By अभिनय आकाश | Jun 25, 2026
ठीक एक दशक पहले आज ही के दिन, ब्रिटेन के करीब 1.7 करोड़ (51.9%) लोगों ने दुनिया के सबसे बड़े एकल बाजार, यूरोपीय संघ (EU) से अलग होने यानी 'ब्रेक्सिट' (Brexit) के पक्ष में ऐतिहासिक वोट दिया था, जिसके बाद साल 2020 में व्यापार और सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर के साथ यह कूटनीतिक तलाक मुकम्मल हो गया। उस वक्त ब्रेक्सिट के समर्थकों ने बड़े-बड़े दावे किए थे कि यूरोपीय संघ से बाहर निकलते ही ब्रिटेन अपनी संप्रभुता वापस पा लेगा, प्रवासन पर काबू होगा, आर्थिक समृद्धि आएगी और जनकल्याणकारी सेवाओं में सुधार होगा; लेकिन एक दशक बाद आज का ब्रिटेन राजनीतिक अस्थिरता, सुस्त आर्थिक विकास और बेकाबू महंगाई की मार झेल रहा है। आर्थिक खुशहाली का सपना देखने वाले इस देश में आज प्रवासन, राष्ट्रीय पहचान का संकट और धुर-दक्षिणपंथ का उभार वहां की राजनीति के केंद्र में है, जिसने यूरोपीय संघ से अलग होने के बाद ब्रिटेन के आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह बदलकर रख दिया है।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री की कुर्सी से स्टार्मर का इस्तीफा ठीक उस मोड़ पर आया है, जब पूरा देश यूरोपीय संघ (ईयू) से अलग होने यानी ब्रेक्जिट के ऐतिहासिक फैसले की दसवीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। लेकिन एक दशक बीत जाने के बाद, आज ब्रेक्जिट को लेकर ब्रिटेन की जनता का मूड पूरी तरह बदल चुका है। दस साल पहले, ब्रेक्जिट समर्थकों ने मुख्य रूप से तीन बड़े मुद्दों पर ईयू से अलग होने के लिए वोट किया था—संप्रभुता, प्रवासियों पर नियंत्रण और आर्थिक समृद्धि। लेकिन एक दशक लंबा वक्त गुजरने के बाद भी ब्रिटेन आज भी संघर्ष की आग में झुलस रहा है। ब्रिटिश सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 2 से 8 प्रतिशत तक की गिरावट का अनुमान है। घटता राजस्व, रिकॉर्ड कर्ज, टैक्स में भारी बढ़ोतरी और कमरतोड़ महंगाई। गैर-ईयू प्रवासियों को रोकने के मामले में सरकार को करारी नाकामी हाथ लगी है। कस्टम्स की पेचीदगियों और कागजी कार्रवाई ने स्थानीय बिजनेसेज का दम घोंट दिया है। यही वजह है कि आज कम से कम 57% ब्रिटिश नागरिक खुले तौर पर यह मानते हैं कि यूरोपीय संघ को छोड़ने का उनका फैसला एक बहुत बड़ी भूल थी। भले ही लेबर पार्टी ने शुरुआत में ब्रेक्जिट जनमत संग्रह का विरोध किया था और वह यूरोपीय संघ में बने रहने के पक्ष में थी, लेकिन सत्ता में आने के बाद स्टार्मर की रणनीति बिल्कुल अलग थी। वह ईयू में दोबारा शामिल हुए बिना 'यूके-ईयू रीसेट' यानी केवल रिश्तों को सुधारना चाहते थे। राजनीतिक रूप से उनके पास हाथ-पैर मारने की ज्यादा जगह नहीं थी, खासकर ऐसे समय में जब कोरोना महामारी, यूक्रेन युद्ध और ईरान संकट ने पहले से ही कराह रही ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को आईसीयू (ICयू) में धकेल दिया। ब्रेक्जिट के पूरे 10 साल बाद भी, दोनों पक्षों के बीच व्यापार, कृषि निर्यात, युवाओं की आवाजाही, बॉर्डर कंट्रोल और ब्रिटिश सामानों पर लगने वाली गैर-टैरिफ पाबंदियों जैसे पेचीदा सवाल आज भी जस के तस बने हुए हैं। यही वो कांटे हैं जो 'यूके-ईयू रीसेट' की राह में सबसे बड़ा रोड़ा साबित हो रहे हैं।
EU के सिंगल मार्केट और कस्टम्स यूनियन से बाहर निकलने के बाद से व्यापार पर बुरा असर पड़ा है। इसकी मुख्य वजह नॉन-टैरिफ़ बाधाएं हैं — जैसे मुश्किल कागज़ी कार्रवाई और कस्टम्स से जुड़ी पेचीदगियां — जिनका असर UK के छोटे व्यवसायों पर पड़ा है। ब्रिटिश सरकार की स्वतंत्र पूर्वानुमान एजेंसी, 'ऑफ़िस ऑफ़ बजट रिस्पॉन्सिबिलिटी' (OBR) के अनुसार, ब्रेक्ज़िट का व्यापार पर लंबे समय में यह असर पड़ने की उम्मीद है कि सामान और सेवाओं के निर्यात और आयात में 15% की गिरावट आएगी। OBR ने अगले 15 वर्षों में राष्ट्रीय आय में भी 4% की गिरावट का अनुमान लगाया है। बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के डेटा के अनुसार, जो ब्रेक्ज़िट की 10वीं सालगिरह से ठीक पहले जारी किया गया था, 2021 में UK के यूनियन से अलग होने के बाद ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को 6% का नुकसान हुआ है। यह ब्रेक्ज़िट के बाद के झटके और UK द्वारा EU के साथ फ़्री-ट्रेड एग्रीमेंट करने के बावजूद बढ़ती व्यापारिक बाधाओं का मिला-जुला नतीजा है। अब EU देशों के साथ व्यापारिक लेन-देन में ज़्यादा समय और पैसा लगता है।
Stay updated with Latest International News in Hindi https://www.prabhasakshi.com/international on Prabhasakshi