1. पत्थरबाजों से हमदर्दी और मेजर गोगोई पर सवाल उठाना गलत

    पत्थरबाजों से हमदर्दी और मेजर गोगोई पर सवाल उठाना गलत

    जो पत्रकार और जेएनयू छाप वामपंथी छात्र फारूक अहमद डार को भारतीय सेना की बर्बरता का प्रतीक बना कर प्रचारित कर रहे हैं, वे पाकिस्तानी तथा इस्लामी जिहादी बर्बरता एवं अमानुषिकता पर एक शब्द भी बोलते नहीं।

  2. राष्ट्रीय राजनीति में मुलायम की जगह लेने में जुटे अखिलेश

    राष्ट्रीय राजनीति में मुलायम की जगह लेने में जुटे अखिलेश

    कुछ दिनों पूर्व दिल्ली में ममता बनर्जी, शरद पवार, गुलाम नबी आजाद और अहमद पटेल से मोदी सरकार के खिलाफ एक राष्ट्रीय मोर्चे के गठन को लेकर हुई चर्चा में अखिलेश यादव ने अपने तर्क रखे थे।

  3. चिदंबरम खानदान पर लगे आरोपों की आंतरिक जाँच कराए कांग्रेस

    चिदंबरम खानदान पर लगे आरोपों की आंतरिक जाँच कराए कांग्रेस

    पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम और उनके बेटे कार्ती के यहां सीबीआई की ओर से डाले गए करीब 39 छापों को राजनीतिक बदला कहा जाता है। यह पता करना एकदम कठिन है कि विपक्ष जो आरोप लगा रहा है वह सही है या नहीं।

  4. मैनचेस्टर हमला आतंकवाद के प्रति दोहरा रवैया रखने वालों को चेतावनी

    मैनचेस्टर हमला आतंकवाद के प्रति दोहरा रवैया रखने वालों को चेतावनी

    मैनचेस्टर में हुए धमाकों के बाद एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं कि क्या आतंकियों से निपटने में पश्चिमी विकसित देश भी सक्षम नहीं हैं? इन हमलों ने पुन: अमेरिका और पश्चिम के आतंकवाद विरोधी अंतर्राष्ट्रीय अभियानों पर भी प्रश्न उठा दिया है।

  5. नीतीश मानें या ना मानें, सुशासन बाबू की छवि को धक्का लगा

    नीतीश मानें या ना मानें, सुशासन बाबू की छवि को धक्का लगा

    नीतीश मानें या ना मानें लेकिन लालू से दोस्ती के बाद बिहार में उनकी ''सुशासन बाबू'' की छवि को गहरा धक्का लगा है। लेकिन इसे नीतीश की मजबूरी कहिए या फिर सत्ता का लालच कि वो सब कुछ जानते हुए भी चुप बैठे हैं।

  6. जो फौज अपने प्रधानमंत्री को लटका सकती है उसके लिए जाधव क्या है

    जो फौज अपने प्रधानमंत्री को लटका सकती है उसके लिए जाधव क्या है

    क्या यह भी संभव है कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की अवहेलना कर दे और जाधव को लटका दे ? यह असंभव नहीं। जो फौज अपने प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को लटका सकती है, उसके लिए जाधव किस खेत की मूली है?

  7. आंकड़े खुद कह रहे हैं- देश के अच्छे दिन आ रहे हैं

    आंकड़े खुद कह रहे हैं- देश के अच्छे दिन आ रहे हैं

    ''अच्छे दिन आएंगे'' ये नारा नहीं है। अच्छे दिन आ रहे हैं। 31 मार्च 2014 को उपभोक्ता महंगाई दर 9.46 प्रतिशत थी जो 31 मार्च 2017 को तीन साल के अंदर घटकर 3.81 प्रतिशत हो गई है। ये आंकड़े भारत के हैं, भाजपा के नहीं।

  8. बढ़ती बेरोजगारी और किसान आत्महत्या मोदी सरकार की विफलता

    बढ़ती बेरोजगारी और किसान आत्महत्या मोदी सरकार की विफलता

    सत्ता में आने से पहले बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में हर साल 2 करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था...लेकिन खुद मोदी सरकार के आंकड़े बताते हैं कि देश में बेरोजगारी दर बढ़कर अब 5 फीसदी हो गई है।

  9. बौद्धिक तेज से दमकता था अनिल माधव दवे का व्यक्तित्व

    बौद्धिक तेज से दमकता था अनिल माधव दवे का व्यक्तित्व

    केंद्रीय पर्यावरण मंत्री श्री अनिल माधव दवे, देश के उन चुनिंदा राजनेताओं में थे, जिनमें एक बौद्धिक गुरूत्वाकर्षण मौजूद था। उन्हें देखने, सुनने और सुनते रहने का मन होता था। पानी, पर्यावरण, नदी और राष्ट्र के भविष्य से जुड़े सवालों पर उनमें गहरी अंर्तदृष्टि मौजूद थी।

  10. परिपक्वता मामले में राहुल के समकक्ष खड़े नजर आते हैं अखिलेश

    परिपक्वता मामले में राहुल के समकक्ष खड़े नजर आते हैं अखिलेश

    राहुल गांधी तो नाहक ही बदनाम हैं। अखिलेश यादव भी परिपक्वता के मामले में राहुल के समकक्ष ही खड़े नजर आते हैं। राहुल की ही तरह से अखिलेश के पास भी न तो कोई विजन है न ही किसी विषय पर गंभीर चर्चा करने की योग्यता।

  11. कश्मीर की अशांति के वास्तविक कारण समझने होंगे

    कश्मीर की अशांति के वास्तविक कारण समझने होंगे

    यह दुर्भाग्य की बात है कि नर्इ दिल्ली ने कुछ साल पहले कश्मीर में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद जिस पैकेज की घोषणा की थी उसे अभी तक नहीं दिया है। मीडिया या राजनीतिक पार्टियों की ओर से इसकी कोर्इ आलोचना नहीं हुई।

  12. मोदी गये तो श्रीलंका थे पर उनकी निगाहें चीन पर थीं

    मोदी गये तो श्रीलंका थे पर उनकी निगाहें चीन पर थीं

    मोदी गये तो श्रीलंका थे, पर उनकी निगाहें चीन की चाल पर लगी थीं। ये महज एक संयोग नहीं था कि उसी दिन चीन के राष्ट्रपति चीन की उस महत्वाकांक्षी परियोजना वन बेल्ट एंड वन रोड कार्यक्रम को अंतिम रूप देने में लगे हुए थे।