By उमेश चतुर्वेदी | Feb 23, 2026
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी के दिशा-निर्देशों से ना सिर्फ जाति विमर्श केंद्र में आ गया है, बल्कि हिंदू समाज जातीय खांचे में बंटता नजर आ रहा है। आर्थिक और शैक्षिक विकास की वजह से जाति विभाजन की जो रेखाएं मध्यम पड़ने लगी थीं, वे एक बार फिर गहरी होती नजर आ रही है। मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद जैसा स्पष्ट विभाजन हिंदू समाज में दिख रहा था, कुछ उसी राह पर एक बार फिर समाज बढ़ता दिख रहा है। जाति के तवे पर राजनीतिक रोटी सेंकने वाले कुछ दल यूजीसी की गाइडलाइन को लागू करने के लिए छात्रों के बीच जाति विमर्श की आंच को हवा दे रहे हैं तो इस गाइडलाइन के विरोध में खड़े सवर्ण समाज के लोग भी अपने समाज के छात्रों को लामबंद करने में प्राणपण से जुटे हुए हैं। मंडल आयोग की रिपोर्ट के बाद जिस तरह नया राजनीतिक विमर्श खड़ा हुआ, जिससे कुछ राजनीतिक दलों और शख्सियतों को उभरने का मौका मिला, कुछ वैसे ही हालात एक बार फिर बनते दिख रहे हैं। अगर यूजीसी गाइडलाइन का सर्वसमावेशी हल नहीं खोजा गया तो हिंदुत्व की राजनीति पर भी असर पड़ सकता है। हिंदू एकता का सपना भी खतरे में पड़ सकता है।
राजनीति के बारे में एक धारणा है। सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक विकास ने जाति विभाजन को जहां कमजोर किया, वहीं राजनीति इसे जिंदा करने में सफल हुई है। सामाजिक यात्रा में पिछड़ी रह गई जातियों के उत्थान के नाम पर राजनीति ने जाति विमर्श को केंद्र में लाने का सबसे बड़ा योगदान विश्वनाथ प्रताप सिंह को जाता है, जिन्होंने देवीलाल के राजनीतिक रसूख को काबू में करने के लिए 1990 में मंडल आयोग की रिपोर्ट पर पड़ी धूल को झाड़ा और उसे लागू कर दिया। पैंतीस साल पहले के उस फैसले ने समाज को बुरी तरह विभाजित कर दिया। मंडल आयोग के खिलाफ तकरीबन समूचा उत्तर भारत धधक उठा था। सवर्ण समुदाय के छात्रों और नौजवानों को अपना भविष्य अंधकारमय नजर आने लगा था। उन्होंने खुद को आग के हवाले करना शुरू कर दिया। विश्वनाथ प्रताप सिंह कविता भी करते थे। कवि को लेकर धारणा है है कि वह कोमल हृदय का स्वामी होता है। लेकिन आग की लपटों के बीच धू-धूकर जवानी को जलती देखकर भी कवि हृदय प्रधान मंत्री नहीं पसीजे थे। उस दौर के शरद यादव सवर्ण समाज के कटु आलोचक और पिछड़ावादी राजनीति के प्रबल पैरोकार के रूप में उभरे। मंडल आयोग की रिपोर्ट से समाज के बीच जो खाई पैदा हुई, बाद की राजनीति ने उसे और ज्यादा चौड़ा और गहरा ही किया है।
पिछड़ों को आरक्षण को समाज ने स्वीकार कर लिया था, तभी दूसरे सवर्ण और मनमोहन सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने साल 2006 में उच्च शैक्षणिक संस्थानों के दाखिले में पिछड़ा वर्ग के छात्रों के लिए आरक्षण की शुरूआत कर दी। इसके विरोध में एक बार फिर युवा राजनीति उभरी। यूथ फॉर इक्वलिटी के बैनर तले दिल्ली में इस फैसले के खिलाफ युवा सड़कों पर उतर पड़े। इस आंदोलन के चलते भी सामाजिक विभाजन बढ़ा। शैक्षणिक संस्थानों के दाखिले में आरक्षण के विरोधी समुदायों और इसके समर्थक समुदायों के बीच एक बार फिर विभाजक रेखा गहरी हुई। इससे भी देश उबर रहा था कि यूजीसी की गाइडलाइन आ गई और फिर से एक बार भारतीय समाज गहरे अंतरद्वंद्व और सामाजिक संघर्ष से जूझने लगा। यह संघर्ष अभी समाज में सीधे तो नहीं दिख रहा, लेकिन विश्वविद्यालयों के परिसर इसके चलते उबल रहे हैं। एक तरफ इस गाइडलाइन के समर्थक हैं तो दूसरी तरफ उसके विरोधी।
आज पिछड़ावाद, दलितवाद, अल्पसंख्यकवाद और महिलावाद का जोर है। इन तबकों के उभार के विचार को सामाजिक न्याय करीब साढ़े तीन दशकों से स्वीकार किया जा रहा है। इन वादों को सामाजिक लोकवृत्त यानी पब्लिक स्फीयर के केंद्र में लाने का विचार समाजवादी राजनीतिक दलों का रहा है, लेकिन इसे मूर्त रूप में लाने वाले कांग्रेसी मूल के राजनेता ही रहे हैं। समाजवादी दलों के ही परोक्ष समर्थन से पहली बार तीस मई 1933 को बिहार के मौजूदा रोहतास जिले के करगहर में त्रिवेणी संघ की स्थापना हुई थी। जिसमें कोइरी यानी कुशवाहा, कुर्मी और यादव जातियों के नेता साथ आए थे और पिछड़ावादी राजनीति की नींव डाली थी। एक तरह से जातिवादी राजनीति की नींव आजादी के पहले ही पड़ गई थी। मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करते वक्त विश्वनाथ प्रताप सिंह भले ही जनता दल नामक समाजवादी विचारधारा वाले दल के नेता थे, लेकिन महज तीन साल पहले तक वे कांग्रेसी थे। अर्जुन सिंह भी कांग्रेसी ही थे। आज राहुल गांधी भी जाति जनगणना को लेकर उत्साहित नजर आते हैं। पता नहीं राहुल गांधी को पता है या नहीं, अर्जुन सिंह और विश्वनाथ प्रताप सिंह को जानकारी जरूर रही होगी। राहुल गांधी की दादी के पिता और देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 27 जून 1961 को देश के मुख्यमंत्रियों के नाम तीस पैराग्राफ का एक लंबा खत लिखा था। उसके चौबीसवें से छब्बीसवें पैरे में नेहरू ने आज की जाति आधारित आरक्षण को एक तरह से नकार दिया है। उस चिट्ठी में उन्होंने भारत को बनाने को लेकर उनकी जो सोच रही, उसका गहन जिक्र किया है। इस पत्र में नेहरू स्पष्ट रूप से अपने विचार को जाहिर करते हैं। वे आरक्षण आधारित विकास और समाज नहीं चाहते थे, बल्कि ज्ञान केंद्रित समाज का विकास चाहते थे। नेहरू के लिखा था, 'मुझे किसी भी रूप में आरक्षण पसंद नहीं है। खासकर नौकरियों में आरक्षण। मैं ऐसे किसी भी कदम के खिलाफ हूं जो अक्षमता को बढ़ावा देता है और हमें औसत दर्जे की ओर ले जाता है।"
यूजीसी की गाइडलाइन का विरोध कर रहे लोग अगर आज यही बात कहें तो उन्हें सामाजिक न्याय का विरोधी माना जाएगा। मंडल आयोग की रिपोर्ट पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद से जिस तरह का राजनीतिक विमर्श स्थापित हुआ, उसमें सवर्ण समाज अपने लोगों के विकास और आरक्षण विरोध की बात करने की हिम्मत नहीं दिखा पाता था। ऐसा करने से उसे दकियानूस माने जाने का खतरा नजर आता था। इसलिए उसने चुप्पी साधे रखी। लेकिन बाद के वर्षों में एससी-एसटी कानून का सवर्ण समाज के खिलाफ जारी दुरूपयोग ने सामाजिक रूप से आगे माने जाते रहे वर्णों और जातियों को मौका मिला। बाढ़ का पानी जब नाक तक पहुंच जाता था, तब व्यक्ति उससे बचाव के लिए छटपटाने लगता है। सवर्ण समाज के लिए यूजीसी की गाइडलाइन नाक तक पहुंचा बाढ़ का पानी है। उसी पानी से बचाव की छटपटाहट ही है कि गाइडलाइन के खिलाफ समूचे देश के सवर्ण समाज में गहन क्षोभ और गुस्सा नजर आ रहा है। अब सवर्ण समुदाय के नौजवान तर्क देने से हिचक नहीं रहे कि जब पिछड़ावाद हो सकता है, दलितवाद प्रगतिशील विचार हो सकता है, अल्पसंख्यकवाद सामाजिक न्याय का प्रतीक हो सकता है तो ब्राह्मणवाद या सवर्णवाद दकियानूस क्यों? सवर्ण समुदाय के बच्चों का कहना है कि माना कि उनके पूर्वजों ने गलती की तो उसकी सजा हम क्यों भुगतें। ध्यान देने की बात है कि राममंदिर आंदोलन के बाद सवर्ण समाज ने पूरी तरह बीजेपी का दामन थाम लिया। उसे बीजेपी में अपनी दबी भावनाओं की अभिव्यक्ति की राह दिखती रही है। लेकिन यूजीसी की गाइडलाइन से वह भौंचक्क रह गया। यही भौंचक्कापन अब गुस्से के रूप में नजर आ रहा है। सत्ता पर निगाह जमाए बैठे विपक्षी दल पर्दे के पीछे से इस गुस्से को हवा दे रहे हैं। इस पूरी प्रक्रिया में उन्हें पिछड़ा वोटर के बिदकने का खतरा भी नजर आ रहा है, इसी सोच के चलते वे गाइडलाइन के खिलाफ खुलकर कुछ बोलने से बच रहे हैं।
ऐसा नहीं कि बीजेपी में इस आफत की काट नहीं खोजी जा रही होगी। बीजेपी संगठन और सरकार के आलानेता इस जातीय विमर्श को ठंडा करने की कोशिश में जुटे हुए हैं। लेकिन इस समस्या का समाधान ढूंढ़ने में जितनी देर होगी, जाति विमर्श उतना ही बढ़ेगा। अगर सवर्ण समुदाय का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ तो आने वाले दिनों में बीजेपी की चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
-उमेश चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं