Nepal ने खो दिये Sugauli Treaty के Original Document ! अब भारत के साथ कैसे सुलझायेगा सीमा विवाद?

india nepal
Image Source: ChatGPT

यह खुलासा ऐसे समय हुआ है जब भारत और नेपाल के बीच लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी को लेकर विवाद फिर सुर्खियों में है। दरअसल, भारत और चीन के बीच लिपुलेख व्यापार मार्ग को फिर खोलने पर सहमति के बाद नेपाल ने इन क्षेत्रों पर अपना दावा दोहराया है।

लो कर लो बात! सीमा विवाद को लेकर भारत पर लगातार सवाल उठाने वाला नेपाल खुद उस ऐतिहासिक दस्तावेज की मूल प्रति नहीं ढूंढ़ पा रहा है, जिसके आधार पर उसकी सीमाओं की बुनियाद तैयार हुई थी। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने संसद में स्वीकार किया है कि सरकार को यह तक स्पष्ट जानकारी नहीं है कि 1816 की सुगौली संधि की आधिकारिक मूल प्रति उसके पास मौजूद है या नहीं। राष्ट्रीय अभिलेखागार में कुछ संबंधित दस्तावेज होने की जानकारी जरूर है, लेकिन वे वास्तविक आधिकारिक संधियां हैं या उनकी प्रतियां, इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है।

यह खुलासा ऐसे समय हुआ है जब भारत और नेपाल के बीच लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी को लेकर विवाद फिर सुर्खियों में है। दरअसल, भारत और चीन के बीच लिपुलेख व्यापार मार्ग को फिर खोलने पर सहमति के बाद नेपाल ने इन क्षेत्रों पर अपना दावा दोहराया है। लेकिन अब सवाल यह है कि जिस ऐतिहासिक संधि को सीमा निर्धारण की बुनियादी कड़ी माना जाता है, उसकी मूल प्रति ही नेपाल के रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है, तो उसके सीमा संबंधी दावों की ऐतिहासिक और दस्तावेजी मजबूती को किस आधार पर परखा जाए?

इसे भी पढ़ें: India Neighborhood First policy: बांग्लादेश से लेकर नेपाल तक भारत का बड़ा गेम, पलटा पासा !

क्या है सुगौली संधि?

सुगौली संधि नेपाल और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई वह ऐतिहासिक संधि थी, जिसने 1814-16 के एंग्लो-नेपाल युद्ध का अंत किया और नेपाल की क्षेत्रीय सीमाओं तथा ब्रिटिश भारत के साथ उसके संबंधों को बड़े पैमाने पर निर्धारित किया। यह संधि 2 दिसंबर 1815 को हुई और 4 मार्च 1816 को इसकी औपचारिक पुष्टि हुई। युद्ध में पराजय के बाद नेपाल को बड़े भूभाग से अपने दावे छोड़ने पड़े और उसकी पश्चिमी सीमा के निर्धारण में महाकाली नदी की महत्वपूर्ण भूमिका बनी। इसी संधि को आगे चलकर नेपाल और ब्रिटिश भारत के बीच सीमा-व्यवस्था की आधारभूत कड़ी माना गया। यही कारण है कि सुगौली संधि की मूल प्रति का गायब होना महज किसी पुराने कागज का गुम होना नहीं है। यह एक ऐसा दस्तावेज है, जिसका सीधा संबंध सीमा, संप्रभुता और ऐतिहासिक भूगोल से जुड़ा है। खासकर तब, जब नेपाल आज उसी ऐतिहासिक सीमा-व्यवस्था के आधार पर लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी पर अपना दावा करता है।

मामला सिर्फ सुगौली संधि तक सीमित नहीं

सबसे गंभीर पहलू यह है कि नेपाल में ऐतिहासिक संधियों के मूल दस्तावेजों की उपलब्धता को लेकर सवाल पहली बार नहीं उठे हैं। 2016 में भारत-नेपाल संबंधों की समीक्षा के लिए गठित प्रबुद्ध व्यक्तियों के समूह की चर्चाओं के दौरान 1950 की भारत-नेपाल शांति एवं मैत्री संधि की मूल प्रति खोजने की कोशिश की गई, लेकिन वह भी नहीं मिली। बाद में संसदीय जांच में सुगौली संधि और 1950 की संधि, दोनों की मूल प्रतियां नेपाल में नहीं मिलने की बात सामने आई।

2019 में तत्कालीन विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली ने भी कहा था कि मंत्रालय के पास दोनों संधियों की प्रतियां हैं, लेकिन यह सुनिश्चित करने के लिए फोरेंसिक जांच जरूरी है कि वे मूल दस्तावेज हैं या नहीं। नेपाल ने भारत और ब्रिटेन में उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों और नक्शों को भी तलाशने की बात कही थी। यानी सवाल केवल यह नहीं कि दस्तावेज कहां हैं, बल्कि यह भी है कि नेपाल के पास मौजूद प्रतियां कितनी प्रामाणिक हैं।

सीमा दावे की कमजोर कड़ी

वैसे इससे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि नेपाल का हर सीमा दावा स्वतः गलत हो जाता है। सीमा विवादों का निर्धारण केवल किसी एक मूल दस्तावेज से नहीं होता; ऐतिहासिक नक्शे, नदी की वास्तविक धारा, प्रशासनिक नियंत्रण, पुराने सरकारी रिकॉर्ड और अन्य अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज भी महत्वपूर्ण होते हैं। लेकिन नेपाल के लिए समस्या यह है कि जिस ऐतिहासिक संधि को वह अपनी सीमा-व्यवस्था के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानता है, उसकी मूल प्रति के अस्तित्व पर ही उसकी सरकार स्पष्ट नहीं है। यही तथ्य उसके आक्रामक सीमा-रुख पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि नेपाल के पास मूल संधि उपलब्ध नहीं है और उसे अपनी प्रतियों की प्रामाणिकता तक फोरेंसिक तरीके से जांचनी पड़ रही है, तो सीमा विवाद पर निर्णायक और एकतरफा ऐतिहासिक दावे करना निश्चित रूप से कठिन हो जाता है। इस पूरे घटनाक्रम का सामरिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि लिपुलेख क्षेत्र भारत, नेपाल और चीन, तीनों के लिए संवेदनशील भौगोलिक क्षेत्र है।

दिलचस्प बात यह है कि इसी तनाव के बीच नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव से मुलाकात कर दोनों देशों के “ऐतिहासिक संबंधों” को मजबूत करने और साझा हितों में सहयोग बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया। वहीं सुगौली संधि की मूल प्रति नहीं मिलने संबंधी नेपाली विदेश मंत्री के बयान पर भारत ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि दोनों देशों के लंबित मुद्दों को मौजूदा राजनयिक माध्यमों से सुलझाया जा सकता है।

बहरहाल, नेपाल यदि सीमा विवाद को वास्तव में ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर सुलझाना चाहता है, तो उसे सबसे पहले अपने अभिलेखों की स्थिति साफ करनी होगी। सुगौली संधि की मूल प्रति कहां है, मौजूद है या नहीं, और उसके पास उपलब्ध प्रतियां कितनी प्रामाणिक हैं, इन सवालों का जवाब देना जरूरी होगा। क्योंकि सीमा का फैसला नारों और राजनीतिक दावों से नहीं, प्रमाणित दस्तावेजों और स्थापित तथ्यों से होता है और फिलहाल, सुगौली संधि की मूल प्रति को लेकर नेपाल की अपनी स्वीकारोक्ति उसके दावे की विश्वसनीयता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न जरूर खड़ा करती है।

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
All the updates here:

अन्य न्यूज़