भारत का सख्त रुख देखकर घबराया अमेरिका, ट्रंप प्रशासन बोला- यूक्रेन में शांति का रास्ता दिल्ली से होकर जाता है

By नीरज कुमार दुबे | Aug 22, 2025

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भारत की ऊर्जा नीति एक बार फिर अमेरिकी राजनीतिक बहस और दबाव का केंद्र बन गई है। ट्रंप प्रशासन ने भारत पर दोहरे आरोप लगाए हैं— एक ओर रूसी तेल खरीदकर युद्ध को लंबा खींचने का आरोप और दूसरी ओर ‘मुनाफाखोरी’ की मानसिकता से वैश्विक शांति को नुकसान पहुँचाने का दावा। वहीं, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी तर्कों को न केवल खारिज किया बल्कि भारत की बढ़ी हुई अमेरिकी तेल खरीद का हवाला देते हुए इसे "विरोधाभासी और असंगत" बताया।


हम आपको बता दें कि व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने पत्रकारों से कहा है कि राष्ट्रपति ट्रंप भारत पर अतिरिक्त 25% शुल्क जारी रखेंगे। उनका आरोप था कि भारत रूसी तेल खरीदकर उसे रिफाइन कर लाभ कमाता है और वही पैसा रूस हथियार बनाने में खर्च करता है, जिससे यूक्रेन पर हमले तेज होते हैं। नवारो ने यहां तक कहा कि “भारत की भूमिका शांति बनाने की नहीं बल्कि युद्ध को आगे बढ़ाने की है।” व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने कहा, "भारत पर 25% टैरिफ इसलिए लगाए गए क्योंकि वे व्यापार में हमारे साथ धोखा करते हैं। फिर 25% रूसी तेल के कारण लगाये गये।'' उन्होंने कहा, ''कई मायनों में, शांति का रास्ता नई दिल्ली से होकर गुजरता है।''

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हालांकि अमेरिकी टिप्पणीकारों ने इस तर्क को चुनौतियों से भरा बताया। उन्होंने याद दिलाया कि चीन भारत से कहीं अधिक रूसी तेल खरीदता है और यूरोपीय संघ भी रूस से ऊर्जा आयात करता रहा है। सवाल यह भी है कि अतीत में खुद अमेरिका ने ही भारत को वैश्विक ऊर्जा बाज़ार स्थिर रखने के लिए रूस से तेल लेने की सलाह दी थी।


वहीं मास्को में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ बैठक के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने साफ़ कहा, “भारत न तो रूस का सबसे बड़ा तेल खरीदार है, न ही सबसे बड़ा गैस आयातक। यह भूमिका चीन और यूरोपीय संघ निभा रहे हैं।” उन्होंने जोड़ा कि भारत ने हाल के वर्षों में अमेरिका से तेल आयात भी बढ़ाया है, इसलिए अमेरिकी आरोप तर्कसंगत नहीं हैं। जयशंकर ने यह भी दोहराया कि भारत का दृष्टिकोण बाज़ार की परिस्थितियों और ऊर्जा सुरक्षा पर आधारित है, न कि किसी राजनीतिक एजेंडे पर।


इसके अलावा, जयशंकर की मॉस्को यात्रा के दौरान भारत और रूस ने अपने संबंधों को पुनः रेखांकित किया। दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार को संतुलित और टिकाऊ बनाने की प्रतिबद्धता जताई। साथ ही कृषि, फ़ार्मा और वस्त्र जैसे क्षेत्रों में भारतीय निर्यात बढ़ाने पर ज़ोर दिया गया। इसके अलावा, ग़ैर-शुल्क बाधाओं और नियामकीय अवरोधों को हटाने पर सहमति बनी। साथ ही, जयशंकर ने रूस में भर्ती हुए भारतीय युवाओं का मुद्दा भी उठाया और लंबित मामलों को शीघ्र सुलझाने की अपेक्षा जताई।


हम आपको बता दें कि यूक्रेन पर भारत का रुख़ पहले की तरह ही संवाद और कूटनीति को प्राथमिकता देने वाला रहा है। भारत न तो रूस की आक्रामकता को सीधे समर्थन देता है, न ही पश्चिमी दबाव में अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं से समझौता करता है। यह संतुलन साधना कठिन है, लेकिन यही भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की मूलधारा है।


बहरहाल, ट्रंप प्रशासन की आलोचनाओं से स्पष्ट है कि आने वाले महीनों में भारत-अमेरिका संबंधों में ऊर्जा नीति एक तनावपूर्ण मुद्दा बना रहेगा। परंतु जयशंकर का पलटवार यह संदेश देता है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों और वैश्विक ऊर्जा स्थिरता दोनों पर समान रूप से ध्यान देगा। यह स्थिति एक बार फिर यह साबित करती है कि भारत अब केवल वैश्विक समीकरणों का हिस्सा भर नहीं है, बल्कि उन समीकरणों को आकार देने वाली शक्ति के रूप में उभर रहा है। साथ ही, शांति का रास्ता नयी दिल्ली से होकर जाता है वाले अमेरिकी बयान को देखें तो इसके पीछे यह समझ छिपी है कि मौजूदा हालात में भारत ही वह शक्ति है जो रूस और यूक्रेन दोनों से संवाद कर सकती है। हम आपको बता दें कि रक्षा, ऊर्जा और कूटनीतिक साझेदारी में भारत और रूस दशकों से घनिष्ठ सहयोगी रहे हैं। पुतिन और मोदी के बीच नियमित वार्ता होती रहती है। इसके अलावा, प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति जेलेंस्की से कई बार बात की है और अंतरराष्ट्रीय मंचों (G7, G20) पर यूक्रेन की संवेदनाओं को भी उठाया है। साथ ही भारत अमेरिका और यूरोप दोनों का करीबी रणनीतिक साझेदार है, परंतु पूरी तरह उनके खेमे में नहीं है। यही “विश्वसनीय मध्यस्थ” की छवि बनाता है।


- नीरज कुमार दुबे

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