धारा 370 हटाने से ही होगा कश्मीर समस्या का स्थायी इलाज

By योगेन्द्र योगी | Feb 20, 2019

भारत के माथे का ताज कश्मीर देश के लिए स्थायी सिरदर्द बन गया है। सीआरपीएफ के काफिले पर हमले से पूर्व उरी और पठानकोट पर हमलों की वारदातों से पूरा देश दुखी और हैरान−परेशान है। केंद्र में किसी भी राजनीतिक दल की सरकार रही हो, किन्तु कश्मीर की समस्या सुलझने के बजाए लगातार उलझती गई है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया को वहां हमेशा चुनौती मिलती रही है। पाकिस्तान ने आतंकी कार्रवाई के मामलों में अपनी रणनीति बदल ली है। पहले सीमा पार से ही आतंकी कार्रवाई को अंजाम देते थे। इसके सबूत विश्व समुदाय के सामने पेश करने पर पाकिस्तान के अलग−थलग होने का खतरा खड़ा हो गया। पाकिस्तान को अमेरिका सहित कई देशों की कड़ी प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ा। विदेशी वित्तीय मदद में भी बाधा उत्पन्न हो गई। पाकिस्तान ने भारत के प्रति दुश्मनी का नजरिया तो नहीं बदला पर आतंकी कार्रवाई के तौर−तरीके बदल लिए। सीआरपीएफ काफिले पर आत्मघाती हमले को अंजाम देने वाला आतंकी कश्मीरी था। उसे हमले की साजिश और कार्रवाई की पूरी ट्रेनिंग पाकिस्तान के आतंकी कैम्पों में दी गई।

यही वजह है कि इस दुर्दान्त हमले के बाद पाकिस्तान यह प्रचार कर रहा है कि इसमें पाकिस्तान का कोई हाथ नहीं है। इसमें भारतीय ही शामिल हैं। पाकिस्तान मगरमच्छ के आंसू बहाते हुए कई बार यह दुहाई भी दे चुका है कि वह खुद ही आतंकवाद से त्रस्त है। यह बात दीगर है कि समूचा विश्व पाकिस्तान की भारत के प्रति दुर्भावाना की नीति और नीयत से अच्छी तरह वाकिफ है। सवाल भारत के सामने है कि आखिर पाकिस्तान को जवाब कैसे दिया जाए। पाकिस्तान परमाणु सम्पन्न देश है। शहीदों के प्रति उमड़े तात्कालिक देशभक्ति के ज्वार की बात छोड़ दें तो भारत रणनीतिक तौर पर पाक के खिलाफ युद्ध नहीं छेड़ सकता। यह बात पाकिस्तान को पता है कि भारत चाहे कितनी भी धमकियां दे ले किन्तु युद्ध की पहल नहीं करेगा।

इसी वजह से पाकिस्तान आतंकियों को पालपोस कर लगातार हमले करवा रहा है। भारत−पाक वार्ता से भी कश्मीर की समस्या का समाधान नहीं निकल सका। पाकिस्तान वार्ता में कश्मीर को शामिल करने से बाज नहीं आता। उसकी कोशिश है कि कश्मीर को पूरी आजादी मिले ताकि बाद में किसी भी बहाने से इसे हड़पा जा सके। यह पाकिस्तान के हुक्मरानों की मजबूरी हो चुकी है कि वहां जो भी दल सत्ता में आए वह कश्मीर का राग जरूर अलापेगा। पाक सेना के अपने निहित स्वार्थ हैं। कश्मीर की आड़ में सेना सरकार पर दबाव बनाए रखती है।

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पाकिस्तान को इसका भी अंदाजा है कि भारत से एक इंच भी भूमि लेना आसान नहीं है, किन्तु पाकिस्तान की अवाम को राजनीतिक दलों ने इस कदर भड़काया है कि अब सरकार आतंकियों के समर्थन के बगैर चल नहीं सकती। रहा सवाल विश्व समुदाय का तो विश्व के देश ऐसे हमलों के बाद केवल निंदा तक सीमित रहे हैं। वैसे भी ज्यादातर देश इसे वैश्विक आतंकवाद न मान कर भारत की घरेलू समस्या की तरह देखते हैं। ऐसे में कोई भी देश सीधे हस्तक्षेप करने से कतराता है। अमेरिका थोड़ी तीखी प्रतिक्रिया इसलिए जताता है कि उसने पूरे विश्व से आतंकवाद के खात्मे की कसम खाई है। हालांकि पाकपरस्त आतंकी हमलों को अमेरिका भी सीधा आतंकवाद नहीं मानता, इसलिए पाकिस्तान को सिर्फ घुड़कियां पिलाने तक सीमित रहता है।

अफगानिस्तान और इराक युद्ध में भारत ने अमेरिका के सैन्य अभियान में शामिल होने से इंकार कर दिया था। जिसे अमेरिका वैश्विक आतंकवाद के सफाए के लिए जरूरी समझता था। भारत के इसमें शामिल नहीं होने की वजह से ही अमेरिका ने पाकिस्तान को आतंकवाद के लिए कभी कड़ा सबक नहीं सिखाया। अमेरिका ने अपने हितों की रक्षा करने के लिए ओसामा बिन लादेन को गुपचुप रूप से पाकिस्तान में घुसकर मार गिराया। पाकिस्तान में अमेरिकी कार्रवाई का दिखावटी विरोध भी हुआ। किन्तु भारत के मामले में अमेरिका ने कभी ऐसी पेशकश नहीं की। संयुक्त राष्ट्रसंघ जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था भी पाकिस्तान के खिलाफ कोई कठोर कदम नहीं उठा सकी। यह संस्था केवल मौखिक तौर पर पाकिस्तान की लानत−मलानत तक सीमित रही है। यूएनओ तो वैसे भी ऐसे मामलों में नख−दंतविहीन संस्था साबित हुआ है।

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भारत के सिर का ताज अब गले की हड्डी बन चुका है। पूरा देश इसकी कीमत चुका रहा है। एक तरफ पाकिस्तान की सरपरस्ती और दूसरी तरफ धारा 370 ने कश्मीर समस्या के रोग को कैंसर में तब्दील कर दिया है। अब यह साबित हो चुका है कि धारा 370 हटाए बिना स्थायी समाधान संभव नहीं। पाकिस्तान की कश्मीर में ही आतंकी तैयार करने की नीति को तभी लगाम लग सकता है, जब इस धारा को समाप्त किया जाए। कश्मीरी आतंकियों ने इस धारा को ढाल बना लिया है।

पाकिस्तान से युद्ध विकल्प नहीं है, ना ही बार−बार सर्जिकल स्टाइक जैसी कार्रवाई व्यावहारिक तौर पर संभव है। धारा 370 के हटाए जाने के बाद जम्मू−कश्मीर को मिले विशेष राज्य का दर्जा समाप्त हो जाएगा। इससे देश की बाकी आबादी को जम्मू−कश्मीर में अस्थाई−स्थायी तौर पर बसने का मौका मिलेगा। अभी इस अनुच्छेद के कारण यह इलाका देश के बाकी हिस्सों से कटा हुआ है। अल्पसंख्यक आबादी होने के कारण कश्मीर पूरी तरह आतंकियों−उपद्रवियों के नियंत्रण में है। जो लोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास रखते हुए शांति चाहते भी हैं वो इनके खिलाफ मुंह खोलने का साहस नहीं कर सकते। क्योंकि उन्हें रहना उन्हीं के बीच है। पानी में रहकर मगर से बैर मोल कौन लेगा। धारा 370 हटाने के बाद बहुसंख्यक और अल्पंसख्यक आबादी के अनुपात में समानता ही इसका स्थायी इलाज है।

-योगेन्द्र योगी

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