तलाक के बाद बेटी का घर पर ढोल नगाड़ों से हुआ स्वागत, समाज को आईना दिखाती घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल

By नीरज कुमार दुबे | Apr 06, 2026

मेरठ में एक अनोखी और प्रेरणादायक घटना ने समाज की पारंपरिक सोच को चुनौती दी है। हम आपको बता दें कि एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश ने अपनी बेटी के तलाक के बाद उसका स्वागत ऐसे किया, मानो वह किसी बड़ी जीत के साथ घर लौटी हो। यह घटना न केवल चर्चा का विषय बनी हुई है, बल्कि समाज में बदलती सोच का एक सशक्त संकेत भी दे रही है।

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अदालत के बाहर का दृश्य किसी उत्सव से कम नहीं था। परिजन ढोल की थाप पर नाचते गाते नजर आए और बेटी को सम्मान के साथ घर लेकर पहुंचे। परिवार के सदस्यों ने काले रंग की टी शर्ट पहन रखी थी, जिन पर बेटी के प्रति प्रेम का संदेश लिखा हुआ था। यह दृश्य इस बात का प्रतीक बन गया कि बेटी का घर वापसी करना कोई हार नहीं बल्कि साहस का कदम है।

बताया जा रहा है कि प्रणिता वशिष्ठ की शादी दिसंबर 2018 में हुई थी, लेकिन शादी के बाद से ही परिस्थितियां अनुकूल नहीं रहीं। परिवार और अधिवक्ताओं के अनुसार उन्हें लगातार मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक परेशानियों का सामना करना पड़ा। एक पुत्र होने के बावजूद हालात में सुधार नहीं हुआ। अंततः उन्होंने अपने आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए तलाक का निर्णय लिया।

इस मामले में विशेष बात यह रही कि परिवार ने किसी भी प्रकार की धनराशि या मुआवजा लेने से इंकार कर दिया। पिता ने साफ कहा कि उनकी प्राथमिकता केवल बेटी की खुशी और सुरक्षा है, न कि कोई आर्थिक लाभ। उनका यह बयान समाज के लिए एक मजबूत संदेश है कि रिश्तों में सम्मान सबसे महत्वपूर्ण होता है।

बताया जा रहा है कि प्रणिता स्वयं भी एक शिक्षित और आत्मनिर्भर महिला हैं। वह एक संस्थान में वित्त निदेशक के रूप में कार्यरत हैं और मनोविज्ञान में परास्नातक कर चुकी हैं। उनका मानना है कि शिक्षा और आत्मनिर्भरता ही महिलाओं को सही निर्णय लेने की ताकत देती है। तलाक के बाद उन्होंने अन्य महिलाओं को भी संदेश दिया कि यदि वे किसी प्रकार की प्रताड़ना झेल रही हैं, तो चुप न रहें। अपने अधिकारों के लिए खड़ी हों और खुद को मजबूत बनाएं। उनका यह संदेश उन महिलाओं के लिए प्रेरणा है जो सामाजिक दबाव के कारण गलत परिस्थितियों में भी चुप रहती हैं।

देखा जाये तो यह पूरी घटना समाज में प्रचलित उस सोच को चुनौती देती है, जिसमें तलाक को कलंक माना जाता है। मेरठ का यह परिवार दिखाता है कि यदि कोई रिश्ता खुशी नहीं दे रहा, तो उससे बाहर निकलना गलत नहीं बल्कि जरूरी हो सकता है। आज जब यह घटना चर्चा में है, तब यह सवाल भी उठता है कि क्या समाज अब बदलने को तैयार है। क्या बेटियों की खुशी को प्राथमिकता देने का यह साहस अन्य परिवारों में भी दिखाई देगा?

मेरठ की यह कहानी केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि उस बदलती मानसिकता की है जहां सम्मान, स्वतंत्रता और आत्मसम्मान को रिश्तों से ऊपर रखा जा रहा है। यह घटना आने वाले समय में समाज के लिए एक नई दिशा तय कर सकती है।

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