आप भी खुजराहो के मतंगेश्वर महादेव मंदिर जाने का मन बना रही हैं। तो आपको अपने किसी भी नजदीकी एयरपोर्ट से खुजराहो एयरपोर्ट पहुंचना होगा। अगर आप ट्रेन से जाती हैं, तो खुजराहो रेलवे स्टेशन तक जाएं। स्टेशन से पर्सनल कैब या ऑटो-रिक्शा करके मंदिर पहुंच सकती हैं। इसके अलावा सड़ग मार्ग से भी आप यहां तक आ सकती हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 25 Aug 2026 11:32:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-mahadev-himself-resides-in-madhya-pradesh-historic-matangeshwar-temple</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Narmadeshwar Shivling के पीछे का रहस्य, क्यों Narmada River का हर पत्थर माना जाता है शिव स्वरूप]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mystery-behind-narmadeshwar-shivling-why-every-stone-from-narmada-river-considered-lord-shiva]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत की कुछ नदियों को बेहद पवित्र माना जाता है। इन नदियों का उल्लेख किसी देवी की तरह धार्मिक शास्त्रों और पुराणों में मिलता है। नर्मदा नदी को भी उन्हीं नदियों में से एक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि नर्मदा का हर कंकड़ भोलेनाथ का स्वरूप होता है। इसलिए यहां पर मिलने वाले प्राकृतिक शिवलिंगों को 'नर्मदेश्वर शिवलिंग' कहा जाता है।</div><div><br></div><div>देशभर में इन शिवलिंगों की पूजा मंदिरों और घरों में की जाती है। इसके अलावा इसके पीछे एक बेहद रोचक पौराणिक कथा है। जिसका उल्लेख 'स्कंद पुराण', 'वायु पुराण' के रेवा खंड, 'नर्मदा माहात्म्य' और 'मत्स्य पुराण' में मिलता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/women-rule-these-temples-there-strict-ban-on-entry-of-men-during-rituals" target="_blank">Mysterious Temple: इन मंदिरों में चलता है महिलाओं का राज, Rituals के दौरान पुरुषों के प्रवेश पर लगा है कड़ा प्रतिबंध</a></h3><div><br></div><h2>नर्मदा ने किया था कठोर तप</h2><div>पौराणिक कथा के मुताबिक, मां नर्मदा ने कई सालों तक कठोर तपस्या की है। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ब्रह्माजी प्रकट हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा। देवी नर्मदा ने कहा, 'मुझे मां गंगा नदी की लोकप्रिय होना है।' मैं चाहती हूं कि दुनियाभर में मुझे भी गंगा की तरह की महान समझा जाए और नर्मदा जी की पूजा की जाए। भगवान शिव देवी नर्मदा को अपनी जटाओं में स्थान दें।</div><div><br></div><div>मां नर्मदा की बात सुनकर ब्रह्माजी मुस्कुराए और कहा, 'जिस दिन कोई दूसरा देवता भोलेनाथ के समान हो जाएगा।' कोई दूसरा पुरुष भगवान विष्णु की बराबरी कर लेगा, कोई दूसरी स्त्री देवी पार्वती के समान होगी और कोई दूसरी नगरी काशी के बराबर मोक्षदायिनी हो जाएगी। उस दिन कोई दूसरी नदी भी गंगा के समान हो सकती है।</div><div><br></div><h2>महादेव को पाने के लिए किया था कठोर तप</h2><div>ब्रह्मदेव की बातें सुनकर देवी नर्मदा समझ गईं कि उनको यह वरदान नहीं मिल सकता है। ऐसे में उन्होंने बिना किसी शिकायत के अपनी इच्छा को छोड़ दिया और काशी चली गईं। वहीं पर पिलपिला तीर्थ में एक शिवलिंग की स्थापना की और शिवजी के कठोर तपस्या करना शुरूकर दी। देवी नर्मदा की भक्ति और समर्पण से भोलेनाथ बेहद प्रसन्न हुए और उनको दर्शन दिया। महादेव ने कहा कि देवी नर्मदा मैं आपकी तपस्या से प्रसन्न हूं, जो चाहे वरदान मांगो।</div><div><br></div><div>जिस पर देवी नर्मदा ने कहा कि सब मोह-माया को पीछे छोड़कर मैं आपके चरणों में स्थान पाऊं। देवी नर्मदा की इच्छा को जानकर भगवान शिव प्रसन्न हुए कि उनको ऐसा आर्शीवाद दिया कि देवी नर्मदा का स्थान सभी देवी-देवताओं जितना ऊंचा हो गया।</div><div><br></div><h2>भगवान शिव ने दिया वरदान</h2><div>भोलेनाथ ने मां नर्मदा को वरदान देते हुए कहा कि नर्मदा के तट पर जितने भी पत्थर होंगे, वह सभी शिवलिंग स्वरूप माने जाएंगे। तुम्हारे किनारे मिलने वाले यह पत्थर हर युग में नर्मदेश्वर शिवलिंग के रूप में पूजे जाएंगे। भोलेनाथ ने कहा कि गंगा नदी में स्नान करने से पाप नष्ट होते हैं, यमुना में सात दिन स्नान करने और सरस्वती में 3 दिन स्नान करने से पापों का नाश होता है। लेकिन नर्मदा नदी के दर्शन मात्र से भक्तों के पाप दूर होंगे।</div><div><br></div><div>वहीं नर्मदा द्वारा स्थापित नर्मदेश्वर शिवलिंग लोगों को पुण्य और मोक्ष प्रदान करेंगे। इसके बाद भोलेनाथ भी उसी शिवलिंग में लीन हो गए। तभी से नर्मदा नदी का हर पत्थर शिवलिंग का आकार लिए हुए होता है। वहीं तब से ही यह मान्यता प्रचलित हुई कि इस नदी का हर पत्थर शिव का स्वरूप है।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 24 Aug 2026 12:57:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mystery-behind-narmadeshwar-shivling-why-every-stone-from-narmada-river-considered-lord-shiva</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mysterious Temple: इन मंदिरों में चलता है महिलाओं का राज, Rituals के दौरान पुरुषों के प्रवेश पर लगा है कड़ा प्रतिबंध]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/women-rule-these-temples-there-strict-ban-on-entry-of-men-during-rituals]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>शायद आपने उन मंदिरों के बारे में तो सुना ही होगा, जहां पर महिलाओं का जाना वर्जित है। लेकिन क्या आपने कभी ऐसे मंदिर के बारे में सुना है, जहां पर पुरुषों का जाना वर्जित हो। भले ही आपको यह बात सुनने में हैरान करने वाली और थोड़ी अटपटी जरूर लगे। लेकिन ऐसा एक रहस्यमयी मंदिर है, जहां पर पुरुषों का जाना वर्जित है। इसलिए आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको उस मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं। साथ ही इसके पीछे के कारण के बारे में भी जानेंगे।</div><div><br></div><h2>केरल का अट्टुकल भगवती मंदिर</h2><div>केरल का फेमस अट्टुकल भगवती मंदिर जहां पर पोंगल उत्सव के समय हजारों की संख्या में महिलाएं प्रसाद को तैयार करने के लिए एकत्र होती है। इस दिन पुरुषों को मंदिर परिसर में प्रवेश करने की मनाही होती है। हालांकि यह पूर्ण तरीके से प्रतिबंध नहीं है। लेकिन एक सामान्य भूमिकाओं का एक अनुष्ठानिक निलंबन है। जोकि महिलाओं को आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र में निर्बोध रूप से रहने की अनुमति देता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/gujarat-city-of-temples-where-staying-overnight-forbidden-know-spiritual-and-divine-mysteries" target="_blank">Famous Temple: गुजरात का वो 'City of Temples' जहां रात में रुकना है मना, जानें इसके Spiritual और दिव्य रहस्य</a></h3><div><br></div><h2>चक्कुलाथुकावु मंदिर केरल</h2><div>केरल के देव भगवती को समर्पित इस मंदिर में नारी पूजा नाम से वार्षिक अनुष्ठान आयोजित किया जाता है। इसका मतलब है कि महिलाओं की पूजा से, उस दिन पुरुषों का मंदिर में प्रवेश वर्जित माना जाता है।</div><div><br></div><div>नारी पूजा के समय महिलाएं व्रत करने के साथ एकत्रित होती हैं। वहीं पुरुष पुजारी उनके पैरों को धोता है। जो सत्ता के पारंपरिक उल्टे क्रम को दिखाता है।</div><div><br></div><h2>असम का कामाख्या मंदिर</h2><div>महान शक्तिपीठों में से एक मां कामाख्या मंदिर भी नारी शरीर से गहराई से जुड़ा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां सती की योनि यहां पर गिरी थी।</div><div><br></div><div>अंबुबाची मेले के दौरान देवी कामाख्या को मासिक धर्म होता है, इस दौरान मंदिर को तीन दिन के लिए बंद कर दिया जाता है और पुरुषों को मंदिर जाने की अनुमति नहीं होती है।</div><div><br></div><h2>तमिलनाडु का कुमारी अम्मन मंदिर</h2><div>कन्याकुमारी मंदिर कन्या कुंवारी दु्र्गा को समर्पित है। परंपराओं के मुताबिक विवाहित पुरुषों को गर्भगृह में अंदर जाने की अनुमति नहीं है। सिर्फ ब्रह्मचारी पुरुष या फिर संन्यासी ही पास जा सकते हैं।</div><div><br></div><div>पुरुषों का तिरस्कार करने के लिए यह नियम नहीं बनाए गए हैं, बल्कि ब्रह्मचर्य, भक्ति और आध्यात्मिक वैराग्य की पवित्रता को बनाए रखने के लिए है।</div><div><br></div><h2>राजस्थान का ब्रह्मा मंदिर</h2><div>राजस्थान के पुष्कर में स्थित ब्रह्मा मंदिर विवाहित पुरुषों को गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति नहीं देता है। पौराणि कथाओं के मुताबिक जब भगवान ब्रह्मा ने देवी गायत्री से विवाह किया था, तो देवी सरस्वती ने ब्रह्मा जी को श्राप दिया और यह आदेश दिया कि मंदिर में कभी विवाहित पुरुष मंदिर में प्रवेश नहीं कर पाएंगे।</div><div><br></div><div>यह प्रतिबंध स्त्री शरीर के बारे में नहीं बल्कि खुद विवाह के बारे में है। जो भक्तों की व्यक्तिगत स्थिति को मंदिर की आध्यात्मिक संरचना से जोड़ने का काम करता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 11:31:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/women-rule-these-temples-there-strict-ban-on-entry-of-men-during-rituals</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Famous Temple: गुजरात का वो 'City of Temples' जहां रात में रुकना है मना, जानें इसके Spiritual और दिव्य रहस्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/gujarat-city-of-temples-where-staying-overnight-forbidden-know-spiritual-and-divine-mysteries]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत का गुजरात राज्य अपने आप में ही अनोखा और समृद्ध माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गुजरात के भावनगर जिले में शत्रुंजय पहाड़ियों की गोद में बसा पालिताणा एक ऐसी अनोखी जगह है। जिसको मंदिरों के शहर के नाम से जाना जाता है। पूर्व में यह स्थान पादलिप्तपुर नाम से फेमस था। यह शहर जैन धर्म के अनुयायियों के लिए अटूट आस्था का केंद्र माना जाता है। इस जगह की खासियत यह है कि यहां पर 800 से ज्यादा संगमरमर के मंदिर मौजूद हैं। इसी वजह से इसको मंदिरों का शहर कहा जाता है। तो आइए जानते हैं गुजरात के पालीताणा मंदिर की खासियत के बारे में...</div><div><br></div><h2>यहां हैं 800 से ज्यादा भव्य मंदिर</h2><div>माना जाता है कि जैन धर्म के लोगों में अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार इन मंदिरों के दर्शन करना निर्वाण या फिर मोक्ष के लिए जरूरी है। शत्रुंजय पहाड़ी पर स्थित यह स्थल इतना अधिक विशाल और भव्य है कि यहां पर करीब 836 संगमरमर से तराशे मंदिर हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/fact-behind-saas-bahu-name-given-to-lord-vishnu-sahastrabahu-temple-know-full-story" target="_blank">Unique Temple: भगवान विष्णु के सहस्त्रबाहु मंदिर का 'सास-बहू' नाम पड़ने के पीछे क्या है Fact? जानें पूरा सच</a></h3><div><br></div><div>इन मंदिरों तक पहुंचने का सफर भी किसी तपस्या से कम नहीं माना जाता है। क्योंकि मुख्य मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को करीब 3500 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। यह जगह इसलिए भी खास है, क्योंकि मान्यता के हिसाब से 24 में से 23 तीर्थकरों ने यहां आकर इस अपनी उपस्थिति से इस पहाड़ी को पावन किया था।</div><div><br></div><h2>रात को रुकना है मना</h2><div>पालिताणा की सबसे अनोखी बात को जानकर आपको हैरानी होगी। दरअसल, यह स्थान पूरी तरह से देवताओं का निवास स्थान माना गया है। यही वजह है कि यहां पर सूर्यास्त के बाद किसी भी इंसान को रात गुजारने की अनुमति नहीं है। यहां तक कि मंदिर की सेवा करने वाले पुजारियों को भी यहां पर रात में रुकने की मनाही है। सदियों से यह परंपरा इस स्थान की दिव्यता और पवित्रता को बनाए रखने के लिए चली आ रही है।</div><div><br></div><h2>जानें धार्मिक महत्व</h2><div>बता दें कि पहाड़ी पर बना मुख्य मंदिर प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव जी को समर्पित है। यह श्वेतांबर मूर्तिपूजक संप्रदाय के लिए सबसे अधिक पवित्र स्थान माना जाता है। हालांकि यहां पर दिगंबर जैन समुदाय का भी एक मंदिर है। यह पूरा क्षेत्र न सिर्फ धार्मिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है, बल्कि यह अपनी अद्भुत नक्काशी और वास्तुकला के लिए भी पूरी दुनिया में जाना जाता है।</div><div><br></div><h2>ऐसे पहुंचें पालिताणा</h2><div>अगर आप भी इस पावन नगरी की यात्रा करना चाहते हैं, तो बता दें कि यहां तक पहुंचना बेहद आसान है।</div><div><br></div><div>यहां का सबसे नजदीकी हवाई अड्डा भावनगर एयरपोर्ट है। जोकि पालिताणा से सिर्फ 55 किमी दूर पर स्थित है।</div><div><br></div><div>वहीं अगर आप ट्रेन से आना चाहते हैं, तो ये शहर भावनगर और मुंबई जैसे प्रमुख शहरों से रेल से अच्छे से जुड़ा है।</div><div><br></div><div>वहीं गुजरात के सभी प्रमुख शहरों से पालिताणा के लिए बेहतरीन सड़क कनेक्टिविटी भी मौजूद है।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 20 Aug 2026 13:41:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/gujarat-city-of-temples-where-staying-overnight-forbidden-know-spiritual-and-divine-mysteries</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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