Gyan Ganga: अथ श्री महाभारत कथा- जानिये भाग-9 में क्या क्या हुआ

By आरएन तिवारी | Jan 12, 2024

ॐ नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्  देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॐ

कथा है पुरुषार्थ की ये स्वार्थ की परमार्थ की

सारथि जिसके बने श्री कृष्ण भारत पार्थ की

शब्द दिग्घोषित हुआ जब सत्य सार्थक सर्वथा

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत 

अभ्युत्थानमअधर्मस्य तदात्मानम सृजाम्यहम।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम 

धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।

भारत की है कहानी सदियो से भी पुरानी

है ज्ञान की ये गंगाऋषियो की अमर वाणी

ये विश्व भारती है वीरो की आरती है

है नित नयी पुरानी भारत की ये कहानी

महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत।।

पिछले अंक में हम सबने पढ़ा कि दुर्योधन ने अपने गुप्तचरों के माध्यम से यह पता लगा लिया था कि पांडव अज्ञातवास के दौरान आखिर कहां ठहरे हुए हैं ?  उसने तत्काल अपनी कौरव सेना तैयार की और विराट नगरी पर आक्रमण कर दिया। जवाब में अर्जुन ने ही अपने गांडीव के द्वारा कौरव सेना को विराट नगर के बाहर ही रोक दिया। साथ ही जब तक दुर्योधन पांडवों के अज्ञातवास का भेद खोल पाता, तब तक पांडवों का अज्ञातवास सफलतापूर्वक पूर्ण हो चुका था।

आइए ! कथा के अगले प्रसंग में चलें----- 

युद्ध की परिस्थितियों का उत्पन्न होना

विराट युद्ध के पश्चात जब पांडव वनवास पूरा करके हस्तिनापुर अपना अधिकार मांगने वापस लौटे तब दुर्योधन ने उन्हें राज्य लौटाने से मना कर दिया। उसका कहना था कि मैंने तुम्हारा अज्ञातवास भंग किया है, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं हुआ था।

दुर्योधन की अन्यायपूर्ण बातें सुनकर पांडवों बहुत नाराज हुए और उन्होंने युद्ध करके अपना राज्यपाठ वापस लेने का निश्चय किया। परिस्थिति को देखते हुए महामंत्री विदुर ने कौरवों को बहुत समझाया कि पांडवों को उनका अधिकार देकर युद्ध टालना चाहिए, लेकिन दुर्योधन अहंकार के वशीभूत था। उसने विदुर जी की एक न सुनी और पांडवों के साथ युद्ध के लिए तैयार हो जाता है। यहाँ तक कि वह भगवान श्रीकृष्ण की भी सलाह नहीं मानता और कहता है ------ 

''सूच्याग्रं नैव दास्यामि बिना युद्धेन केशव।''

हे कृष्ण !!, बिना युद्ध के सूई की नोक के बराबर भी ( जमीन ) नहीं दूँगा ।

इसके बाद, दोनों ही पक्ष युद्ध में अपनी-अपनी सेना को बढ़ाने के उद्देश्य से लग जाते हैं। 

जहां कौरवों की तरफ से गांधार नरेश, अंगराज कर्ण, मत्स्य राजा शल्य, अश्वस्थामा, भूरिश्रवा, सोमदत्त, कृतवर्मा, शल्य, वृषसेन, जयद्रथ समेत हस्तिनापुर के महान योद्धा भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य आदि भी युद्ध में लड़े थे।

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वहीं पांडवों की तरफ से राजा द्रुपद, राजा विराट, सात्यकि, धृष्टकेतु आदि युद्ध लड़े थे। तो वहीं भगवान श्री कृष्ण और उनकी नारायणी सेना के चुनाव के समय अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण और दुर्योधन ने नारायणी सेना को चुना था। इस प्रकार, कौरवों के पास 11 अक्षौहिणी (24,05,700) और पांडवों के पास 9 अक्षौहिणी (15,30,900) सेना थी।

उधर, युद्ध की बात निश्चित होने पर विदुर भीष्म पितामह से युद्ध को रोकने की बात कहते हैं, लेकिन भीष्म पितामह राजा के आदेश से बंधे होने के कारण विवशतापूर्ण कुछ कर नही पाते हैं। जिसके चलते विदुर महामंत्री के पद से त्याग-पत्र दे देते हैं और इस अधर्म से खुद को अलग कर लेते है। इस दौरान संजय को महाराज धृतराष्ट्र का मुख्य सेवक नियुक्त किया जाता है।

भगवान श्री कृष्ण का शांतिदूत बनकर कौरवों के पास जाना

युद्ध की तैयारियां सुनिश्चित हो जाने के पश्चात् दोनों ही पक्षों की ओर से शांति दूतों को भेजा गया। जहां पांडवों की ओर से भगवान श्री कृष्ण को कौरवों के पास भेजा गया तो वहीं महाराज धृतराष्ट्र ने संजय को शांति दूत बनाकर पांडवों के पास भेजा। इधर, जब भगवान श्री कृष्ण कौरवों के पास पांडवों का संदेश लेकर पहुंचे।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने महाराज धृतराष्ट्र से पांडवों के लिए पांच गांव (दिल्ली, सोनीपत, पानीपत, बागपत और तिलपत) मांगे। लेकिन दुर्योधन ने इस शांति प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इतना ही नहीं शांति दूत बनकर आए श्री कृष्ण को बंदी बनाने का अपराध किया। 

महाभारत युद्ध का आरंभ

युद्ध से एक दिन पहले कौरवों ने भीष्म पितामह को और पांडवों ने राजा धृष्टद्युम्न को अपनी सेना का सेनापति नियुक्त किया। युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व भीष्म पितामह ने युद्ध की कुछ शर्तें बताई, जिन शर्तों को मानने के लिए दोनों पक्ष ही बाध्य थे।

युद्ध की शर्तें

1) सूर्यास्त के बाद युद्ध नहीं किया जाएगा।

2) एक श्रेणी का योद्धा अपने समान योद्धा से ही युद्ध करेगा।

3) नि:शस्त्र व घायल योद्धा पर कोई वार नही करेगा।

4) इस युद्ध में मनुष्यों को छोड़कर अन्य कोई राक्षस प्रजाति का व्यक्ति भाग नहीं लेगा।

5) युद्धभूमि से दूर जाकर कोई युद्ध नहीं करेगा।

महाभारत युद्ध के संपूर्ण दिनों की कथा

युद्ध के पहले दिन का आरंभ शंखनाद से किया गया। जिसके बाद दोनों पक्ष एक दूसरे के सामने आ गए। इस दौरान जब अर्जुन ने अपने सामने पिता तुल्य भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य को देखा, तब उन्होंने अपने गांडीव को रखते हुए भगवान श्री कृष्ण से युद्ध को टालने की बात कही। जिसपर भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद भगवद्गीता का ज्ञान दिया। इसके बाद युद्ध प्रारंभ हुआ।

युद्ध आरंभ से पहले युधिष्ठिर द्वारा यह घोषणा की गई थी कि यदि कोई अपना पक्ष बदलना चाहता है तो बदल सकता है, तब कौरवों का सौतेला भाई युयुत्सु कौरवों का साथ छोड़कर पांडवों की ओर चला जाता है।

युद्ध के पहले दिन पांडवों को काफी हानि हुई। तथा राजा विराट के दोनों पुत्र उत्तर और श्वेत वीरगति को प्राप्त हो गए।

शेष अगले प्रसंग में ------

श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव ----------

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय । 

- आरएन तिवारी

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