Gyan Ganga: भगवान विष्णु से अपनी प्रशंसा सुनकर नारदजी के मन में क्या विचार आये थे?

Lord Vishnu Narad
Prabhasakshi
सुखी भारती । Aug 02, 2022 6:12PM
इधर श्रीहरि ने भी अपनी लीला का विस्तार करने की ठान ली थी। जिस मार्ग पर देवऋर्षि नारद जी जा रहे थे, उस रास्ते पर भगवान विष्णु जी ने, अपनी माया से, एक ऐसे नगर का निर्माण किया कि जिसका वर्णन शब्दों में करना संभव ही नहीं था।

देवऋर्षि नारद जी की मनःस्थिति निःसंदेह ही ऐसी थी कि उन पर एक साधारण व्यक्ति भी दया-सी कर रहा था। कारण कि संत शिरोमणि अथवा भक्त शिरोमणि, जैसे शब्द उनके प्रभावशाली व तपोमय व्यक्तित्व के लिए बहुत छोटे थे। आप स्वयं ही सोच सकते हैं, कि जिन्हें स्वयं श्रीहरि भी अपने साथ बिठाते हों, उन्हें प्रणाम करते हों, वो देवऋर्षि नारद जी भला साधारण व्यक्तित्व के स्वामी कैसे हो सकते हैं? लेकिन आज उन्हें प्रशंसा के दंश ने ऐसा काटा, कि वे इससे नख से सिर तक पीड़ित हो गए। भगवान श्रीविष्णु जी ने उन्हें एक बार भी कठोर शब्दों में, कोई भी सीख नहीं दी। बल्कि मन ही मन यह कहा, कि जो मेरे भक्त के जीवन के लिए श्रेष्ठ व उत्तम हो, और मेरी लीला हो, मैं वही कार्य करूँगा।

देवऋर्षि नारद जी को तो लगा, कि अब श्रीहरि को, मैंने अपनी प्रभुता की सारी गाथा सुना ही दी है। और वे मेरे इस असाध्य कार्य से अतिअंत प्रभावित भी हैं। तो क्यों न अब यहाँ से प्रस्थान किया जाये। यह सोच कर, व श्रीहरि को प्रणाम कर, देवऋर्षि नारद जी विष्णु लोक से वापिस हो जाते हैं। कहाँ जाना है, किस दिशा की और गमन करना है, उन्होंने कुछ भी निर्धारित नहीं किया था। बस निकलना था और देवऋर्षि नारद जी वहाँ से निकल गए। उनका निकलना कोई ऐसे संदर्भ में भी नहीं था, कि वे कहीं जाकर, भगवान की कथा सुनाने को निकले थे। अपितु अब तो उन्हें अपने स्वामी की कथा नहीं, बल्कि स्वयं की ही कथा सुनाने का नशा-सा था।

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इधर श्रीहरि ने भी अपनी लीला का विस्तार करने की ठान ली थी। जिस मार्ग पर देवऋर्षि नारद जी जा रहे थे, उस रास्ते पर भगवान विष्णु जी ने, अपनी माया से, एक ऐसे नगर का निर्माण किया कि जिसका वर्णन शब्दों में करना संभव ही नहीं था-

‘बिरचेउ मग महुँ नगर तेहिं सत जोजन बिस्तार।

श्रीनिवासपुर तें अधिक रचना बिबिध प्रकार।।’

हालाँकि देवऋर्षि नारद जी को संसार में कुछ भी आकर्षित नहीं करता था। लेकिन मन में जब से संसार की प्रशंसा की भूख बनी थी, तब से देवऋर्षि नारद जी की आंतरिक अवस्था, मानो अर्श से फर्श पर आ चुकी थी। माया का दुष्प्रभाव तो देखिए, देवऋर्षि नारद जी, निश्चित ही उस मार्ग से पहले भी कितने ही बार रमन करते हुए निकले थे। लेकिन कभी भी यह नगर उन्हें दृष्टिपात नहीं हुआ था। भगवान विष्णु जी ने उनकी प्रशंसा क्या की, उन्होंने तो सोचना समझना ही बंद कर दिया। उन्होंने एक बार भी यह नहीं सोचा, कि इतना बड़ा नगर भला रातों-रात अस्तित्व में कैसे आ गया। कहीं यह कोई माया तो नहीं? लेकिन देवऋर्षि नारद जी इस नगर को माया क्यों कहते? कारण कि अब तो माया ही उनके लिए ‘सर्वसत्य’ था। देवऋर्षि नारद जी ने देखा कि यह नगर तो बड़ा सुंदर व वैभवशाली है। और यहाँ के नर-नारी तो मानो, साक्षात् कामदेव और रति ही मनुष्य का सरीर धारण कर के आये हों। उस नगर के राजा का नाम शीलनिधि था। उसके यहाँ असंख्य घोड़े, हाथी और सेना के समूह थे-

‘बसहिं नगर सुंदर नर नारी।

जनु बहु मनसिज रति तनुधारी।।

तेहिं पुर बसइ सीलनिधि राजा।

अगनित हय गय सेन समाजा।।’

वास्तव में उस नगर में वहाँ की राजकुमारी विश्वमोहिनी का स्वयंवर होना था। वह राजकुमारी ऐसी थी, कि उसके सुंदर रूप को देख कर, स्वयं श्रीलक्ष्मी जी भी मोहित हो जायें। हालाँकि देवऋर्षि नारद जी, कभी भी ऐसे स्थानों पर जाने में रुचि नहीं दिखाया करते थे, जहाँ मन को हरने वाले ऐसे-ऐसे दृश्य हों, कि स्वयं मायापति भी अचंभित हो जायें। लेकिन देवऋर्षि नारद जी को आज यह संपूर्ण दृश्य अपने से प्रतीत हुए। उनका बड़ा ही मन हुआ, कि एक बार नगर में जाकर देखा जाये। देवऋर्षि नारद जी यह विचार कर, जैसे ही नगर में प्रवेश करते हैं, नगर के समस्त वासी, क्या राजा, क्या रंक, सभी देवऋर्षि नारद जी को प्रणाम करने लगते हैं। देवऋर्षि नारद जी ने जब यह देखा, तो उन्हें बड़ा प्रिय लगा। उन्होंने सोचा कि वाह! मेरे तप की धूम तो, यहाँ तक भी सबके हृदय में गूँज रही है।? देवऋर्षि नारद जी ने एक-एक कर सबका हाल पूछा। उनसे निर्वत हो, देवऋर्षि नारद जी राजा के महलों में गए। वहाँ भी उनका, राजा के द्वारा विधिवत् सम्मान हुआ। केवल सम्मान ही नहीं, अपितु राजा द्वारा उनकी पूजा भी की गई। राजा ने देवऋर्षि नारद जी को सबसे उत्तम आसन पर बिठाया। बस पिफ़र क्या था, देवऋर्षि नारद जी तो बन गए पूरी सभी के ‘हीरो’-

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‘मुनि कौतुकी नगर तेहि गयऊ।

पुरबासिन्ह सब पूछत भयऊ।।

सुनि सब चरित भूपगृहँ आए।

करि पूजा नृप मुनि बैठाए।।’

नगर के संपूर्ण नर-नारी देवऋर्षि नारद जी को ही निहार रहे थे। यह देख देवऋर्षि नारद जी को अतिअंत प्रसन्नता हो रही थी। समस्त नगर वासियों में से प्रत्येक व्यक्ति यहाँ उपस्थित था। बस एक विश्वमोहिनी राजकुमारी ही ऐसी थी, जो अभी तक देवऋर्षि नारद जी के दर्शनों हेतु नहीं पधारी थी। लेकिन देखिए, वह घड़ी भी आन पहुँची, जब यह घोषणा होती है कि राजकुमारी विश्वमोहिनी देवऋर्षि नारद जी के दर्शनों हेतु पधार रही हैं।

राजकुमारी विश्वमोहिनी के रूप सौंदर्य का प्रभाव, देवऋर्षि नारद जी के मन पर क्या पड़ता है, जानेंगे अगले अंक में---(क्रमशः)---जय श्रीराम।

-सुखी भारती

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