Bay of Pigs Invasion: भारत के हरियाणा राज्य से भी छोटे देश पर जब अमेरिका ने किया हमला, हार भी मिली और चुकानी पड़ी भारी कीमत

By अभिनय आकाश | Mar 27, 2026

अंग्रेजी की एक बहुत ही मशहूर कहावत है विक्ट्री हैज 100 फादर्स, बट डिफिट इज एन ऑर्फन यानी सफलता का श्रेय लेने के लिए सब आगे आते हैं, लेकिन असफलता की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता। ये वाक्या किसी और ने नहीं बल्कि अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी द्वारा कही गई थी। साल 1961 के बे ऑफ पिग्स में मिली नाकामी को लेकर उन्होंने इन शब्दों का प्रयोग किया था। 1961 में अमेरिका ने क्यूबा में फ़िदेल कास्त्रो की सरकार गिराने के लिए एक बड़ा सैन्य अभियान चलाया। इस ऑपरेशन को इतिहास में “बे ऑफ़ पिग्स इनवेज़न” के नाम से जाना जाता है। अमेरिका ने कास्त्रो सरकार के विरोध में मौजूद क्यूबाई विद्रोहियों और निर्वासित लोगों को सैन्य प्रशिक्षण, हथियार और आर्थिक मदद दी। योजना यह थी कि ये विद्रोही क्यूबा में हमला करेंगे और जनता का समर्थन मिलते ही कास्त्रो की सरकार गिर जाएगी। लेकिन यह योजना पूरी तरह फेल हो गई।

आइजनहावर के प्लान पर कैसे फिरा पानी

दूसरे विश्व युद्ध के नायक रहे राष्ट्रपति आइजनहावर ने 1960 में खुफिया एजेंसी सीआईए को कास्त्रो को हटाने का गुप्त मिशन सौंपा। अमेरिका खुद सीधे युद्ध नहीं करना चाहता था, इसलिए उन्होंने फ्लोरिडा में रह रहे उन क्यूबाई शरणार्थियों को भर्ती किया जो कास्त्रो के खिलाफ थे। लगभग 1,400 लड़ाकों की एक फौज तैयार की गई जिसे 'ब्रिगेड 2506' नाम दिया गया। इन्हें अमेरिका ने हथियार और नावें दीं और ग्वाटेमाला व निकारागुआ के गुप्त शिविरों में कड़ी ट्रेनिंग दी। इस हमले की योजना के दो मुख्य हिस्से थे: पहला, हवाई हमला करके कास्त्रो के लड़ाकू विमानों को जमीन पर ही नष्ट करना। दूसरा, इन बागियों को क्यूबा के समुद्र तट (बे ऑफ पिग्स) पर उतारना ताकि वहां की जनता उनके साथ मिल जाए और देश के भीतर ही विद्रोह भड़क उठे। अमेरिका चाहता था कि यह पूरी दुनिया को एक "घरेलू क्रांति" जैसा दिखे ताकि वह खुद पर लगने वाले किसी भी आरोप से इनकार कर सके। उन्हें उम्मीद थी कि कुछ ही दिनों में कास्त्रो की सत्ता गिर जाएगी। हालांकि, क्यूबा पर आक्रमण की योजना बनने के दौरान ही अमेरिका में नेतृत्व परिवर्तन हुआ और जॉन एफ कैनेडी को आइजनहावर के कार्यालय द्वारा तैयार की गई योजना विरासत में मिली। कैनेडी जनवरी 1961 में राष्ट्रपति बने। पदभार संभालने के कुछ ही समय बाद, उन्हें सीआईए द्वारा फिदेल कास्त्रो के खिलाफ क्यूबा के निर्वासितों को प्रशिक्षित और तैनात करने के लिए चल रहे अभियान के बारे में जानकारी दी गई।

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तीन दिनों के भीतर ही इस पूरे अभियान को कुचल दिया गया

इस असफलता की एक बड़ी वजह यह भी थी कि अमेरिका की ओर से वादा की गई हवाई सहायता समय पर नहीं पहुंच सकी। उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी थे और इस नाकामी से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की छवि को बड़ा झटका लगा। इस घटना के बाद क्यूबा ने अपनी सुरक्षा के लिए सोवियत संघ से नज़दीकियां और बढ़ा लीं। सोवियत संघ को क्यूबा में गुप्त रूप से परमाणु मिसाइलें तैनात करने की अनुमति दे दी गई। अक्टूबर 1962 में अमेरिकी जासूसी विमानों ने इन मिसाइलों का पता लगा लिया। इसके बाद अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तनाव अचानक बहुत बढ़ गया और दुनिया परमाणु युद्ध के बेहद करीब पहुंच गई। करीब 13 दिनों तक चले इस संकट के बाद आखिरकार सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने क्यूबा से मिसाइलें हटाने पर सहमति दे दी। क्यूबा के आम लोगों ने विद्रोहियों का साथ नहीं दिया और कास्त्रो की सेना ने बेहद तेजी से जवाबी कार्रवाई की। सिर्फ तीन दिनों के भीतर ही इस पूरे अभियान को कुचल दिया गया। इसके बदले में अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी ने क्यूबा पर हमला न करने का वादा किया और साथ ही तुर्की में तैनात अमेरिकी मिसाइलें हटाने पर भी सहमति दी।

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