By नीरज कुमार दुबे | Aug 06, 2026
असम में मानसून इस बार केवल बारिश नहीं, बल्कि भारी तबाही लेकर आया है। राज्य में बाढ़ का संकट लगातार भयावह होता जा रहा है। पिछले 24 घंटों में छह और लोगों की मौत के साथ इस वर्ष बाढ़ से मरने वालों की संख्या बढ़कर 100 के आसपास हो गई है। 14 जिलों में 1.60 लाख से अधिक लोग जलप्रलय की चपेट में हैं, जबकि सैकड़ों गांव पानी में डूब चुके हैं। हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि तबाह हो गई है, सड़कें और पुल क्षतिग्रस्त हैं, पशुधन बह गया है और शहरी इलाकों तक में जलभराव ने जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। इस प्राकृतिक आपदा के बीच अब अवैध कोयला और पत्थर खनन को लेकर सियासी घमासान भी तेज हो गया है, जिसने इस त्रासदी को नया राजनीतिक रंग दे दिया है।
राज्य के शिवसागर, गोलाघाट, जोरहाट, लखीमपुर, चराइदेव, बिश्वनाथ, धेमाजी, कामरूप महानगर, कार्बी आंगलोंग, सोनितपुर, तिनसुकिया, नगांव, दरांग और उदालगुड़ी सहित 14 जिले बाढ़ की चपेट में हैं। इनमें सबसे अधिक प्रभावित शिवसागर है, जहां 57 हजार से अधिक लोग प्रभावित हैं। इसके बाद गोलाघाट में करीब 34 हजार और जोरहाट में लगभग 25 हजार लोग संकट झेल रहे हैं। महज एक दिन पहले तक पांच जिलों में 1.22 लाख लोग प्रभावित थे, लेकिन लगातार बारिश के कारण बाढ़ का दायरा तेजी से बढ़ गया।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य के 563 गांव जलमग्न हैं और लगभग 16,952 हेक्टेयर कृषि भूमि बाढ़ के पानी में डूब चुकी है। सात बड़े तटबंध टूट गए हैं, जिनमें बिश्वनाथ के ब्रह्माजन क्षेत्र में पांच और दरांग के मंगलदोई में दो तटबंध शामिल हैं। चराइदेव का एक स्टील ब्रिज और उदालगुड़ी के तंगला का एक पैदल पुल भी क्षतिग्रस्त हो गया है। धानसिरी नदी न्यूमालीगढ़ में अब भी खतरे के निशान से ऊपर बह रही है, जिससे निचले इलाकों में नया खतरा मंडरा रहा है।
हम आपको यह भी बता दें कि बाढ़ का असर केवल इंसानों तक सीमित नहीं है। 35 हजार से अधिक मवेशी और पोल्ट्री प्रभावित हुए हैं, जबकि लगभग 8,500 पशु बाढ़ के तेज बहाव में बह गए। राज्य के कई हिस्सों में सड़क, पुल और अन्य सार्वजनिक ढांचा भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। गुवाहाटी जैसे शहरी क्षेत्रों में भी हालात सामान्य नहीं हैं। कामरूप, कामरूप महानगर, मोरीगांव और जोरहाट में शहरी बाढ़ से सैकड़ों लोग प्रभावित हुए हैं। सतगांव और हाटीगांव जैसे इलाकों से एसडीआरएफ और जिला आपदा बल ने नावों के जरिए लोगों को सुरक्षित निकाला, जबकि जूरीपार और अनिल नगर में अब भी जलभराव बना हुआ है।
उधर, राहत और बचाव कार्यों को तेज करते हुए प्रशासन ने 105 राहत शिविर और राहत वितरण केंद्र संचालित किए हैं, जहां 44 हजार से अधिक लोग रह रहे हैं। इसके अलावा 45 प्रमुख राहत शिविरों में 12 हजार से अधिक विस्थापितों को आश्रय दिया गया है। पिछले 24 घंटों में सैकड़ों क्विंटल चावल, दाल, नमक, सरसों का तेल और पशुओं के लिए चारा प्रभावित इलाकों में पहुंचाया गया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने भी बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर राहत एवं पुनर्वास कार्यों की समीक्षा की।
दूसरी ओर, राहत कार्यों के बीच सबसे बड़ा राजनीतिक विवाद बाढ़ की वजह को लेकर खड़ा हो गया है। ऊपरी असम में कई स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने आरोप लगाया है कि नागालैंड सीमा से लगे क्षेत्रों में वर्षों से चल रहे अनियंत्रित कोयला और पत्थर खनन ने डिखौ नदी के प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित किया है, जिसके कारण इस बार बाढ़ कहीं अधिक विनाशकारी साबित हुई। स्थानीय लोगों का दावा है कि नागिनीमोरा के आसपास बड़े पैमाने पर रैट-होल कोयला खनन और पत्थर खनन से जंगलों की कटाई, मिट्टी का कटाव और नदी की पारिस्थितिकी को भारी नुकसान पहुंचा है।
सुरक्षा एजेंसियों के सूत्रों ने यह भी आरोप लगाया है कि इस कोयला कारोबार में कुछ उग्रवादी संगठनों की आर्थिक हिस्सेदारी रही है, जिससे इस पूरे नेटवर्क पर प्रभावी कार्रवाई मुश्किल हो गई। नागालैंड सरकार की वार्षिक प्रशासनिक रिपोर्ट और विभिन्न पर्यावरणीय अध्ययनों में भी रैट-होल खनन से जलस्रोतों के प्रदूषण, भूस्खलन, भूमि क्षरण और पारिस्थितिकीय असंतुलन की गंभीर चेतावनी दी गई है। इन रिपोर्टों में तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने की आवश्यकता बताई गई है।
इसी मुद्दे पर कांग्रेस सहित विपक्ष ने भाजपा सरकार को घेरते हुए अवैध खनन को बाढ़ की बड़ी वजह बताया। हालांकि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उनका कहना है कि ऊपरी असम में हर वर्ष नागालैंड की पहाड़ियों से आने वाले पानी के कारण बाढ़ आती है और इसका अवैध खनन से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि नागालैंड में होने वाली खनन गतिविधियों पर असम सरकार का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है और इस मामले में प्रभावी हस्तक्षेप केवल केंद्र सरकार के स्तर पर ही संभव है। बावजूद इसके, शिवसागर के बाढ़ प्रभावित लोगों ने मुख्यमंत्री से डिखौ नदी में पत्थर और खनन गतिविधियों पर रोक लगाने की मांग दोहराई है।
उधर, इस भीषण त्रासदी के बीच राहत कार्यों में कई सामाजिक संगठन और फिल्मी हस्तियां भी आगे आई हैं। अभिनेता सलमान खान की संस्था बीइंग ह्यूमन ने राहत अभियान के दूसरे चरण की शुरुआत करते हुए सबसे अधिक प्रभावित गांव नेपाली खुटी में 220 अर्ध-स्थायी बाढ़रोधी मकान तैयार कर दिए हैं। अभिनेता रणदीप हुड्डा और सामाजिक संस्था ग्लोबल सिख्स के साथ मिलकर कुल 500 मकान बनाने का लक्ष्य रखा गया है। पिछले कई दिनों से प्रभावित परिवारों तक भोजन पहुंचाने के साथ-साथ अब पुनर्वास पर भी तेजी से काम किया जा रहा है। रणदीप हुड्डा ने लोगों से अपील की है कि मानवता के इस कठिन समय में हर व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार मदद के लिए आगे आना चाहिए।
इस बीच, मौसम विभाग ने अगले कुछ दिनों में कैचमेंट क्षेत्रों में और बारिश की आशंका जताई है। ऐसे में प्रशासन की चिंता यह है कि नदियों का जलस्तर और बढ़ने पर हालात और विकराल हो सकते हैं। फिलहाल असम के सामने केवल बाढ़ से निपटने की चुनौती नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, सीमा पार खनन, आपदा प्रबंधन और राजनीतिक जवाबदेही जैसे कई गंभीर सवाल भी खड़े हो गए हैं। यही कारण है कि यह आपदा अब केवल प्राकृतिक संकट नहीं, बल्कि पर्यावरण, प्रशासन और राजनीति, तीनों की बड़ी परीक्षा बन चुकी है।