30 मार्च की तारीख, जब भारत और चीन के बीच संघर्ष की नींव पड़ी और फिर ये युद्ध में परिवर्तित हुआ

By अभिनय आकाश | Mar 30, 2022

1962 के भारत चीन युद्ध को कौन भूल सकता है।  जब महावीर और बुद्ध की शांतिपूर्ण धरती युद्ध भूमि में बदल गई थी। 1962 में भारत पर चीन ने हमला क्यों किया था और इस युद्ध के पीछे चीन की मंशा क्या थी। इसको लेकर जितने सवाल उतने ही जवाब सामने आते हैं। कोई कहेगा कि इस युद्ध की नींव 1950 में तिब्बत पर चीन के आक्रमण के साथ शुरू हुई।  कोई इसे चीन के बड़े नेता माओत्से तुंग ने 'ग्रेट लीप फॉरवर्ड' आंदोलन की असफलता के बाद सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी पर अपना फिर से नियंत्रण कायम रखने को इस युद्ध की वजह बताता है। लेकिन इसकी आधिकारिक रूप से शुरुआत आज से 63 साल पहले यानी 30 मार्च 1959 के दिन शुरू हुई। जब एक गहरे कत्थई रंग का लबादा ओढ़े इस भिक्षु के कदम भारत में पड़ते हैं। जिसके बाद से चीन और भारत के बीच तनाव का जो दौर शुरू हो वो देखते ही देखते युद्ध में परिवर्तित हो गया। 

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दलाई लामा की भारत में एंट्री

तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा ने बुधवार को भारत में निर्वासन के 63 वर्ष पूरे कर लिए। वह छह दशक पहले 30 मार्च, 1959 को भारत आए थे। दलाई लामा चीनी सत्ता से अपने जीवन के लिए खतरे को भांपने के बाद अपनी मातृभूमि से निर्वासित होना पड़ा था।  दलाई लामा को अपने सुरक्षा गार्डों के बिना एक नृत्य शो में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था। निमंत्रण ने आध्यात्मिक नेता के अनुयायियों में संदेह पैदा कर दिया, जिसके बाद उन्हें देश छोड़ने की सलाह दी गई। निर्देशों का पालन करते हुए, दलाई लामा एक आम सैनिक के वेश में 17 मार्च, 1959 को ल्हासा से पैदल ही भारत के लिए रवाना हुए। हिमालय के पहाड़ों को पार करते हुए 15 दिनों बाद भारतीय सीमा में दाखिल हुए थे। 30 मार्च को, दलाई लामा ने भारतीय राज्य अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश किया। तब से, आध्यात्मिक नेता हिमाचल प्रदेश में धर्मशाला में अपने मुख्यालय में रह रहे हैं। दलाई लामा एक ऐसे देश के निर्वासित शासक हैं जिसका न तो दुनिया के राजनीतिक नक्शे में कोई जिक्र बचा है और न धर्मशाला से चलने वाली उनकी निर्वाचित सरकार को किसी देश ने मान्यता दी है। इन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद दलाई लामा की गिनती सबसे लोकप्रिय और सम्मानित व्यक्तियों में होती है। 

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सरदार पटेल ने चीन के प्रति किया था आगाह

वर्ष 1950 में ही सरदार पटेल ने नेहरू को चीन से सावधान रहने के लिए कहा था। अपनी मृत्यु के एक महीने पहले ही 7 नवंबर 1950 को देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने चीन के खतरे को लेकर नेहरू को आगाह करते हुए एक चिट्ठी में लिखा था कि भले ही हम चीन को मित्र के तौर पर देखते हैं लेकिन कम्युनिस्ट चीन की अपनी महत्वकांक्षाएं और उद्देश्य हैं। हमें ध्यान रखना चाहिए कि तिब्बत पर कब्जे के साथ ही अब चीन हमारे दरवाजे तक पहुंच गया है। गृहमंत्री सरदार पटेल ने नवम्बर, 1950 में पंडित नेहरू को लिखे एक पत्र में परिस्थितियों का सही मूल्यांकन करते हुए लिखा- "मुझे खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि चीन सरकार हमें शांतिपूर्ण उद्देश्यों के आडम्बर में उलझा रही है। मेरा विचार है कि उन्होंने हमारे राजदूत को भी "तिब्बत समस्या शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने" के भ्रम में डाल दिया है। मेरे विचार से चीन का रवैया कपटपूर्ण और विश्वासघाती जैसा ही है।" सरदार पटेल ने अपने पत्र में चीन को अपना दुश्मन, उसके व्यवहार को अभद्रतापूर्ण और चीन के पत्रों की भाषा को "किसी दोस्त की नहीं, भावी शत्रु की भाषा" कहा है। 

 सीआईए ने की मदद

अपने अंतरराष्ट्रीय आभामंडल और कूटनीतिक समझ के सामने पंडित नेहरू ने किसी कि भी सलाह को अहमियत नहीं दी। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' का नारा दिया। मगर 1959 में दलाई लामा के भारत में शरण लेने के बाद दोनों देशों के संबंधों में तनाव आने लगा। यही भारत-चीन युद्ध की बड़ी वजह बना। 1950 में चीनी सेनाओं ने तिब्बत पर बलपूर्वक कब्जा कर लिया। दलाई लामा के नेतृत्व में चीन के खिलाफ आजादी के लिए विद्रोह हुआ। तिब्बत में विद्रोह को कुचलने के लिए चीन ने पूरा जोर लगा दिया। चीन ये जानता था कि उसे अपने अवैध कब्जे के खिलाफ मोर्चे को ध्वस्त करना है तो इसका एक ही उपाय है-दलाई लामा का अंत। लेकिन इसकी भनक दलाई लामा के अनुयायियों को पहले ही पड़ गई और उन्होंने इसकी सूचना दे दी। कहा जाता है कि दलाई लामा को सुरक्षित चीन से निकालने में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की एक विशेष टुकड़ी का भी योगदान था। जिसके बाद 30 मार्च 1959 को दलाई लामा ने भारत में प्रवेश किया और पिछले 63 सालों से वो यहीं हैं।  

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