Gyan Ganga: अथ श्री महाभारत कथा- जानिये भाग-7 में क्या क्या हुआ

By आरएन तिवारी | Dec 01, 2023

ॐ नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्  देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॐ

कथा है पुरुषार्थ की ये स्वार्थ की परमार्थ की

सारथि जिसके बने श्री कृष्ण भारत पार्थ की

शब्द दिग्घोषित हुआ जब सत्य सार्थक सर्वथा

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत 

अभ्युत्थानमअधर्मस्य तदात्मानम सृजाम्यहम।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम 

धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।

भारत की है कहानी सदियो से भी पुरानी

है ज्ञान की ये गंगाऋषियो की अमर वाणी

ये विश्व भारती है वीरो की आरती है

है नित नयी पुरानी भारत की ये कहानी

महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत।।

पिछले अंक में हम सबने देखा कि जब युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ महाराज धृतराष्ट्र को राजसूय यज्ञ की जानकारी देने महल में जाते हैं। तब दुर्योधन, शकुनि आदि मिलकर द्यूत क्रीड़ा के लिए युधिष्ठिर को उकसाते हैं। सीधे साधे धर्म की मूर्ति युधिष्ठिर उनका षडयंत्र नहीं समझ पाते हैं और जुआ खेलने के लिए बैठ जाते हैं। 

आइए ! कथा के अगले प्रसंग में चलते हैं .... 

द्युत क्रीड़ा, द्रौपदी चीरहरण और पांडवों के वनवास की कहानी

दुर्योधन के राजमहल में द्युत क्रीड़ा का भव्य आयोजन किया गया। एक तरफ धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव, मामा शकुनि और कर्ण थे। तो दूसरी तरफ युधिष्ठिर के साथ उनके पांचों पांडव भाई मौजूद थे। खेल के आरंभ में तो बाजी पांडवों के पक्ष में थी। लेकिन जैसे ही मामा शकुनि ने अपने पासों के माध्यम से चाल डालनी शुरू की। तब मानों खेल का रुख ही बदल गया।

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धीरे धीरे खेल में दांव लगने लगे। और युधिष्ठिर ने एक-एक करके अपने राज्य, अस्त्रों, रथ और आभूषणों को दांव पर लगाना शुरू कर दिया। उपरोक्त सभी बाजी हारने के बाद युधिष्ठिर ने अपने भाइयों को भी दांव पर लगा दिया। जिसके बाद मानो हर बाजी कौरवों के पक्ष में जाने लगी। जब युधिष्ठिर खेल में अपने भाइयों तक को हार गए तब दुर्योधन के उकसाने पर युधिष्ठिर ने द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया। अब युधिष्ठिर उस द्वयुत क्रीड़ा में द्रौपदी को भी हार गए। शकुनि और कर्ण के साथ-साथ दुर्योधन भी अत्यंत प्रसन्न था। उसने मौके का फायदा उठाते हुए दु:शासन को आदेश दिया कि वह जाए और द्रौपदी को भरी सभा में बाल खींचकर लेकर आए। दु:शासन ने अपने अग्रज की आज्ञा का पालन किया और घसीटते हुए द्रौपदी को सभा के बीच में लाकर पटक दिया। उस सभा में हस्तिनापुर के सभी विद्वान व्यक्ति भी मौजूद थे किन्तु किसी ने कुछ नहीं कहा। सभी चुपचाप मूकदर्शक बने रहे और तमाशा देखते रहे। इस दौरान दुर्योधन ने द्रौपदी को बहुत भला-बुरा कहते हुए दु:शासन से कहा-- कि इस पांच पतियों वाली द्रौपदी को मेरी जंघा पर बैठा दे। कर्ण भी पीछे नहीं रहा उसने तो हर सीमा लाँघ दी और  द्रौपदी को वेश्या-वेश्या कहकर चिल्लाने लगा। उस भरी सभा में अधिक नीचता तो तब हुई जब दुर्योधन ने दु:शासन को सबके सामने द्रौपदी के वस्त्रों का चीर हरण करने का आदेश दे दिया।  द्रौपदी इस अपमान के बदले में फूट फूट कर रोने लगी और सभा में विराजमान महाराज धृतराष्ट्र को शाप दे दिया कि उनके वंश का सर्वनाश अवश्य हो जाएगा।

पहले तो अपनी इज्जत और लाज बचाने के लिए द्रौपदी ने चारो तरफ नजरें दौड़ाई, सहायता की गुहार लगाई किन्तु जब किसी ने भी हाथ नहीं बढ़ाया तब उसने अपनी रक्षा के लिए भगवान श्री कृष्ण को याद किया भगवान श्रीकृष्ण द्रौपदी  परम सखा भी थे। भगवान श्री कृष्ण ने भरी सभा में द्रौपदी की रक्षा की और उसको बेइज्जत होने से बचाया। उसी क्षण सभा में रानी गांधारी का आगमन होता है और वे इस अधर्म को रोक लेती हैं।

इसके पश्चात भीम द्रौपदी के अपमान का बदला लेने के लिए भरी सभा में यह प्रतिज्ञा लेते हैं, कि द्रौपदी के ये केश तब तक ऐसे ही खुले रहेंगे जब तक मैं दु:शासन की छाती फाड़कर उसका  लहू नहीं लाऊं। द्रौपदी दुशासन के लहू से ही अपने ये बाल धुलेगी और दुर्योधन ने जिस जंघा पर द्रौपदी को बैठाने की बात कही है  उस जंघे को मैं चकनाचूर करके ही दम लूँगा।  यानि दूसरे शब्दों में भीम ने द्रौपदी के अपमान का बदला लेने की ठान ली थी।

इसके बाद महाराज धृतराष्ट्र उस समय युद्ध की परिस्थितियों को टालने के लिए पांडवों से बातचीत करते हैं और कहते है--- कि अपराध तो तुमसे भी हुआ है, तुम्हें किसी व्यक्ति या स्त्री को दांव पर लगाने का अधिकार नहीं है। इसलिए तुमको 12 साल का वनवास और 1 साल का अज्ञातवास दिया जाता है।

इसके पश्चात् तुम्हारे वापस आने पर तुम्हें तुम्हारा राज्य सम्मान समेत लौटा दिया जाएगा। परंतु यदि 1 वर्ष के अज्ञातवास के दौरान तुम पहचान लिए जाते हो, तो तुम्हें पुन: वनवास भोगना होगा।

पांडवों का 12 वर्ष का वनवास

पांडव अपने वनवास के दौरान एक जंगल में कुटिया बनाकर रहने लगते हैं। जहां वह जंगल की लकड़ियां, नदियों का पानी और पेड़ों के फल खाकर अपना जीवन व्यतीत करते हैं। तभी एक बार तालाब में पानी पीने के दौरान पांडवों की मुलाकात यक्ष के भेष में यमराज से होती है।

यक्ष उनसे कहता हैं कि यदि उनको इस तालाब से पानी पीना है तो उन्हें पहले कुछ प्रश्नों का उत्तर देना होगा। लेकिन युधिष्ठिर को छोड़कर सारे पांडव भाई यक्ष की बात को अनसुनी कर देते हैं और मूर्छित हो जाते हैं। ऐसे में युधिष्ठिर द्वारा सारे प्रश्नों का ठीक उत्तर देने पर यमराज खुश होकर युधिष्ठिर के समस्त भाइयों को जीवित कर देते हैं। इस घटना के बाद ही युधिष्ठिर को धर्मराज के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त होती है।

शेष अगले प्रसंग में ------

श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव ----------

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।

- आरएन तिवारी

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