Vanakkam Poorvottar: कोई क्षेत्र नहीं खोया है, सभी पोस्ट भारतीय नियंत्रण में हैं, Arunachal Pradesh में चीनी घुसपैठ की खबरों पर Indian Army का स्पष्टीकरण

By नीरज कुमार दुबे | Aug 13, 2026

भारतीय सेना ने अरुणाचल प्रदेश में चीन की कथित ‘धीमी घुसपैठ’ के दावों को खारिज करते हुए साफ कर दिया है कि भारत ने कोई क्षेत्र नहीं खोया है और सभी पोस्ट भारतीय नियंत्रण में हैं। सेना के सूत्रों के मुताबिक, अरुणाचल प्रदेश में चीन की ओर से किसी ‘स्लो एन्क्रोचमेंट’ की बात सही नहीं है और सेना तथा भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) सीमा पर चीनी गतिविधियों पर नजर रखने और उन्हें रोकने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। चीन को यह संदेश बिल्कुल स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है और यहां घुसपैठ, दबाव या जमीन पर तथाकथित ‘धीरे-धीरे कब्जा जमाने’ की कोई कोशिश भारत बर्दाश्त नहीं करेगा। ऐसी किसी भी हरकत का जवाब भारतीय सुरक्षा बल अपनी पूरी ताकत से देंगे।

इसे भी पढ़ें: Nepal ने खो दिये Sugauli Treaty के Original Document ! अब भारत के साथ कैसे सुलझायेगा सीमा विवाद?

समिति का दावा है कि PLA ने भारत के कुछ निर्धारित पेट्रोलिंग प्वाइंट तक भारतीय जवानों की पहुंच को प्रभावी रूप से रोक दिया है और पारंपरिक भारतीय चराई तथा शिकार क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश की है। सबसे गंभीर आरोप शेरा-5 पेट्रोलिंग प्वाइंट को लेकर है। PPA के मुताबिक, 2023 में इस स्थान पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच टकराव हुआ था। इसके बाद भारतीय बल पीछे हटे और कथित तौर पर दोबारा वहां नहीं लौटे। समिति का दावा है कि PLA ने वहां मौजूद भारतीय निशान और प्रतीकात्मक ढांचे हटा दिए तथा भारतीय गश्त को रोकना शुरू कर दिया।

यही वह बिंदु है जहां चीन की सीमा रणनीति पर गंभीर सवाल उठते हैं। PPA ने इसे चीन की उस कथित रणनीति से जोड़ा है जिसमें पहले किसी इलाके में पहुंच सीमित की जाती है, फिर अस्थायी रोक को जमीन पर स्थायी वास्तविकता में बदलने की कोशिश होती है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये PPA समिति के निष्कर्ष हैं, भारतीय सेना का आधिकारिक आकलन नहीं। सेना ने इसके उलट कहा है कि भारत ने कोई क्षेत्र नहीं खोया और सभी पोस्ट नियंत्रण में हैं।

मामला केवल एक पेट्रोलिंग प्वाइंट तक सीमित नहीं है। PPA समिति ने तक्सिंग, माजा और गालमो के इलाकों में मौसमी सैन्य उपस्थिति को एक बड़ी चुनौती बताया है। उसके अनुसार, भारी बर्फबारी और कठिन मौसम के कारण नियमित भारतीय पेट्रोलिंग मुख्यतः अप्रैल से अक्टूबर तक सीमित रहती है, जबकि PLA की गतिविधियां पूरे वर्ष जारी रहती हैं। सर्दियों में स्थानीय पोर्टरों की सेवाएं भी काफी हद तक बंद हो जाती हैं, जिससे अग्रिम क्षेत्रों में भारतीय मौजूदगी घटने का खतरा पैदा होता है। समिति ने इसे रणनीतिक रूप से संवेदनशील LAC पर ‘सीजनल वैक्यूम’ बताया है।

इसका सीधा असर स्थानीय लोगों पर भी पड़ता है। नांगा पहाड़ जैसे क्षेत्र पारंपरिक रूप से नाह और मारा समुदायों के शिकार तथा याक पालन के इलाके रहे हैं, लेकिन PPA के अनुसार अब स्थानीय लोगों की वहां पहुंच प्रतिबंधित है। समिति का दावा है कि इस तरह के प्रतिबंध PLA को आगे बढ़ने के लिए अधिक गुंजाइश दे सकते हैं। सीमा पर रहने वाले लोगों के लिए यह सिर्फ सुरक्षा का प्रश्न नहीं, बल्कि उनकी सदियों पुरानी आवाजाही, चराई और पारंपरिक अधिकारों का सवाल भी है।

यही कारण है कि अरुणाचल की सीमा नीति में सड़क, संचार और सैन्य ढांचे को हथियार से कम महत्वपूर्ण नहीं माना जा सकता। PPA ने Nacho-Taksing BRO सड़क को युद्धस्तर पर पूरा करने, 68 किलोमीटर लंबी Galemo-Pokorla सड़क को प्राथमिकता देने और Taksing-Pokorla मार्ग को Yaja तथा Huri होते हुए समयबद्ध तरीके से पूरा करने की मांग की है। समिति ने Sipi-2 में हेलीपैड तथा Sipi-4 और Sipi-6 में स्थायी सेना बेस बनाने, अग्रिम इलाकों में विश्वसनीय बिजली और Maza-Galemo में बेहतर टेलीफोन व नेटवर्क कनेक्टिविटी की भी मांग की है।

देखा जाये तो सामरिक दृष्टि से यह पूरा क्षेत्र इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि अपर सुबनसिरी का यह इलाका भारत-चीन सीमा के उन कठिन और दुर्गम हिस्सों में आता है जहां भौगोलिक परिस्थितियां ही सैन्य चुनौती बन जाती हैं। चीन ने पिछले वर्षों में सीमावर्ती इलाकों में बुनियादी ढांचे को मजबूत कर अपनी निगरानी और पेट्रोलिंग क्षमताओं को बढ़ाया है। भारतीय पक्ष भी इंफ्रास्ट्रक्चर और सीमा प्रभुत्व पर लगातार जोर दे रहा है। सेना के अनुसार, अनिर्धारित सीमा के कारण पेट्रोलिंग के दौरान दोनों पक्षों के सैनिकों का आमना-सामना हो सकता है और ऐसे मामलों को स्थापित प्रोटोकॉल के जरिए संभाला जाता है।

बीजिंग ने भी फिलहाल स्थिति को ‘सामान्यतः स्थिर’ बताया है और कहा है कि दोनों देश सैन्य तथा कूटनीतिक माध्यमों से संवाद बनाए हुए हैं। लेकिन चीन की भाषा चाहे जितनी संयमित हो, भारत के लिए असली कसौटी जमीन पर वास्तविक स्थिति है।

इतिहास भी भारत को सतर्क रहने की वजह देता है। 1959 में चीन ने Longju में Assam Rifles की चौकी पर हमला कर उसे कब्जे में लिया था और यह क्षेत्र लंबे समय से चीन की गतिविधियों तथा बुनियादी ढांचा निर्माण के कारण चर्चा में रहा है। 1962 के युद्ध में भी Kameng, Subansiri, Siyom, Siang और Lohit घाटियों में बड़े चीनी सैन्य अभियान हुए थे। युद्धविराम के बाद PLA LAC के उत्तर में लौट गया था।

इसलिए आज की चुनौती केवल यह साबित करने की नहीं है कि किसी खास बिंदु पर जमीन गई या नहीं। असली चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि सीमा पर भारत की मौजूदगी कभी कमजोर न पड़े। चीन यदि दबाव, बुनियादी ढांचे, स्थानीय आवाजाही पर प्रतिबंध या लगातार पेट्रोलिंग के जरिए जमीन पर नई ‘वास्तविकताएं’ बनाने की कोशिश करता है, तो भारत को हर मोर्चे पर उससे आगे रहना होगा।

बहरहाल, अरुणाचल पर भारत का रुख दोटूक है न जमीन छोड़ी जाएगी, न भारतीय संप्रभुता पर कोई सवाल स्वीकार किया जाएगा। सेना का यह स्पष्ट संदेश कि भारत ने कोई क्षेत्र नहीं खोया और सभी पोस्ट नियंत्रण में हैं, चीन के लिए पर्याप्त चेतावनी है। अब जरूरत इस चेतावनी को सड़क, सुरंग, हेलीपैड, संचार, स्थायी सैन्य ठिकानों और सालभर सक्रिय सीमा निगरानी की ताकत में बदलने की है। अरुणाचल की बर्फीली चोटियों पर भारत की मौजूदगी जितनी मजबूत होगी, चीन की ‘धीरे-धीरे दबाव बनाने’ की कोई भी रणनीति उतनी ही पहले चरण में नाकाम होगी।

-नीरज कुमार दुबे

प्रमुख खबरें

Bhikaji Cama Death Anniversary: वो वीरांगना जिसने Germany में लहराया भारत का तिरंगा और British Rule को ललकारा

Sridevi Birth Anniversary: एक फिल्म के लिए 1 करोड़ चार्ज करने वाली Legend की Success Story और अनकहे किस्से

क्या DMK अब NDA के साथ? Kanimozhi की चाय पर चर्चा ने खोले नए सियासी रास्ते

World Organ Donation Day 2026: अंगदान की संस्कृति ही मानवता को नई दिशा दे सकती है