द्रौपदी ने साबित किया- हर मुसीबत में अपने भक्तों को बचाते हैं भगवान श्रीकृष्ण

By शुभा दुबे | Aug 03, 2022

देवी द्रौपदी पांचाल नरेश राजा द्रुपद की अयोनिजा पुत्री थी। इनकी उत्पत्ति यज्ञवेदी से हुई थी। इनका रूप लावण्य अनुपम था। इनके जैसी सुंदरी उस समय पृथ्वी भर में न थी। इनके शरीर से तुरंत खिले कमल की सी गंध निकलकर एक कोस तक फैल जाती थी। इनके जन्म के समय आकाशवाणी ने कहा था कि देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए क्षत्रियों के संहार के उद्देश्य से इस रमणीरत्न का जन्म हुआ है। इसके कारण कौरवों को बड़ा भय होगा। कृष्णवर्ण होने के कारण लोग इन्हें कृष्णा कहते थे। पूर्वजन्म में दिये हुए भगवान शंकर के वरदान से इन्हें इस जन्म में पांच पति प्राप्त हुए। अकेले अर्जुन के द्वारा स्वयंवर में जीती जाने पर भी माता कुन्ती की आज्ञा से इन्हें पांचों भाइयों ने ब्याहा था। 

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सच्चे हृदय की करुण पुकार भगवान बहुत जल्दी सुनते हैं। भगवान श्रीकृष्ण उस समय द्वारका में थे, वहां से वे तुरंत दौड़े आये और धर्म रूप से द्रौपदी के वस्त्रों में छिपकर उनकी लाज बचायी। भगवान की कृपा से द्रौपदी की साड़ी अनन्तगुना बढ़ गयी। दुशासन उसे जितना ही खींचता था, उतना ही वह बढ़ती जाती थी। देखते−देखते वहां वस्त्र का ढेर लग गया। महाबली दुशासन की प्रचण्ड भुजाएं थक गयीं। परंतु साड़ी का छोर हाथ नहीं आया। उपस्थित सारे सभासदों ने भगवदभक्ति एवं पातिव्रत्य का अद्भुत चमत्कार देखा। अंत में दुशासन हार कर लज्जित हो उठा। भक्तवत्सल प्रभु ने अपने भक्त की लाज रख ली। 

एक दिन की बात है− जब पाण्डव लोग द्रौपदी के साथ काम्यक वन में रह रहे थे, दुर्योधन के भेजे हुए महर्षि दुर्वासा अपने दस हजार शिष्यों को साथ लेकर पाण्डवों के पास आये। दुर्योधन ने जानबूझकर उन्हें ऐसे समय में भेजा जबकि सब लोग भोजन करके विश्राम कर रहे थे। महाराज युधिष्ठिर ने अतिथि सेवा के उद्देश्य से ही भूगवान सूर्यदेव से एक ऐसा चमत्कारी बर्तन प्राप्त किया था जिसमें पकाया हुआ थोड़ा-सा भोजन भी अक्षय हो जाता था। लेकिन उसमें शर्त यही थी कि जब तक द्रौपदी भोजन न करके अन्न परोसती रहे, तभी तक उस बर्तन से यथेष्ट अन्न प्राप्त हो सकता था। युधिष्ठिर ने महर्षि को शिष्यमण्डली सहित भोजन के लिए आमंत्रित किया और दुर्वासा जी मध्यकालीन स्नान−सन्ध्यादि से निवृत्त होने के लिए सबके साथ गंगा तट पर चले गये। 

दुर्वासा जी के साथ दस हजार शिष्यों का एक पूरा का पूरा विश्वविद्यालय सा चला करता था। धर्मराज ने उन सबको भोजन का निमंत्रण तो दे दिया और ऋषि ने उसे स्वीकार भी लिया। परंतु किसी ने इसका विचार नहीं किया कि द्रौपदी भोजन कर चुकी है, इसलिए सूर्य के दिये हुए बर्तन से उन लोगों के भोजन की व्यवस्था नहीं हो सकती थी। द्रौपदी बड़ी चिंता में पड़ गईं। उन्होंने सोचा कि ऋषि यदि बिना भोजन किये वापस लौट जाते हैं तो वे बिना शाप दिये नहीं रहेंगे। उनका क्रोधी स्वभाव जगत विख्यात था। द्रौपदी को और कोई उपाय नहीं सूझा। तब इन्होंने मन ही मन भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया और इस आपत्ति से उबारने की उनसे प्रार्थना की। 

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श्रीकृष्ण तो घट−घट की जानने वाले हैं। वे तुरंत वहां आ पहुंचे। उन्हें देखकर द्रौपदी के शरीर में मानो प्राण आ गये। डूबते हुए को मानो सहारा मिल गया। द्रौपदी ने संक्षेप में उन्हें सारी बात सुना दी। श्रीकृष्ण ने अधीरता प्रदर्शित करते हुए कहा कि और सब बात पीछे होगी। पहले मुझे जल्दी कुछ खाने को दो। मुझे बड़ी भूख लगी है। तुम जानती नहीं हो कि मैं कितनी दूर से थका हुआ आया हूं। द्रौपदी लाज के मारे गड़-सी गईं। इन्होंने रुकते−रुकते कहा− प्रभो! मैं अभी−अभी खाकर उठी हूं। अब तो उस बटलोई में कुछ भी नहीं है। श्रीकृष्ण ने कहा− जरा अपनी बटलोई मुझे दिखाओ तो सही। द्रौपदी बटलोई ले आईं। श्रीकृष्ण ने उसे हाथ में लेकर देखा तो उसके गले में उन्हें एक साग का पत्ता चिपका हुआ मिला। उन्होंने उसी को मुंह में डालकर कहा− इस साग के पत्ते से सम्पूर्ण जगत के आत्मा यज्ञभोक्ता परमेश्वर तृप्त हो जायें। इसके बाद उन्होंने सहदेव से कहा− भैया! अब तुम मुनीश्वरों को भोजन के लिए बुला लाओ। सहदेव ने गंगा तट पर जाकर देखा तो वहां उन्हें कोई नहीं मिला। बात यह हुई कि जिस समय श्रीकृष्ण ने साग का पत्ता मुंह में डाल कर वह संकल्प पढ़ा, उस समय मुनीश्वर लोग जल में खड़े होकर अघमर्षण कर रहे थे। उन्हें अकस्मात ऐसा अनुभव होने लगा कि मानो उनका पेट गले तक अन्न से भर गया है। वे सब एक दूसरे के मुंह की ओर ताकने लगे और कहने लगे कि अब वहां जाकर क्या खाएंगे। ऐसा कह वह सब वहां से चले गये। इस प्रकार द्रौपदी की श्रीकृष्ण भक्ति से पाण्डवों की भारी बला टल गयी। श्रीकृष्ण ने आकर इन्हें दुर्वासा ऋषि के कोप से बचा लिया और इस प्रकार अपनी शरणागतवत्सलता का परिचय दिया।

-शुभा दुबे

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