By रेनू तिवारी | Jun 02, 2026
तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आने के संकेत मिल रहे हैं। तमिलनाडु बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष और फायरब्रांड नेता के. अन्नामलाई दिल्ली पहुंचे हैं, जहां वह पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात कर रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा बेहद तेज़ है कि अन्नामलाई बीजेपी से अलग होने की गंभीर योजना बना रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, वह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिलकर अपनी भविष्य की राह और फैसलों से उन्हें अवगत करा सकते हैं। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि अन्नामलाई अब किसी के अधीन रहने के बजाय एक स्वतंत्र राजनीतिक रास्ता चुनने की तैयारी में हैं, हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई भी औपचारिक (Official) घोषणा नहीं की गई है।
अन्नामलाई की नाराज़गी के 5 मुख्य कारण (Key Factors)
अन्नामलाई और बीजेपी आलाकमान के बीच दूरियां रातों-रात नहीं बढ़ी हैं। इसके पीछे पांच बेहद अहम और गहरे कारण माने जा रहे हैं:
1. AIADMK के साथ गठबंधन की मजबूरी
अन्नामलाई शुरू से ही तमिलनाडु में AIADMK के साथ किसी भी तरह के समझौते या गठबंधन के सख्त खिलाफ रहे हैं। साल 2024 के लोकसभा चुनावों में अन्नामलाई के स्टैंड के कारण बीजेपी ने अकेले चुनाव लड़ा और 11.24% वोट शेयर हासिल किया। हालांकि, पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी और खुद अन्नामलाई को कोयंबटूर से हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद केंद्रीय नेतृत्व दोबारा AIADMK के करीब जाने लगा, जो अन्नामलाई को रास नहीं आया।
2. प्रदेश अध्यक्ष पद से अचानक हटाया जाना
2021 से 2025 तक तमिलनाडु बीजेपी अध्यक्ष के रूप में अन्नामलाई ने पार्टी को राज्य में एक नई पहचान दी और आक्रामक राजनीति के कारण वह घर-घर में जाना-पहचाना चेहरा बन गए। इसके बावजूद, अप्रैल 2025 में बीजेपी ने उन्हें हटाकर नैनार नागेंद्रन को कमान सौंप दी।
3. AIADMK की 'शर्त' के आगे नतमस्तक होना हाईकमान
चर्चा है कि AIADMK के महासचिव एडप्पादी के. पलानीस्वामी ने बीजेपी के साथ दोबारा गठबंधन की बातचीत शुरू करने के लिए अन्नामलाई को पद से हटाने की मुख्य शर्त रखी थी। पलानीस्वामी, अन्नामलाई द्वारा अतीत में की गई AIADMK की तीखी आलोचनाओं से बेहद नाराज थे और बीजेपी आलाकमान ने गठबंधन के लिए अन्नामलाई की बलि दे दी।
4. 2026 के विधानसभा चुनावों में रणनीतिक अनदेखी
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान अन्नामलाई काफी असहज और कटे-कटे दिखाई दिए। रिपोर्ट्स के अनुसार, पार्टी के सभी महत्वपूर्ण नीतिगत और चुनावी फैसलों से उन्हें पूरी तरह किनारे (Sideline) कर दिया गया था। पार्टी में अपनी इस उपेक्षा से वह इस कदर आहत थे कि उन्होंने खुद विधानसभा चुनाव लड़ने से भी साफ इनकार कर दिया था।
5. केंद्र की नीतियों और चुनावी रणनीति पर गहरे मतभेद
अन्नामलाई ने कई मौकों पर बीजेपी की केंद्रीय नीतियों पर भी सवाल उठाए। उदाहरण के लिए, उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा स्कूलों में लागू की जा रही 'त्रि-भाषा नीति' (Three-Language Policy) के समय पर सार्वजनिक रूप से आपत्ति जताई थी और इस अधिसूचना को वापस लेने का आग्रह किया था। इसके अलावा, सीटों के बंटवारे और उम्मीदवारों के चयन को लेकर भी उनके और दिल्ली दरबार के बीच गहरे मतभेद लगातार बने रहे।
आगे क्या?
अन्नामलाई का अगला कदम न सिर्फ बीजेपी के लिए तमिलनाडु में एक बड़ा झटका साबित हो सकता है, बल्कि राज्य के आगामी राजनीतिक समीकरणों को भी पूरी तरह बदल सकता है। अब सभी की निगाहें 4 जून और दिल्ली में हो रही इन मुलाकातों के नतीजों पर टिकी हैं।
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