राजभवन में ही सीमित नहीं हैं आचार्य देवव्रत, किसानों के जीवन में ला रहे हैं नया उजाला

By ललित गर्ग | Mar 14, 2020

विश्व के अन्य देशों की भांति भारत के लोगों ने भी पिछले कई सालों से पाश्चात्य अंधानुकरण के चलते न केवल अपने जीवन को बल्कि कृषि को भी अंधकारमय बना दिया है। इस मशीनी युग में खाद्यान्न पदार्थों को उगाने के लिए प्रयोग हो रही रासायनिक खाद और कीटनाशकों से खाद्य सामग्री भी जहरीली होने लगी है। देश में कृषि को बढ़ावा देने के नाम पर लंबे अर्से से प्रयोग हो रहे रसायनों से जहरीली हो रही धरती अब अपनी उपजाऊ शक्ति भी खोने लगी है। तथ्य है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत की कृषि संस्कृति को तंग और तबाह किया है।

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धरती को रसायनों से मुक्ति दिलाने और देश के नागरिकों को शुद्ध खाद्यान्न पदार्थ उपलब्ध करवाने की दृष्टि से शून्य लागत प्राकृतिक खेती एक बड़ा विकल्प बनकर उभरी है। आजादी बचाओ आंदोलन के संस्थापक स्व. राजीव दीक्षित 90 के दशक में देसी गाय को भारत के हरेक घर की आर्थिक समृद्धि, प्राकृतिक खेती एवं गो-संरक्षण का आधार बताते रहे हैं, इसी तरह प्राकृतिक खेती के सूत्रधार महाराष्ट्र के सुभाष पालेकर जीरो बजट खेती का अभियान चलाते हुए भारतीय कृषि को उन्नत बनाते रहे हैं, इन अभियानों को गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत एक आंदोलन की तरह आगे बढ़ा रहे हैं। उनके प्रयासों से हिमाचल प्रदेश के बाद अब गुजरात में कृषि की नयी फिजाएं आकार ले रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राज्यपालों के सम्मेलन में उनके प्राकृतिक खेती एवं उन्नत जीवनशैली के प्रयासों की सराहना करते हुए देश के सभी राज्यों में इन्हें लागू करने को कहा है।

हिमाचल प्रदेश के बाद अब गुजरात के राज्यपाल के रूप में आचार्य देवव्रत कई ऐसे काम कर रहे हैं जिनकी बदौलत गुजरात में न केवल खेती एवं प्राकृतिक जीवन की दृष्टि से बल्कि अनेक क्षेत्रों में शुद्ध पर्यावरण, भारतीय संस्कृति एवं जीवनशैली के आदर्श मूल्यों को नये मुकाम हासिल हो रहे हैं। स्वच्छता एवं पर्यावरण संरक्षण, नशा निवारण, जल संरक्षण एवं साक्षरता, समरसता, प्राकृतिक कृषि एवं गौ-पालन और बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ के महत्वपूर्ण कामों में उनकी सक्रियता प्रेरक एवं अनुकरणीय है। उनके द्वारा संचालित गुरुकुल कुरुक्षेत्र (हरियाणा) में उन्होंने लम्बे समय तक प्राकृतिक जीवन, खेती एवं उन्नत जीवन के अनूठे एवं सफल प्रयोग किये। इन्हीं प्रयोग एवं प्रयासों को विभिन्न राज्यों के राज्यपाल रहते हुए उन्होंने आगे बढ़ाया और प्राकृतिक खेती के प्रति प्रदेश के किसानों-बागवानों को प्रोत्साहित किया जिसके चलते वर्तमान में हजारों किसान कृषि एवं बागवानी कर अपने जीवन को उन्नत बना रहे हैं। यही नहीं प्रदेश सरकारों ने भी इस प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए बजट में प्रावधान किये हैं। हिमाचल प्रदेश के 30 हजार से अधिक किसान अब शून्य लागत प्राकृतिक खेती कर रहे हैं जबकि दक्षिण भारत में भी 50 लाख किसान इसे अपना चुके हैं। पूरे भारत में जैविक खेती अपनाने वाले सिक्किम राज्य ने भी अब शून्य लागत प्राकृतिक खेती अपनाने की योजना पर काम शुरू कर दिया है क्योंकि जैविक खेती से सिक्किम का खाद्यान्न उत्पादन बहुत कम हो गया है जबकि शून्य लागत प्राकृतिक खेती से उत्पादन ज्यादा होता है। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी आचार्य देवव्रत के रसायन मुक्त खेती के मंत्र को अपना लिया है।

गौ-पालन व देशी नस्ल की गायों को अपनाने एवं गोबर एवं गोमूत्र से प्राकृतिक खेती के उनके अभियान के भी अनूठे परिणाम सामने आये हैं। क्योंकि केवल देसी गाय पर आधारित इस प्राकृतिक खेती को करने में कोई लागत नहीं आती है। किसान गाय के गोबर और मूत्र से ही खेत के लिए जरूरी पोषक तत्वों की जरूरत को पूरा करता है। वहीं गाय के गोबर और मूत्र में लस्सी व गुड़ आदि मिलाकर किसान खेत में ही प्राकृतिक कीटनाशक भी तैयार कर सकता है। दूसरा, जैविक खेती की तुलना में प्राकृतिक खेती काफी सरल और फायदेमंद है क्योंकि एक देसी गाय से लगभग 30 एकड़ भूमि पर प्राकृतिक खेती की जा सकती है। जबकि जैविक खेती के लिए एक एकड़ क्षेत्र में करीब 20 पशुओं के गोबर की जरूरत पड़ती है। यह करिश्मा केवल और केवल जीरो बजट प्राकृतिक कृषि मॉडल से हुआ है जिसके लिये समूचे राष्ट्र के किसान आचार्य देवव्रत के ऋणि है।

शून्य लागत प्राकृतिक खेती छोटे और सीमांत किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है क्योंकि वर्तमान में खेती के लिए रसायनों आदि की भारी कीमत चुकाने के लिए किसानों को कर्ज का सहारा लेना पड़ता है और कर्ज का यह बोझ बढ़ता ही जाता है। किसान रासायनिक खाद, कीटनाशक और पेस्टीसाइड के प्रयोग से न केवल कर्ज में डूब रहा है बल्कि खेतों में जहर की खेती कर रहे हैं। अनाज सब्जियों के माध्यम से यही जहर हमारे शरीर में जाता है। जिससे आज कैंसर, हार्ट अटैक, रक्तचाप जैसी गंभीर बीमारियां लगातार फैल रही हैं। यदि हमें अपने परिवार और समाज को स्वस्थ रखना है तो हमें प्राकृतिक खेती की ओर लौटना होगा। गाय से प्राप्त सप्ताह भर के गोबर एवं गौमूत्र से निर्मित घोल का खेत में छिड़काव खाद का काम करता है और भूमि की उर्वरकता का हृास भी नहीं होता है। इसके इस्तेमाल से एक ओर जहां गुणवत्तापूर्ण उपज होती है, वहीं दूसरी ओर उत्पादन लागत लगभग शून्य रहती है। राजस्थान में सीकर जिले के एक प्रयोगधर्मी किसान कानसिंह कटराथल ने अपने खेत में प्राकृतिक खेती कर उत्साहवर्धक सफलता हासिल की है। उनके मुताबिक इससे पहले वह रासायनिक एवं जैविक खेती करते थे लेकिन देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र आधारित जीरो बजट वाली प्राकृतिक खेती कहीं ज्यादा फायदेमंद साबित हो रही है।

जैविक एवं रासायनिक कृषि-कर्म से जुड़े आंकड़े एक तरफ हैरान कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ हृदय विचारक करुणा पैदा करते हैं। इसके चलते हजारों किसानों ने आत्महत्या की है। ये तथ्य भारतीय किसान की तबाही के बुनियादी सवालों पर सोचने के लिए मजबूर करते हैं। भारतीय कृषि की आंतरिक व्यवस्था एवं उसके अधिक उपयोगी होने को यहां स्पष्टता से समझा जा सकता है। बीते चार दशक की किसानी संस्कृति के मुआयने में स्पष्ट दिखता है कि प्रकृति और वातावरण से लेकर मनुष्य, विज्ञान और नसीब तक ने उन्हें हतप्रभ किया है। रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों के निरंतर उपयोग से बंजर होती धरती, नीचे होते जा रहे जलस्तर, बाढ़-सूखा, अंतवृष्टि, अनावृष्टि, असमय आंधी-तूफान, बारिश, उन्नत बीज के अभाव, पशुधन की मृत्यु सभी तरह की आपदाओं के कारण फसल का आहत होना, उदारीकरण, मंडीकरण वगैरह के कारण उसके क्षतिग्रस्त उत्पाद का समुचित विपणन न होना, किसानों के जीवन में असंतोष और विपन्नता बढ़ाने के कारण बनते रहे हैं। नतीजतन, तनाव और चिंता की अवस्था में पारिवारिक कलह बढ़ रहा है, अपनी समस्याओं से निजात पाने के बदले वह लगातार दूसरी मुसीबतों में फंसता जा रहा है।

ऐसे जटिल समय में आचार्य देवव्रत के प्रयासों से नवीन परिवेश निर्मित हो रहा है एवं किसान अपनी समस्याओं से उपरत हो रहे हैं। देवव्रत ने आंकड़ों और तथ्यों के सहारे देश के किसानों की समस्याओं को वास्तविकता के सहारे बड़ी सूक्ष्मता से देखा है। उन्होंने विसंगतियों और विरोधाभासों से जूझ रहे भारत के किसान के निराश चेहरों पर खुशी लाने के सफल उपक्रम किये हैं। जो भारत विकसित परमाणु शक्ति कहलाता है, आईटी महाशक्ति और उभरता हुआ एशियाई शेर कहलाता है, उसी भारत की दो तिहाई आबादी कृषि पर निर्भर है और उसकी दशा लगातार बदतर होती जा रही है। इन हालातों में आचार्य देवव्रत ने कृषि संस्कृति के अर्थशास्त्र को लोक संस्कृति के संदर्भ में देखा है। उन्होंने पूरे संदर्भ में लोकजीवन को रेखांकित किया है और सामंती संस्कार के कारण किसान, मजदूरों के अभाव और जीवन की भयावहता का संकेत दिखाया है।

आचार्य देवव्रत जीरो बजट प्राकृतिक खेती के प्रेरक एवं संरक्षक हैं, यह खेती की प्रक्रिया जैविक खेती से भिन्न है तथा ग्लोबल वार्मिंग और वायुमंडल में आने वाले बदलाव का मुकाबला एवं उसे रोकने में सक्षम है। इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाला किसान कर्ज के झंझट से भी मुक्त रहता है वहीं उन्नत कृषि उत्पादों से आम जनजीवन को स्वस्थ जीवन प्रदत्त करता है।

-ललित गर्ग

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