पंजाबी अखबारों की रायः धनखड़ के इस्तीफे ने भाजपा की मुश्किलें बढ़ा दी

By डॉ. आशीष वशिष्ठ | Jul 28, 2025

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अचानक इस्तीफा देने,  मुंबई सीरियल ट्रेन ब्लास्ट मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट से सभी 12 आरोपियों के बरी होने और संसद के हंगामेदार मानसून सत्र पर इस हफ्ते पंजाबी अखबारों ने अपनी राय प्रमुखता से रखी है।

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2006 के मुंबई सीरियल ट्रेन ब्लास्ट मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा सभी 12 आरोपियों को बरी करने पर चंडीगढ़ से प्रकाशित ‘पंजाबी ट्रिब्यून’ लिखता है- मुंबई ट्रेन बम विस्फोट भारत में हुए अब तक के सबसे भीषण आतंकवादी हमलों में से एक था। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपना अपराध साबित करने में नाकाम रहा है। अखबार लिखता है-  ऐसे समय में जब 26/11 हमले के आरोपी तहव्वुर राणा से एनआईए पूछताछ कर रही है और पहलगाम हमले की जांच जारी है, पाकिस्तान को भारत की जांच एजेंसियों पर सवाल उठाने का हौसला मिलेगा। जालंधर से प्रकाशित 'अज दी आवाज'  लिखता है- निचली अदालत ने लगभग 9 साल बाद अपना फैसला सुनाया, जबकि बॉम्बे हाईकोर्ट की विशेष पीठ को भी अपना फैसला सुनाने में लगभग 9 साल लग गए। इस कानूनी पचड़े में सिर्फ़ पीड़ितों का ही नुकसान होगा, जिन्हें न्याय के लिए अभी और इंतज़ार करना होगा। अखबार लिखता है- हमारा कानून उन लोगों के बारे में चुप है जो बिना कोई अपराध किए 17 साल से जेल में हैं। क्या वे बिना किसी गलती के अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा जेल में बिताने के लिए मुआवज़े के हक़दार नहीं हैं? जालंधर से प्रकाशित 'पंजाबी जागरण' लिखता है- यदि आतंकवाद के सबसे गंभीर मामलों में हमारी न्यायिक प्रणाली इतनी धीमी गति से काम करती है, तो यह दावा नहीं किया जा सकता कि भारत आतंकवाद से सख्ती से निपट रहा है। वहीं अंतर्राष्ट्रीय समुदाय यह भी सवाल उठा सकता है कि भारत की जांच एजेंसियां और न्यायिक प्रणाली आतंकवाद के गंभीर मामलों में भी सतर्क और सक्रिय क्यों नहीं हैं। पटियाला से प्रकाशित 'रोजाना आशियाना' लिखता है- यह मामला निचली अदालतों के काम करने के तरीके पर भी एक बड़ा सवालिया निशान है। महाराष्ट्र सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है। देश को उम्मीद है कि इस बार तथ्य सही ढंग से पेश किए जाएंगे।

संसद के मानसून सत्र में विपक्ष के हंगामे और कामकाज ठप होने पर जालंधर से प्रकाशित 'अजीत'  लिखता है- संसद में पहले ही दिन इतना हंगामा क्यों मचा, जबकि सत्र से पहले इस बात पर पूरी सहमति थी कि सभी दलों की भागीदारी से महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तृत चर्चा होगी। चंडीगढ़ से प्रकाशित ‘देशसेवक’ लिखता है- विपक्ष लंबे समय से मांग कर रहा है कि पहलगाम और उसके जवाब, ऑपरेशन सिंदूर के बारे में खुली चर्चा होनी चाहिए। विपक्ष सरकार से जानना चाहता है कि बिहार में मतदाता सूचियों में इस नाज़ुक समय में बड़े पैमाने पर संशोधन के पीछे असली मकसद क्या है। वहीं उपराष्ट्रपति के अचानक इस्तीफे को लेकर अब एक नया सवाल खड़ा हो गया है। अखबार लिखता है- ऐसा लगता है कि जब तक प्रधानमंत्री संसद में उपस्थित नहीं होंगे, दोनों सदनों की कार्यवाही स्थगित रहेगी। पटियाला से प्रकाशित 'चढ़दीकलां' लिखता है- हाल ही में संसद के बाहर सरकार और विपक्ष के बीच बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ और भाषा विवाद जैसे मुद्दों पर झड़पें हुई हैं, लेकिन उम्मीद है कि ये झड़पें सदन के भीतर सकारात्मक बहस तक ही सीमित रहेंगी। पटियाला से प्रकाशित 'रोजाना आशियाना' लिखता है,  विपक्ष ने अपना एजेंडा तय किया है, लेकिन ध्यान रखा जाना चाहिए कि सत्र शोर-शराबे और हंगामे की भेंट न चढ़ जाए। अखबार लिखता है- इस मामले में इस साल के बजट सत्र को उदाहरण बनाया जा सकता है। बजट सत्र में राज्यसभा और लोकसभा की उत्पादकता क्रमश: 119 और 118 प्रतिशत रही। सत्र चलाने में हर मिनट ढाई लाख रुपये से ज़्यादा खर्च होते हैं। ऐसे में सदन का न चलना समय के साथ-साथ देश के संसाधनों की भी बर्बादी है।

 -डॉ. आशीष वशिष्ठ

स्वतंत्र पत्रकार

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