पंजाब में कांग्रेस और शिअद ही संभालती रही हैं सत्ता, इस बार खेल बिगाड़ने को कई मोर्चे मैदान पर उतरे

By अनुराग गुप्ता | Dec 31, 2021

चंडीगढ़। पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और इससे पहले राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने की कोशिश में जुट गए हैं। जबकि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपने पुराने साथी शिरोमणि अकाली दल (शिअद) को मनाने की कोशिश कर रही है। हालांकि भाजपा का कांग्रेस छोड़ अपनी पार्टी का गठन करने वाले अमरिंदर सिंह के साथ गठबंधन हो चुका है। जबकि अमरिंदर सिंह के पार्टी छोड़ने के बाद और अंतर्कलह का सामना कर रही कांग्रेस कमजोर पड़ गई है। इसके अलावा आम आदमी पार्टी का प्रभाव भी धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है। ऐसे में आज हम बात करेंगे पंजाब के प्रमुख राजनीतिक दलों के बारे में, जो सत्ता में आने और बने रहने का भरपूर प्रयास करेंगी। 

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शिरोमणि अकाली दलपंजाब की सियासत में अहम भूमिका निभाने वाली अकाली दल का गठन दिसंबर, 1920 को 14 शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी, सिख धार्मिक शरीर के एक कार्य बल के रूप में किया गया था। अकाली दल खुद को सिखों का प्रतिनिधि मानता है इसीलिए तो पंजाब में उसकी पकड़ काफी मजबूत है। इतिहास के पन्नों से धूल हटाएं तो 20 मार्च, 1967 को अकाली दल सत्ता में आई और कांग्रेस के बाद पंजाब का नेतृत्व किया। इसके बाद पांचवीं विधानसभा में भी अकालियों का दबदबा रहा। हालांकि इस दौरान अकाली दल ने दो मुख्यमंत्री दिए। यही वो वक्त था जब पहली बार प्रकाश सिंह बादल ने पंजाब की सत्ता संभाली थी। हालांकि अगला चुनाव अकाली दल हार गई। लेकिन फिर खुद को मजबूत करते हुए 1977 का चुनाव जीत लिया और फिर प्रकाश सिंह बादल ने प्रदेश की गद्दी संभाली। यह ऐसा समय था जब सरकारें पार्टी के भीतर आंतरिक संघर्ष और सत्ता संघर्ष के कारण लंबे समय तक सत्ता में नहीं रहीं। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाते थे।1984 में हुए ऑपरेशन ब्लू स्टार के कारण कांग्रेस की स्थिति प्रदेश में कमजोर हुई और अकालियों का परचम बुलंद हो गया। इसी वजह से शिरोमणि अकाली दल की फिर वापसी हुई और सुरजीत सिंह बरनाला को मुख्यमंत्री बनाया गया। इसके बाद 1997 में और फिर 2017 में शिअद ने चुनाव जीता लेकिन 2017 का चुनाव हार गई। 

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भारतीय जनता पार्टीसाल 1980 में जन्मीं भाजपा के लिए पंजाब अभी भी दूर का सपना है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी ने पूरे भारत में अपना विस्तार किया है तब भी पंजाब में उसे सफलता नहीं मिल सकी है। 1992 तक भाजपा अकेले पंजाब में चुनाव लड़ती थी हालांकि उसे सफलता का इंतजार ही रहता था। 1992 तक भाजपा और अकाली दल दोनों अलग-अलग चुनाव लड़ते थे लेकिन बाद में एक साथ हो जाते थे। हालांकि दोनों दलों के बीच 1996 में गठबंधन हुआ और उसके बाद लगातार 2020 तक भाजपा अकाली दल के छोटे भाई की तरह पंजाब में मौजूद रहा।पंजाब में भाजपा की दाल ज्यादा गल भी नहीं पाई और मोदी लहर में भी पार्टी के कद्दावर नेता अरुण जेटली जीत नहीं पाए। हालांकि कुछ सीटों पर पार्टी का दबदबा देखने को मिलता रहा। अमृतसर से भाजपा के टिकट पर नवजोत सिंह सिद्धू लगातार चुनाव जीते थे जबकि गुरदासपुर क्षेत्र में भी पार्टी ने अपना दबदबा कायम रखा हुआ है। अकाली दल के साथ गठबंधन में पार्टी 20 से 25 सीटों के बीच ही चुनाव लड़ते थे और 5 से 10 सीटों के बीच में ही चुनाव जीत पाती थी। ऐसे में इस बार 2022 में भाजपा गठबंधन के साथ चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में है देखना दिलचस्प होगा कि अमरिंदर सिंह के साथ गठबंधन के बाद पार्टी वहां खुद को कितना मजबूत कर पाते हैं। 

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आम आदमी पार्टी(आप)साल 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले पंजाब के समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। अमरिंदर सिंह के कांग्रेस में रहते हुए आम आदमी पार्टी का प्रभाव बढ़ रहा था लेकिन अमरिंदर सिंह के कांग्रेस छोड़ खुद का दल बनाने के बाद समीकरण बदलने लगे। आप ने पिछले विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश में अपनी पकड़ बनाना शुरू कर दिया था। हालांकि साल 2017 के चुनाव में पार्टी को कामयाबी भी मिली लेकिन कोई भी नेता राज्य में पार्टी का चेहरा नहीं बन पाया और राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ही रैली करते हुए दिखाई दिए। इस बार भी उन्होंने मोर्चा संभाल लिया है।पिछले चुनाव में जहां अकील दल भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रही थी तो कांग्रेस अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में मतदाताओं को लुभाने का प्रयास कर रहे थे। इसी बीच आम आदमी पार्टी ने अपनी हुंकार भर दी लेकिन गलती यह की कि कोई भी चेहरा नहीं उतारा। ऐसे में पार्टी को महज 20 सीटें ही मिल पाई लेकिन वो दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई। 117 सीटों वाले विधानसभा में कांग्रेस को 72 सीटें मिली थी। हालांकि आम आदमी पार्टी ने इस बार भी कोई चेहरा घोषित नहीं किया।

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