भविष्य के कार्यक्रम के साथ वैचारिक कुहासे पर प्रहार

By उमेश चतुर्वेदी | Aug 30, 2025

किसी संगठन की सौ साल की यात्रा सामान्य बात नहीं है। आने वाले दशहरे को संघ अपनी स्थापना के सौ साल पूरी कर लेगा। चौतरफा कटु वैचारिक हमले, आरोप-प्रत्यारोप के बीच से निकलते हुए सौ साल की यात्रा पूरी कर लेना कोई हंसी-खेल नहीं है। अपने स्वयंसेवकों के त्याग, उनकी कठोर मेहनत और पैरों को गहरे तक छेद देने वाले कांटों के बीच से राह बनाने की उनकी कोशिशों की वजह से संघ उस दौर से निकल आया है, जिसमें किसी नव संगठन को उपेक्षा और विरोध के कड़वे दंश को झेलना पड़ता है। 

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अपने सौ साल की यात्रा में संघ ने जीवन के हर मुमकिन क्षेत्रों में काम किया है और विराट स्तर पर उसके काम को मान्यता भी मिली है। संघ की शब्दावली में कहें तो दुनिया का सबसे बड़ा मजदूर संगठन भारतीय मजदूर संघ, उसका प्रकल्प है। संघ ने समाज के हाशिए पर खड़े रहे वनवासी समुदाय के लिए कई प्रकल्प चला रखे हैं। सामान्य शब्दावली में जिन्हें आदिवासी कहा जाता है, संघ की वैचारिकी उन्हें आदिम ना मानकर जंगलों में रहने वाली आम नागरिक ही मानती है। उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने और शिक्षा से वंचित उन बच्चों के लिए वनवासी कल्याण आश्रम और एकल विद्यालय संघ के ही कार्यकर्ताओं द्वारा चलाए जा रहे प्रकल्प हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद छात्र आंदोलन की आज अहम धुरी है, भारतीय किसान संघ भारतीय मूल्यों के साथ किसानों को भारतीय खेती की ओर लौटाने के साथ ही उनके हितों के लिए संघर्षरत है। विद्या भारती की ओर से शिक्षा क्षेत्र में काम चल रहा है। ऐसे व्यापक संगठन को एक सूत्र में बांधे रखने और वैचारिक पथ पर चलाते रहने के लिए पारंपरिक तरीके का कोई प्रशासनिक ढांचा संघ के पास नहीं है, बल्कि तमाम संगठनों को जोड़ने की धुरी संघ का वैचारिक दर्शन है, जिसके मूल में भारतीयता, भारत की सांस्कृतिक विरासत पर गर्वबोध के साथ राष्ट्र प्रथम की भावना है।

सौ साल की यात्रा के बाद हर संगठन के सामने आगे बढ़ने के लिए स्पष्ट दिशा नीति और दर्शन की जरूरत है। संघ प्रमुख के तीन दिनों के व्याख्यान की एक वजह इसी दर्शन को आम लोगों से साझा करने और अपने कार्यकर्ताओं तक उसकी गहन पहुंच बाने की कोशिश कहा जा सकता है।

’सौ वर्ष की संघ यात्रा, नए क्षितिज’ विषय पर राजधानी दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहनराव भागवत के व्याख्यान को सावन की मेह कहा जा सकता है, जिसने संघ की वैचारिकी पर छाए आग्रही कुहासे को छांटने की सफल कोशिश तो की ही, संघ के कार्यकर्ताओं को अगले सौ साल के लिए आगे बढ़ते रहने के लिए दिशा भी दी। संघ के हिंदुत्व को अक्सर संकीर्ण नजरिए से देखा जाता है। संघ प्रमुख ने इसे खारिज करते हुए कहा कि संघ के हिंदुत्व का मतलब वसुधैव कुटुंबकम है। संघ के हिंदू राष्ट्र का मतलब यह नहीं कि राष्ट्र में गैर हिंदू नहीं होंगे, बल्कि वह ऐसा राष्ट्र होगा, जहां पंथ, संप्रदाय या भाषा के नाम पर किसी से कोई भेदभाव नहीं होगा, सबके साथ बराबरी का व्यवहार और न्याय होगा। संघ बार-बार कहता है कि उसका राष्ट्र, आधुनिक नेशन की तरह नहीं है, जिसमें स्टेट यानी राज भी शामिल है। संघ प्रमुख ने इस बार भी इसे दोहराया। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में उसे बड़ा और महत्वपूर्ण माना जाता रहा है, जो मानव और सृष्टि की भलाई के लिए काम करता है। उनका कहना था कि संघ का उद्देश्य मानव का निर्माण है, जो व्यक्ति, समाज, विश्व और सृष्टि को साथ लेकर चले, राष्ट्र को मजबूत बनाए और राष्ट्र निर्माण में अपना पूर्ण योगदान करे। 

बीते कुछ वर्षों से हिंदू और हिंदुत्व को संकुचित अर्थों में लिया जाता रहा है। संघ प्रमुख ने इस संदर्भ में कहा कि हिंदू की चर्चा का मतलब राष्ट्रनिष्ठ जिम्मेदारी का बोध है । इतिहास में 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम को प्रस्थान बिंदु के रूप में याद करते हुए भागवत ने नया दृष्टिकोण पेश किया। उन्होंने कहा कि भले ही इस संग्राम में भारतीयों को असफलता मिली, लेकिन उसके बाद लोगों में अपनी स्वाधीनता को लेकर विचार बना। इसके बाद चार तरह की वैचारिक धाराएं उभरीं, स्वाधीनता प्राप्ति के लिए राजनीतिक विचारधारा कांग्रेस के रूप में सामने आई। मोहन भागवत ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस से ही आज की राजनीतिक पार्टियां एक तरह से निकली हुई हैं। उन्होंने कहा कि 1857 के बाद आजादी के लिए सशस्त्र संघर्ष का रास्ता अपनाने पर जोर दिया। ये क्रांतिकारी लोग थे। कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्हें लगा कि हमारे समाज में कई बुराइयां हैं, उन्हें दूर करने के लिए उन्होंने समाज सुधार आंदोलन शुरू किया, तो एक धारा ऐसी भी रही, जिन्होंने धार्मिक और सामाजिक सुधार पर जोर दिया। इस श्रेणी में दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानंद का नाम लिया जा सकता है। भागवत के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार इन चारों धाराओं के साथ काम करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जिन्हें हम हिंदू के नाम से जानते हैं, उन्हें संगठित करना जरूरी है और संघ की स्थापना हुई। भारत जैसे विशाल देश में स्थानीय स्तर पर नायकों की जरूरत बताते हुए मोहन भागवत ने रवींद्र नाथ ठाकुर के निबंध ‘स्वदेशी समाज’ को याद किया। ठाकुर ने कहा है कि देश को सुदृढ़ और राष्ट्र को सुगठित करना सिर्फ राजनीति के भरोसे नहीं हो सकता। नेता, नीति, पार्टी, विचार और संगठन की बजाय हर व्यक्ति को सक्षम होना होगा। संघ की वैचारिकी इसी सोच पर केंद्रित होकर व्यक्ति निर्माण के संकल्प के साथ लगातार आगे बढ़ रही है।

इसके साथ ही संघ ने आगे के लिए पंच परिवर्तन के सिद्धांत स्वीकार रखा है और इन्हीं बिंदुओं पर समाज के बीच काम कर रहा है। संघ प्रमुख ने अपने व्याख्यान में इसको विस्तार से समझाकर एक तरह से आने वाले दिनों का संघ का कार्यक्रम प्रस्तुत कर दिया। इस पंच परिवर्तन का पहला बिंदु है, ससामाजिक समरसता। इसके तहत संघ और उसके असंख्य कार्यकर्ता लगातार समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सौहार्द और प्रेम बढ़ाने को लेकर काम कर रहे हैं। संघ के पंच परिवर्तन का दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु है कुटुम्ब प्रबोधन, जिसके तहत संघ की कोशिश राष्ट्र के विकास में परिवार को महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली इकाई के रूप में संवर्धित करने के प्रयासों में लगातार जुटा है। पंच परिवर्तन के तीसरे बिंदु पर्यावरण संरक्षण के तरह संघ पृथ्वी को माता तो मानता ही, इसी आधार पर पर्यावरण संरक्षण के लिए लगातार सक्रिय रहता है और अपने स्वयंसेवकों के साथ ही समाज से ही आशा करता है कि वह भी ऐसा ही करे। पंच परिवर्तन के चौथे बिंदु स्वदेशी और आत्मनिर्भरता के तहत संघ अपने विभिन्न सहयोगी संगठनों और प्रकल्पों के माध्यम से देश की स्वदेशी अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता की दिशा में काम कर रहा है। पंच परिवर्तन के पांचवें बिंदु नागरिक कर्तव्य के तहत संघ की कोशिश देश के हर नागरिक की वैचारिकी को इस तरह स्थापित करना है कि वह अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए राष्ट्रहित में अपना अप्रतिम योगदान दे सके।

-उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं

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