By अंकित सिंह | Oct 01, 2026
जन्म और मृत्यु का पंजीकरण (संशोधन) अधिनियम, 2026, 1 अक्टूबर से लागू हो गया है। इसमें घटना के एक या दो साल बाद रिपोर्ट किए गए जन्म और मृत्यु के पंजीकरण के लिए कड़े नियम लागू किए गए हैं। संशोधित अधिनियम के तहत, घटना के एक साल बाद लेकिन दो साल के भीतर रिपोर्ट किए गए किसी भी जन्म या मृत्यु का पंजीकरण तभी किया जा सकता है, जब उस इलाके के अधिकार क्षेत्र वाले डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट या डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट द्वारा अधिकृत एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट का आदेश हो। यह आदेश घटना की सच्चाई की जांच और तय फीस के भुगतान के बाद ही दिया जाता है।
यह बिल 31 जुलाई, 2026 को लोकसभा से बिना किसी बड़ी बहस के पास होने के बाद, 4 अगस्त, 2026 को राज्यसभा में हंगामे के बीच पास हुआ। इसका मकसद देर से होने वाले रजिस्ट्रेशन से जुड़े नियमों को और सख्त बनाना है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संशोधन बिल के पीछे की वजह बताते हुए कानूनी पहचान के लिए जन्म और मृत्यु के रजिस्ट्रेशन के महत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा, "किसी व्यक्ति के जन्म या मृत्यु को साबित करने के लिए जन्म या मृत्यु का प्रमाण पत्र सबूत के तौर पर मान्य होता है।" जन्म और मृत्यु के रजिस्ट्रेशन को रेगुलेट करने के लिए मूल कानून 1969 में बनाया गया था और इसमें पहले 2023 में संशोधन किया गया था।
शाह ने आगे कहा कि 2026 के बिल का मकसद देर से होने वाले रजिस्ट्रेशन के नियमों को सख्त बनाकर समय पर जानकारी देने को बढ़ावा देना है। उन्होंने बताया कि एक साल के बाद लेकिन दो साल के भीतर रिपोर्ट किए गए जन्म या मृत्यु के मामलों में वेरिफिकेशन के बाद मजिस्ट्रेट की मंज़ूरी ज़रूरी होगी, जबकि दो साल के बाद रिपोर्ट किए गए मामलों को फर्स्ट क्लास ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट से मंज़ूरी लेनी होगी।