पूजा के नए फॉर्मेट से प्रसन्न आराध्य (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Nov 25, 2020

नीली छतरी वाले की नाराजगी ने शहर के गणमान्य लोगों को प्रशासन के दरबार में खड़ा कर दिया था। संजीदा बातचीत के बाद सभी ने माना ईष्टदेव को खुश रखना भी ज़रूरी है। विश्वास हो चला था कि जल्दी पूजा अर्चना शुरू न हुई तो हम देव प्रकोप से बच नहीं पाएंगे। अच्छा प्रशासन धर्म के मार्ग पर चलता है और सुकर्म सभी को बचाता है। सभी समझदार व्यक्तियों ने वास्तविक वर्तमान स्थिति पर गहन चर्चा की, महामारी से उपजी स्थिति से स्वयं एवं दूसरों को अवगत करवाया। संयुक्त निर्णय लिया गया नया अनुशासन उगाया जाए जिसमें पूजा भी होती रहे ताकि व्यवसाय और जीवन सुरक्षित रहे। सदमार्ग पर चलते हुए सद्कर्म करने से ही जीवन, समाज और काफी कुछ सुरक्षित रहता है। बिगड़ती स्थिति की आशंका से बचना भी सामयिक समझदारी है। बुद्धिजनों को सही बात सही लगी और पूजास्थल खोलने की बात पर सहमति हो गई। उन्होंने माना कि पूजा अर्चना जीवन में अभिन्न लाभ देने वाला सकारात्मक पहलू है।

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लकड़ी के कवर में बंद ऐतिहासिक घंटी पुरातत्व चोरों से बची रहेगी। महामारी के माध्यम से सीखने का स्वर्णिम अवसर मिल रहा है कि सब का मालिक एक है। सब के मालिक ने यह प्रेरणा भी दी कि सुरक्षा घेरे में पूजा करना और घर स्वस्थ लौटना ही उचित प्रसाद रहेगा। पैंसठ साल से ज्यादा उम्र के बंदों को घर पर ही भजन करना होगा ताकि उनका शरीर संक्रमण ग्रस्त न हो उनकी प्राणवायु स्वच्छ रहे। ईष्ट नए अनुशासन से बहुत प्रसन्न लगते हैं, इतिहास में पहली बार कई दशकों बाद पूजा का असली महत्व समझा जा रहा है और वे भक्तों की फालतू इच्छाओं, रासायनिक युक्त धुंए और शोर प्रदुषण से बचे हुए हैं। उम्मीद रखनी चाहिए नए वातावरण में, स्वच्छ पर्यावरण में ईमानदार पूजा से आराध्य प्रसन्न तो होंगे।

- संतोष उत्सुक

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