एक और सर्जिकल स्ट्राइक के साथ ही समान नागरिक संहिता भी लागू करिये

By कमलेश पांडे | Publish Date: Feb 19 2019 4:01PM
एक और सर्जिकल स्ट्राइक के साथ ही समान नागरिक संहिता भी लागू करिये
Image Source: Google

मुस्लिमों या अन्य धर्मावलम्बियों को जो अतिरिक्त सुविधाएं दिए जा रही हैं, उसका औचित्य क्या है ? और सिर्फ धर्म ही क्यों, जाति, भाषा, क्षेत्र, लिंग आदि के नाम पर जो तरह तरह के वाद स्थापित किये जा चुके हैं या किये जा रहे हैं, वह क्या राष्ट्रीयता के लिहाज से उचित हैं ?

पत्रकारिता में आम धारणा है, 'जब तोप मुकाबिल हो तो एक अखबार निकालो।' आशय यह कि शब्दों-विचारों की मारक क्षमता कतिपय शस्त्रों से अधिक होती है। विशेष तौर से सर्वव्यापी भी। यही वजह है कि जब पाकिस्तान की नापाक हरकतों के खिलाफ एक और सर्जिकल स्ट्राइक की मांग बलवती है तो मेरे मन में यह खयाल आया कि जम्मू-कश्मीर के उरी आतंकी हमले के बाद हुए सर्जिकल स्ट्राइक का फलाफल क्या निकला। जाहिर है, अंतराल दर अंतराल के इंतजार के बाद पुलवामा आत्मघाती आतंकी हमला हो गया। सवाल है कि यह सिलसिला आखिर कब और कैसे थमेगा? क्योंकि अब तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सेना से साफ कह दिया है कि इस घटना का बदला कब, कहां और कैसे लेना है, अपने पेशेवर रुख से वह खुद तय करे। प्रथमदृष्टया यह बहुत बड़ी बात है।
 
 
लेकिन भारतीय शासन व्यवस्था की गतिविधियों को बड़े ही करीब से देखने के बाद मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि इस बार भी पाकिस्तान पर सर्जिकल हमला हो, ताकि उसे कड़ा सबक मिले। लेकिन, इसके साथ ही 'भारतीय संविधान' से जुड़े उन तमाम प्रावधानों पर भी बौद्धिक-नीतिगत सर्जिकल स्ट्राइक होनी चाहिए, जिससे ऐसे तत्वों को कानूनी खाद-पानी मिलती आई है। क्योंकि दुनियावी संविधान की 'वैचारिक खिचड़ी' समझे जाने वाले भारतीय संविधान के कुछेक प्रावधानों से भी ऐसे तत्वों का मनोबल बढ़ता है। साथ ही, देश में रणनीतिक विरोधाभास भी बढ़ता है। 


 
 
बानगी स्वरूप 'अल्पसंख्यक' शब्द की अवधारणा को ही ले लीजिए। यह कौन नहीं जानता कि साम्प्रदायिक विभाजन के परिणाम स्वरूप बने हिंदुओं के हिन्दुस्तान और मुस्लिमों के पाकिस्तान में कथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर जो अगर-मगर करने की कोशिश की गई है, वह समाजशास्त्र की मूल प्रकृति के विपरीत है। शायद यही वजह है कि भारत आज उसकी भारी कीमत चुकाने की दिशा की ओर अग्रसर है। कारण कि जिन वजहों से 1947 में पाकिस्तान अलग हुए था, आज वही वजहें फिर से मुंह बाए खड़ी हैं। स्वाभाविक है कि दोष परिस्थितियों का कम, उन नीति-नियंताओं का अधिक है जिन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय लोकप्रियता हासिल करने के लिए हिंदुओं के दूरगामी हित से एक नहीं, बल्कि कई नापाक समझौते किये, जिनका यहां उल्लेख करना मैं जरूरी नहीं समझता हूं, क्योंकि ये सभी बातें पब्लिक डोमेन मैं हैं।
 
सवाल है कि अल्पसंख्यक वर्ग के नाम पर भारत में मुस्लिमों या अन्य धर्मावलम्बियों को जो अतिरिक्त सुविधाएं दिए जा रही हैं, उसका औचित्य क्या है ? और सिर्फ धर्म ही क्यों, जाति, भाषा, क्षेत्र, लिंग आदि के नाम पर जो तरह तरह के वाद स्थापित किये जा चुके हैं या किये जा रहे हैं, वह क्या राष्ट्रीयता के लिहाज से उचित हैं ? किसी भी लोकतंत्र में वोट बैंक के लिहाज से यदि नैसर्गिक व सार्वभौमिक मानवीय, सामाजिक और प्रशासनिक मूल्यों से छेड़छाड़ की जाएगी, तो नीतिगत विरोधाभास बढ़ेंगे ही। भारत इसी अव्यवहारिक अंतर्द्वंद्व से गुजर रहा है। इसलिए सत्ताधारी वर्ग समान नागरिक संहिता का समर्थक होते हुए भी लाचार दिख रहा है। इसलिए खंडित-विखंडित लाभों पर फिर से विचार करने की जरूरत है, जो कि एक लंबे अरसे से महसूस की जा रही है।


 
 
सबसे बड़ा नीतिगत सवाल यह है कि आखिर फिरंगियों की सोच पर उधार लिए हुए कतिपय कानूनों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किस नए भारत का निर्माण करेंगे, यह जानने का हक हिंदुस्तानियों को है। देश ही नहीं दुनिया को भी है, क्योंकि एनआरआई पूरे देश में फैले हुए हैं। फिर भी यदि हमारी संसद और सुप्रीम कोर्ट विगत 70 सालों में भी आस्तीन के सांपों की तरह काम करने वाले कानूनी शब्दों या प्रावधानों की पहचान नहीं कर पाई है तो यह उसका 'बौद्धिक दिवालियापन' है, जिससे राष्ट्रवाद, एकता और अखंडता की अवधारणा निरंतर खोखली होती जा रही है। इससे देश में विघटनकारी तत्वों को प्रश्रय मिल रहा है और शेष देशवासी अपने ही वीर जवानों की लाशें यत्र तत्र सर्वत्र गिनने को अभिशप्त हो चुके हैं।
 


क्या आपने कभी सोचा है कि फूट डालो और राज करो जैसी हिंसक नीति से जब अंग्रेजों की सत्ता चिरस्थाई नहीं हो पाई, तो 'काले अंग्रेजों' की कितनी होगी, समझना आसान है! और बिगड़ते हालात दिन ब दिन इस बात की चुगली भी कर रहे हैं। गुलामी की पीड़ा यदि भुला भी दी जाए तो आजादी के साथ ही विरासत में मिले हुए साम्प्रदायिक दंगों, फिर 1948 में महात्मा गांधी की हत्या, 1962 के चीनी आक्रमण, 1965 के भारत-पाक युद्ध से उपजी ताशकंद त्रासदी, 1971-72 का भारत-पाक युद्ध और बांग्लादेश का निर्माण, 1975 का राष्ट्रीय आपातकाल, 1980 के दशक का खालिस्तानी आतंकवाद और 1984 का इंदिरा हत्याकांड, एलटीटीई आतंकवाद और 1991 का राजीव हत्याकांड, कारगिल युद्ध 1999, मुम्बई आतंकी हमला 2008, उरी आतंकी अटैक 2016 और अब पुलवामा आतंकी आत्मघाती हमला 2018 से जो सिलसिलेवार सख्त संदेश मिले हैं, और वक्त-वेवक्त जो साम्प्रदायिक झड़पें होती रहती हैं, उसकी भयावह आंच यत्र-तत्र आम लोगों पर पड़ते-पड़ते अब हमारे वीर जवानों तक पहुंच चुकी है। जिसका मुंहतोड़ जवाब शस्त्रों से अधिक मारक प्रभाव रखने वाले शब्दों से देने की जरूरत है, अन्यथा मुकाबला मुश्किल है।
 
सवाल फिर वही कि जब आम आदमी और खास आदमी के वोट की कीमत समान है तो फिर अन्य कानूनी विसंगतियां और नीतिगत-रणनीतिक लापरवाहियां आखिर किसके हितवर्द्धन के लिए बनाये रखी गई हैं, यह जानने को देशवासी उत्सुक हैं। बेशक अल्पसंख्यकवाद के समतुल्य ही जातिवादी आरक्षण व्यवस्था की अवधारणा से भी देश खोखला होता जा रहा है। क्योंकि इसके आर्थिक स्वरूप का तो स्वागत किया जा सकता है जिससे वर्गवाद पनपेगा, लेकिन जातीय स्वरूप का कतई नहीं, क्योंकि इससे सामाजिक विखंडन पैदा होगा, हो भी रहा है। खास बात यह कि किसी भी तरह के आरक्षण पर पहला हक तो गुलाम भारत से लेकर आजाद भारत के अमर शहीदों के परिजनों का होना चाहिए, लेकिन इस दिशा में कदम उठाने की बात शायद किसी ने भी नहीं सोची तो क्यों, समझना मुश्किल नहीं है?
 
बेशक, देश और समाज आज विपरीत परिस्थितियों से गुजर रहा है। सरकारी व्यवस्था का विकल्प बन रही निजीकरण व्यवस्था का यत्र-तत्र आर्थिक नंगा नाच सिर चढ़कर बोल रहा है जिससे राष्ट्रवादी भावना को वह मजबूती नहीं मिल पा रही है जिसकी अपेक्षा देशवासियों को है। या फिर जैसी चीनियों और पाकिस्तानियों में आमतौर पर देखी-पाई जा रही है।
 
सवाल फिर वही कि आखिर जिस निकृष्ट लोकतांत्रिक प्रवृति को प्रश्रय देकर यह देश खोखला होता जा रहा है, उसकी प्रासंगिकता और समकालीन परिस्थितियों के अनुरूप उसमें आवश्यक बदलाव लाने के बारे में आखिर सोचेगा कौन ? क्योंकि अब यह महसूस किया जाने लगा है कि ऐसे अपेक्षित बदलाव लाने में हमारी संसद व विधानमंडल और क्रमशः सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय विफल या फिर असहाय प्रतीत हो रहे हैं, जो सार्वजनिक चिंता का विषय है। लिहाजा, समकालीन प्रबुद्ध वर्ग का यह नैतिक दायित्व है कि वह देश को एक नई और सर्वस्वीकार्य दिशा दिखाए, जिसकी अपेक्षा और जरूरत समकालीन वैश्विक परिप्रेक्ष्य में समर्थ भारत के निर्माण के लिए सबसे ज्यादा है। खासकर एनजीओ की अवधारणा का सदुपयोग इस दिशा में किया जाए तो बेहतर रहेगा।
 
लेकिन इसके लिए सत्ता, शासन, न्यायिक, मीडिया और कारोबारी शीर्ष पर बैठे और उनसे जुड़े लोगों और विशेषकर छोटे-छोटे सामाजिक धड़ों के संगठित पहरेदारों को आम आदमी के दूरगामी और बुनियादी हितों के प्रति उदार होना होगा। क्योंकि पुरातन अथवा समकालीन दौर में बढ़ती भोग की प्रवृति और इसकी पूर्ति हेतु हर ओर मची मार-काट से इतर 'सनातन भारत' के सेवा और त्याग की उदात्त सोच को अपनाना होगा, अन्यथा स्थिति बहुत जटिल से जटिलतम बन चुकी है। 
 
शायद अब खतरा इस बात का है कि आतंकवाद के रथ पर सवार इस्लामिक दुनिया जब हिंदुत्व के प्रतीक समझे जाने वाले भारत को निगलने को तत्पर प्रतीत हो रही हो और आहिस्ता-आहिस्ता आगे बढ़ रही हो, तब मुकाबले के सिवाय अन्य चारा भी बचा है क्या ? उधर, ईसाइयत व्यवस्था भी इस ताक में बैठी है कि दिन प्रतिदिन बेतुके धर्म-संघर्ष में उलझते जा रहे भारत को कैसे अपना सहज ग्रास बनाया जाए और फिर से उसे अपना आर्थिक गुलाम बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की आड़ लेकर बनाया जाये, क्योंकि उसका आर्थिक हित इसी में सुरक्षित है।
 
सवाल है कि क्या आप इन बातों को सोच पा रहे हैं और इस देश के आम आदमी को समझा पा रहे हैं। यदि नहीं तो अब भी सोचिए, समझिए और अंदर से हिल चुके देश को एक नई मजबूती देने के लिए आगे आकर समर्थ नेतृत्व दीजिये। वैसा उदारमना नेतृत्व विकसित कीजिए जो दलित, पिछड़ी, अल्पसंख्यक, भाषाई, क्षेत्रीयता, लिंग भेद, साम्प्रदायिकता, जातीयता, परिवारवाद और सम्पर्कवाद जैसी संक्रामक वैचारिक बीमारियों और उससे उपजी निकृष्ट सोच से परे हो। जो समान मताधिकार की तरह समान नागरिक संहिता यानी कि अन्यान्य असमानताओं को दूर करने की पैरोकारी करता हो। जो भारत को भय, भूख और भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने वाली अटल-आडवाणी युगीन बीजेपी की अवधारणा-विचारधारा के विराट रूप का दर्शन जन-जन को आत्म-साक्षात्कार के माध्यम से करवाने में समर्थ हो। अन्यथा देश का वैचारिक दलदल इस सद्भावी राष्ट्र को भी ले डूबेगा, पूर्णतया समाप्त कर देगा, जिससे पूरी मानवता संकट में पड़ जाएगी, आज नहीं तो निश्चय कल!
 
-कमलेश पांडे
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और आलेख में व्यक्त विचार उनके अपने हैं।)

रहना है हर खबर से अपडेट तो तुरंत डाउनलोड करें प्रभासाक्षी एंड्रॉयड ऐप   



Disclaimer: The views expressed here are solely those of the author in his/her private capacity and do not necessarily reflect the opinions, beliefs and viewpoints of Prabhasakshi and do not in any way represent the views of Prabhasakshi.

Related Story

Related Video