Supreme Court पर्यावरण न्याय का वटवृक्ष, विकास व संरक्षण में संतुलन जरूरी: CJI

By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Sep 19, 2026

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने शनिवार को कहा कि भारतीय अदालतों के सामने अब सवाल संरक्षण बनाम विकास का नहीं, बल्कि यह है कि दोनों के बीच तालमेल कैसे बिठाया जाए और उन्हें साथ-साथ कैसे कायम रखा जाए। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने इसी के साथ उच्चतम न्यायालय को पर्यावरणीय न्याय का ‘वटवृक्ष’ करार दिया। प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) ने न्यायालय के पर्यावरण से जुड़े कानूनी फैसलों के चार दशकों के सफर का उल्लेख करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण का कोई एक ही संवैधानिक रास्ता नहीं है और उन्होंने ‘कॉपी-पेस्ट’ फैसलों के प्रति आगाह किया।

सीजेआई ने कहा, ‘‘फिलहाल, हमारी अदालतों के सामने सवाल यह नहीं है कि संरक्षण या विकास में से किसे चुना जाए, बल्कि यह है कि इन दोनों के बीच समन्वय कैसे स्थापित किया जाए और इन्हें साथ-साथ कैसे बनाए रखा जाए।’’ उन्होंने कहा कि एक अहम बदलाव यह है कि यह आंदोलन अब पर्यावरण संबंधी अधिकारों से हटकर जलवायु से जुड़े अधिकारों की ओर बढ़ रहा है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘जलवायु से जुड़े हालिया भारतीय कानूनी फैसलों ने इस सवाल को संवैधानिक नजरिए से और भी अहम बना दिया है। इन फैसलों में यह माना गया है कि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव समानता, आजीविका और स्वास्थ्य के मौलिक अधिकारों, और इन अधिकारों का सही ढंग से उपभोग करने के लिए आवश्यक परिस्थितियों को प्रभावित कर सकते हैं।’’ उन्होंने कहा कि दूसरा बदलाव अलग-थलग पर्यावरणीय नुकसान की जांच से हटकर, संचयी पारिस्थितिक नुकसान को समझने की ओर है।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘नदी प्रशासनिक सीमाओं के हिसाब से प्रदूषण का सामना नहीं करती। जंगल एक परियोजना और दूसरी परियोजना के बीच का फर्क नहीं समझते। वातावरण राष्ट्रीय सीमाओं को नहीं मानता।

इसलिए, जलवायु से जुड़े मामलों में फैसला करते समय केवल उस परियोजना पर ही गौर नहीं करना चाहिए, बल्कि उस बड़े पारिस्थितिकी तंत्र को भी देखना चाहिए जिसका वह परियोजना एक हिस्सा है।’’ उन्होंने कहा कि आने वाली चुनौतियां और भी मुश्किल होंगी, और ऊर्जा बदलाव के लिए नयी आधारभूत अवसंरचना, नयी प्रौद्योगिकी और ज़मीन व संसाधनों के इस्तेमाल के नये तरीकों की जरूरत होगी। एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता का नुकसान और प्रदूषण जैसी पर्यावरणीय चुनौतियों की कोई राष्ट्रीय सीमा नहीं होती और इनका सबसे नकारात्मक ससर अक्सर उन लोगों पर पड़ता है जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के लिए सबसे कम जिम्मेदार होते हैं। अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने पर्यावरण और जलवायु न्याय के लिए मज़बूत वैश्विक संस्थागत तंत्र विकसित करने के वास्ते संधियों और घोषणाओं से आगे बढ़ने का आह्वान किया, जिसमें एक साझा और लागू करने योग्य अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण न्याय अदालत की संभावना भी शामिल हो।

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