फेंकुओं की बस्ती में लपटुओं की मस्ती (व्यंग्य)

  •  डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
  •  नवंबर 21, 2020   13:27
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फेंकुओं की बस्ती में लपटुओं की मस्ती (व्यंग्य)
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अगर आप यह सोचते हैं कि फेंकुओं और लपटुओं के बीच केवल बातों की उगाही होती है, तो यह आपकी बड़ी भूल है। इनके काम करने का तरीका बड़ा हटकर होता है। और यह केवल दिमाग से हटकर, मोबाइल से जुड़कर, कुतर्क से लड़ कर समझने वाले ही समझ सकते हैं।

‘दूर तक फेंकने’ वालों का सामना करने के लिए छप्पन इंच का सीना चाहिए होता है। और इस समय छप्पन इंच का सीना केवल ‘लिमिटेड’ लोगों के पास है। ऐसे में इन फेंकु सम्राटों की हाँकबाजी, फेंकबाजी और गप्पबाजी को लपेटने के लिए थोक में लपटन बाबुओं की सख्त जरूरत पड़ती है। यह देश मेहनतकश, ईमानदार, समयबद्ध बहुमुखी प्रतिभाशाली बेरोजगारों को रोजगार दे न दे, लेकिन लपटन बाबुओं को जरूर देता है। यदि आप में फेंकने और लपेटने की अपार क्षमता है, तो आप कभी बेरोजगार नहीं रह सकते।

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आजकल फेंकु ह्यूमन रिसोर्स मैनेजरों को अपनी ‘दूर के ढोल सुहावने’ कंपनी में काम करने के लिए असंख्य लपटन बाबुओं की जरूरत है। यह कंपनी इतनी मनोरंजक और मनलुभावन होती है कि दिन-रात लोग इसी का गुणगान करते हैं। यदि आप में फेंकु सम्राट और लपटन बाबुओं के गुण हैं, तो हो जाइए तैयार और आ जाइए गली फेसबुकिया, गाँव इंस्टाग्राम, ब्लॉक व्हाट्सपपुर और जिला ट्विट्टराना में। फिर देखिए कैसे होती है बातों की खेती में, ऊटपटांग कुतर्की बीज की रोपाई, कुछ ही मिनटों और घंटों में लहलहाती रुपयों की फसल।

अगर आप यह सोचते हैं कि फेंकुओं और लपटुओं के बीच केवल बातों की उगाही होती है, तो यह आपकी बड़ी भूल है। इनके काम करने का तरीका बड़ा हटकर होता है। और यह केवल दिमाग से हटकर, मोबाइल से जुड़कर, कुतर्क से लड़कर समझने वाले ही समझ सकते हैं। तर्क करने के लिए पुस्तक और कुतर्क करने के लिए खाली मस्तक की जरूरत पड़ती है। चूँकि जमाना ऑनलाइन और ज्ञान ऑफलाइन होता जा रहा है, इसलिए कुतर्कबाजों की संख्या में मच्छर के अंड़ों की तरह वृद्धि होती जा रही है। दोनों में अंतर केवल इतना है कि जहाँ अंड़ों से निकलने वाले मच्छर मात्र तर्कसंगत खून चूसते हैं तो वहीं कुतर्कबाज हर तरह का दिमाग। वैसे जमाना कुतर्कबाज नेताओं, फरेबियों, घंटाज्ञानधारियों का है, जिनकी सेवा, रक्षा तथा सेवा-सुश्रुषा में तर्कबाज आई.ए.एस., वकील, बुद्धिजीवी लगे रहते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि जब तक धरती पर तर्कबाज हैं, तब तक कुतर्कबाजों का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता।

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फेंकु सम्राट अपनी कंपनी में लपटुओं की भर्ती करने के लिए कुछ योग्यताओं की विशेष खोज करते हैं। जो लपटु यह सिद्ध कर देता है कि हाथ से पकड़े हुए खरगोश के तीन पैर हैं, वही ढीठ, हिट और फिट कहलाता है। आँख-कान को लंबी छुट्टी देकर हठधर्मिता की शरण में जाने वाले लपटुओं की यहाँ बड़ी माँग होती है। फेंकुओं की कंपनी योजनाबद्ध ढंग से काम करती है। इसमें सबसे पहले फेंकु सम्राट किसी घटिया उत्पाद को बाजार में उतारते हैं। इनकी देखा-देखी बुद्धिजीवी भी अपना उत्पाद उतारकर इनसे होड़ लेने लगते हैं। चूँकि बुद्धिजीवी अधिक सोचने वाले होते हैं, इसलिए उनमें एकता, समग्रता और संगठन बल की कमी होती है। जबकि फेंकुओं के उत्पाद का प्रचार-प्रसार लपटु सेल्स मार्केटिंग एक्जिक्यूटिव करते हैं, इसलिए उनमें एकजुटता, प्रबंधन और बेवकूफी की क्षमता कूट-कूट कर भरी होती है। वे झूठ, फरेब और धोखाधड़ी का इतना बढ़िया विज्ञापन करते हैं कि बुद्धिजीवी इनके झांसे में आए बिना नहीं रह सकते। वे बेरोजगारों में तारे गिनने जैसे रोजगार, रोगियों में वैक्सिन निराकार, पैदल चलने वाले प्रवासियों में वामन का ठगावतार रूप धारण कर पंचवर्षीय झूले में जनता को खूब झुलाते हैं। जनता भी झूले में झूल, सुध-बुध गंवाकर, फेंकुओं की बस्ती में लपटुओं की मस्ती लूटने में मशगूल हो जाती है।

-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’







बैठक में वैक्सीन वितरण (व्यंग्य)

  •  संतोष उत्सुक
  •  नवंबर 28, 2020   18:39
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बैठक में वैक्सीन वितरण (व्यंग्य)
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वैक्सीन न मिल पाने वालों में असमर्थ, गरीब, नासमझ, नज़रंदाज़ किए गए किस्म के लोग रह जाएंगे। कमजोर इम्युनिटी वालों को वैक्सीन देने बारे में आखिर में सोचना चाहिए क्यूंकि इनमें से जितने लोग हमारे सभ्य समाज से कम हो जाएं उतना बेहतर।

वैक्सीन लगभग आ चुकी है लेकिन एक सौ तीस करोड़ को चार दिन में नहीं दे सकते। यह स्वतंत्रता जैसी भी नहीं है कि आधी रात घोषणा की और पूरे देश को मिल गई। यह प्रशंसनीय बात है कि हम बिना सोचे विचारे कोई कार्य नहीं करते। अपनी विश्वगुरु इमेज का ध्यान रखते हैं। नियमित बैठकें कर ज़रूरी संकल्प लेते हैं तब आगे बढ़ते हैं। वैक्सीन के उचित वितरण बारे बैठक में सांस्कृतिक परम्पराओं के आधार विमर्श किया। अविलम्ब निर्णय लिया गया, सबसे पहले समृद्ध लोगों के घर पहुंचेगी क्यूंकि उनका स्वस्थ रहना सबसे ज़रूरी है। उनके काम धंधे चलते रहेंगे तभी तो देश की राजनीतिक पार्टियों को चंदा मिल सकेगा। उनके बाद देश चलाने वाले नेता, अफसर और विकास के ठेकेदारों को दी जाएगी। इनको वैक्सीन लगाने के बाद यह एहसास होगा कि देश का शासन, प्रशासन और विकास  सुरक्षित हो गया है इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है।

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सरकारी कर्मचारियों बारे विचार करने की ज़रूरत नहीं, वे इतने समझदार होते हैं कि वैक्सीन सप्लाई में से अपने और अपने परिवार के सदस्यों के लिए आवश्यक डोज़ जैसे कैसे सुरक्षित कर लेंगे। उन्हें मौका मिलेगा तो अतिरिक्त डोज़ भी हथिया लेंगे, बचा माध्यम वर्ग, तो उनमें से जुगाडू बंदों ने अपना अपना जुगाड़ लगाना शुरू कर लिया है। वैक्सीन की अग्रिम ब्लैक शुरू हो चुकी है कुछ बंदे एक की जगह दो लगवाने की सोच रहे होंगे। जाति, धर्म, क्षेत्र आधारित राजनीति करने वाले पहले ही प्रबंध कर लेंगे कि किसको वैक्सीन मिलनी चाहिए और किस को नहीं। किन परिवारों को छोड़ना है, किनको किसी भी हालत में वैक्सीन नहीं मिलनी चाहिए, यह कार्यकर्ताओं को समझा दिया जाएगा। किसी की किसी से पुरानी खुन्नुस बची रह गई हो तो उसे निकालने का पूरा मौका दिया जाएगा। इस बीच नकली वैक्सीन भी आ चुकी होगी और आराम से बिक रही होगी एक दूसरे को ठगकर लोग खुश हो रहे होंगे।

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वैक्सीन न मिल पाने वालों में असमर्थ, गरीब, नासमझ, नज़रंदाज़ किए गए किस्म के लोग रह जाएंगे। कमजोर इम्युनिटी वालों को वैक्सीन देने बारे में आखिर में सोचना चाहिए क्यूंकि इनमें से जितने लोग हमारे  सभ्य समाज से कम हो जाएं उतना बेहतर। ऐसे लोग निरंतर परेशानी पैदा करते हैं। बैठक के अध्यक्ष ने कहा, हम अपने लोगों की मदद कर सकें या नहीं पूरे विश्व समुदाय की मदद करें। सबसे पहले हम विश्वगुरु हैं। चुनाव और राहत प्रबंधन की प्रसिद्द तर्ज़ पर राहत पहुंचाने का अनुभव इसमें प्रयोग किया जाएगा। चुनाव व आपदा के समय पूरा तंत्र एक हो सहयोग करता है। वैक्सीन वितरण पर सूचना तकनीक से पूरा नियंत्रण रखना मुश्किल होगा। अनुभव व आंकड़ों के स्वादिष्ट पकौड़े बनाने में हम माहिर हैं ही। यह नैतिक कार्य सभ्यता, संस्कृति के आधार पर बिना किसी निम्न स्तरीय राजनीति के होना चाहिए।

- संतोष उत्सुक







जीवन का गणित (व्यंग्य)

  •  डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
  •  नवंबर 26, 2020   19:14
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जीवन का गणित (व्यंग्य)
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अब अंकों से मृत्यु की गंध आ रही है। मात्र एक अदृश्य रूपातीत रूपिणी कब दहाई से सैकड़ा, सैकड़े से हजार और हजार से लाख, करोड़ बन गयी, पता ही नहीं चला। जिंदगी का गणित एक ऐसा विषय है जहाँ गलती होने पर हम स्वयं को न कोसकर भाग्य को कोसते हैं।

नौ के पहाड़े में जब नौ तियाँ कितना होता है, बता नहीं सका, तभी मेरे भविष्य का फैसला हो चुका था। जो नौ का पहाड़ा नहीं बता सकता वह आगे का पहाड़ा समझे न समझे खुद को पहाड़ अवश्य समझेगा। अंक गणित और बीज गणित दोनों नाम से तो मानो मुझको जुड़वा भाई लगते हैं। एक-सी शक्ल और एक-सी करतूत। स्वप्न में कई बार आर्किमिडिज़, पैथागारस की पीठ पर चढ़कर कुछ सूत्रों को छूने की कोशिश की। कोशिश क्या खुद को बेइज्जत करवाने की भरपूर चेष्टा की। दोनों स्वप्न में मुझे देखकर पिंड छुड़ाकर भागते दिखायी दिए। समय और दूरी के बीच के सूत्र में जब सिर नहीं खपा सका तो एक दिन 10 बटा 2 ने मुझे चुल्लू भर पानी में डूबकर मर जाने की सलाह दी। मैं मरता भी कैसे? मेरे जैसे बेशर्म इंसान बहुत कम पैदा होते हैं।

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चूँकि मैं बड़ा हो चुका हूँ तो मुझे लगा कि अब कभी गणित की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। मैंने पाठशाला के समय ही गणित की तेरहवीं और श्राद्ध दोनों कर दी। मैंने उससे हाय-तौबा कर ली और उसने मुझसे। वह अपने घर खुश, मैं अपने घर। वह अपनी कठिनता का जब इतना एटिट्युड दिखाता है तो मैं क्या कुछ कम हूँ। मेरा एटिट्युड बार-बार बेशर्म करने वाले के पीछे जाने से रोकता है। लेकिन यह गुमान ज्यादा देर न टिक सका। सच तो यह है कि हम चाहकर भी गणित से पीछा नहीं छुड़ा सकते। उसने जीवन के वर्तमान को अंकों में बदलकर उसे हमारी उपलब्धियों से भाग दे दिया। जो बचा शेष उसे ही जिंदगी करार दिया। जमाना जिस दौर से गुजर रहा है वहाँ मृत्यु के मूलधन पर ब्याज चढ़ता ही जा रहा है। इसका मूलधन तो दूर ब्याज चुकाने में हमारी हालत सवा सेर गेहूँ जैसी हो गयी है। धरती के कुल योग से जंगल, पहाड़, नदियाँ, समुंदर का व्यकलन होता जा रहा है। जो शेष बचा वह ऋणात्मक बनकर रह गया है।

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अब अंकों से मृत्यु की गंध आ रही है। मात्र एक अदृश्य रूपातीत रूपिणी कब दहाई से सैकड़ा, सैकड़े से हजार और हजार से लाख, करोड़ बन गयी, पता ही नहीं चला। जिंदगी का गणित एक ऐसा विषय है जहाँ गलती होने पर हम स्वयं को न कोसकर भाग्य को कोसते हैं। इससे जीवन का गणित संतुलित बना रहता है। परीक्षा के समय दो खंभों के बीच ट्रेन की स्पीड कितनी है, जैसे प्रश्न अक्सर पूछे जाते थे। अब प्रश्न को कोई क्या बताए कि मेरी दो गिरती उम्मीदों के बीच आत्मविश्वास की स्पीड कितनी है। मैं तो बहुविकल्पीय उत्तर वाले प्रश्नों का आदी हो चुका हूँ। हर बार एक नए विकल्प के साथ जीवन प्रश्न के बहुविकल्पीय उत्तर चुन लेता हूँ। इससे कभी निराशा तो कभी प्रसन्नता हाथ लगती है। चलिए अच्छा है, कभी-कभी प्रसन्नता हाथ तो लगती है! वरना दुनिया में ऐसे कई हैं जो जीवन को रिक्त स्थान की तरह जिए जा रहे हैं और हर बार त्रुटिपूर्ण उत्तर भरकर जीवन के हाथों दुर्भाग्य का तमाचा खाते जा रहे हैं। दिन की शुरुआत में घड़ी देखने के लिए गणित जरूरी है। गणित से लाख पिंड छुड़ाना चाहता हूँ छुड़ा ही नहीं पाता हूँ। चाय पीने का मन करता है तो शक्कर, दूध, पानी का अनुपात वाला गणित आना चाहिए। बाज़ार से कुछ खरददारी करना हो तो गणित आना चाहिए। साँप-सीढ़ी, अष्टचम्मा, लूडो, चेस, क्रिकेट, कबड्डी, हॉकी खेलना हो तो गणित आना चाहिए। गोल रोटी चाहिए तो गणित, तिकोना समोसा चाहिए तो गणित! खुद का क्षेत्रफल समझना हो तो गणित, कटोरी में दाल भरना हो तो उसके घेरे का गणित आना चाहिए। बाप रे! जहाँ देखो वहाँ सिर्फ एक ही चीज़ है- गणित! गणित! गणित! 

-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त'







पूजा के नए फॉर्मेट से प्रसन्न आराध्य (व्यंग्य)

  •  संतोष उत्सुक
  •  नवंबर 25, 2020   18:57
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पूजा के नए फॉर्मेट से प्रसन्न आराध्य (व्यंग्य)
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बातचीत ने पूजाघर जाने का रास्ता ठीक व साफ़ करा किया, परिसर पहली बार सेनिटाइज्ड किया गया यह देखकर ईष्ट को भी संतुष्टि हुई। वैसे स्वच्छता हमारे जीवन के कण कण में प्रवेश कर चुकी है, इतना कि कोरोना के मरीज़ दूसरी बीमारियों से मर रहे हैं।

नीली छतरी वाले की नाराजगी ने शहर के गणमान्य लोगों को प्रशासन के दरबार में खड़ा कर दिया था। संजीदा बातचीत के बाद सभी ने माना ईष्टदेव को खुश रखना भी ज़रूरी है। विश्वास हो चला था कि जल्दी पूजा अर्चना शुरू न हुई तो हम देव प्रकोप से बच नहीं पाएंगे। अच्छा प्रशासन धर्म के मार्ग पर चलता है और सुकर्म सभी को बचाता है। सभी समझदार व्यक्तियों ने वास्तविक वर्तमान स्थिति पर गहन चर्चा की, महामारी से उपजी स्थिति से स्वयं एवं दूसरों को अवगत करवाया। संयुक्त निर्णय लिया गया नया अनुशासन उगाया जाए जिसमें पूजा भी होती रहे ताकि व्यवसाय और जीवन सुरक्षित रहे। सदमार्ग पर चलते हुए सद्कर्म करने से ही जीवन, समाज और काफी कुछ सुरक्षित रहता है। बिगड़ती स्थिति की आशंका से बचना भी सामयिक समझदारी है। बुद्धिजनों को सही बात सही लगी और पूजास्थल खोलने की बात पर सहमति हो गई। उन्होंने माना कि पूजा अर्चना जीवन में अभिन्न लाभ देने वाला सकारात्मक पहलू है।

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बातचीत ने पूजाघर जाने का रास्ता ठीक व साफ़ करा किया, परिसर पहली बार सेनिटाइज्ड किया गया यह देखकर ईष्ट को भी संतुष्टि हुई। वैसे स्वच्छता हमारे जीवन के कण कण में प्रवेश कर चुकी है, इतना कि कोरोना के मरीज़ दूसरी बीमारियों से मर रहे हैं। ईष्ट को यह देखकर अच्छा लगा कि इंसान उन्हें भी सेनिटाइज्ड कर रहा है। कई भक्तों के बढ़े नाखून और गंदे वस्त्र तो उन्हें भी अच्छे न लगते थे। धूप का बंद पैकेट या अन्य पैक्ड सामग्री चढ़ाना बाज़ार के लिए फायदेमंद रहेगा। धर्मस्थल का बैंक खाता खुलवाने के खिलाफ सेवकों ने अब संक्रमित माहौल होने के कारण ऑन लाइन सुविधाओं की अनुमति उपरवाले से ले ली है। थर्मल स्कैनर से तापमान जांचने, नामपता रजिस्टर में अंकित करने, प्रवेश द्वार पर श्रद्धालुओं पर सेनेटाइज़र का स्वास्थ्य टिकाऊ छिडकाव देखकर सृष्टि रचयिता भी प्रसन्न हैं। उन्हें अच्छा लग रहा है इंसानी लापरवाही कम हो रही है। स्वचालित हैंड सेनेटाइज़र मशीन, प्रवेश करने के लिए गोल दायरे चिन्हित करना, छ फुट दूरी से माथा टेकना पूजा का नया अनुशासन हो गया है।

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लकड़ी के कवर में बंद ऐतिहासिक घंटी पुरातत्व चोरों से बची रहेगी। महामारी के माध्यम से सीखने का स्वर्णिम अवसर मिल रहा है कि सब का मालिक एक है। सब के मालिक ने यह प्रेरणा भी दी कि सुरक्षा घेरे में पूजा करना और घर स्वस्थ लौटना ही उचित प्रसाद रहेगा। पैंसठ साल से ज्यादा उम्र के बंदों को घर पर ही भजन करना होगा ताकि उनका शरीर संक्रमण ग्रस्त न हो उनकी प्राणवायु स्वच्छ रहे। ईष्ट नए अनुशासन से बहुत प्रसन्न लगते हैं, इतिहास में पहली बार कई दशकों बाद पूजा का असली महत्व समझा जा रहा है और वे भक्तों की फालतू इच्छाओं, रासायनिक युक्त धुंए और शोर प्रदुषण से बचे हुए हैं। उम्मीद रखनी चाहिए नए वातावरण में, स्वच्छ पर्यावरण में ईमानदार पूजा से आराध्य प्रसन्न तो होंगे।

- संतोष उत्सुक