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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[Char Dham Yatra: बद्रीनाथ के पास व्यास गुफा-भीम पुल जैसे 5 Divine स्पॉट्स जरूर देखें]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/5-must-visit-spiritual-sites-near-badrinath]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>चारधाम की यात्रा शुरु हो चुकी है। बद्रीनाथ धाम के कपाट 23 अप्रैल 2026 को खुल चुके हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, बद्रीनाथ के दर्शन करने से व्यक्ति जन्म मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। ऐसे में बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलते ही यहां लाखों की संख्या में भक्त दर्शन के लिए आते हैं।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">बद्रीनाथ कपाट खुलते ही लोगों ने यहां पर दर्शन करने के लिए प्लान बनाना शुरु कर दिया होगा। हर साल यहां पर लाखों की संख्या में भक्त दर्शन के लिए आते हैं। बद्रीनाथ के पास ऐसे कई स्थान मौजूद है जिनको शास्त्रों व पौराणिक कथाओं में रहस्यमयी और चमत्कारी बताया है। आइए आपको बताते हैं बद्रीनाथ के पास आप किन जगहों के दर्शन करने के लिए जा सकते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>भविष्य बद्री</b></div><div><br></div><div>बद्रीनाथ धाम के दर्शन करने के बारे में प्लान बना रहे हैं, तो आप यहां मौजूद भविष्य बद्री के दर्शन करने जरुर जाएं। इसे भविष्य का बद्रीनाथ भी कहा जाता है, जो जोशीमठ से थोड़ी दूरी पर स्थित है। इसके पीछे धार्मिक मान्यता है कि जब कलयुग अपने चरम पर होगा, तो नर और नारायण पर्वत आपस में मिल जाएंगे। जिसके बाद बद्रीनाथ पहुंचना संभव नहीं होगा। तब भविष्य बद्री में ही बद्रीनाथ विराजमान रहेंगे।</div><div><br></div><div><b>श्री वेद व्यास गुफा</b></div><div><br></div><div>मान्यता है कि महर्षि व्यास ने इसी गुफा में तपस्या करते हुए चारों वेदों और गीता का संकलन किया था, इसी वजह से इसका नाम व्यास गुफा पड़ा। कहा जाता है कि यह गुफा लगभग 5 हजार साल पुरानी और अत्यंत पवित्र मानी जाती है। इसकी छत की बनावट ऐसी है, जैसे किसी किताब के पन्ने एक के ऊपर एक रखे हों। इसी कारण इसे ‘व्यास पुस्तक’ के नाम से भी पुकारा जाता है। लोककथाओं के अनुसार, समय के साथ यह दिव्य पुस्तक पत्थर का रूप ले चुकी है।</div><div><br></div><div><b>भीम पुल</b></div><div><br></div><div>बद्रीनाथ मंदिर जाने के साथ-साथ आप भीम पुल के दर्शन भी कर सकते हैं। यह माना गांव के पास सरस्वती नदी के झरने पर स्थित है। धार्मिक मान्यताओं और प्राचीन कथाओं के अनुसार, महाभारत काल में जब पांडव द्रौपदी के साथ स्वर्ग की यात्रा पर निकले थे, तब उनके मार्ग में यह नदी आई थी। उस समय भीम ने द्रौपदी को पार कराने के लिए एक बड़ा पत्थर उठाकर नदी पर रख दिया, जिससे रास्ता आसान हो गया। ऐसा भी कहा जाता है कि नदी के किनारे जो लगभग 20 फीट लंबे पदचिह्न नजर आते हैं, उन्हें भीम के पैरों के निशान माना जाता है।</div><div><br></div><div><b>वसुधारा झरना</b></div><div><br></div><div>बद्रीनाथ से लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर यह पवित्र स्थित है। वसुधारा को बहुत ही पवित्र स्थान माना जाता है। वसुधारा झरने का पानी करीब 400 फीट की ऊंचाई से नीचे गिरता है। कहा जाता है कि इसकी धारा खूबसूरत मोतियों जैसी है जो स्वर्ग में होने का अहसास कराती है। मान्यता है कि जिस व्यक्ति पर पाप का बोझ होता है, उस पर इस झरने की एक भी बूंद नहीं गिरती। स्थानीय लोगों के अनुसार, केवल वही व्यक्ति इसकी बूंदों को महसूस कर पाता है, जिसका मन और कर्म शुद्ध होते हैं।</div><div><br></div><div><b>तप्त कुंड</b></div><div><br></div><div>बद्रीनाथ मंदिर के पास अलकनंदा नदी के पवित्र तट पर एक प्राकृतिक गर्म पानी का कुंड मौजूद है। श्रद्धालु बद्रीनाथ धाम के दर्शन करने से पहले इस कुंड में स्नान करने जरुर आते हैं। माना जाता है कि इस पवित्र कुंड में स्नान करने का खास महत्व बताया जाता है और इसके साथ पानी को औषधीय गुणों से भरपूर माने जाते हैं, जिसमें स्नान करने से हेल्थ संबंधित समस्याएं दूर हो जाती है।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 25 Apr 2026 17:54:09 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/5-must-visit-spiritual-sites-near-badrinath</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Vishnu Chalisa Path: Vishnu Chalisa का Powerful पाठ देगा Success, Life की हर Problem होगी दूर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/powerful-recitation-of-vishnu-chalisa-bring-success-every-problem-of-life-solved]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में गुरुवार का दिन जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित होता है। इस दिन लोग व्रत और भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करते हैं। गुरुवार का व्रत और पूजा करने से जातक की मनोकामनाएं जल्दी ही पूरी होती हैं। वहीं भगवान विष्णु की कृपा से धन-धान्य में वृद्धि होती है। वहीं अगर आप भी भगवान विष्णु की कृपा और आशीर्वाद पाना चाहते हैं, तो आपको रोजाना विष्णु चालीसा का पाठ करना चाहिए। </div><div>&nbsp;</div><div>जो भी व्यक्ति रोजाना नियमित रूप से विष्णु चालीसा का पाठ करता है, उसके सुख-सौभाग्य में वृद्धि होती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको विष्णु चालीसा के पाठ के बारे में बताने जा रहे हैं। साथ ही विष्णु चालीसा का पाठ करने से मिलने वाले लाभों के बारे में भी जानेंगे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/from-mathura-vrindavan-to-dwarka-these-nine-abodes-of-lord-krishna-filled-with-divinity" target="_blank">Shri Krishna Famous Temples: मथुरा-वृंदावन से द्वारका तक, कान्हा के इन 9 धामों में बसती है दिव्यता</a></h3><div><br></div><h2>विष्णु चालीसा का पाठ</h2><div><br></div><h2>दोहा</h2><div>विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय ।</div><div>कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय ॥</div><div><br></div><div>नमो विष्णु भगवान खरारी, कष्ट नशावन अखिल बिहारी ।</div><div>प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी, त्रिभुवन फैल रही उजियारी ॥</div><div><br></div><div>सुन्दर रूप मनोहर सूरत, सरल स्वभाव मोहनी मूरत ।</div><div>तन पर पीताम्बर अति सोहत, बैजन्ती माला मन मोहत ॥</div><div><br></div><div>शंख चक्र कर गदा विराजे, देखत दैत्य असुर दल भाजे ।</div><div>सत्य धर्म मद लोभ न गाजे, काम क्रोध मद लोभ न छाजे ॥</div><div><br></div><div>सन्तभक्त सज्जन मनरंजन, दनुज असुर दुष्टन दल गंजन ।</div><div>सुख उपजाय कष्ट सब भंजन, दोष मिटाय करत जन सज्जन ॥</div><div><br></div><div>पाप काट भव सिन्धु उतारण, कष्ट नाशकर भक्त उबारण ।</div><div>करत अनेक रूप प्रभु धारण, केवल आप भक्ति के कारण ॥</div><div><br></div><div>धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा, तब तुम रूप राम का धारा ।</div><div>भार उतार असुर दल मारा, रावण आदिक को संहारा ॥</div><div><br></div><div>आप वाराह रूप बनाया, हिरण्याक्ष को मार गिराया ।</div><div>धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया, चौदह रतनन को निकलाया ॥</div><div><br></div><div>अमिलख असुरन द्वन्द मचाया, रूप मोहनी आप दिखाया ।</div><div>देवन को अमृत पान कराया, असुरन को छवि से बहलाया ॥</div><div><br></div><div>कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया, मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया ।</div><div>शंकर का तुम फन्द छुड़ाया, भस्मासुर को रूप दिखाया ॥</div><div><br></div><div>वेदन को जब असुर डुबाया, कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया ।</div><div>मोहित बनकर खलहि नचाया, उसही कर से भस्म कराया ॥</div><div><br></div><div>असुर जलन्धर अति बलदाई, शंकर से उन कीन्ह लड़ाई ।</div><div>हार पार शिव सकल बनाई, कीन सती से छल खल जाई ॥</div><div><br></div><div>सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी, बतलाई सब विपत कहानी ।</div><div>तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी, वृन्दा की सब सुरति भुलानी ॥</div><div><br></div><div>देखत तीन दनुज शैतानी, वृन्दा आय तुम्हें लपटानी ।</div><div>हो स्पर्श धर्म क्षति मानी, हना असुर उर शिव शैतानी ॥</div><div><br></div><div>तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे, हिरणाकुश आदिक खल मारे ।</div><div>गणिका और अजामिल तारे, बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे ॥</div><div><br></div><div>हरहु सकल संताप हमारे, कृपा करहु हरि सिरजन हारे ।</div><div>देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे, दीन बन्धु भक्तन हितकारे ॥</div><div><br></div><div>चाहता आपका सेवक दर्शन, करहु दया अपनी मधुसूदन ।</div><div>जानूं नहीं योग्य जब पूजन, होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन ॥</div><div><br></div><div>शीलदया सन्तोष सुलक्षण, विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण ।</div><div>करहुं आपका किस विधि पूजन, कुमति विलोक होत दुख भीषण ॥</div><div><br></div><div>करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण, कौन भांति मैं करहु समर्पण ।</div><div>सुर मुनि करत सदा सेवकाई, हर्षित रहत परम गति पाई ॥</div><div><br></div><div>दीन दुखिन पर सदा सहाई, निज जन जान लेव अपनाई ।</div><div>पाप दोष संताप नशाओ, भव बन्धन से मुक्त कराओ ॥</div><div><br></div><div>सुत सम्पति दे सुख उपजाओ, निज चरनन का दास बनाओ ।</div><div>निगम सदा ये विनय सुनावै, पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै ॥</div><div><br></div><div>॥ इति श्री विष्णु चालीसा ॥</div><div><br></div><h2>विष्णु चालीसा के लाभ</h2><div>विष्णु चालीसा का पाठ करने से तनाव और चिंता से मुक्ति मिलती है।</div><div>इसके नियमित पाठ से रोगों से बचाव होता है और स्वास्थ्य उत्तम बना रहता है।</div><div>वहीं आर्थिक स्थिरता और सफलता मिलती है।</div><div>जो भी जातक विष्णु चालीसा का नियमित पाठ करता है, उसको शत्रुओं पर विजय मिलती है।</div><div>विष्णु चालीसा का पाठ करने से पूर्व जन्म के पापों का नाश होता है।</div><div>व्यक्ति को सांसारिक बंधनों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 11:46:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/powerful-recitation-of-vishnu-chalisa-bring-success-every-problem-of-life-solved</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Shri Krishna Famous Temples: मथुरा-वृंदावन से द्वारका तक, कान्हा के इन 9 धामों में बसती है दिव्यता]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/from-mathura-vrindavan-to-dwarka-these-nine-abodes-of-lord-krishna-filled-with-divinity]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>महाभारत और पुराणों में भगवान श्रीकृष्ण का जीवनकाल 125 साल का बताया गया है। लेकिन अपने जीवनकाल में शायद ही श्रीकृष्ण लंबे समय तक एक स्थान पर रहे हों। भगवान श्रीकृष्ण का जीवन अलग-अलग चरणों में बीता। खतरे के माहौल को देखते हुए बचपन छिपकर बिताया। यौवन काल प्रेम और विरह से भरा, वयस्क जीवन जिम्मेदारियों से भरा और आखिर में वैराग्य और एकांत से जुड़ी यादें। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको जन्म से लेकर वैराग्य तक भगवान श्रीकृष्ण के 9 पवित्र धाम के बारे में बताने जा रहे हैं। जहां पर आज भी दिव्यता गूंजती है।</div><div><br></div><h2>मथुरा</h2><div>भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ था।&nbsp;</div><div>यहां पर भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मंदिर और विश्राम घाट है।</div><div>उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में श्रीकृष्ण जन्मभूमि है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/400-year-old-shiva-temple-mysterious-stream-flows-from-mouth-of-nandi" target="_blank">Mysterious Shiv Mandir: 400 साल पुराना अद्भुत Shiv Mandir, नंदी के मुख से बहती है Mysterious धारा, स्रोत आज भी अज्ञात</a></h3><div><br></div><h2>गोकुल</h2><div>जन्म के बाद श्रीकृष्ण का पालन-पोषण नंद बाबा के घर गोकुल में ही हुआ था।</div><div>यहां के मुख्य स्थल नंद भवन और रमणरेती है।</div><div>आज भी यहां की गलियां बाल कृष्ण की लीलाओं की गवाही देती है।</div><div>यहां पर आज भी मां यशोदा की लोरियां और घर-घर में श्रीकृष्ण के माखन चुराने की कथाएं प्रचलित हैं।</div><div><br></div><h2>वृंदावन</h2><div>वृंदावन श्रीराधा-कृष्ण की रासलीलाओं का पावन स्थल है।</div><div>वृंदावन के प्रमुख मंदिर प्रेम मंदिर और बांके बिहारी मंदिर है।</div><div>यहां का हर कोना प्रेम और भक्ति से सराबोर रहता है।</div><div>यहां पर रात के समय राधा रानी और गोपियों की मौजूदगी को महसूस किया जा सकता है।</div><div><br></div><h2>नंदगांव</h2><div>नंदगांव भगवान श्रीकृष्ण के किशोर काल से जुड़ा है।</div><div>यहां का मुख्य आकर्षण नंद राय मंदिर है।</div><div><br></div><h2>बरसाना</h2><div>यह गांव राधा जी का गांव माना जाता है।</div><div>यहां पर लाडली जी का मंदिर है। वहीं बरसाना की लठमार होली विश्व प्रसिद्ध है।</div><div><br></div><h2>उज्जैन</h2><div>उज्जैन में श्रीकृष्ण ने गुरु संदीपनि के आश्रम में शिक्षा ली थी।</div><div>यहां पर आज भी संदीपनि ऋषि का आज भी दर्शनीय है।</div><div>यहां पर श्रीकृष्ण की सुदामा से मित्रता हुई थी।</div><div><br></div><h2>द्वारका</h2><div>मथुरा छोड़कर भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारका को अपनी राजधानी बनाया था।</div><div>यहां का मुख्य आकर्षण द्वारकाधीश मंदिर है।</div><div>द्वारकाधीश मंदिर चार धामों में से एक प्रमुख धाम है।</div><div><br></div><h2>कुरुक्षेत्र</h2><div>महाभारत युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था।</div><div>यहां का विशेष स्थल ज्योतिसर है।</div><div>यह स्थान कर्म और धर्म का प्रतीक है।</div><div><br></div><h2>सोमनाथ</h2><div>माना जाता है कि श्रीकृष्ण ने यहीं प्रभास क्षेत्र में देह त्याग किया था।</div><div>सोमनाथ मंदिर के पास स्थित यह स्थान अत्यंत पवित्र माना जाता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 21 Apr 2026 16:24:44 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[भगवान शिव का 'Healing Temple', यहां Thyroid-PCOS से परेशान महिलाएं लगाती हैं अर्जी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/tamil-nadu-temple-faith-healing-hub-for-thyroid-and-pcos]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत में प्राचीन और लोकप्रिय कई मंदिर मौजूद है। इन्हीं में से एक खास शिव मंदिर तमिलनाडु में स्थित है। भगवान शिव को नेचुरल हीलर के तौर पर भक्त मानते हैं। कई शिव मंदिरों के बारे में यहां मान्यता है कि यहां पर दर्शन करने और प्रसाद लेने से इंसान को कई बीमारियों से छुटकारा मिल जाता है। तमिलनाडु में एक ऐसा मंदिर है, जहां सिर्फ दर्शन और पूजने के लिए नहीं बल्कि अपने अपने थायराइड इश्यू, महिलाएं पीसीओएस की समस्या दूर करने के लिए भी आती हैं। वैसे तो ये मंदिर किसी उपचार का हल नहीं है लेकिन लोगों की श्रद्धा ने उन्हें इस मंदिर की तरफ ले जाती है। आइए आपको बताते हैं कहां पर स्थित है ये मंदिर</div><div><br></div><div><b>जानिए तमिलनाडु में कहां पर स्थित है मंदिर?</b></div><div><br></div><div>तमिलनाडु के छोटे से गांव थिरुनिलकुडी के कुम्बकोणम में बना है नीलकंडेश्वर महादेव टेंपल। जो कि तंजावुर जिले में बना है। जहां पर भक्त थायराइड और पीसीओएस जैसी समस्याओं को हील करने के लिए जाते हैं।</div><div><br></div><div><b>नीलकंठ के रूप में पूजे जाते हैं महादेव</b></div><div><br></div><div>इस प्रसिद्ध मंदिर में भगवान शिव की पूजा नीलकंठेश्वर के रुप में होती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवता और असुरों के बीच हुए समुद्र मंथन से निकले विष को भगवान शिव ने कंठ में धारण किया था। जिसकी जलन से भगवान का कंठ नीला हो गया था। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस मंदिर में माता पार्वती ने भगवान शिव को तेल अर्पित किया था, जिससे उनकी गले की जलन शांत हो सके। इसी मान्यता के चलते इस मंदिर में भक्तजन थायराइड और पीसीओएस जैसी समस्या को शांत करने के लिए आते हैं।</div><div><br></div><div><b>चमत्कारिक विभूति के लिए आते हैं भक्त</b></div><div><br></div><div>इस मंदिर में भक्त अपने अंदर के डर, पीसीओएस की समस्या और थायराइड जैसे गले की प्रॉब्लम की हील करने के लिए आते हैं। माना जाता है कि इस मंदिर की पवित्र और चमत्कारिक विभूति को गले में लगाने से इन सभी समस्याओं से राहत मिलती है। इस मंदिर पर लोगों की गहरी आस्था है। ताकि उन्हें मानसिक रूप से बल मिल सके और वो अपनी बीमारियों से लड़कर उसे ठीक कर सकें।</div><div><br></div><div><b>भगवान शिव की पूजा वैद्य रूप में की जाती है</b></div><div><br></div><div><span style="font-size: 1rem;">नीलकंडेश्वर महादेव मंदिर के अलावा कई और भी मंदिर है जहां पर भगवान शिव की पूजा वैद्य के रुप में की जाती है। सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में एक है वैथीस्वरन मंदिर। ये मंदिर तंजावुर जिले से दो घंटे की दूरी पर स्थित वैथीस्वरन कोइल मंदिर है। यहां पर सिद्ध कुंड है, जिसे सिद्धामृतम कुंड के नाम से जाना जाता है। इस जल को भक्त औषधीय मानते हैं जो उनके त्वचा के रोग ठीक हो सके।&nbsp;</span></div>

<blockquote class="instagram-media" data-instgrm-captioned="" data-instgrm-permalink="https://www.instagram.com/reel/DXM9_EIAaL9/?utm_source=ig_embed&amp;utm_campaign=loading" data-instgrm-version="14" style=" background:#FFF; border:0; border-radius:3px; box-shadow:0 0 1px 0 rgba(0,0,0,0.5),0 1px 10px 0 rgba(0,0,0,0.15); margin: 1px; max-width:540px; min-width:326px; padding:0; width:99.375%; width:-webkit-calc(100% - 2px); width:calc(100% - 2px);"><div style="padding:16px;"> <a href="https://www.instagram.com/reel/DXM9_EIAaL9/?utm_source=ig_embed&amp;utm_campaign=loading" style=" background:#FFFFFF; line-height:0; padding:0 0; text-align:center; text-decoration:none; width:100%;" target="_blank"> <div style=" display: flex; flex-direction: row; align-items: center;"> <div style="background-color: #F4F4F4; border-radius: 50%; flex-grow: 0; height: 40px; margin-right: 14px; width: 40px;"></div> <div style="display: flex; flex-direction: column; flex-grow: 1; justify-content: center;"> <div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; margin-bottom: 6px; width: 100px;"></div> <div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; width: 60px;"></div></div></div><div style="padding: 19% 0;"></div> <div style="display:block; height:50px; margin:0 auto 12px; width:50px;"><svg width="50px" height="50px" viewBox="0 0 60 60" version="1.1" xmlns="https://www.w3.org/2000/svg" xmlns:xlink="https://www.w3.org/1999/xlink"><g stroke="none" stroke-width="1" fill="none" fill-rule="evenodd"><g transform="translate(-511.000000, -20.000000)" fill="#000000"><g><path d="M556.869,30.41 C554.814,30.41 553.148,32.076 553.148,34.131 C553.148,36.186 554.814,37.852 556.869,37.852 C558.924,37.852 560.59,36.186 560.59,34.131 C560.59,32.076 558.924,30.41 556.869,30.41 M541,60.657 C535.114,60.657 530.342,55.887 530.342,50 C530.342,44.114 535.114,39.342 541,39.342 C546.887,39.342 551.658,44.114 551.658,50 C551.658,55.887 546.887,60.657 541,60.657 M541,33.886 C532.1,33.886 524.886,41.1 524.886,50 C524.886,58.899 532.1,66.113 541,66.113 C549.9,66.113 557.115,58.899 557.115,50 C557.115,41.1 549.9,33.886 541,33.886 M565.378,62.101 C565.244,65.022 564.756,66.606 564.346,67.663 C563.803,69.06 563.154,70.057 562.106,71.106 C561.058,72.155 560.06,72.803 558.662,73.347 C557.607,73.757 556.021,74.244 553.102,74.378 C549.944,74.521 548.997,74.552 541,74.552 C533.003,74.552 532.056,74.521 528.898,74.378 C525.979,74.244 524.393,73.757 523.338,73.347 C521.94,72.803 520.942,72.155 519.894,71.106 C518.846,70.057 518.197,69.06 517.654,67.663 C517.244,66.606 516.755,65.022 516.623,62.101 C516.479,58.943 516.448,57.996 516.448,50 C516.448,42.003 516.479,41.056 516.623,37.899 C516.755,34.978 517.244,33.391 517.654,32.338 C518.197,30.938 518.846,29.942 519.894,28.894 C520.942,27.846 521.94,27.196 523.338,26.654 C524.393,26.244 525.979,25.756 528.898,25.623 C532.057,25.479 533.004,25.448 541,25.448 C548.997,25.448 549.943,25.479 553.102,25.623 C556.021,25.756 557.607,26.244 558.662,26.654 C560.06,27.196 561.058,27.846 562.106,28.894 C563.154,29.942 563.803,30.938 564.346,32.338 C564.756,33.391 565.244,34.978 565.378,37.899 C565.522,41.056 565.552,42.003 565.552,50 C565.552,57.996 565.522,58.943 565.378,62.101 M570.82,37.631 C570.674,34.438 570.167,32.258 569.425,30.349 C568.659,28.377 567.633,26.702 565.965,25.035 C564.297,23.368 562.623,22.342 560.652,21.575 C558.743,20.834 556.562,20.326 553.369,20.18 C550.169,20.033 549.148,20 541,20 C532.853,20 531.831,20.033 528.631,20.18 C525.438,20.326 523.257,20.834 521.349,21.575 C519.376,22.342 517.703,23.368 516.035,25.035 C514.368,26.702 513.342,28.377 512.574,30.349 C511.834,32.258 511.326,34.438 511.181,37.631 C511.035,40.831 511,41.851 511,50 C511,58.147 511.035,59.17 511.181,62.369 C511.326,65.562 511.834,67.743 512.574,69.651 C513.342,71.625 514.368,73.296 516.035,74.965 C517.703,76.634 519.376,77.658 521.349,78.425 C523.257,79.167 525.438,79.673 528.631,79.82 C531.831,79.965 532.853,80.001 541,80.001 C549.148,80.001 550.169,79.965 553.369,79.82 C556.562,79.673 558.743,79.167 560.652,78.425 C562.623,77.658 564.297,76.634 565.965,74.965 C567.633,73.296 568.659,71.625 569.425,69.651 C570.167,67.743 570.674,65.562 570.82,62.369 C570.966,59.17 571,58.147 571,50 C571,41.851 570.966,40.831 570.82,37.631"></path></g></g></g></svg></div><div style="padding-top: 8px;"> <div style=" color:#3897f0; font-family:Arial,sans-serif; font-size:14px; font-style:normal; font-weight:550; line-height:18px;">View this post on Instagram</div></div><div style="padding: 12.5% 0;"></div> <div style="display: flex; flex-direction: row; margin-bottom: 14px; align-items: center;"><div> <div style="background-color: #F4F4F4; border-radius: 50%; height: 12.5px; width: 12.5px; transform: translateX(0px) translateY(7px);"></div> <div style="background-color: #F4F4F4; height: 12.5px; transform: rotate(-45deg) translateX(3px) translateY(1px); width: 12.5px; flex-grow: 0; margin-right: 14px; margin-left: 2px;"></div> <div style="background-color: #F4F4F4; border-radius: 50%; height: 12.5px; width: 12.5px; transform: translateX(9px) translateY(-18px);"></div></div><div style="margin-left: 8px;"> <div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 50%; flex-grow: 0; height: 20px; width: 20px;"></div> <div style=" width: 0; height: 0; border-top: 2px solid transparent; border-left: 6px solid #f4f4f4; border-bottom: 2px solid transparent; transform: translateX(16px) translateY(-4px) rotate(30deg)"></div></div><div style="margin-left: auto;"> <div style=" width: 0px; border-top: 8px solid #F4F4F4; border-right: 8px solid transparent; transform: translateY(16px);"></div> <div style=" background-color: #F4F4F4; flex-grow: 0; height: 12px; width: 16px; transform: translateY(-4px);"></div> <div style=" width: 0; height: 0; border-top: 8px solid #F4F4F4; border-left: 8px solid transparent; transform: translateY(-4px) translateX(8px);"></div></div></div> <div style="display: flex; flex-direction: column; flex-grow: 1; justify-content: center; margin-bottom: 24px;"> <div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; margin-bottom: 6px; width: 224px;"></div> <div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; width: 144px;"></div></div></a><p style=" color:#c9c8cd; font-family:Arial,sans-serif; font-size:14px; line-height:17px; margin-bottom:0; margin-top:8px; overflow:hidden; padding:8px 0 7px; text-align:center; text-overflow:ellipsis; white-space:nowrap;"><a href="https://www.instagram.com/reel/DXM9_EIAaL9/?utm_source=ig_embed&amp;utm_campaign=loading" style=" color:#c9c8cd; font-family:Arial,sans-serif; font-size:14px; font-style:normal; font-weight:normal; line-height:17px; text-decoration:none;" target="_blank">A post shared by Sri’s Temple Adventures (@sristempleadventures)</a></p></div></blockquote>
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      <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 15:44:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/tamil-nadu-temple-faith-healing-hub-for-thyroid-and-pcos</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Mysterious Shiv Mandir: 400 साल पुराना अद्भुत Shiv Mandir, नंदी के मुख से बहती है Mysterious धारा, स्रोत आज भी अज्ञात]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/400-year-old-shiva-temple-mysterious-stream-flows-from-mouth-of-nandi]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देश भर में महाशिवरात्रि का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। वहीं देश में कई प्राचीन और अद्भुत शिव मंदिर हैं। हर रोज भक्त इन शिवधामों के दर्शन और जलाभिषेक करने के लिए आते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत मे एक ऐसा रहस्यमयी शिव मंदिर है। जहां पर नंदी के मुख से शिवलिंग पर निरंतर जलधारा गिरती रहती है। वह भी बिना किसी ज्ञात जलस्त्रोत के। बता दें कि यह आध्यात्मिक और चमत्कारी स्थल कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में है। यहां स्थित काडू मल्लेश्वर मंदिर का रहस्य और चमत्कार इस जगह को और अधिक खास बना देती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको इस चमत्कारी मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>काडु मल्लेश्वर मंदिर का रहस्य</h2><div>दक्षिण भारत का रहस्यमयी शिवधाम बेंगलुरु के मल्लेश्वरम क्षेत्र में स्थित है। इस मंदिर का नाम काडु मल्लेश्वर मंदिर है, जोकि करीब 400 साल पुराना माना जाता है। माना जाता है कि इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का स्वरूप है। इस मंदिर का निर्माण 17वीं शताब्दी में मराठा राजा शिवाजी के भाई वेंकोजी द्वारा कराया गया था। इस मंदिर का वास्तुकला मराठा और द्रविड़ शैली का अद्भुत संगम है। मंदिर की दीवारों, स्तंभों और शिखर की नक्काशी इसकी प्राचीनता और भव्यता को दर्शाती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/divine-shaktipeeth-of-chitrakoot-where-lord-ram-worshipped-during-his-exile-know-secret" target="_blank">Ramgiri Shaktipeeth: Chitrakoot का वो Divine शक्तिपीठ, जहां वनवास में Lord Ram ने भी की थी पूजा, जानें रहस्य</a><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></h3><div><br></div><h2>दक्षिणामुख नंदी तीर्थ में होता है चमत्कार</h2><div>काडू मल्लेश्वर मंदिर के पास श्री दक्षिणामुख नंदी तीर्थ कल्याणी क्षेत्र स्थित है। स्थानीय मान्यता के मुताबिक जब तक नंदी तीर्थ के दर्शन न हों, तब तक काडु मल्लेश्वर मंदिर की पूजा को अधूरा माना जाता है।</div><div><br></div><h2>नंदी के मुख से निकलती जलधारा</h2><div>इस क्षेत्र में नंदी महाराज की प्रचीन पत्थर की प्रतिमा स्थापित है। नंदी के मुख से निरंतर साफ और ठंडा पानी निकलता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>यह जलधारा शिवलिंग पर गिरकर स्वत: जलाभिषेक करती है।</div><div><br></div><div>लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस पानी का स्त्रोत आज तक अज्ञात बना हुआ है।</div><div><br></div><div>शोधकर्ता और वैज्ञानिक भी इस जलधारा के उद्गम का पता लगाने का प्रयास कर चुके हैं। लेकिन अब तक कोई भी ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आया है।</div><div><br></div><h2>भक्त मानते हैं इसको चमत्कार</h2><div>इस रहस्य को जहां विज्ञान समझ पाने में असमर्थ रहे हैं। तो वहीं श्रद्धालु इसको भगवान शिव की दिव्य कृपा और चमत्कार मानते हैं। धार्मिक मान्यता हैं कि यहां पर सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है।</div><div><br></div><h2>विशेष आयोजन</h2><div>बता दें कि महाशिवरात्रि के पावन मौके पर काडु मल्लेश्वर मंदिर और नंदी तीर्थ क्षेत्र में विशेष धार्मिक आयोजन किए जाते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>इस दौरान मंदिर को फूलों से भव्य रूप से सजाया जाता है।</div><div><br></div><div>रुद्राभिषेक और महापूजा का आयोजन किया जाता है।</div><div><br></div><div>इस पावन मौके पर भगवान शिव की रथ यात्रा निकाली जाती है।</div><div><br></div><div>वहीं 15 दिन प्रसिद्ध मूंगफली मेला लगता है। जोकि दूर-दराज से भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करता है।</div><div><br></div><div>इस दौरान लाखों की संख्या में भक्त दर्शन के लिए बेंगलुरु पहुंचते हैं।</div><div><br></div><h2>ऐसे पहुंचे</h2><div>आप यहां पर अगर हवाई मार्ग से आना चाहते हैं, तो केंपेगौड़ा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, बेंगलुरु है।</div><div><br></div><div>अगर आप रेल मार्ग से यहां आना चाहते हैं, तो बेंगलुरु सिटी रेलवे स्टेशन है।</div><div><br></div><div>वहीं शहर के सभी प्रमुख हिस्सों से मेट्रो और बस सुविधा उपलब्ध है।</div><div><br></div><h2>ठहरने की सुविधा</h2><div>मल्लेश्वरम और आसपास के क्षेत्रों में धर्मशालाएं, बजट होटल और मिड रेंज होटल आसानी से मिल जाएंगे।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 12:49:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/400-year-old-shiva-temple-mysterious-stream-flows-from-mouth-of-nandi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Akshay Tritiya पर शुभ संयोग, 19 अप्रैल से शुरू होगी Chardham Yatra 2026, जाने कितने दिन बाद होंगे केदारनथ और बद्रीनाथ के दर्शन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/char-dham-yatra-2026-dates-pilgrimage-starts-april-19]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>चारधाम यात्रा हिंदू धर्म की अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण तीर्थ यात्राओं में गिनी जाती है, जिसे करना आसान नहीं होता। इस साल 2026 में इस यात्रा की शुरुआत अक्षय तृतीया के शुभ अवसर से होगी यानी के 19 अप्रैल 2026 को यमुनोत्री और गंगोत्री धाम के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाएंगे, वहीं केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम के द्वार कुछ दिनों बाद दर्शन के लिए खुलेंगे। इस लेख में हम आपको चारधाम यात्रा का शुभारंभ और शेड्यूल के बारे में बताएंगे।</div><div><br></div><div><b>चारधाम यात्रा शेड्यूल</b></div><div><br></div><div>हिमायल की पहाड़ियों में बसे ये चारों धाम श्रृद्धालुओं को मोक्ष रास्ता दिखाते हैं और पापों से मुक्ति दिलाते हैं। इस साल अक्षय तृतीया के दिन शुभ योगों में चारधाम यात्रा के कपाट खुल जाएंगे। आइए आपको इस लेख में बताते हैं गंगोत्री-यमुनोत्री से लेकर केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम के दर्शन कब से शुरु हो रहे हैं।</div><div><br></div><div><b>चारधाम यात्रा 2026 का शुभारंभ</b></div><div><br></div><div>चारधाम यात्रा 2026 की शुरुआत 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया के पावन दिन से होने जा रही है। इस शुभ अवसर पर यमुनोत्री और गंगोत्री धाम के द्वार एक साथ श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाएंगे। इसके बाद केदारनाथ धाम 22 अप्रैल को और बद्रीनाथ धाम 23 अप्रैल को दर्शन हेतु खुलेगा। अक्षय तृतीया पर बन रहे शुभ संयोगों के चलते इस यात्रा का आरंभ बेहद शुभ और फलदायी माना जा रहा है।</div><div><br></div><div><b>यमुनोत्री धाम- यात्रा का पहला पड़ाव</b></div><div><br></div><div>चारधाम में से यमुनोत्री पहला धाम है। 19 अप्रैल 2026 को इसके कपाट खुलने जा रहे हैं। यहां पर मां यमुना की काले संगमरमर की मूर्ति स्थापित है। यहां सूर्यकुंड और गर्म पानी के झरने भक्तों को आकर्षित करते हैं। यमुनोत्री के दर्शन करने से आयु, आरोग्य और पापों से मुक्ति मिलती है। यात्रा शुरु होने से पहले भक्त यहीं दर्शन करते हैं।</div><div><br></div><div><b>गंगोत्री धाम: गंगा मां का उद्गम स्थल</b></div><div><br></div><div>19 अप्रैल 2026 को गंगोत्री धाम के कपाट खुल जाएंगे। यह गंगा नदी का उद्गम स्थल है। माना जाता है कि राजा भागीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने धरती पर मां गंगा को उतारा था। गंगोत्री धाम में मां गंगा की मूर्ति विराजमान है। यहां के दर्शन से भक्तों को आध्यात्मिक शुद्धि और पापमुक्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है।</div><div><br></div><div><b>केदारनाथ धाम: भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग</b></div><div><br></div><div>22 अप्रैल 2026 को केदरनाथ के कपाट सुबह 8 बजे खुल जाएंगे। यह भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। धार्मिक कथा के अनुसार, पांडवों की भक्ति से प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें यहां पर दर्शन दिए थे। मंदिर में शिवलिंग बैल की पीठ के आकार में है। गौरीकुंड से पैदल या हेलीकॉप्टर से पहुंचा जा सकता है। माना जाता है कि केदारनाथ के दर्शन करने से भक्तों के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।</div><div><br></div><div><b>बद्रीनाथ धाम: भगवान विष्णु का प्रमुख पीठ</b></div><div><br></div><div>चारधाम यात्रा के चौथे और अंतिम पड़ाव के रूप में बद्रीनाथ धाम के कपाट 23 अप्रैल 2026 को प्रातः 6:15 बजे श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाएंगे। इस पवित्र स्थल पर भगवान विष्णु नर-नारायण के रूप में विराजते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, वे यहां वर्ष के छह महीने योगनिद्रा में रहते हैं और शेष छह महीने जाग्रत अवस्था में भक्तों को दर्शन देते हैं। बद्रीनाथ धाम में अखंड ज्योति निरंतर प्रज्वलित रहती है। ऐसा विश्वास है कि यहां दर्शन करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है।</div><div><br></div><div><b>चारधाम यात्रा की तैयारी और सावधानियां</b></div><div><br></div><div><span style="font-size: 1rem;">चारधाम यात्रा काफी कठिन और शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण मानी जाती है, इसलिए रवाना होने से पहले अपना हेल्थ चेकअप जरूर करवा लें। सफर के लिए आरामदायक जूते, गर्म कपड़े और आवश्यक दवाइयों को साथ रखना बेहद जरूरी है। यात्रा के दौरान सादगीपूर्ण व्यवहार, श्रद्धा और अनुशासन का पालन करें। इस साल अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर शुरू हो रही यह यात्रा श्रद्धालुओं के लिए विशेष पुण्य और सौभाग्य का प्रतीक मानी जा रही है।</span></div><div><br></div><div><b>चारधाम यात्रा का आध्यात्मिक महत्व क्या है?</b></div><div><br></div><div>चारधाम यात्रा सिर्फ तीर्थ दर्शन नहीं है, बल्कि यह आत्म-शुद्धि, पापों से मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग है। गंगोत्री और यमुनोत्री से गंगा-यमुना की पवित्रता, केदारनाथ से शिव की कृपा और बद्रीनाथ से विष्णु की शरण मिलती है। माना जाता है कि इस यात्रा को पूरा करने वाला व्यक्ति जीवनभर पुण्य का भागीदार बन जाता है।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 16:26:55 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/char-dham-yatra-2026-dates-pilgrimage-starts-april-19</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ramgiri Shaktipeeth: Chitrakoot का वो Divine शक्तिपीठ, जहां वनवास में Lord Ram ने भी की थी पूजा, जानें रहस्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/divine-shaktipeeth-of-chitrakoot-where-lord-ram-worshipped-during-his-exile-know-secret]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>उत्तर प्रदेश के चित्रकूट में रामगिरी शक्तिपीठ स्थित है। जिसको रामगिरी शिवानी शक्तिपीठ के नाम से भी जाना जाता है। बता दें कि यह हिंदू धर्म के पवित्र 51 शक्तिपीठों में से एक है। यह स्थान सिर्फ देवी मां की शक्ति का केंद्र नहीं बल्कि भगवान श्रीराम से भी इस स्थान का गहरा नाता जुड़ा है। भगवान शिव का मोह भंग करने के लिए श्रीहरि ने अपने सुदर्शन चक्र से मां सती के शरीर के कई टुकड़े कर दिए थे। जोकि धरती पर अलग-अलग स्थानों पर गिरे थे। वर्तमान में इन स्थानों पर देवी मां के 51 शक्तिपीठ स्थापित हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको चित्रकूट में स्थित इस चमत्कारी शक्तिपीठ के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>भगवान राम ने की थी पूजा</h2><div>हिंदू धर्म में देवी सती को समर्पित शक्तिपीठों की विशेष मान्यता होती है। कई धर्म ग्रंथों में इन शक्तिपीठों की संख्या अलग-अलग बताई जाती है। माना जाता है कि जो भी भक्त इन सभी शक्तिपीठों के दर्शन कर लेता है, उनके जीवन के सभी दुख-दर्द दूर हो सकते हैं। चित्रकूट में रामगिरी शक्तिपीठों के संबंध में माना जाता है कि श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान इस स्थान पर पूजा-अर्चना की थी। जिस कारण इस स्थान का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/surefire-solution-to-stress-and-anxiety-these-radha-rani-names-give-mental-peace" target="_blank">Radha Rani Naam Jap: Stress और Anxiety का अचूक उपाय, Radha Rani के ये नाम देंगे आपको Mental Peace</a></h3><div><br></div><h2>रामगिरि शक्तिपीठ</h2><div>बता दें कि वाल्मीकि रामायण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि भगवान श्रीराम, मां सीता और लक्ष्मण जी ने वनवास के साढ़े 11 साल उत्तर प्रदेश के चित्रकूट में बिताए थे। चित्रकूट में भगवान राम द्वारा स्थित इस शक्तिपीठ की पूजा-अर्चना करने की वजह से इस शक्तिपीठ को रामगिरी शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है। यही वजह है कि यहां पर रामनवमी का पर्व विशेष रूप से मनाया जाता है।</div><div><br></div><div>वहीं कुछ मान्यताओं के मुताबिक मध्य प्रदेश के मैहर में स्थित शारदा देवी मंदिर को शक्तिपीठ माना जाता है। वहीं कुछ लोग यूपी के चित्रकूट में स्थित शारदा मंदिर को शक्तिपीठ मानते हैं। इसको लेकर अलग-अलग मत देखने को मिलते हैं।</div><div><br></div><h2>पूरी होती हैं मनोकामनाएं</h2><div>माना जाता है कि यूपी में मंदाकिनी नदी के पास मां सती का दायां स्तन गिरा था। जिसको शिव पुराण में शिवानी शक्तिपीठ के रूप में वर्णित किया गया है। इस शक्तिपीठ में स्थापित देवी को 'शिवानी' के रूप में पूजा जाता है। देवी के साथ भगवान शिव यहां पर भैरव रूप में विराजमान हैं, जिनको 'चंड' कहा जाता है। इस शक्तिपीठ को लेकर यह मान्यता चली आ रही है कि इस स्थान के दर्शन मात्र से भक्तों को अपनी विपत्तियों से मुक्ति मिल जाती है और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 13:20:46 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/divine-shaktipeeth-of-chitrakoot-where-lord-ram-worshipped-during-his-exile-know-secret</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Radha Rani Naam Jap: Stress और Anxiety का अचूक उपाय, Radha Rani के ये नाम देंगे आपको Mental Peace]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/surefire-solution-to-stress-and-anxiety-these-radha-rani-names-give-mental-peace]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज के समय में आमतौर पर हर दूसरा व्यक्ति किसी न किसी कारण से तनाव का सामना कर रहा है। लगातार बढ़ती चिंता व्यक्ति की मानसिक स्थिति को प्रभावित करती है। वहीं कई बार यह स्थिति इतनी ज्यादा बढ़ जाती है कि व्यक्ति छोटी-छोटी बातों में ओवरथिंक करने लगता है। ऐसे में मन को शांत करने के लिए अक्सर राधा रानी के नाम का जप किया जाता है। मान्यता है कि राधा रानी के स्मरण मात्र से मन को शांति और प्रसन्नता मिलती है।</div><div><br></div><div>वहीं राधा रानी के नाम के स्मरण से जीवन के दुख भी हल्के महसूस होने लगते हैं। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक अगर पूरी श्रद्धा और नियम के साथ राधा रानी के नाम का जप किया जाए, तो जीवन में कई सकारात्मक बदलाव महसूस होते हैं। वहीं लंबे समय से रुके हुए काम भी पूरे होने लगते हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको राधा रानी के शक्तिशाली नामों के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mysterious-nirai-mata-temple-in-chhattisgarh-open-for-5-hours-year-burns-its-own-divine-light" target="_blank">Nirai Mata Temple: Chhattisgarh का रहस्यमयी Nirai Mata मंदिर, साल में 5 घंटे खुलता है, खुद जलती है Divine Light</a></h3><div><br></div><h2>राधा रानी के 108 नाम</h2><div>ॐ श्रीराधायै नम:</div><div>ॐ राधिकायै नम:</div><div>ॐ जीवायै नम:</div><div>ॐ जीवानन्दप्रदायिन्यै नम:</div><div>ॐ नन्दनन्दनपत्न्यै नम:</div><div>ॐ वृषभानुसुतायै नम:</div><div>ॐ शिवायै नम:</div><div>ॐ गणाध्यक्षायै नम:</div><div>ॐ गवाध्यक्षायै नम:</div><div>ॐ जगन्नाथप्रियायै नम:</div><div>ॐ किशोर्यै नम:</div><div>ॐ कमलायै नम:</div><div>ॐ कृष्णवल्लभायै नम:</div><div>ॐ कृष्णसंयुतायै नम:</div><div>ॐ वृन्दावनेश्वर्यै नम:</div><div>ॐ कृष्णप्रियायै नम:</div><div>ॐ मदनमोहिन्यै नम:</div><div>ॐ श्रीमत्यै कृष्णकान्तायै नम:</div><div>ॐ कृष्णानन्दप्रदायिन्यै नम:</div><div>ॐ यशस्विन्यै नम:</div><div>ॐ यशोगम्यायै नम:</div><div>ॐ यशोदानन्दवल्लभायै नम:</div><div>ॐ दामोदरप्रियायै नम:</div><div>ॐ गोकुलानन्दकर्त्र्यै नम:</div><div>ॐ गोकुलानन्ददायिन्यै नम:</div><div>ॐ गतिप्रदायै नम:</div><div>ॐ गीतगम्यायै नम:</div><div>ॐ गमनागमनप्रियायै नम:</div><div>ॐ विष्णुप्रियायै नम:</div><div>ॐ विष्णुकान्तायै नम:</div><div>ॐ विष्णोरंकनिवासिन्यै नम:</div><div>ॐ यशोदानन्दपत्न्यै नम:</div><div>ॐ यशोदानन्दगेहिन्यै नम:</div><div>ॐ कामारिकान्तायै नम:</div><div>ॐ कामेश्यै नम:</div><div>ॐ कामलालसविग्रहायै नम:</div><div>ॐ जयप्रदायै नम:</div><div>ॐ जयायै नम:</div><div>ॐ गोप्यै नम:</div><div>ॐ गोपानन्दकर्यै नम:</div><div>ॐ कृष्णांगवासिन्यै नम:</div><div>ॐ हृद्यायै नम:</div><div>ॐ चित्रमालिन्यै नम:</div><div>ॐ विमलायै नम:</div><div>ॐ दु:खहन्त्र्यै नम:</div><div>ॐ मत्यै नम:</div><div>ॐ धृत्यै नम:</div><div>ॐ लज्जायै नम:</div><div>ॐ कान्त्यै नम:</div><div>ॐ पुष्टयै नम:</div><div>ॐ गोकुलत्वप्रदायिन्यै नम:</div><div>ॐ केशवायै नम:</div><div>ॐ केशवप्रीतायै नम:</div><div>ॐ रासक्रीडाकर्यै नम:</div><div>ॐ रासवासिन्यै नम:</div><div>ॐ राससुन्दर्यै नम:</div><div>ॐ हरिकान्तायै नम:</div><div>ॐ हरिप्रियायै नम:</div><div>ॐ प्रधानगोपिकायै नम:</div><div>ॐ गोपकन्यायै नम:</div><div>ॐ त्रैलोक्यसुन्दर्यै नम:</div><div>ॐ वृन्दावनविहारिण्यै नम:</div><div>ॐ विकसितमुखाम्बुजायै नम:</div><div>ॐ पद्मायै नम:</div><div>ॐ पद्महस्तायै नम:</div><div>ॐ पवित्रायै नम:</div><div>ॐ सर्वमंगलायै नम:</div><div>ॐ कृष्णकान्तायै नम:</div><div>ॐ विचित्रवासिन्यै नम:</div><div>ॐ वेणुवाद्यायै नम:</div><div>ॐ वेणुरत्यै नम:</div><div>ॐ सौम्यरूपायै नम:</div><div>ॐ ललितायै नम:</div><div>ॐ विशोकायै नम:</div><div>ॐ विशाखायै नम:</div><div>ॐ लवंगनाम्न्यै नम:</div><div>ॐ कृष्णभोग्यायै नम:</div><div>ॐ चन्द्रवल्लभायै नम:</div><div>ॐ अर्द्धचन्द्रधरायै नम:</div><div>ॐ रोहिण्यै नम:</div><div>ॐ कामकलायै नम:</div><div>ॐ बिल्ववृक्षनिवासिन्यै नम:</div><div>ॐ बिल्ववृक्षप्रियायै नम:</div><div>ॐ बिल्वोपमस्तन्यै नम:</div><div>ॐ तुलसीतोषिकायै नम:</div><div>ॐ गजमुक्तायै नम:</div><div>ॐ महामुक्तायै नम:</div><div>ॐ महामुक्तिफलप्रदायै नम:</div><div>ॐ प्रेमप्रियायै नम:</div><div>ॐ प्रेमरुपायै नम:</div><div>ॐ प्रेमभक्तिप्रदायै नम:</div><div>ॐ प्रेमक्रीडापरीतांग्यै नम:</div><div>ॐ दयारुपायै नम:</div><div>ॐ गौरचन्द्राननायै नम:</div><div>ॐ कलायै नम:</div><div>ॐ शुकदेवगुणातीतायै नम:</div><div>ॐ शुकदेवप्रियायै सख्यै नम:</div><div>ॐ रतिप्रदायै नम:</div><div>ॐ चैतन्यप्रियायै नम:</div><div>ॐ सखीमध्यनिवासिन्यै नम:</div><div>ॐ मथुरायै नम:</div><div>ॐ श्रीकृष्णभावनायै नम:</div><div>ॐ पतिप्राणायै नम:</div><div>ॐ पतिव्रतायै नम:</div><div>ॐ सकलेप्सितदात्र्यै नम:</div><div>ॐ कृष्णभार्यायै नम:</div><div>ॐ श्यामसख्यै नम:</div><div>ॐ कल्पवासिन्यै नम:</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 13:13:39 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/surefire-solution-to-stress-and-anxiety-these-radha-rani-names-give-mental-peace</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Nirai Mata Temple: Chhattisgarh का रहस्यमयी Nirai Mata मंदिर, साल में 5 घंटे खुलता है, खुद जलती है Divine Light]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mysterious-nirai-mata-temple-in-chhattisgarh-open-for-5-hours-year-burns-its-own-divine-light]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत में कई ऐसे मंदिर हैं, जिनसे जुड़ी मान्यताएं हर किसी को हैरान कर देती हैं। ऐसा ही एक मंदिर छत्तीसगढ़ में भी है। छत्तीसगढ़ में मौजूद निरई माता मंदिर के प्रति लोगों की गहरी आस्था और श्रद्धा है। वहीं निरई माता मंदिर से जुड़ी मान्यताएं भी बेहद अनोखी हैं। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि इस मंदिर में महिलाओं का प्रवेश पूरी तरह से वर्जित है। वहीं साल में सिर्फ 5 घंटे के लिए निरई माता का मंदिर खुलता है। आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको निरई माता मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>पूरी होती हैं सभी मनोकामनाएं</h2><div>छत्तीसगढ़ के धमतरी के मगरलोड क्षेत्र में घने जंगलों और ऊंची पहाड़ियों के बीच स्थित निरई माता भक्तों के लिए आस्था का केंद्र है। दुर्गम रास्तों और उबड़-खाबड़ पहाड़ियों पर स्थित होने के बाद भी भक्त यहां पर दर्शन के लिए आते हैं। इस मंदिर में भक्त देवी मां को नारियल, नींबू और अगरबत्ती भेंट करते हैं। माना जाता है कि इससे मां प्रसन्न होती हैं और जातक की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/vrindavan-secret-shaktipeeth-where-mother-sati-hair-fell-know-its-krishna-connection" target="_blank">Famous Temple: Vrindavan का 'Secret' Shaktipeeth, जहां गिरे थे मां सती के केश, जानिए इसका कृष्ण कनेक्शन</a></h3><div><br></div><h2>अनोखा मंदिर</h2><div>बता दें कि निरई माता का मंदिर बेहद रहस्यमयी और अनोखा सिद्धपीठ है। यहां पर साल में सिर्फ एक बार यानी कि चैत्र नवरात्रि के पहले रविवार पर सुबह 4 से 9 बजे यानी की मात्र 5 घंटों के लिए खुलता है। सीमित समय के लिए मंदिर खुलने की वजह से भक्तों की मंदिर में भारी भीड़ उमड़ती है।</div><div><br></div><div>इस मंदिर में मां की मूर्ति स्थापित नहीं है, बल्कि एक पवित्र गुफा में ज्योत प्रज्वलित होती है। इस ज्योति को लेकर मान्यता है कि नवरात्रि के पावन मौके पर यह ज्योति बिना घी, तेल और माचिस के अपने आप प्रज्वलित हो जाती है।</div><div><br></div><h2>जानिए क्या हैं मान्यताएं</h2><div>अगर मंदिर से जुड़ी मान्यताओं की बात की जाए, तो महिलाओं का इस मंदिर में प्रवेश पूरी तरह से वर्जित है। इस मंदिर में सिर्फ पुरुष ही पूजा-पाठ कर सकते हैं। इसके पीछे एक पुरानी किवदंती भी मिलती है। जिसके मुताबिक प्राचीन काल में पहाड़ियों के बीच एक बैगा पुजारी मां निरई की श्रद्धा और सच्चे मन से सेवा करता है, जिससे देवी मां अति प्रसन्न थीं।</div><div><br></div><div>देवी मां स्वयं पुजारी को स्नान व भोजन कराती थीं। लेकिन इससे पुजारी की पत्नी के मन में संदेह पैदा हो गया। इस बात से देवी बेहद क्रोधित हो गईं और उन्होंने यह आदेश दिया कि भविष्य में कोई भी स्त्री उनका दर्शन नहीं करेगी। तभी यह मान्यता चली आ रही है कि महिलाओं का मंदिर में प्रवेश वर्जित है।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 13:34:12 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mysterious-nirai-mata-temple-in-chhattisgarh-open-for-5-hours-year-burns-its-own-divine-light</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Famous Temple: Vrindavan का 'Secret' Shaktipeeth, जहां गिरे थे मां सती के केश, जानिए इसका कृष्ण कनेक्शन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/vrindavan-secret-shaktipeeth-where-mother-sati-hair-fell-know-its-krishna-connection]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वृंदावन की पावन धरती पर मां कात्यायनी का पावन मंदिर है। यह शक्तिपीठ सिर्फ मंदिर नहीं बल्कि प्रेम और आस्था का केंद्र भी है। यहां पर स्वयं राधा रानी और गोपियों ने तपस्या की थी। वृंदावन का नाम सुनते ही हमारे मन में बांके बिहारी की छवि उभरती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ब्रज की भूमि की रक्षा और यहां की अधिष्ठात्री देवी स्वयं मां कात्यायनी हैं। मां कात्यायनी का यह मंदिर वृंदावन के राधा बाग इलाके में है और यह 51 शक्तिपीठों में से एक है।</div><div><br></div><div>धार्मिक मान्यता के मुताबिक जब भगवान श्रीविष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शव के टुकड़े किए थे, तो मां सती के केश यहां पर गिरे थे। इस कारण इस स्थान को 'उमा शक्तिपीठ' कहा जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/these-temples-of-lord-shiva-spread-from-thailand-to-mauritius" target="_blank">Lord Shiva Temple: Nepal के Pashupatinath जैसा वैभव, Thailand से Mauritius तक फैले हैं Lord Shiva के ये मंदिर</a></h3><div><br></div><h2>मंदिर का इतिहास</h2><div>इस मंदिर का इतिहास किसी चमकत्कार से कम नहीं है। साल 1923 में स्वामी केशवानंद महाराज ने मंदिर का निर्माण कराया था। स्वामी जी ने 33 सालों तक हिमालय की कंदराओं में कठिन साधना-तपस्या की थी। इस दौरान उनको एक दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई, जिसमें उनको वृंदावन में लुप्त इस शक्तिपीठ को ढूंढने के साथ मंदिर को स्थापित करने का भी आदेश मिला। स्वामी केशवानंद ने अपने योगबल से न सिर्फ इस मंदिर को पहचाना बल्कि आज यह मंदिर भक्तों की आस्था का केंद्र है।</div><div><br></div><h2>अष्टधातु की प्रतिमा</h2><div>यह मंदिर सफेद संगमरमर से बना है, जोकि देखने में काफी भव्य लगता है। मंदिर के मुख्य द्वार पर दो सुनहरे शेर खड़े हैं, जोकि मां की शक्ति का एहसास कराते हैं। वहीं मंदिर के गर्भगृह में मां कात्यायनी की अष्टधातु की विशाल प्रतिमा विराजमान हैं। मां की चार भुजाएं हैं, जिसमें दाहिनी भुजा अभय और वर मुद्रा में हैं। बाईं भुजाओं में कमल का पुष्प और तलवार है। मां के अलावा यहां भगवान शिव, भगवान विष्णु, सूर्य देव और गणेश जी की प्रतिमा है। जो इसको एक पूर्ण पंचदेव मंदिर बनाती हैं।</div><div><br></div><h2>श्रीकृष्ण ने रचाया 'महारास'</h2><div>बता दें कि इस मंदिर का संबंध द्वापर युग और श्रीकृष्ण से है। श्रीमद्भागवत पुराण के मुताबिक वृंदावन की गोपियां श्रीकृष्ण को अपने पति के रूप में पाना चाहती थीं। जिसके लिए गोपियों ने यमुना किनारे पूरा कार्तिक मास मां कात्यायनी की बालू से मूर्ति बनाकर पूजा की थी।</div><div><br></div><div>गोपियों की भक्ति से प्रसन्न होकर मां कात्यायनी ने उनको वरदान दिया था। इस वरदान के फलस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण ने शरद पूर्णिमा की रात 16108 रूप धारण किए थे। साथ ही हर गोपी के साथ महारास भी रचाया था। माना जाता है कि आज भी जो कुंवारे युवक-युवतियां यहां आकर मां के दर्शन करते हैं, उनके विवाह में आने वाली अड़चनें दूर होती हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 14 Apr 2026 13:38:24 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/vrindavan-secret-shaktipeeth-where-mother-sati-hair-fell-know-its-krishna-connection</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Jagannath Rath Yatra 2026: जानें तारीख, महत्व और इस Divine Festival की अनूठी परंपराएं]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/jagannath-rath-yatra-2026-date-rituals-and-significance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में जगन्नाथ रथ यात्रा का विशेष महत्व माना जाता है। पूरे भारत में भव्य और पवित्र त्योहारों में से एक है जगन्नाथ रख यात्रा। हर साल यह रथ यात्रा लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है। खासतौर पर यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और भक्ति का मुख्य केंद्र है। हर साल ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ निकलती है। इस यात्रा की एक झलक के लिए देश-दुनिया से भक्त पहुंचते हैं। तो चलिए इस लेख में हम आपको बताते हैं कब है जगन्नाथ रथ? जानिए इसका धार्मिक महत्व क्या है और इसे कैसे मनाया जाता है।</div><div><br></div><div><b>जगन्नाथ रथ यात्रा 2026 की तिथि</b></div><div><br></div><div><span style="font-size: 1rem;">इस साल 2026 में जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई, गुरुवार को निकाली जाएगी। यह पर्व हर साल आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। ओडिशा के पुरी में जगन्नाथ यात्रा विशेष तौर पर प्रसिद्ध है, जहां लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>जाने रथ यात्रा का धार्मिक महत्व</b></div><div><br></div><div>यह यात्रा भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की नगर यात्रा है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए स्वयं बाहर आते हैं। इस पर्व को भक्ति, प्रेम और समपर्ण का प्रतीक माना जाता है।</div><div><br></div><div><b>रथ यात्रा की खास परंपरा क्या है?</b></div><div><br></div><div>इस त्योहार में तीन विशाल रथ बनाए जाते हैं, जिन्हें भक्त मिलकर खींचते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसमें किसी भी तरह का भेदभाव नहीं होता।&nbsp;</div><div><br></div><div><b>जानिए पूजा विधि</b></div><div><br></div><div>भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा से पहले स्नान पूर्णिमा, अनवसर और गुंडिचा मंदिर की सफाई जैसे अनुष्ठान किए जाते हैं। यात्रा के दिन भगवान रथ पर विराजमान कर शोभायात्रा निकाली जाती है और इसके साथ ही भजन-कीर्तन होते हैं।</div><div><br></div><div><b>क्यों है यह पर्व इतना खास?</b></div><div><br></div><div><span style="font-size: 1rem;">यह एक ऐसा पर्व है जिसमें ईश्वर और उनके भक्तों के बीच का अंतर पूरी तरह समाप्त हो जाता है। रथ यात्रा सिर्फ आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक और सामाजिक एकजुटता का भी संदेश देती है, जिसमें सभी वर्गों के लोग बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं।</span></div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 17:15:17 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/jagannath-rath-yatra-2026-date-rituals-and-significance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Lord Shiva Temple: Nepal के Pashupatinath जैसा वैभव, Thailand से Mauritius तक फैले हैं Lord Shiva के ये मंदिर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/these-temples-of-lord-shiva-spread-from-thailand-to-mauritius]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>महाशिवरात्रि का पर्व शिवभक्तों के लिए बेहद खास होता है। इस दिन भगवान शिव की विशेष रूप से पूजा और अर्चना की जाती है। इस दिन भारत के हर छोटे-बड़े मंदिर में लोग पूजा-उपासना के लिए जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शिव मंदिर सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में हैं। भारत के बाहर भी कई फेमस शिव मंदिर हैं, जहां पर भक्त पूजा और दर्शन के लिए आते हैं। ये शिव मंदिर उन देशों में भी हैं, जहां पर भारतीय समुदाय बसता है। उन्होंने अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को वहां बनाए रखा है।</div><div><br></div><div>बता दें कि इन शिव मंदिरों में शिवलिंग, नाग देवता और पारंपरिक पूजा सामग्री आदि स्थापित होती है। वहीं विदेशी भूमि पर श्रद्धालु महाशिवरात्रि के पर्व पर भजन और आरती के जरिए भगवान शिव की पूजा-आराधना करते हैं। तो आइए जानते हैं इन मंदिरों के बारे में...</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/not-make-this-mistake-on-day-of-dasha-mata-vrat-king-nal-to-lose-his-entire-kingdom" target="_blank">Dasha Mata Vrat Katha: Dasha Mata Vrat के दिन भूलकर न करें ये गलती, King Nal को गंवाना पड़ा था अपना पूरा राजपाट</a></h3><div><br></div><h2>थाईलैंड का प्रेह विहार शिव मंदिर</h2><div>थाईलैंड और कंबोडिया की सीमा पर प्रेह विहार मंदिर स्थित है।&nbsp;</div><div>यह मंदिर महादेव को समर्पित है और अपनी प्राचीन वास्तुकला और पर्वतीय लोकेशन के लिए जाना जाता है।</div><div>प्रेह विहार मंदिर भारतीय शैली के मंदिरों की याद दिलाता है और विदेशी भक्तों को आकर्षित करता है।</div><div><br></div><h2>श्रीलंका का मुन्नेश्वरम मंदिर&nbsp;</h2><div>श्रीलंका के उत्तरी हिस्से में मुन्नेश्वरम मंदिर स्थित है। यह भोलेनाथ को समर्पित एक प्राचीन हिंदू मंदिर है।</div><div>हर साल यहां पर महाशिवरात्रि के मौके पर श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ होती है।</div><div>यह मंदिर न सिर्फ धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी प्रसिद्ध है।</div><div><br></div><h2>ऑकलैंड का शिव मंदिर (न्यूजीलैंड)</h2><div>ऑकलैंड में स्थित भगवान शिव का यह मंदिर भारतीय प्रवासी समुदाय द्वारा स्थापित किया गया है।</div><div>यहां हर साल महाशिवरात्रि और अन्य हिंदू त्योहार भी बड़े उत्साह के साथ मनाए जाते हैं।</div><div>मंदिर में नियमित रूप से भजन, पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>नेपाल का पशुपतिनाथ मंदिर</h2><div>नेपाल में मौजूद पशुपतिनाथ मंदिर पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।</div><div>यह मंदिर काठमांडू के बागमती नदी के किनारे स्थित है और हिंदू धर्म के सबसे पवित्र शिव धामों में से एक है।</div><div>महाशिवरात्रि के मौके पर यहां लाखों की संख्या में भक्त जमा होते हैं।</div><div><br></div><h2>इंडोनेशिया का प्रम्बानन मंदिर</h2><div>इंडोनेशिया के जावा द्वीप में प्रम्बानन मंदिर स्थित है।</div><div>यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है।</div><div>इस मंदिर की वास्तुकला और नक्काशी आर्कियोलॉजिस्ट और यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करती है।</div><div><br></div><h2>मॉरीशस का सागर शिव मंदिर</h2><div>मॉरीशस के मारे लोटस इलाके में सागर शिव मंदिर स्थित है।&nbsp;</div><div>हिंदू समुदाय के लोगों के लिए यह मंदिर श्रद्धा का केंद्र है। हर साल यहां पर महाशिवरात्रि का आयोजन भव्य तरीके से होता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 12:01:18 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/these-temples-of-lord-shiva-spread-from-thailand-to-mauritius</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Dasha Mata Vrat Katha: Dasha Mata Vrat के दिन भूलकर न करें ये गलती, King Nal को गंवाना पड़ा था अपना पूरा राजपाट]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/not-make-this-mistake-on-day-of-dasha-mata-vrat-king-nal-to-lose-his-entire-kingdom]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>चैत्र माह के कृष्ण पक्षी की दशमी तिथि को दशा माता का व्रत किया जा रखा जाता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक दशा माता देवी पार्वती का एक स्वरूप हैं, जिनका वाहन ऊंट है। दशा माता के व्रत में नीम, पीपल और बरगद की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक ऐसा कहा जाता है कि जो भी भक्त दशा माता का व्रत करके उनका डोरा बांधता है, उसको कभी धन-संपत्ति की कमी नहीं होती है। दशा माता व्रत का पूरा लाभ उठाने के लिए इनकी कथा जरूर पढ़नी चाहिए।</div><div><br></div><h2>दशा माता व्रत की कथा</h2><div>प्राचीन काल में एक नल नामक राजा हुआ करता था। वह अपनी पत्नी दयमंती के साथ राज किया करते थे। रानी दमयंती दशा मां की भक्त थीं और पूरी श्रद्धा के साथ व्रत करती थीं और पूजा करती थीं। एक बार राजा नल ने रानी के गले में धागा देखा और इसके बारे में पूछा तो रानी ने दशा माता की पूजा के बारे में बताया। राजा नल को उनकी बातों पर भरोसा नहीं हुआ और रानी के गले से धागा निकालकर फेंक दिया।</div><div><br></div><div>ऐसा करने में राजा नल पर दशा माता कुपित हो गईं। वहीं राजा नल जुएं में अपना राजपाठ हारकर वन में भटकने लगे। राजा नल पर चोरी का भी आरोप लगा। राजा रानी की स्थिति यह हो गई कि उनको अपने भरण पोषण के लिए जंगल से लकड़ी काटकर बेचने लगे। रानी दमयंती का माता दशा पर अटूट विश्वास था। जब दोबारा चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की दशमी आई, तो राजा और रानी दोनों ने पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ माता का व्रत और पूजा की। उसी रात दशा माता ने रानी को स्वप्न में आकर आशीर्वाद दिया।&nbsp;</div><div><br></div><div>जब रानी दमयंती ने राजा को यह बात बताई, तो राजा ने कहा कि मां के आशीर्वाद से हमारे पुराने दिन जरूर लौट आएंगे। धीरे-धीरे राजा की स्थिति में सुधार होने लगा। वहीं दशा मां की कृपा से राजा नल को अपना खोया हुआ राज्य वापस मिल गया। इस तरह जो भी दशा माता का व्रत करता है, उसके जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली बनी रहती है। इसलिए सभी भक्तों को पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ माता दशा की पूजा करनी चाहिए। वहीं स्त्रियों को कथा-पूजन कर धागा पहनना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 16:48:01 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/not-make-this-mistake-on-day-of-dasha-mata-vrat-king-nal-to-lose-his-entire-kingdom</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Kangra Famous Temple: Kangra का वो शक्तिपीठ जिसे पांडवों ने बनाया, जानें मक्खन वाले प्रसाद का Divine रहस्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/shaktipeeth-of-kangra-which-built-by-pandavas-know-divine-secret-of-butter-prasad]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कांगड़ा जिले में फेमस शक्तिपीठों में से एक नगरकोट धाम है। जहां पर मां ब्रजेश्वरी का मंदिर है और यहां पर मक्खन चढ़ता है। यहां पर मकर संक्रांति को यहां पर विशेष पूजा की जाती है। यहां बनने वाले मक्खन के घृतमंडल को लेकर कहा जाता है कि युद्ध में महिषासुर को मारने के बाद देवी मां को कुछ चोटें आई थीं। उन चोटों को दूर करने के लिए मां ने नगरकोट में अपने शरीर पर मक्खन लगाया था। इस दिन को चिह्नित करने के लिए देवी की पिंडी को मक्खन से ढका जाता है और मंदिर में एक सप्ताह उत्सव मनाया जाता है।</div><div><br></div><div>फिर इस मक्खन को उतारा जाता है और भक्तों में मक्खन को प्रसाद के रूप में दिया जाता है। यह मक्खन खाने के लिए नहीं बल्कि लगाने के लिए होता है। मान्यता है कि यह प्रसाद के रूप में मिलने वाला मक्खन चर्म रोग भी दूर करता है। यहां पर मां पिंडी स्वरूप में विराजमान हैं। माना जाता है कि महाभारत काल में पांडवों द्वारा मंदिर का निर्माण कराया गया है। यहां विभिन्न राज्यों के श्रद्धालु दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/5-ancient-shiva-temples-in-uttar-pradesh-where-ravana-worshipped-and-karna-performed-anointment" target="_blank">Famous Shiv Temple: UP के 5 प्राचीन शिव Temple, कहीं रावण ने की थी पूजा तो कहीं कर्ण करते थे अभिषेक</a></h3><div><br></div><h2>कहां स्थित है कांगड़ा ब्रजेश्वरी मंदिर</h2><div>यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा शहर में स्थित है। धर्मशाला घूमने आने वाले लोग यहां माता रानी के दर्शन करके जाते हैं। धर्मशाला से करीब 18 से 20 किमी की दूरी पर है। इसलिए यहां पहुंचने में कोई ज्यादा परेशानी नहीं होगी। मंदिर पहाड़ों में ऐसी जगह स्थित है। जहां का शांत और सुकून भरा वातावरण रहता है। इस मंदिर को माता के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। यही वजह है कि नवरात्रि में इस मंदिर में भक्तों की भीड़ होती है। महाभारत काल से भी इस मंदिर का इतिहास जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि पांडवों ने भी यहां पूजा की थी।</div><div><br></div><h2>कैसे जाएं मंदिर</h2><div><br></div><h2>हवाई मार्ग</h2><div>अगर आप यहां पर फ्लाइट से आने का प्लान कर रही हैं, तो गग्गल एयरपोर्ट तक फ्लाइट ले सकती हैं। यह कांगड़ा में स्थित है और यहां से मंदिर तक पहुंचने के लिए आपको 15 किमी का सफर पूरा करना होगा।</div><div><br></div><h2>रेल मार्ग</h2><div>वहीं अगर आप ट्रेन यात्रा से यहां तक पहुंचना चाहती हैं, तो आपको पठानकोट रेलवे स्टेशन के लिए टिकट बुक करना होगा। यहां से कांगड़ा पहुंचने के लिए टैक्सी या बस लेना होगा।</div><div><br></div><h2>सड़क मार्ग</h2><div>जो भी लोग अपनी गाड़ी से यात्रा प्लान कर रहे हैं, तो यह बेस्ट रास्ता है। दिल्ली, चंडीगढ़ और धर्मशाला से नियमित बसें चलती हैं। वहीं रास्ता अच्छा होने के कारण आप अपनी गाड़ी से भी आ सकते हैं। वहीं जो लोग बाइक से यात्रा करना चाहते हैं, तो यह शहर हिमाचल और आसपास के राज्यों से जुड़ा हुआ है।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 11:02:20 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/shaktipeeth-of-kangra-which-built-by-pandavas-know-divine-secret-of-butter-prasad</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Famous Shiv Temple: UP के 5 प्राचीन शिव Temple, कहीं रावण ने की थी पूजा तो कहीं कर्ण करते थे अभिषेक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/5-ancient-shiva-temples-in-uttar-pradesh-where-ravana-worshipped-and-karna-performed-anointment]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देश में भगवान शिव को समर्पित कई मंदिर हैं। भगवान शिव को 'देवों के देव महादेव' कहा जाता है। वहीं शिवभक्त शिवालयों में जाकर भी भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते हैं। लेकिन अगर आप यूपी में रहते हैं। तो बता दें कि उत्तर प्रदेश में भी भगवान शिव के कई प्राचीन और ऐतिहासिक शिव मंदिर हैं, जोकि सदियों से भक्तों की आस्था का केंद्र रहे हैं। </div><div>&nbsp;</div><div>ऐसे में अगर आप भी भगवान शिव की कृपा और आशीर्वाद पाना चाहते हैं, तो आप इन मंदिरों में भगवान शिव के दर्शन के लिए जा सकते हैं। आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको यूपी में स्थित भोलेनाथ के 5 ऐसे शिव मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनकी सदियों से मान्यता है।</div><div><br></div><h2>काशी विश्वनाथ, वाराणसी</h2><div>यह मंदिर वाराणसी में स्थित है और देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है।</div><div>गंगा तट के किनारे स्थित यह मंदिर मोक्षदायिनी काशी की पहचान है।</div><div>यहां भक्ति और पूजन करने से व्यक्ति को जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिलती है।</div><div>महाशिवरात्रि और सावन महीने में यहां भक्तों की भारी भीड़ होती है।</div><div><br></div><h2>गोला गोकर्णनाथ, लखीमपुर-खीरी</h2><div>गोला गोकर्णनाथ मंदिर को 'छोटा काशी' के नाम से जाना जाता है।</div><div>इस शिवलिंग पर रावण के अंगूठे का निशान है।</div><div>शिवरात्रि में यह मंदिर भक्तों से खचाखच भरा रहता है।</div><div>स्थानीय और आसपास के लोग और दूर-दूर से भक्त यहां आते हैं।</div><div><br></div><h2>मनकामेश्वर मंदिर, आगरा</h2><div>मनकामेश्वर मंदिर आसपास के इलाकों और शहरवासियों के लिए भक्ति का बड़ा केंद्र है।</div><div>यह मंदिर आगरा के दिल यानी की सेंटर में मौजूद है।</div><div>यहां पर भक्त अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए नियमित आते हैं।</div><div>माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना स्वयं भगवान शिव ने की थी।</div><div><br></div><h2>परमट मंदिर, कानपुर</h2><div>कानपुर में स्थित यह मंदिर एक प्राचीन स्थल है।</div><div>ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह मंदिर काफी महत्वपूर्ण है।</div><div>मंदिर परिसर में भव्य नंदी और शिवलिंग के दर्शन श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव कराते हैं।</div><div>इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है।</div><div>माना जाता है कि यहां पर दानवीर कर्ण गंगा स्नान के बाद शिवजी का पूजन करते थे।</div><div><br></div><h2>दुग्धेश्वर नाथ मंदिर, गाजियाबाद&nbsp;</h2><div>यह मंदिर अपनी अनोखी मान्यता के लिए फेमस है।</div><div>भक्तों का मानना है कि शिवलिंग पर दूध चढ़ाने से विशेष फल की प्राप्ति होती है और व्यक्ति की मनोकामना पूरी होती है।</div><div>मंदिर में नियमित पूजा होती है और परंपरागत आयोजन किए जाते हैं।</div><div>धार्मिक मान्यता के मुताबिक दशानन रावण ने इस स्थान पर भोलेनाथ की पूजा की थी।</div><div>इस मंदिर को 'हिरण्यगर्भ महादेव मंदिर मठ' के रूप में भी जाना जाता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 16:50:20 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/5-ancient-shiva-temples-in-uttar-pradesh-where-ravana-worshipped-and-karna-performed-anointment</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Char Dham Yatra: Char Dham पर नया नियम! Gangotri में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक, क्या ये सिर्फ शुरुआत है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/new-rules-at-char-dham-non-hindus-barred-from-entering-gangotri-is-this-just-beginning]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हर साल जब चार धाम यात्रा शुरू होती है, तो हजारों-लाखों की संख्या में लोग उत्तराखंड आते हैं। बता दें कि इन दिनों चार धाम यात्रा से जुड़ा एक मुद्दा चर्चा में है। दरअसल, गंगोत्री धाम और मुखबा में गैर हिंदुओं की एंट्री को बैन कर दिया गया है। मंदिर से जुड़े लोगों का कहना है कि यह फैसला धार्मिक स्थल की पवित्रता को बनाए रखने को ध्यान में रखकर लिया गया है। ऐसे में अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह नियम केदारनाथ, बद्रीनाथ और यमुनोत्री जैसे दूसरे धामों में भी लागू हो सकता है। इसलिए आज इस पर हम आपको विस्तार से जानकारी देने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>आस्था और सनातन परंपरा से जुड़े जगहें</h2><div>प्राप्त जानकारी के मुताबिक गंगोत्री धाम से जुड़े ट्रस्ट ने यह साफ कहा है कि यह जगह सिर्फ सनातन परंपरा और आस्था से जुड़े हैं। इसलिए इन जगहों को टूरिस्ट प्लेस की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। इस सोच के साथ गैर-हिंदुओं की एंट्री पर रोक लगाने का फैसला लिया गया है। फिलहाल यह फैसला सिर्फ गंगोत्री और मुखबा तक ही सीमित है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/amazing-secret-of-chamunda-devi-temple-in-himachal-maa-herself-told-place-in-dream" target="_blank">Famous Temple: Himachal के Chamunda Devi Temple का अद्भुत रहस्य, सपने में आकर मां ने खुद बताई थी जगह</a></h3><div><br></div><h2>उठ सकता है मुद्दा</h2><div>चार धामों का प्रबंधन देखने वाली समिति की तरफ से यह सुझाव सामने आया है कि इस तरह का नियम बाकी धामों में भी लागू किया जा सकता है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में इस मुद्दे को उठाया जा सकता है। इस मुद्दे पर चर्चा के बाद ही कोई प्रस्ताव पास किया जा सकता है। लेकिन अभी तक इस बारे में कोई फैसला नहीं लिया गया है।</div><div><br></div><h2>अभी नहीं हुई है ऑफिशियल घोषणा</h2><div>हालांकि अभी तक बोर्ड लेवल पर कोई ऑफिशियल घोषणा नहीं हुई है। लोगों का मानना है कि इस तरह का फैसला लेने से पहले सभी पक्षों से बात करना जरूरी है। क्योंकि चार धाम में कई तरह के लोग काम करते हैं। इनमें मजदूर, दुकानदार और सेवाकर्मी मौजूद होते हैं, जोकि अलग-अलग समुदायों के हैं।</div><div>&nbsp;</div><h2>किसे मिलती है एंट्री</h2><div>यह भी साफ किया गया है कि जो भी लोग धार्मिक परंपराओं का पूरी तरह से पालन करते हैं। वह आमतौर पर मंदिरों में प्रवेश करते हैं। इसके साथ ही प्रशासनिक काम से आने वाले अधिकारियों और बाकी लोगों को एंट्री मिलती है।</div><div><br></div><div>सिर्फ भारत से ही नहीं बल्कि विदेशों से भी लोग चारधाम यात्रा के लिए आते-जाते हैं। बड़ी संख्या में लोग दर्शन और ट्रेकिंग के लिए आते हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 16:09:37 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Famous Temple: Himachal के Chamunda Devi Temple का अद्भुत रहस्य, सपने में आकर मां ने खुद बताई थी जगह]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/amazing-secret-of-chamunda-devi-temple-in-himachal-maa-herself-told-place-in-dream]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिमाचल प्रदेश में स्थित चामुंडा देवी मंदिर प्रमुख मंदिरों में से एक माना जाता है। चामुंडा देवी मंदिर पालमपुर से करीब 19 किमी दूर है। यह मंदिर अटूट आस्था और प्राकृतिक सुंदरता का अनोखा संगम है। चामुंडा देवी मंदिर से कई धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। एक अत्यंत प्रसिद्ध शक्तिपीठ है, जो माता चामुंडा को समर्पित है। यह स्थान प्राकृतिक सुंदरता से घिरा है। मां चामुंडा के दर्शन के लिए हर रोज हजारों की संख्या में भक्त मंदिर पहुंचते हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको चामुंडा देवी मंदिर की खासियत के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>मंदिर की मुख्य खासियत</h2><div>वहीं 16वीं शताब्दी में चामुंडा देवी का यह मंदिर बनाया गया था। यह मंदिर बनेर नदी के किनारे स्थित है और इसके पीछे धौलाधार पर्वतमाला की बर्फ से ढकी चोटियां बेहद खूबसूरत नजारा पेश करती हैं। इस मंदिर के पीछे एक प्राकृतिक गुफा भी है, जिसको शिव और शक्ति का निवास स्थान माना जाता है।</div><div><br></div><div>इस प्राकृतिक गुफा में नंदीकेश्वर महादेव का शिवलिंग है, जिसके दर्शन मात्र के भक्त दूर-दूर से आते हैं। इसलिए इस मंदिर को चामुंडा नंदीकेश्वर धाम के नाम से भी जाना जाता है। वहीं मंदिर के दोनों ओर भैरव जी और हनुमान जी की प्रतिमा बनी है। माना जाता है कि यह दोनों देवी चामुंडा के प्रतिनिधि हैं।</div><div><br></div><h2>यहां नहीं था चामुंडा देवी का मंदिर&nbsp;</h2><div>बता दें कि यह मंदिर धौलाधार पर्वत श्रृंखला पर 16 किमी ऊंची चढ़ाई पर था। जहां पहुंच पाना काफी मुश्किल था। भक्तों की इस मुश्किल को हल करने के लिए राजा और एक पुजारी ने देवी मां से प्रार्थना की कि वह मंदिर को आसानी से पहुंच सकने वाली जगह पर स्थापित किए जाने की अनुमति दें।</div><div><br></div><div>तब पंडित के सपने में देवी मां ने अपनी सहमति दी। उन्होंने पुजारी को वर्तमान स्थल पर खुदाई करके मूर्ति निकालने का निर्देश दिया। फिर पुजारी ने यह बात राजा को बताया। खुदाई किए जाने पर वहां देवी की मूर्ति मिली। लेकिन राजा के सिपाही इस मूर्ति को उठा न सके। जिसके बाद देवी पंडित के सपने में फिर से प्रकट हुईं और निर्देश दिया कि वह खुद जाकर उस मूर्ति की स्थापना करें। इस तरह से वर्तमान जगह पर चामुंडा मंदिर स्थापित हुआ।</div><div><br></div><h2>पौराणिक कथा</h2><div>माना जाता है कि हजारों साल पहले चण्ड और मुण्ड नामक दो शक्तिशाली राक्षस थे, जो इस क्षेत्र में आतंक मचा रहे थे। तब देवी ने काली रूप लेकर भीषण युद्ध में दोनों राक्षसों का वध कर दिया था। इसी वजह से देवी के इस स्वरूप को चामुंडा के नाम से पूजा जाता है।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 04 Apr 2026 12:11:49 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/amazing-secret-of-chamunda-devi-temple-in-himachal-maa-herself-told-place-in-dream</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Sanatan Dharma के 18 महापुराणों में छिपा है जीवन का सार, जानें यह Divine Knowledge]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/essence-of-life-hidden-in-18-mahapuranas-of-sanatan-dharma-know-this-divine-knowledge]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में 18 महापुराणों के विशेष महत्व के बारे में बताया गया है। धार्मिक मान्यता है कि इन ग्रंथों में धार्मिक आस्था का वर्णन किया गया है। वहीं इन पुराणों में ऋषि-मुनियों की कथाएं, सृष्टि की उत्पत्ति, इतिहास और प्रलय का जिक्र किया गया है। साथ ही यह भी कहा जाता है कि यह पुराण वेदों के बाद की रचनाएं हैं। इनमें जीवन के गूढ़ सिद्धांतों की जानकारी है। इन पुराणों का अध्ययन करने से व्यक्ति के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इन पुराणों को पढ़ने से व्यक्ति जीवन चक्र को भी समझने लगता है।</div><div><br></div><div>बता दें कि इन पुराणों को भक्ति-ग्रंथ के रूप में भी जाना जाता है। क्योंकि इनमें भगवान की लीलाओं, उनके विभिन्न स्वरूपों और भक्तों के साथ भगवान के संबंधों का सुंदर चित्रण मिलता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको इन 18 महापुराणों के नाम और इनके महत्व के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/how-did-manu-and-shatarupa-become-king-dasharatha-and-kaushalya-in-their-next-birth" target="_blank">Gyan Ganga: Ram Katha में याज्ञवल्क्य ने सुनाया प्रसंग, जब हजारों साल की तपस्या से मिला राम जैसा पुत्र</a></h3><div><br></div><h2>जानिए 18 महापुराणों के नाम और महत्व</h2><div><br></div><h2>ब्रह्म पुराण</h2><div>सृष्टि के आरंभ का वर्णन मिलता है।</div><div><br></div><h2>पद्म पुराण</h2><div>भगवान विष्णु का विवरण मिलता है।</div><div><br></div><h2>विष्णु पुराण</h2><div>इसमें जगत के पालनहार भगवान विष्णु के अवतारों का जिक्र किया गया है।</div><div><br></div><h2>शिव पुराण</h2><div>शिव पुराण में भगवान शिव और पूरे 12 ज्योतिर्लिंगों का वर्णन किया गया है।</div><div><br></div><h2>भागवत पुराण</h2><div>श्री कृष्ण की लीलाओं का वर्णन मिलता है।</div><div><br></div><h2>नारद पुराण</h2><div>व्रत और तीर्थ स्थलों का वर्णन मिलता है।</div><div><br></div><h2>मार्कंडेय पुराण</h2><div>इन पुराण में देवी दुर्गा की महिमा का जिक्र किया गया है।</div><div><br></div><h2>अग्नि पुराण</h2><div>अग्नि पुराण में ज्योतिष विद्या का जिक्र देखने को मिलता है।</div><div><br></div><h2>भविष्य पुराण</h2><div>आने वाले समय की भविष्यवाणियों का उल्लेख मिलता है।</div><div><br></div><h2>ब्रह्मवैवर्त पुराण</h2><div>प्रकृति की कथाओं का संकलन देखने को मिलता है।</div><div><br></div><h2>लिंग पुराण</h2><div>शिवलिंग पूजा के महत्व के बारे में बताया गया है।</div><div><br></div><h2>वराह पुराण</h2><div>वराह अवतार द्वारा पृथ्वी के उद्धार की जानकारी मिलती है।</div><div><br></div><h2>स्कंद पुराण</h2><div>भगवान कार्तिकेय की कथा है।</div><div><br></div><h2>वामन पुराण</h2><div>भगवान विष्णु के वामन अवतार का जिक्र किया गया है।</div><div><br></div><h2>कूर्म पुराण</h2><div>इस पुराण में आध्यात्मिक ज्ञान का उपदेश देखने को मिलता है।</div><div><br></div><h2>मत्स्य पुराण</h2><div>सृष्टि के प्रलय की प्राचीन कथाएं हैं।</div><div><br></div><h2>गरुड़ पुराण</h2><div>गरुड़ पुराण में मृत्यु और मोक्ष की जानकारी मिलती है।</div><div><br></div><h2>ब्रह्मांड पुराण</h2><div>बता दें कि इस पुराण में ब्रह्मांड के रहस्यों का जिक्र है।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 16:43:16 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/essence-of-life-hidden-in-18-mahapuranas-of-sanatan-dharma-know-this-divine-knowledge</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Gyan Ganga: Ram Katha में याज्ञवल्क्य ने सुनाया प्रसंग, जब हजारों साल की तपस्या से मिला राम जैसा पुत्र]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/how-did-manu-and-shatarupa-become-king-dasharatha-and-kaushalya-in-their-next-birth]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>याज्ञवल्क्यजी अत्यंत मधुर और भावपूर्ण स्वर में श्रीरामकथा का वर्णन करते हुए महर्षि भरद्वाज को आनन्दित कर रहे हैं। भरद्वाज मुनि प्रभु के विविध अवतारों की दिव्य लीलाओं को एकाग्रचित्त होकर श्रवण कर रहे हैं। नारद प्रसंग के उपरांत याज्ञवल्क्यजी मनु और शतरूपा के महान तप तथा उस तप से प्राप्त दिव्य वरदान की कथा सुनाते हैं।</div><div><br></div><div>वे मनु, जिन्हें समस्त मानव जाति का आदिपुरुष कहा जाता है, परम पराक्रमी, तपस्वी और धर्मनिष्ठ राजा थे। उनकी धर्मपत्नी शतरूपा भी सदाचार और पतिव्रत धर्म की मूर्ति थीं। उनके पवित्र आचरण का गुणगान आज भी वेद करते हैं। उनके पुत्र उत्तानपाद के यहाँ महान भक्त ध्रुव का जन्म हुआ, जिनकी भक्ति अमर है। देवहूति, जो कर्दम मुनि की पत्नी थीं, उन्हीं के गर्भ से प्रकट हुए महान मुनि कपिल, जिनकी महिमा समस्त संसार में गाई जाती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/when-narad-muni-cursed-lord-vishnu-in-anger-discover-the-mystery-behind-this-divine-leela" target="_blank">Gyan Ganga: जब क्रोध में Narad Muni ने दिया Lord Vishnu को श्राप, जानिए इस दिव्य लीला का रहस्य</a></h3><div>मनु ने दीर्घकाल तक धर्मपूर्वक राज्य का संचालन किया। वे सामान्य मनुष्यों की भाँति जीवन के सुख-दुःख का अनुभव करते हुए वृद्धावस्था को प्राप्त हुए, परंतु उनके मन को कहीं भी स्थिरता प्राप्त न हुई। अंततः उनके भीतर वैराग्य जाग्रत हुआ। उन्होंने अपने पुत्र को राज्य सौंपकर, पत्नी सहित वनगमन का निश्चय किया।</div><div><br></div><div>नैमिषारण्य और गोमती के पावन तटों से होते हुए वे अनेक संत-महात्माओं के आश्रमों में पहुँचते रहे। निरंतर कठोर तप और वन के कष्ट भी उनके संकल्प को विचलित न कर सके। उनके हृदय में एक ही व्याकुलता थी—कहीं यह नश्वर जीवन प्रभु के दर्शन के बिना ही व्यर्थ न बीत जाए।</div><div><br></div><div>धीरे-धीरे उनकी तपस्या और भी कठोर होती गई। उन्होंने हजारों वर्षों तक केवल जल का सेवन किया, फिर वायु पर जीवन यापन किया, और अंततः वायु का भी त्याग कर एक पैर पर खड़े रहकर कठोर तप में लीन हो गए। उनकी इस अद्वितीय तपस्या को देखकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी अनेक बार उनके समीप आए और विभिन्न प्रकार से उनकी परीक्षा ली, किंतु वे अपने संकल्प से तनिक भी विचलित न हुए।</div><div><br></div><div>उनकी अटूट श्रद्धा और भक्ति से प्रसन्न होकर अंततः आकाशवाणी हुई—“वर मांगो।”</div><div><br></div><div>प्रभु की वाणी सुनते ही उनका क्षीण शरीर पुनः तेजस्वी और पुष्ट हो उठा। अत्यंत भावविभोर होकर मनु ने विनम्र वाणी में कहा—</div><div><br></div><div>“हे प्रभु! जिनका निरंतर वेदों द्वारा गुणगान किया जाता है, जिनके सगुण और निर्गुण दोनों स्वरूपों का मुनिजन ध्यान करते हैं, हम उन आपके दिव्य रूप का साक्षात् दर्शन करना चाहते हैं। कृपा कर हमारे इस दुःख का निवारण कीजिए।”</div><div><br></div><div>उनकी सरल और निष्कपट प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान ने अपना मनोहर स्वरूप प्रकट किया। उनका श्यामवर्ण शरीर नीलकमल, नीलमणि और मेघ के समान सौम्य एवं मनोहर था। उनके रूप की छटा देखकर असंख्य कामदेव भी लज्जित हो जाएँ। उनका मुख शरद पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान शीतल और प्रसन्न था। अधरों की लाली, दाँतों की उज्ज्वलता और मधुर मुस्कान अद्वितीय शोभा बिखेर रही थी।</div><div><br></div><div>प्रभु ने स्नेहपूर्वक कहा—“हे मनु! मैं तुम पर अत्यंत प्रसन्न हूँ। जो भी इच्छा हो, निःसंकोच वर मांगो।”</div><div><br></div><div>मनु ने विनम्रता से उत्तर दिया—“प्रभु! आपके दर्शन से अब कोई इच्छा शेष नहीं रही। तथापि एक अभिलाषा है—मुझे आपके समान एक पुत्र प्राप्त हो।”</div><div><br></div><div>भगवान मुस्कराए और बोले—“हे मनु! मेरे समान कोई दूसरा नहीं है, अतः मैं स्वयं तुम्हारे यहाँ पुत्र रूप में अवतार ग्रहण करूँगा।”</div><div><br></div><div>यह सुनकर मनु और शतरूपा अत्यंत प्रसन्न हुए। शतरूपा ने भी प्रभु से अटूट भक्ति और उनके चरणों में अनन्य प्रेम का वरदान माँगा। प्रभु ने दोनों को इच्छित वर प्रदान कर अंतर्धान हो गए।</div><div><br></div><div>कुछ समय पश्चात मनु और शतरूपा ने अपने शरीर का त्याग किया। अगले जन्म में वे त्रेता युग में अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के रूप में अवतरित हुए, जहाँ स्वयं प्रभु श्रीराम ने उनके पुत्र रूप में प्रकट होकर अपनी दिव्य नरलीला की।</div><div><br></div><div>।।श्रीराम।।</div><div><br></div><div>- सुखी भारती</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 15:43:05 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Hanuman Jayanti पर इस विधि से करें सुंदरकांड पाठ, बजरंगबली देंगे Powerful Blessings, जानें Rules]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/on-hanuman-jayanti-recite-sunderkand-in-this-way-bajrangbali-give-powerful-blessings]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी की 02 अप्रैल को हनुमान जन्मोत्सव मनाया जा रहा है। हिंदू धर्म में हनुमान जी की आराधना का विशेष महत्व माना जाता है। बता दें कि बजरंगबली को 8 चिरंजीवियों में से एक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि चैत्र माह की पूर्णिमा तिथि को हनुमान जी का जन्म हुआ था। इसलिए हर साल इस दिन को हनुमान जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन विधिविधान से हनुमान जी की पूजा करने से और सुंदरकांड का पाठ करने से जातक की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। वहीं हनुमान जी की कृपा से जीवन में ऐश्वर्य, धन, बल और बुद्धि की प्राप्ति होती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि हनुमान जन्मोत्सव पर किस तरह से सुंदरकांड का पाठ करना चाहिए।</div><div><br></div><h2>जानिए क्या है सुंदरकांड</h2><div>रामचरितमानस का पांचवां अध्याय सुंदरकांड है। सुंदरकांड की रचना गोस्वामी तुलसीदास ने 16वीं शताब्दी में की थी। यह एकमात्र ऐसा खंड है, जो पूरी तरह से हनुमान जी को समर्पित है। सुंदरकांड में बजरंगबली द्वारा मां सीता की खोज, सुरसा राक्षसी को पराजित करना, लंका प्रवेश, अशोक वाटिका नष्ट करना और लंका दहन जैसे उद्धरण मिलते हैं। सुंदरकांड की हर घटना आध्यात्मिक रूप से प्रासंगिक और बेहद शक्तिशाली है। इसलिए सुंदरकांड को एक प्रमुख योग शास्त्र भी माना जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/know-these-golden-rules-of-chalisa-recitation-every-wish-will-be-fulfilled" target="_blank">Hanuman Chalisa Niyam: चालीसा पाठ के ये Golden Rules जरूर जानें, हर मनोकामना होगी पूरी</a></h3><div><br></div><h2>क्यों करना चाहिए सुंदरकांड का पाठ</h2><div>हनुमान जयंती पर सुंदरकांड का पाठ करने से आपको बजरंगबली की कृपा प्राप्त होती है। इस दिन सुंदरकांड का पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है। यह हनुमान जी की दिव्य शक्ति का आह्वान करता है। वहीं हनुमान जन्मोत्सव पर पढ़े गए सुंदरकांड से हर श्लोक का फल कई गुना ज्यादा मिलता है। इससे न सिर्फ पापों का नाश होता है, बल्कि यह शरीर और मन के उच्च चक्रों विशेष रूप से कंठ और हृदय को जाग्रत करने में सहायक होता है। सुंदरकांड का पाठ करने से मानसिक और आध्यात्मिक उत्थान संभव हो पाता है।</div><div><br></div><h2>ऐसे करें सुंदरकांड का पाठ</h2><div>सुंदरकांड का पाठ सुबह या फिर शाम को 4 बजे के बाद करना चाहिए।</div><div>&nbsp;</div><div>माना जाता है कि दोपहर के 12 बजे के बाद सुंदरकांड का पाठ करना शुभ नहीं होता है। साधक को पूजा का फल नहीं मिलता है।</div><div>&nbsp;</div><div>पाठ शुरू करने से पहले एक चौकी पर हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित करें। फिर घी का दीपक जलाएं।</div><div>&nbsp;</div><div>अब भगवान श्रीराम और हनुमान जी का स्मरण करें और सुंदरकांड का पाठ शुरू करें।</div><div>&nbsp;</div><div>इस पाठ को बीच में न छोड़ें और न बीच में किसी भी विषय पर बात करें।</div><div>&nbsp;</div><div>पाठ करते समय मन में कोई नकारात्मक विचार न आएं।</div><div>&nbsp;</div><div>श्रद्धा और भक्ति से पाठ करने से बाद हनुमान जी को फल-फूल, बूंदी या बेसन के लड्डू का भोग लगाएं।</div><div>&nbsp;</div><div>पाठ समाप्त होने के बाद हनुमान जी की आरती करना न भूलें।</div><div>&nbsp;</div><div>आरती करने के बाद बजरंगबली को चढ़ाए गए प्रसाद को वितरित करें।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 13:24:14 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/on-hanuman-jayanti-recite-sunderkand-in-this-way-bajrangbali-give-powerful-blessings</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Hanuman Chalisa Niyam: चालीसा पाठ के ये Golden Rules जरूर जानें, हर मनोकामना होगी पूरी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/know-these-golden-rules-of-chalisa-recitation-every-wish-will-be-fulfilled]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>धार्मिक मान्यता के मुताबिक चैत्र माह की पूर्णिमा तिथि को हनुमान जी का जन्म हुआ था। इसलिए हर साल यह दिन बड़े धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस बार आज यानी की 02 अप्रैल 2026 को हनुमान जयंती का पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन लोग हनुमान जी की विधिविधान से पूजा-अर्चना औऱ व्रत आदि करते हैं। माना जाता है कि हनुमान जी की पूजा-अर्चना और साधना करने से जातक के सभी दुख-दर्द दूर होते हैं और प्रभु की कृपा प्राप्त होती है।</div><div><br></div><div>ऐसे में अगर आप भी हनुमान जन्मोत्सव के मौके पर पवनपुत्र को प्रसन्न करना चाहते हैं, तो पूजा के दौरान विधिपूर्वक हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। हनुमान चालीसा का पाठ करने से जातक को भय और नकारात्मक शक्तियों से छुटकारा मिलता है। वहीं जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/jyotish/hanuman-janmotsav-will-be-celebrated-on-april-2nd" target="_blank">Hanuman Janmotsav 2026: 2 अप्रैल को मनाया जायेगा हनुमान जन्मोत्सव, राशि अनुसार करें इन मंत्रों का जाप होगी बजरंगबली की कृपा</a></h3><div><br></div><h2>इन बातों का रखें ध्यान</h2><div>हनुमान चालीसा का पाठ करने के दौरान शुद्धता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। जो भी जातक प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, उनको मांस-मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। चालीसा के पाठ करते समय कोई भी नकारात्मक भाव नहीं आने देना चाहिए। पूरी श्रद्धा के साथ हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। वहीं दिन में 3 बार हनुमान चालीसा का पाठ करना लाभदायक माना जाता है।</div><div><br></div><h2>हनुमान चालीसा</h2><div><br></div><h2>।। दोहा।।</h2><div>श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।</div><div>बरनउं रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ।।</div><div><br></div><div>बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन-कुमार ।</div><div>बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार ।।</div><div><br></div><h2>।। चौपाई ।।</h2><div>जय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपीस तिहुं लोक उजागर ।।</div><div>राम दूत अतुलित बल धामा । अंजनि पुत्र पवनसुत नामा ।।</div><div><br></div><div>महाबीर बिक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी ।।</div><div>कंचन बरन बिराज सुबेसा । कानन कुण्डल कुंचित केसा ।।</div><div><br></div><div>हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजै । कांधे मूंज जनेउ साजै ।।</div><div>शंकर स्वयं/सुवन केसरी नंदन । तेज प्रताप महा जगवंदन ।।</div><div><br></div><div>बिद्यावान गुनी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ।।</div><div>प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । राम लखन सीता मन बसिया ।।</div><div><br></div><div>सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा । बिकट रूप धरि लंक जरावा ।।</div><div>भीम रूप धरि असुर संहारे । रामचन्द्र के काज संवारे ।।</div><div><br></div><div>लाय सजीवन लखन जियाए । श्री रघुबीर हरषि उर लाये ।।</div><div>रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई । तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ।।</div><div><br></div><div>सहस बदन तुम्हरो जस गावैं । अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं ।।</div><div>सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा । नारद सारद सहित अहीसा ।।</div><div><br></div><div>जम कुबेर दिगपाल जहां ते । कबि कोबिद कहि सके कहां ते ।।</div><div>तुम उपकार सुग्रीवहिं कीह्ना । राम मिलाय राज पद दीह्ना ।।</div><div><br></div><div>तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना । लंकेश्वर भए सब जग जाना ।।</div><div>जुग सहस्त्र जोजन पर भानु । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ।।</div><div><br></div><div>प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं । जलधि लांघि गये अचरज नाहीं ।।</div><div>दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ।।</div><div><br></div><div>राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ।।</div><div>सब सुख लहै तुम्हारी सरना । तुम रक्षक काहू को डरना ।।</div><div><br></div><div>आपन तेज सम्हारो आपै । तीनों लोक हांक तै कांपै ।।</div><div>भूत पिशाच निकट नहिं आवै । महावीर जब नाम सुनावै ।।</div><div><br></div><div>नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत बीरा ।।</div><div>संकट तै हनुमान छुडावै । मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ।।</div><div><br></div><div>सब पर राम तपस्वी राजा । तिनके काज सकल तुम साजा ।।</div><div>और मनोरथ जो कोई लावै । सोई अमित जीवन फल पावै ।।</div><div><br></div><div>चारों जुग परताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ।।</div><div>साधु सन्त के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ।।</div><div><br></div><div>अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता । अस बर दीन जानकी माता ।।</div><div>राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ।।</div><div><br></div><div>तुम्हरे भजन राम को पावै । जनम जनम के दुख बिसरावै ।।</div><div>अंतकाल रघुवरपुर जाई । जहां जन्म हरिभक्त कहाई ।।</div><div><br></div><div>और देवता चित्त ना धरई । हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ।।</div><div>संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ।।</div><div><br></div><div>जै जै जै हनुमान गोसाईं । कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ।।</div><div>जो सत बार पाठ कर कोई । छूटहि बंदि महा सुख होई ।।</div><div><br></div><div>जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा । होय सिद्धि साखी गौरीसा ।।</div><div>तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ हृदय मह डेरा ।।</div><div><br></div><h2>।। दोहा ।।</h2><div>पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप ।</div><div>राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ।।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 12:31:45 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/know-these-golden-rules-of-chalisa-recitation-every-wish-will-be-fulfilled</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mahavir Jayanti 2026: युगों-युगों तक मार्गदर्शन करती रहेगी भगवान महावीर की अमृतवाणी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/the-nectar-like-teachings-of-lord-mahavir-will-continue-to-provide-guidance-for-ages-to-come]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>‘अहिंसा परमो धर्मः’ का अमर संदेश देने वाले भगवान महावीर का जीवन और दर्शन आज के अशांत, तनावग्रस्त और संघर्षपूर्ण समय में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठा है। आधुनिक युग में मनुष्य प्रगति की अंधी दौड़ में नैतिक मूल्यों से दूर होता जा रहा है। स्वार्थ, लोभ और प्रतिस्पर्धा ने उसे इस हद तक प्रभावित कर दिया है कि वह अपने हित के लिए हिंसा और अनैतिकता को भी उचित ठहराने लगा है। ऐसे समय में महावीर स्वामी का अहिंसा, संयम और करुणा पर आधारित दर्शन मानवता को एक नई दिशा देता है और उसे आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है।</div><div><br></div><div>भगवान महावीर ने अपने जीवन के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि प्रत्येक जीव समान है और हर प्राणी में आत्मा का वास है। उन्होंने ‘जीओ और जीने दो’ का जो सिद्धांत दिया, वह केवल एक नैतिक उपदेश नहीं बल्कि संपूर्ण जीवन दर्शन है। यह हमें सिखाता है कि हम अपने व्यवहार और आचरण में ऐसी संवेदनशीलता विकसित करें, जिससे किसी भी प्राणी को कष्ट न पहुंचे। उनका यह विचार कि पेड़-पौधे, जल, वायु और अग्नि तक में जीवन है, आज के पर्यावरणीय संकट के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। जब पृथ्वी प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के संकट से जूझ रही है, तब महावीर का यह संदेश हमें प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनने का आह्वान करता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mahavir-swami-message-of-ahimsa-it-was-not-cowardice-the-greatest-weapon-for-nation-building" target="_blank">Mahavir Swami का 'अहिंसा' Message: यह कायरता नहीं, राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा हथियार था</a></h3><div>महावीर स्वामी ने कर्म के सिद्धांत को भी अत्यंत स्पष्टता से समझाया। उनका मानना था कि मनुष्य स्वयं अपने कर्मों के लिए जिम्मेदार है और वही उसके भविष्य का निर्धारण करते हैं। कोई भी व्यक्ति अपने कर्मों से बच नहीं सकता। जो जैसा करता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है। यह सिद्धांत न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से बल्कि सामाजिक और नैतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मनुष्य को उत्तरदायित्व और सजगता का बोध कराता है। उन्होंने यह भी सिखाया कि धर्म बाहरी आडंबरों में नहीं बल्कि आत्मा की पवित्रता में निहित है। अहिंसा, सत्य, संयम और तप ही धर्म के वास्तविक लक्षण हैं। क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे दोष मनुष्य के सभी गुणों का नाश कर देते हैं। इसलिए जो व्यक्ति अपने जीवन में शांति और संतुलन चाहता है, उसे इन विकारों का त्याग करना चाहिए। महावीर का यह संदेश आज के तनावपूर्ण जीवन में अत्यंत उपयोगी है, जहां मानसिक अशांति और असंतुलन तेजी से बढ़ रहा है।</div><div><br></div><div>महावीर स्वामी ने समानता और मानवता का भी अद्वितीय संदेश दिया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जन्म से नहीं बल्कि कर्म से व्यक्ति महान बनता है। यदि कोई उच्च कुल में जन्म लेकर भी बुरे कर्म करता है तो वह श्रेष्ठ नहीं हो सकता जबकि निम्न कुल में जन्म लेने वाला व्यक्ति यदि सदाचार और सद्विचार अपनाता है तो वह सम्मान का अधिकारी है। यह विचार सामाजिक समरसता और समानता की नींव को मजबूत करता है। उनकी दृष्टि में सेवा भी सर्वोच्च धर्म है। रोगियों और जरूरतमंदों की सेवा को उन्होंने ईश्वर की सेवा से भी बढ़कर बताया। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि स्त्री और पुरुष दोनों समान रूप से मुक्ति के अधिकारी हैं, जो उनके प्रगतिशील और समतामूलक विचारों को दर्शाता है।</div><div><br></div><div>आज जब समाज हिंसा, असहिष्णुता और नैतिक पतन की चुनौतियों से जूझ रहा है, तब भगवान महावीर की अमृतवाणी हमें आत्मशुद्धि, सह-अस्तित्व और शांति का मार्ग दिखाती है। यदि हम उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में आत्मसात कर लें तो न केवल व्यक्तिगत जीवन में संतुलन और शांति स्थापित हो सकती है बल्कि समाज में भी सद्भाव, करुणा और अहिंसा की स्थापना संभव है। यही महावीर स्वामी के संदेश की वास्तविक सार्थकता है, जो युगों-युगों तक मानवता का मार्गदर्शन करती रहेगी।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ पुस्तक के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 11:01:56 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/the-nectar-like-teachings-of-lord-mahavir-will-continue-to-provide-guidance-for-ages-to-come</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Mahavir Swami का 'अहिंसा' Message: यह कायरता नहीं, राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा हथियार था]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mahavir-swami-message-of-ahimsa-it-was-not-cowardice-the-greatest-weapon-for-nation-building]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>तपस्या और साधना द्वारा पूर्ण आत्मशक्ति प्राप्त कर लेने पर महावीर कार्यक्षेत्र में अवतीर्ण हुए और पूरे तीस वर्ष तक विशेष रूप से बिहार और गौण रूप से भारत के अन्यान्य प्रदेशों में भी प्रचार कार्य करते रहे। महावीर अहिंसा के दृढ़ उपासक थे, इसलिए किसी भी दिशा में विरोधी को क्षति पहुंचाने की वे कल्पना भी नहीं करते थे। वे किसी के प्रति कठोर वचन भी नहीं बोलते थे और जो उनका विरोध करता, उसको भी नम्रता और मधुरता से ही समझाते थे। इससे परिचय हो जाने के बाद लोग उनकी महत्ता समझ जाते थे और उनके आंतरिक सद्भावना के प्रभाव से उनके भक्त बन जाते थे।</div><div><br></div><div>महावीर स्वयं क्षत्रिय और राजवंश के थे, इसलिए उनका प्रभाव कितने ही क्षत्रिय नरेशों पर विशेष रूप से पड़ा। जैन ग्रंथों के अनुसार राजगृह का राजा बिंबिसार महावीर का अनुयायी था। वहां पर इसका नाम श्रेणिक बताया गया है और महावीर स्वामी के अधिकांश उपदेश श्रेणिक के प्रश्नों के उत्तर के रूप में ही प्रकट किये गये हैं। आगे चलकर इतिहास प्रसिद्ध महाराज चंद्रगुप्त मौर्य भी जैन धर्म के अनुयायी बन गये थे और उन्होंने दक्षिण भारत में आकर जैन मुनियों का तपस्वी जीवन व्यतीत किया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/ram-raja-of-orchha-only-temple-in-india-where-lord-receives-guard-of-honour" target="_blank">Ram Raja Mandir Orchha: Orchha के Ram Raja, भारत का एकमात्र मंदिर जहां भगवान को मिलती है Guard of Honour</a></h3><div>ओडिशा का राजा खाखेल तथा दक्षिण के कई राजा जैन थे। इसके फलस्वरूप जनता में महावीर स्वामी के सिद्धांतों का अच्छा प्रचार हो गया और उनके द्वारा प्रचारित धर्म कुछ शताब्दियों के लिए भारत का एक प्रमुख धर्म बन गया। आगे चलकर अनेक जैनाचार्यों ने जैन और हिंदू धर्म के समन्वय की भावना को भी बल दिया, जिसके फल से सिद्धांत रूप से अंतर रहने पर भी व्यवहार रूप में इन दोनों धर्मों में बहुत कुछ एकता हो गई और जैन एक संप्रदाय के रूप में ही हिंदुओं में मिल जुल गये।</div><div><br></div><div>महावीर स्वामी का सबसे बड़ा सिद्धांत अहिंसा का है, जिनके समस्त दर्शन, चरित्र, आचार−विचार का आधार एक इसी अहिंसा सिद्धांत पर है। वैसे उन्होंने अपने अनुयायी प्रत्येक साधु और गृहस्थ के लिए अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह के पांच व्रतों का पालन करना आवश्यक बताया है, पर इन सबमें अहिंसा की भावना सम्मिलति है। इसलिए जैन विद्वानों का प्रमुख उपदेश यही होता है− 'अहिंसा ही परम धर्म है। अहिंसा ही परम ब्रह्म है। अहिंसा ही सुख शांति देने वाली है। अहिंसा ही संसार का उद्धार करने वाली है। यही मानव का सच्चा धर्म है। यही मानव का सच्चा कर्म है। अहिंसा जैनाचार का तो प्राण ही है।''</div><div><br></div><div>महावीर स्वामी ने अपने समय में जिस अहिंसा के सिद्धांत का प्रचार किया, वह निर्बलता और कायरता उत्पन्न करने के बजाय राष्ट्र का निर्माण और संगठन करके उसे सब प्रकार से सशक्त और विकसित बनाने वाली थी। उसका उद्देश्य मनुष्य मात्र के बीच शांति और प्रेम का व्यवहार स्थापित करना था, जिसके बिना समाज कल्याण और प्रगति की कोई आशा नहीं रखी जा सकती।</div><div><br></div><div>- शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 17:15:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mahavir-swami-message-of-ahimsa-it-was-not-cowardice-the-greatest-weapon-for-nation-building</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Ram Raja Mandir Orchha: Orchha के Ram Raja, भारत का एकमात्र मंदिर जहां भगवान को मिलती है Guard of Honour]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/ram-raja-of-orchha-only-temple-in-india-where-lord-receives-guard-of-honour]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वैसे तो भारत में भगवान श्रीराम के हजारों मंदिर है। लेकिन मध्य प्रदेश के निवाड़ी जिले में स्थित ओरछा एक ऐसी पावन नगरी है, जिसकी कहानी सबसे ज्यादा निराली है। यहां पर भगवान श्रीराम को 'ईश्वर' के रूप में नहीं बल्कि ओरछा के 'वैध राजा' के रूप में पूजा जाता है। वहीं ओरछा को 'बुंदेलखंड की अयोध्या' भी कहा जाता है और यहां की परंपराएं इतनी अनूठी है कि दुनिया में कहीं और ऐसा देखने को नहीं मिलता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको भारत के इस मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां पर भगवान श्रीराम को राजा की तरह पूजते हैं।</div><div><br></div><h2>भक्ति और जिद की कहानी</h2><div>राम राजा के मंदिर का इतिहास करीब 500 साल पुराना है। वहीं इसका संबंध ओरछा के राजा मधुकर शाह और उनकी रानी कुंवरि गणेश से जुड़ा है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक राजा मधुकर शाह भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे, जबकि रानी कुंवरि गणेश भगवान श्रीराम की अनन्य भक्त थीं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/the-ideals-of-maryada-purushottam-lord-rama-will-forever-remain-exemplary" target="_blank">Ram Navami 2026: सदैव अनुकरणीय रहेंगे मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम के आदर्श</a></h3><div><br></div><div>एक बार राजा मधुकर शाह ने अपनी रानी को साथ वृंदावन चलने का आग्रह किया था। लेकिन रानी अयोध्या जाना चाहती थीं। इस बात पर दोनों के बीच बहस हो गई और राजा ने व्यंग्य करते हुए कहा, 'अगर तुम्हारे राम इतने बच्चे हैं, तो उनको अयोध्या से ओर लाकर दिखाओ।' रानी ने इस चुनौती को स्वीकार किया और यह ठान लिया कि वह अयोध्या से तभी लौटेंगी तब स्वयं रामलला उनके साथ होंगे।</div><div><br></div><h2>सफर और 3 शर्तें</h2><div>जब रानी अयोध्या पहुंची, तो सरयू किनारे कठिन तपस्या की। जब भगवान प्रकट नहीं हुए तो उन्होंने सरयू में छलांग लगा दी। रानी की अटूट भक्ति को देखकर भगवान श्रीराम बालरूप में उनकी गोद में प्रकट हुए। स्थानीय कथाओं के मुताबिक भगवान श्रीराम ने ओरछा चलने के लिए रानी के सामने तीन बड़ी शर्तें रखी थीं।</div><div><br></div><div>पहली शर्त थी कि वह पुष्य नक्षत्र में यात्रा करेंगे, दूसरी शर्त है कि उनको जहां पहली बार बिठा दिया जाएगा, वह वहीं स्थापित हो जाएंगे। वहीं तीसरी शर्त थी कि ओरछा पहुंचने के बाद उनकी सत्ता होगी, वहां पर कोई दूसरा राजा राज नहीं करेगा।</div><div><br></div><h2>महल बना मंदिर</h2><div>जब रानी रामलला को लेकर ओरछा पहुंची, तो रात हो चुकी थी। इसलिए उन्होंने प्रतिमा को महल की रसोई में रख दिया। लेकिन जब अगले दिन वह विशाल 'चतुर्भुज मंदिर' में भगवान को लेकर जाने की कोशिश करने लगी। तो प्रतिमा टस से मस नहीं हुई। भगवान की शर्त के मुताबिक रसोई ही रामलला का स्थायी निवास बन गई, जिसको आज हम राम राजा मंदिर के रूप में जानते हैं।</div><div><br></div><div>माना जाता है कि तब से भगवान रात के हाथों में ओरछा की पूरी सत्ता है। राजा मधुकर शाह ने अपना राजपाठ भगवान राम के चरणों में सौंप दिया। आज भी यहां पुलिस के जवान चारों पहर भगवान को 'गार्ड ऑफ ऑनर' देते हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 28 Mar 2026 12:18:38 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/ram-raja-of-orchha-only-temple-in-india-where-lord-receives-guard-of-honour</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Ram Navami 2026: सदैव अनुकरणीय रहेंगे मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम के आदर्श]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/the-ideals-of-maryada-purushottam-lord-rama-will-forever-remain-exemplary]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव के रूप में समूचे भारतवर्ष में प्रतिवर्ष चैत्र मास की शुक्ल पक्ष नवमी को अपार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ रामनवमी का त्यौहार मनाया जाता है। रामनवमी की तारीख को लेकर इस बार भ्रम की स्थिति बनी हुई है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल चैत्र महीने के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि 26 मार्च को सुबह 11:48 बजे से शुरू होकर अगले दिन 27 मार्च को सुबह 10:06 बजे तक रहेगी। ऐसे में समान्य जन रामनवमी का पर्व 26 मार्च को मनाएंगे जबकि वैष्णव परंपरा से जुड़े लोग उदया तिथि के आधार पर 27 मार्च 2026 को रामनवमी मनाएंगे। रामनवमी के दिन श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या में उत्सवों का विशेष आयोजन होता है, जिनमें भाग लेने के लिए देशभर से हजारों भक्तगण अयोध्या पहुंचते हैं तथा अयोध्या स्थित सरयू नदी में पवित्र स्नान कर पंचकोसी की परिक्रमा करते हैं। समूची अयोध्या नगरी इस दिन पूरी तरह राममय नजर आती है और हर तरफ भजन-कीर्तनों तथा अखण्ड रामायण के पाठ की गूंज सुनाई पड़ती है। देशभर में अन्य स्थानों पर भी जगह-जगह इस दिन श्रद्धापूर्वक हवन, व्रत, उपवास, यज्ञ, दान-पुण्य आदि विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है।</div><div><br></div><div>मान्यता है कि त्रेता युग में इसी दिन अयोध्या के महाराजा दशरथ की पटरानी महारानी कौशल्या ने मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम को जन्म दिया था। श्रीराम का चरित्र बेहद उदार प्रवृत्ति का था। उन्होंने उस अहिल्या का भी उद्धार किया, जिसे उसके पति ने देवराज इन्द्र द्वारा छलपूर्वक उसका शीलभंग किए जाने के कारण पतित घोषित कर पत्थर की मूर्त बना दिया था। जिस अहिल्या को निर्दोष मानकर किसी ने नहीं अपनाया, उसे भगवान श्रीराम ने अपनी छत्रछाया प्रदान की। लोगों को गंगा नदी पार कराने वाले एक मामूली से नाविक केवट की अपने प्रति अपार श्रद्धा व भक्ति से प्रभावित होकर भगवान श्रीराम ने उसे अपने छोटे भाई का दर्जा दिया और उसे मोक्ष प्रदान किया। अपनी परम भक्त शबरी नामक भीलनी के झूठे बेर खाकर शबरी का कल्याण किया।</div><div><br></div><div>महारानी केकैयी ने महाराजा दशरथ से जब राम को 14 वर्ष का वनवास दिए जाने और अपने लाड़ले पुत्र भरत को राम की जगह राजगद्दी सौंपने का वचन मांगा तो दशरथ गंभीर धर्मसंकट में फंस गए थे। वह बिना किसी कारण राम को 14 वर्ष के लिए वनों में भटकने के लिए भला कैसे कह सकते थे और श्रीराम में तो वैसे भी उनके प्राण बसते थे। दूसरी ओर वचन का पालन करना रघुकुल की मर्यादा थी। ऐसे में जब श्रीराम को माता केकैयी द्वारा यह वचन मांगने और अपने पिता महाराज दशरथ के इस धर्मसंकट में फंसे होने का पता चला तो उन्होंने खुशी-खुशी उनकी यह कठोर आज्ञा भी सहज भाव से शिरोधार्य की और उसी समय 14 वर्ष का वनवास भोगने तथा छोटे भाई भरत को राजगद्दी सौंपने की तैयारी कर ली। श्रीराम द्वारा लाख मना किए जाने पर भी उनकी पत्नी सीता जी और अनुज लक्ष्मण भी उनके साथ वनों में निकल पड़े।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-rama-the-symbol-of-social-harmony" target="_blank">सामाजिक समरसता के प्रतीक भगवान श्रीराम</a></h3><div>वनवास की यात्रा की शुरूआत श्रृंगवेरपुर नामक स्थान से प्रारंभ कर वहां से वे भारद्वाज मुनि के आश्रम में चित्रकूट पहुंचे। उसके बाद विभिन्न स्थानों की यात्रा के दौरान पंचवटी में उन्होंने अपनी कुटिया बनाने का निश्चय किया। यहीं पर रावण की बहन शूर्पणखां की नाक काटे जाने की घटना हुई। उसी घटना के कारण वहां खर-दूषण सहित 14000 राक्षस राम-लक्ष्मण के हाथों मारे गए। यहीं से श्रीराम व लक्ष्मण की अनुपस्थिति में लंका का राजा रावण माता सीता का अपहरण कर उन्हें अपने साथ लंका ले गया।</div><div><br></div><div>कहा जाता है कि जब सीता का विरह श्रीराम से नहीं सहा गया तो उन्होंने साधारण मनुष्य की भांति विलाप किया लेकिन हिम्मत न हारते हुए सीता जी की खोज में राम-लक्ष्मण जंगलों में भटकने लगे। इसी दौरान उनकी भेंट श्रीराम के अनन्य भक्त हनुमान से हुई, जिन्होंने राम-लक्ष्मण को वानरराज बाली के छोटे भाई सुग्रीव से मिलाया, जो उस समय बाली के भय से यहां-वहां छिपता फिर रहा था। श्रीराम ने बाली का वध करके सुग्रीव तथा बाली के पुत्र अंगद को किष्किंधा का शासन सौंपा और उसके बाद सुग्रीव की वानरसेना के नेतृत्व में लंका पर आक्रमण कर देवताओं पर भी विजय पाने वाले महाप्रतापी, महाबली, महापंडित तथा भगवान शिव के घोर उपासक लंका नरेश राक्षसराज रावण का वध कर सीता को उसके बंधन से मुक्त कराया और लंका पर खुद अपना अधिकार न जमाकर लंका का शासन रावण के छोटे भाई विभीषण को सौंप दिया तथा वनवास की अवधि समाप्त होने पर भैया लक्ष्मण, सीता जी व हनुमान सहित अयोध्या लौट आए।</div><div><br></div><div>वास्तव में विधि के विधान के अनुसार राम को दुष्ट राक्षसों का विनाश करने के लिए ही वनवास मिला था। उन्होंने अपने मानव अवतार में न तो भगवान श्रीकृष्ण की भांति रासलीलाएं खेली और न ही कदम-कदम पर चमत्कारों का प्रदर्शन किया बल्कि उन्होंने सृष्टि के समक्ष अपने क्रियाकलापों के जरिये ऐसा अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसकी वजह से उन्हें ‘मर्यादा पुरूषोत्तम’ कहा गया।</div><div><br></div><div>जहां तक राम-रावण के बीच हुए भीषण युद्ध की बात है तो वह सिर्फ दो राजाओं के बीच का सामान्य युद्ध नहीं था बल्कि दो विचारधाराओं का संघर्ष था, जिसमें एक मानव संस्कृति थी तो दूसरी राक्षसी संस्कृति। एक ओर क्षमादान की भावना को महत्व देने वाले व जनता के दुख-दर्द को समझने एवं बांटने वाले वीतरागी भाव थे तो दूसरी ओर दूसरों का सब कुछ हड़प लेने की राक्षसी प्रवृत्ति। रावण अन्याय, अत्याचार व अनाचार का प्रतीक था तो श्रीराम सत्य, न्याय एवं सदाचार के। यही नहीं, सीता जी के अपहरण के बाद भी श्रीराम ने अपनी मर्यादाओं को कभी तिलांजलि नहीं दी। उन्होंने इसके बाद भी रावण को एक महाज्ञानी के रूप में सदैव सम्मान दिया और यह इससे साबित भी हुआ कि रावण की मृत्यु से कुछ ही क्षण पूर्व श्रीराम ने लक्ष्मण को रावण के पास ज्ञान अर्जन के लिए भेजा था। मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम में सभी के प्रति प्रेम की अगाध भावना कूट-कूटकर भरी थी। उनकी प्रजा वात्सल्यता, न्यायप्रियता और सत्यता के कारण ही उनके शासन को आज भी ‘आदर्श’ शासन की संज्ञा दी जाती है और आज भी अच्छे शासन को ‘रामराज्य’ कहकर परिभाषित किया जाता है। ‘रामराज्य’ यानी सुख, शांति एवं न्याय का राज्य।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ पुस्तक के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 27 Mar 2026 11:02:17 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/the-ideals-of-maryada-purushottam-lord-rama-will-forever-remain-exemplary</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mangalnath Temple: Mangal Dosh से हैं परेशान, Ujjain के इस मंदिर में Bhaat Puja से मिलती है सभी कष्टों से मुक्ति]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/troubled-by-mangal-dosh-performing-bhaat-puja-at-ujjain-temple-provides-relief-from-all-troubles]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ज्योतिष शास्त्र में मंगल देव को साहस, ऊर्जा, विवाह और शक्ति का कारक माना जाता है। लेकिन जब कुंडली में मंगल की स्थिति प्रतिकूल होती है, तो इसको 'मंगल दोष' या 'मांगलिक दोष' भी कहा जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति के विवाह में देरी, कर्ज, ज्यादा क्रोध और पारिवारिक कलह जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए भारत में कुछ विशेष मंदिर और उपायों के बारे में बताया गया है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको उज्जैन में स्थित मंगलनाथ मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>मंगलनाथ मंदिर, उज्जैन</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित मंगलनाथ मंदिर को मंगल देव का जन्मस्थान माना जाता है। शिप्रा नदी के तट पर स्थित यह मंदिर पूरे विश्व में मंगल दोष के निवारण के लिए प्रमुख केंद्र है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/hanuman-footprints-still-present-in-shimla-jakhu-temple-mystery-connected-to-sanjivani" target="_blank">Jakhu Temple: Shimla के Jakhu Temple में आज भी मौजूद हैं Hanuman के पदचिन्ह, संजीवनी से जुड़ा है गहरा रहस्य</a></h3><div><br></div><h2>क्यों खास है पूजा</h2><div>पुराणों के मुताबिक मंगल देव की उत्पत्ति भगवान शिव के पसीने की बूंद से हुई थी। यहां की जाने वाली 'भात पूजा' का विशेष महत्व होता है। माना जाता है कि चावल की प्रकृति ठंडी होती है और इससे मंगल देव का उग्र स्वभाव शांत होता है। वहीं भक्तों को मांगलिक दोष के निगेटिव प्रभावों से मुक्ति मिलती है।</div><div><br></div><h2>अत्यंत प्राचीन मंदिर</h2><div>महाराष्ट्र के जलगांव जिले में स्थित अमलनेर मंगल देव मंदिर भी भक्तों के लिए विशेष श्रद्धा का केंद्र है। यहां मंगल देव की अत्यंत दुर्लभ प्रतिमा स्थापित है। मंगलवार के दिन यहां विशेष अभिषेक और शांति पाठ किया जाता है, जिससे जीवन की बाधाएं दूर होती हैं।</div><div><br></div><h2>मंगल दोष दूर करने के उपाय</h2><div>अगर किसी जातक की कुंडली में मंगल भारी है या फिर आप इसके दोष से परेशान हैं, तो आप इन उपायों को अपना सकते हैं।</div><div><br></div><h2>हनुमान जी की शरण में जाएं</h2><div>मंगल देव के इष्ट देव भगवान बजरंगबली हनुमान हैं। इसलिए मंगलवार के दिन हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ करने से मंगल के अशुभ प्रभाव फौरन कम होने लगते हैं।</div><div><br></div><h2>विशेष दान</h2><div>मंगलवार के दिन लाल मसूर की दाल, तांबे के बर्तन, लाल वस्त्र या गुड़ आदि का दान करना बेहद शुभ माना जाता है।</div><div><br></div><h2>मंत्र जाप</h2><div>रोजाना 'ऊँ भौमाय नम:' या 'ऊँ अंगारकाय नम:' मंत्र का 108 बार जाप करना चाहिए। इससे मन शांत रहता है और कर्ज से मुक्ति मिलती है।</div><div><br></div><h2>मिट्टी का उपाय</h2><div>मंगल को 'भूमि पुत्र' कहा जाता है। मंगल दोष निवारण के लिए मिट्टी के शिवलिंग की पूजा करना शुभ फलदायी होता है।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>जो भी लोग मंगल दोष की वजह से वैवाहिक समस्याओं का सामना कर रहे हैं। उनको कम से कम 21 मंगलवार व्रत करना चाहिए। इस दिन नमक का सेवन नहीं करना चाहिए और शाम को हनुमान जी को फलाहार लगाना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 27 Mar 2026 10:36:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/troubled-by-mangal-dosh-performing-bhaat-puja-at-ujjain-temple-provides-relief-from-all-troubles</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Jakhu Temple: Shimla के Jakhu Temple में आज भी मौजूद हैं Hanuman के पदचिन्ह, संजीवनी से जुड़ा है गहरा रहस्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/hanuman-footprints-still-present-in-shimla-jakhu-temple-mystery-connected-to-sanjivani]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देवभूमि हिमाचल की सुंदरता और कई चमत्कारी मंदिरों के कारण यह देश-विदेश में प्रसिद्ध है। यहां पर कई देवी-देवताओं के मंदिर स्थित हैं। जो किसी मान्यता की वजह से आस्था के केंद्र बने हुए हैं। इन्हीं मंदिरों में शिमला का जाखू मंदिर भी शामिल है। यह मंदिर शिमला की सबसे ऊंची चोटी, जिसकी ऊंचाई 2,438 मीटर है पर स्थित है। इस मंदिर में बजरंगबली हनुमान जी की मूर्ति स्थापित है। इस मंदिर को विश्व की सबसे बड़ी मूर्ति के लिए जाना जाता है।</div><div><br></div><div>ऐसा दावा भी किया जाता है कि मंदिर में आज भी हनुमानजी के पैरों के निशान मौजूद हैं। पौराणिक मान्यता के मुताबिक जाखू मंदिर में भगवान हनुमान जी ने संजीवनी बूटी को ले जाते समय विश्राम किया था। तो आइए जानते हैं इस मंदिर के रोचक रहस्य के बारे में...</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-rama-the-symbol-of-social-harmony" target="_blank">सामाजिक समरसता के प्रतीक भगवान श्रीराम</a></h3><div><br></div><h2>इस स्थान पर किया था विश्राम</h2><div>पौराणिक मान्यता के मुताबिक जब युद्ध के दौरान लक्ष्मण जी मेघनाथ की शक्ति बाण से मूर्छित हो गए थे। तो उनको बचाने के लिए हनुमान जी हिमालय से संजीवनी बूटी लेने के लिए गए थे। इस दौरान हनुमान जी की नजर जाखू पहाड़ी पर पड़ी। यहां पर यक्ष ऋषि तपस्या कर रहे थे। तब संजीवनी बूटी की जानकारी लेने और विश्राम के लिए हनुमानजी जाखू पहाड़ी पर उतरे थे। हनुमान जी के पैर रखने से यह पहाड़ी धंस गई थी। इस कारण आज भी ऊपर से जाखू पहाड़ी चपटी दिखती है।</div><div><br></div><div>जब हनुमान जी वापस जाने लगे, तो लौटते समय उन्होंने यक्ष ऋषि से दर्शन देने का वचन दिया। लेकिन कालनेमि राक्षस से युद्ध के कारण ऋषि को दर्शन नहीं दिए। ऋषि के व्याकुल होने पर हनुमान जी ने दर्शन दिए। जिसके बाद जाखू पहाड़ी पर हनुमान जी की एक स्वयंभू मूर्ति प्रकट हुई और ऋषि ने हनुमान जी का मंदिर बनवाया। बताया जाता है कि जाखू मंदिर में आज भी हनुमान जी के पैरों के निशान सुरक्षित है। मंदिर में भक्त पहाड़ी जी के पदचिन्हों की पूजा-अर्चना करते हैं और उनकी कृपा पाते हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 15:09:14 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/hanuman-footprints-still-present-in-shimla-jakhu-temple-mystery-connected-to-sanjivani</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[सामाजिक समरसता के प्रतीक भगवान श्रीराम]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-rama-the-symbol-of-social-harmony]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत विविधतापूर्ण भाषा संस्कृति वाला देश है। देश को एक सूत्र में पिरोकर रखने के लिए ऐसे नेतृत्व की सदैव आवश्यकता रही है जो समस्त विविधताओं में समन्वय स्थापित कर सामाजिक व्यवस्था में समरसता बनाए रख सके। इस दृष्टि से मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम सामाजिक समरसता के अग्रदूत हैं। हमारे वेद तथा धर्मशास्त्रों में धर्म के स्वरूप व आचार-विचार की विवेचना तो है किन्तु सामाजिक जीवन में उसको व्यवहार में कैसे लाया जाये, इसका आदर्श उदाहरण भगवान श्रीराम के जीवन चरित्र में ही दृष्टिगोचर होता है। समस्त लौकिक व अलौकिक गुणों का जो समावेश भगवान श्रीराम के जीवन में स्पष्ट होता है वह अन्यत्र दुर्लभ है। एक साधारण मनुष्य के रूप में समस्त सामाजिक, नैतिक और राजनैतिक मर्यादाओं का जैसा पालन श्रीराम ने किया है वैसा कोई अन्य उदाहरण विश्व साहित्य में भी उपलब्ध नहीं है।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>विपरीत परिस्थितियों में जीवन से हार मान लेने वाले निराश-हताश व्यक्तियों के लिए भगवान श्रीराम का जीवन एक प्रेरणा का स्रोत है। उनके जीवन में कई बार ऐसी विषम परिस्थितियां उत्पन्न हुईं जिनमें सामान्य व्यक्ति या तो निराशा के गर्त में गिरकर अपना जीवन नष्ट कर लेता है अथवा ईर्ष्या -क्रोध के वशीभूत होकर पारिवारिक तथा सामाजिक सदाचार व नैतिक मर्यादाओं का उल्लंघन कर बैठता है लेकिन भगवान श्रीराम ने इन विपरीत परिस्थितियों में न केवल सदाचार व नैतिक मर्यादाओं की प्रतिष्ठा की अपितु समन्वय तथा समरसता की भावना भी मजबूत की।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/shri-ram-the-global-leader-of-propriety-good-governance-and-peace" target="_blank">मर्यादा, सुशासन और शांति के विश्वनायक श्रीराम</a></h3><div>ये भगवान श्रीराम ही थे जिन्होंने राज्याभिषेक के समय माता कैकेयी द्वारा चौदह वर्ष के वनवास के आदेश को न केवल सहर्ष स्वीकार किया अपितु माता कैकेयी के प्रति भी उनके मन में किंचित भी क्रोध, द्वेष या प्रतिकार की भावना उत्पन्न नहीं हुई। वे माता कौशल्या की भांति ही कैकेयी के प्रति भी आदर का भाव रखते रहे। अनुज लक्ष्मण जब कैकेयी की निंदा करते हैं तो वे तुरंत लक्ष्मण को रोकते हैं। साथ ही भाई भरत व शत्रुघ्न के प्रति लक्ष्मण के मन का संशय भी दूर करते हैं। अनुज भरत व शत्रुघ्न जब वनवास के लिए मन्थरा व कैकेयी के प्रति अपना क्रोध प्रकट करते हैं तब श्रीराम उन्हें भी शांत करते हैं। परिवार में समरसता स्थापित करने का ऐसा कोई उदाहरण नहीं है।&nbsp;</div><div><br></div><div>श्रीराम ने वनवासी जीवन में उत्तर से दक्षिण तक विभिन्न जातियों व वर्गो के मध्य परस्पर प्रेम व विश्वास की भावना का संचार किया। निषादराज गुह के यहां रुक कर और उन्हें गले लगाकर भगवान श्रीराम ने सामाजिक समरसता का संदेश दिया। शबरी के झूठे बेर खाकर प्रेम व स्नेह का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। समाज के पिछड़े, दलित, वंचित लोग भी सम्मानपूर्ण जीवन के अधिकारी हैं इस शिक्षा के लिए श्रीराम का जीवन आदर्श है। इसी प्रकार केवट को पारिश्रमिक देने की बात भी अत्यंत महत्वपूर्ण है बिना पारिश्रमिक दिए किसी श्रमिक से कार्य करवाना भी अन्याय है, निर्धनों का शोषण है। गुणवान होने के साथ ही भगवान श्रीराम धर्म व अर्थ तत्व को भी जानते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>सामाजिक समरसता की स्थापना के लिए भगवान श्रीराम ने सदा न्याय का साथ दिया और अन्याय के विरुद्ध खड़े हुये। इसका सुंदर उदारहण बालि वध का प्रसंग है। बालि ने जब धर्म की दुहाई देते हुए श्रीरामजी के कार्य को अन्याय बताया तो उन्होंने उसकी बात का खण्डन करते हुए कहा कि -”बालि तुम्हें तुम्हारे पाप का ही दण्ड मिला है।तुमने अपने छोटे भाई की स्त्री को जो तुम्हारी कन्या के समान है बलपर्वूक रख लिया हैअतः तुम्हें दण्ड&nbsp; देकर मैने राजधर्म, मित्रधर्म एवं प्रतिज्ञा का पालन किया है।“&nbsp;</div><div><br></div><div>अपने इन्हीं गुणों के कारण भगवान श्रीराम रीछ, भालू और वानरों की सेना संगठित करने में सफल हुए। इतना ही नहीं उन्होनें अपने शरणागत रक्षा धर्म का पालन करते हुए रावण को छोड़कर आए उसके लधुभ्राता विभीषण को अपनाने में एक क्षण भी नहीं लगाया। इसके साथ ही भगवान श्रीराम कृतज्ञ हैं। मन पर नियंत्रण होने के कारण वे दूसरों के द्वारा किये गये अपराधों को भी भुला देते हैं किन्तु यदि कोई किसी प्रकार एक बार भी उपकार कर देता है तो उसी से वे संतुष्ट रहते हैं और उसको याद रखते हैं। राज्याभिषेक के बाद हनुमान जी को विदा करते हुए कहते हैं-“ हे कपिश्रेष्ठ! मुझ पर तुम्हारे ऐसे उपकार हैं कि उनमें एक- एक के बदले अपने प्राण तक दे सकता हूं। फिर भी शेष उपकारों के लिए मुझे तुम्हारा ऋणी बनकर ही रहना होगा। कपिवर तुमने जो भी उपकार किए हैं वे सब मेरे शरीर में ही विलीन हो जाएं अर्थात तुम पर कभी कोई विपत्ति आए ही नहीं। मनुष्य विपत्तियों में पड़ने पर ही प्रत्युपकार का पात्र बनता है।”&nbsp;</div><div><br></div><div>सामाजिक समन्वय स्थापित करते हुए श्रीरामचन्द्र जी ने राजधर्म का निर्वहन जिस परिपक्वता से किया उसके कारण ही रामराज्य आज की एक आदर्श राज्य संकल्पना है, जिसमें प्रजा में शारीरिक तथा भौतिक किसी भी प्रकार को कोई कष्ट नहीं थे। सदभाव, सद्विचार तथा सद्भावना और परमार्थ ही परम लक्ष्य होने के कारण प्रजा में परस्पर प्रेम व स्नेह था। छोटे- बड़े ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं था। आर्थिक विषमता नहीं थी। चोरी, डकैती और दुराचार&nbsp; जैसे जघन्य अपराध नहीं होते थे।अतः प्रजा सभी प्रकार से सुख का अनुभव करती हुई धर्माचरण में निमग्न थी। इसलिए मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम आज भी जन-जन के नायक व आराध्य है। जिनके चरणों में भक्त अपना तन-मन-धन समर्पित करके इहलोक और परलोक को सफल बनाते हैं। भगवान श्रीराम ही नहीं अपितु पूरे श्रीराम दरबार के सभी सदस्य मर्यादा और अनुशासन का अनुपम उदाहरण हैं। भगवान श्रीराम के जीवन को यदि आज का युवा आदर्श मान कर चले तो आज भी रामराज&nbsp; स्थापित होने में कतई देर नहीं लगेगी आवश्यकता है भगवान श्रीराम के जीवन के आदर्शों को आधुनिक शैली में अपनाने की।</div><div><br></div><div>भगवान श्रीराम की कृपा से अयोध्या में अब उनके जन्मस्थान पर दिव्य व भव्य राम मंदिर बनकर तैयार हो चुका है तथा लाखों की संख्या में रामभक्त श्रद्धालु अयोध्या पहुंचकर भाव विभोर हो रहे हैं। अयोध्या में राम मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह मंदिर भी सामाजिक समरसता का एक बहुत बड़ा सन्देश दे रहा हे। अयोध्या की धरती पर&nbsp; माता शबरी का भी मंदिर है, महर्षि वाल्मीकि, वशिष्ठ जी महर्षि वेद व्यास सहित संत रविदास जी का मंदिर भी बन चुका है। इन सभी संत पुरुषों के मंदिरों के दर्शन करके मन में सामाजिक समरसता का भाव जाग्रत होना स्वाभविक ही है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>- मृत्युंजय दीक्षित</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 17:23:11 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-rama-the-symbol-of-social-harmony</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Famous Temple: Assam का रहस्यमयी Vishnu Temple, जहां मन्नत पूरी होने पर चढ़ाए जाते हैं जिंदा कछुए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mysterious-vishnu-temple-of-assam-where-live-turtles-offered-upon-fulfillment-of-wishes]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत के असम राज्य में कामरूप जिले के हाजो में श्री हयग्रीव माधव मंदिर स्थित है। यह मंदिर न सिर्फ अपनी वास्तुकला बल्कि अनोखी परंपराओं के लिए भी फेमस है। मणिकूट पर्वत पर बना यह मंदिर सदियों से बौद्ध और हिंदू धर्म के लोगों के लिए बड़ा आस्था का केंद्र रहा है। इस मंदिर की खासियत यह है कि भक्त भगवान श्रीविष्णु को प्रसन्न करने के लिए कछुए का चढ़ावा करते हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको इस मंदिर का महत्व, अनूठी परंपरा और बौद्ध धर्म से खास जुड़ाव के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>मंदिर का पौराणिक महत्व</h2><div>इस मंदिर का इतिहास काफी प्राचीन है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक यहां भगवान श्रीविष्णु के 'हयग्रीव' अवतार की पूजा की जाती है। माना जाता है कि श्रीविष्णु ने इसी स्थान पर मधु-कैटभ नामक दोनों राक्षसों का वध किया था।</div><div><br></div><div>माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 1583 में कोच राजा रघुदेव नारायण द्वारा कराया गया था। वहीं कुछ लोग 100 साल से भी ज्यादा प्राचीन काल के ध्वस्त मंदिर का पुनर्निर्मित रूप मानते हैं। यह मंदिर पत्थरों से बना है और इसकी दीवारों पर हाथियों और अन्य पौराणिक आकृतियों की बेहद सुंदर नक्काशी बनी है।</div><div>&nbsp;&nbsp;</div><h2>जानिए अनूठी परंपरा</h2><div>इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यहां का 'माधव पुखरी' है। इस तालाब में सैकड़ों दुर्लभ प्रजाति के कछुए रहते हैं। यहां की परंपरा है कि भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने पर या फिर भगवान को श्रद्धा अर्पित करने के लिए कछुओं को खाना खिलाते हैं। या फिर तालाब में कछुए छोड़ते हैं। इन कछुओं को भगवान विष्णु का कूर्म अवतार माना जाता है। वहीं स्थानीय लोग इन कछुओं की सुरक्षा का खास ख्याल रखते हैं और इनको कभी नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।</div><div><br></div><h2>बौद्ध धर्म से जुड़ाव</h2><div>हयग्रीव माधव मंदिर की खासियत यह भी है कि यहां पर सिर्फ हिंदू ही नहीं बल्कि भारी संख्या में बौद्ध अनुयायी भी आते हैं। तिब्बती बौद्धों का मानना है कि यह वही स्थान है, जहां पर स्वयं भगवान बुद्ध ने निर्वाण प्राप्त किया था। इस कारण बौद्ध अनुयायी इस मंदिर को काफी पवित्र मानते हैं और इसको 'महामुनि' का मंदिर कहते हैं।</div><div><br></div><div>श्री हयग्रीव माधव मंदिर संस्कृति, धर्म और वन्यजीव संरक्षण का एक अनूठा उदाहरण है। यहां की शांति और सदियों पुरानी परंपराएं इसको भारत के अन्य मंदिरों से अलग बनाती हैं। वहीं अगर आप असम की यात्रा पर जा रहे हैं, तो हाजो के इस फेमस मंदिर के दर्शन करना न भूलें।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 16:00:40 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mysterious-vishnu-temple-of-assam-where-live-turtles-offered-upon-fulfillment-of-wishes</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Guruvar Puja Mantra: विष्णु जी को प्रिय तुलसी के ये नाम, जपते ही घर में होगी धन की वर्षा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/chanting-these-names-of-tulsi-dear-to-lord-vishnu-bring-wealth-to-your-home]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में गुरुवार का दिन जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित होता है। इस दिन भगवान विष्णु संग देवताओं के गुरु बृहस्पति की भी पूजा की जाती है। वहीं मनचाही मनोकामना पाने के लिए गुरुवार का व्रत किया जाता है। यह व्रत विवाहित और अविवाहित महिलाएं करती हैं। इस व्रत को करने से जातक के सभी मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। वहीं जगत के पालनहार श्रीविष्णु को देवी मां तुलसी अतिप्रिय हैं। इसलिए रविवार छोड़कर रोजाना तुलसी मां की पूजा की जानी चाहिए। गुरुवार के दिन तुलसी मां की विशेष पूजा और आरती करनी चाहिए। इससे घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है।</div><div><br></div><div>ऐसे में अगर आप भी सुख-सौभाग्य में वृद्धि पाना चाहते हैं, तो आपको गुरुवार के दिन भगवान श्रीविष्णु की पूजा के समय तुलसी मां के नामों का जप करना जरूरी है। वहीं गुरुवार को किसी भी समय आप तुलसी माला से तुलसी के नामों का जप कर सकते हैं।</div><div><br></div><h2>तुलसी माता के नाम</h2><div>ॐ श्री तुलस्यै नमः</div><div>ॐ नन्दिन्यै नमः</div><div>ॐ देव्यै नमः</div><div>ॐ शिखिन्यै नमः</div><div>ॐ धारिण्यै नमः</div><div>ॐ धात्र्यै नमः</div><div>ॐ सावित्र्यै नमः</div><div>ॐ सत्यसन्धायै नमः</div><div>ॐ कालहारिण्यै नमः</div><div>ॐ गौर्यै नमः</div><div>ॐ देवगीतायै नमः</div><div>ॐ द्रवीयस्यै नमः</div><div>ॐ पद्मिन्यै नमः</div><div>ॐ सीतायै नमः</div><div>ॐ रुक्मिण्यै नमः</div><div>ॐ प्रियभूषणायै नमः</div><div>ॐ श्रेयस्यै नमः</div><div>ॐ श्रीमत्यै नमः</div><div>ॐ मान्यायै नमः</div><div>ॐ गौर्यै नमः</div><div>ॐ गौतमार्चितायै नमः</div><div>ॐ त्रेतायै नमः</div><div>ॐ त्रिपथगायै नमः</div><div>ॐ त्रिपादायै नमः</div><div>ॐ त्रैमूर्त्यै नमः</div><div>ॐ जगत्रयायै नमः</div><div>ॐ त्रासिन्यै नमः</div><div>ॐ गात्रायै नमः</div><div>ॐ गात्रियायै नमः</div><div>ॐ गर्भवारिण्यै नमः</div><div>ॐ शोभनायै नमः</div><div>ॐ समायै नमः</div><div>ॐ द्विरदायै नमः</div><div>ॐ आराद्यै नमः</div><div>ॐ यज्ञविद्यायै नमः</div><div>ॐ महाविद्यायै नमः</div><div>ॐ गुह्यविद्यायै नमः</div><div>ॐ कामाक्ष्यै नमः</div><div>ॐ कुलायै नमः</div><div>ॐ श्रीयै नमः</div><div>ॐ भूम्यै नमः</div><div>ॐ भवित्र्यै नमः</div><div>ॐ सावित्र्यै नमः</div><div>ॐ सरवेदविदाम्वरायै नमः</div><div>ॐ शंखिन्यै नमः</div><div>ॐ चक्रिण्यै नमः</div><div>ॐ चारिण्यै नमः</div><div>ॐ चपलेक्षणायै नमः</div><div>ॐ पीताम्बरायै नमः</div><div>ॐ प्रोत सोमायै नमः</div><div>ॐ सौरसायै नमः</div><div>ॐ अक्षिण्यै नमः</div><div>ॐ अम्बायै नमः</div><div>ॐ सरस्वत्यै नमः</div><div>ॐ सम्श्रयायै नमः</div><div>ॐ सर्व देवत्यै नमः</div><div>ॐ विश्वाश्रयायै नमः</div><div>ॐ सुगन्धिन्यै नमः</div><div>ॐ सुवासनायै नमः</div><div>ॐ वरदायै नमः</div><div>ॐ सुश्रोण्यै नमः</div><div>ॐ चन्द्रभागायै नमः</div><div>ॐ यमुनाप्रियायै नमः</div><div>ॐ कावेर्यै नमः</div><div>ॐ मणिकर्णिकायै नमः</div><div>ॐ अर्चिन्यै नमः</div><div>ॐ स्थायिन्यै नमः</div><div>ॐ दानप्रदायै नमः</div><div>ॐ धनवत्यै नमः</div><div>ॐ सोच्यमानसायै नमः</div><div>ॐ शुचिन्यै नमः</div><div>ॐ श्रेयस्यै नमः</div><div>ॐ प्रीतिचिन्तेक्षण्यै नमः</div><div>ॐ विभूत्यै नमः</div><div>ॐ आकृत्यै नमः</div><div>ॐ आविर्भूत्यै नमः</div><div>ॐ प्रभाविन्यै नमः</div><div>ॐ गन्धिन्यै नमः</div><div>ॐ स्वर्गिन्यै नमः</div><div>ॐ गदायै नमः</div><div>ॐ वेद्यायै नमः</div><div>ॐ प्रभायै नमः</div><div>ॐ सारस्यै नमः</div><div>ॐ सरसिवासायै नमः</div><div>ॐ सरस्वत्यै नमः</div><div>ॐ शरावत्यै नमः</div><div>ॐ रसिन्यै नमः</div><div>ॐ काळिन्यै नमः</div><div>ॐ श्रेयोवत्यै नमः</div><div>ॐ यामायै नमः</div><div>ॐ ब्रह्मप्रियायै नमः</div><div>ॐ श्यामसुन्दरायै नमः</div><div>ॐ रत्नरूपिण्यै नमः</div><div>ॐ शमनिधिन्यै नमः</div><div>ॐ शतानन्दायै नमः</div><div>ॐ शतद्युतये नमः</div><div>ॐ शितिकण्ठायै नमः</div><div>ॐ प्रयायै नमः</div><div>ॐ धात्र्यै नमः</div><div>ॐ श्री वृन्दावन्यै नमः</div><div>ॐ कृष्णायै नमः</div><div>ॐ भक्तवत्सलायै नमः</div><div>ॐ गोपिकाक्रीडायै नमः</div><div>ॐ हरायै नमः</div><div>ॐ अमृतरूपिण्यै नमः</div><div>ॐ भूम्यै नमः</div><div>ॐ श्री कृष्णकान्तायै नमः</div><div>ॐ श्री तुलस्यै नमः</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 09:42:01 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/chanting-these-names-of-tulsi-dear-to-lord-vishnu-bring-wealth-to-your-home</link>
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