सबके निशाने पर थी कांग्रेस, 9 हफ्तों का अभियान, 300 से ज्यादा रैलियां, 25,000 मील सफर, देश के पहले आम चुनाव में नेहरू ने कैसे संभाला मोर्चा

first general elections
Prabhasakshi
अभिनय आकाश । Mar 16 2024 1:59PM

आज से करीब 72 साल पहले 25 अक्टूबर को भारत में लोकसभा का पहला चुनाव शुरू हुआ। जो लगभग पांच महीनों तक चला था। उस समय भारत के लोगों के लिए आजादी बिल्कुल नई चीजें थी।

भरूच में विभिन्न केंद्र सरकार की योजनाओं के लाभार्थी के बीच एक बैठक में वस्तुतः बोलते हुए देश के प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार कहा कि एक बहुत वरिष्ठ विपक्षी नेता ने एक बार उनसे पूछा था कि दो बार पीएम बनने के बाद उनके पास करने के लिए और क्या बचा है? मोदी ने कहा कि वह तब तक चैन से नहीं बैठेंगे जब तक देश में सरकारी योजनाओं का शत-प्रतिशत कवरेज नहीं हो जाता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के 10 साल पूरे होने को है और अबकी बार 400 पार के नारे के साथ एनडीए तीसरे कार्यकाल के लिए तैयार हैं। सात दशकों से अधिक वर्षों में देश ने सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों से भरी यात्रा के दौरान 15 प्रधानमंत्रियों को देखा है। एक बार फिर 18वीं लोकसभा के चयन के लिए देश चुनावी मोड में जाने वाला है। लेकिन आज आपको हम इन चुनावों या उसके आने वाले नतीजों को लेकर कुछ भी नहीं बताने जा रहे हैं। बल्कि आज आपको चुनाव के इतिहास में लेकर जा रहे हैं। अगर मैं आपसे सवाल करूं कि भारत आजाद कब हुआ? आप फट से 15 अगस्त 1947 कहेंगे। अगर मैं आपसे कहूं कि भारत गणतंत्र कब बना? आप कहेंगे 26 जनवरी 1950, हम आपका कोई जीके का टेस्ट नहीं ले रहे हैं। लेकिन अगर मैं आपसे पूछूं कि भारत लोकतंत्र कब बना। जाहिर सी बात है लोकतंत्र अंग्रेजों से तो हमें मिला नहीं। दरअसल, 26 जनवरी की घोषणा तो हो गई थी लेकिन थ्योरी में और प्रैक्टिकल अभी बाकी थी। सारे सवालों के जवाब हमारे संविधान में छिपा था जो ये तय करता कि हमारा गणतंत्र और हमारा लोकतंत्र कैसा होगा। भारत को लोकतंत्र होना था और उसके लिए जरूरी था चुनाव करवाना। चुनाव लोकतंत्र की एक आवश्यक शर्त है। आज से करीब 72 साल पहले 25 अक्टूबर को भारत में लोकसभा का पहला चुनाव शुरू हुआ। जो लगभग पांच महीनों तक चला था। उस समय भारत के लोगों के लिए आजादी बिल्कुल नई चीजें थी। हमारे पास आजादी का अनुभव केवल चार वर्ष का था लेकिन गुलामी का अनुभव करीब 800 वर्षों का था। कल्पना कीजिए जो देश 800 सालों से गुलाम था वो अचानक आजाद हुआ और इससे पहले वो देश भी नहीं था। देश बना, गणतंत्र  बना और फिर वहां अचानक से चुनाव हुए। कहा गया कि ये लोकतंत्र बनेगा। लेकिन किसी ने भी लोकतंत्र को देखा नहीं था जाना नहीं था। 

इसे भी पढ़ें: क्या केंद्र के बनाए किसी कानून को राज्य अपने यहां लागू करने से कर सकता है इनकार? नागरिकता के सवाल पर संविधान सभा में हुई थी जबरदस्त बहस

ऐसे हुआ था भारत का पहला आम चुनाव

पहला आम चुनाव 25 अक्टूबर 1951 से 27 मार्च 1952 के बीच हुआ था

 चुनाव के लिए करीब 1874 उम्मीदवारों और 53 पार्टियों ने चुनाव लड़ा था

पार्टियों ने 489 सीटों पर चुनाव लड़ा

कांग्रेस ने 364 सीटों के साथ चुनाव जीता क्योंकि लोगों ने उस पार्टी को वोट दिया जिसका नेतृत्व जवाहरलाल नेहरू ने किया था

भाकपा वह पार्टी है जो 16 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही क्योंकि उन्हें लगभग 3.29 प्रतिशत वोट मिले

एसओसी 10.59 फीसदी वोटों के साथ चुनाव में तीसरे स्थान पर रही और 12 सीटों पर जीत हासिल की

पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए कुल वोटों का लगभग 45 प्रतिशत मतदान हुआ था

भारत की जनसंख्या 36 करोड़ थी, जिसमें से 17.32 करोड़ जनसंख्या मतदान के योग्य थी

चुनाव में 45.7 प्रतिशत मतदान हुआ।

सभी पार्टियों के निशाने पर नेहरू

प्रथम लोकसभा के चुनाव में 14 राष्ट्रीय दलों ने भाग लिया, जिनमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी), अखिल भारतीय भारतीय जनसंघ (बीजेएस), बोल्शेविक पार्टी ऑफ इंडिया, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई), फॉरवर्ड ब्लॉक (मार्क्सवादी) शामिल थे। ग्रुप), फॉरवर्ड ब्लॉक (रुइकर ग्रुप), अखिल भारतीय हिंदू महासभा, कृषक लोक पार्टी, किसान मजदूर प्रजा पार्टी, रिवोल्यूशनरी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, अखिल भारतीय राम राज्य परिषद, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी, ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन और सोशलिस्ट पार्टी। इसके अलावा, 39 राज्य दलों और 533 निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी चुनाव लड़ा था। चुनाव अभियान प्रत्याशित तर्ज पर चला और तब से इसमें बहुत अधिक बदलाव नहीं आया है। वामपंथियों ने कांग्रेस पर पूंजीपतियों को खुश करने का आरोप लगाया, दक्षिणपंथियों ने कांग्रेस पर मुसलमानों के तुष्टिकरण का आरोप लगाया और अम्बेडकर की पार्टी, शेड्यूल कास्ट फेडरेशन ने कांग्रेस पर निचली जाति समूहों की उपेक्षा करने का आरोप लगाया। कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हुए नेहरू ने पूरे चुनाव को सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ जनादेश में बदल दिया। 

इसे भी पढ़ें: भारत में लोकसभा चुनाव कराने की व्यवस्था के बारे में ये है रोचक जानकारी

नेहरू का चुनावी अभियान

30 सितंबर 1951 को लुधियाना में पहली रैली हुई।

पंडित नेहरू का चुनाव प्रचार 9 हफ्तों तक चला।

नेहरू ने देशभर में 300 से ज्यादा रैलियां की।

25,000 मील का सफर किया।

18,000 मील हवाई जहाज से यात्रा की।

15,200 मील की यात्रा कार से तय किया। 

1,600 मील सफर रेलगाड़ी से किया।

90 मील का दौरा नाव से किया।

नेहरू को प्राप्त हुए 64% से अधिक वोट

13 फरवरी, 1952 को अपने रिपब्लिकन संविधान के तहत हुए पहले आम चुनावों में भारत ने अगले पांच वर्षों के लिए कांग्रेस सरकार को चुना। प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू और पूर्व संचार मंत्री रफी अहमद किदवई का लोक सभा के लिए चुनाव परिणामों के मुख्य आकर्षणों में से एक था। प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र में परिणाम जानने के लिए सुबह से ही इलाहाबाद की जिला अदालतों के परिसर में लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई थी। प्रधान मंत्री अपने गृह निर्वाचन क्षेत्र इलाहाबाद से लोक सभा के लिए चुने गए, उन्होंने चार विरोधियों को 105,462 मतों से हराया। नेहरू को 233,571 वोट मिले। ये सामान्य सीट के लिए पड़े वोटों का 64% से अधिक रहा। माना जाता है कि यह देश में अब तक के चुनावों में किसी भी उम्मीदवार द्वारा प्राप्त सबसे अधिक वोट हैं। 

हिंदू कोड बिल के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार के अलावा सभी की जमानत जब्त

हिंदू कोड बिल के मुद्दे पर नेहरू के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले 50 वर्षीय प्रभु दत्त ब्रह्मचारी को छोड़कर, प्रधान मंत्री के सभी तीन विरोधियों की जमानत जब्त हो गई। जबकि ब्रह्मचारी ने 56,718 वोट हासिल किए, जो सुरक्षा बनाए रखने के लिए आवश्यक न्यूनतम से लगभग 600 अधिक थे, मैदान में शेष तीन प्रत्याशी केके चटर्जी (स्वतंत्र), एलजी थट्टे (हिंदू महासभा) और बद्री प्रसाद (रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी) को क्रमश: 27,392, 25,870 और 18,129 वोट प्राप्त हुए। इस दोहरे सदस्यीय इलाहाबाद जिला पूर्वी-जौनपुर जिला पश्चिमी संसदीय क्षेत्र की आरक्षित सीट पर भी कांग्रेस प्रत्याशी मसुरिया दीन ने कब्जा कर लिया। उनके एकमात्र प्रतिद्वंद्वी बंसी लाल (केएमपीपी) को 55,642 वोट मिले।

जहां नहीं पहुंच पाए नेहरू

चुनाव प्रचार के दौरान नेहरू देश के हरेक कोने तक अपनी पहुंच बनाई। लेकिन हिमाचल प्रदेश की चीनी तहसील तक वो नहीं पहुंच पाए थे। इसके पीछे की वजह थी कि यहां 25 अक्टूबर 1951 को ही वोट पड़ गए थे। शर्दियों और बर्फबारी की वजह से ऐसा फैसला किया गया था। 

We're now on WhatsApp. Click to join.
All the updates here:

अन्य न्यूज़