Jan Gan Man: CJI रहते हुए Chandrachud का झुकाव क्या सचमुच मोदी सरकार की ओर था? Justice Kaul के आरोपों से क्या संदेश मिल रहा है?

By नीरज कुमार दुबे | Oct 27, 2026

न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर छिड़ी बहस अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट से निकलकर सियासत के अखाड़े में पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल ने अपनी किताब में पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। संजय किशन कौल का आरोप है कि न्यायिक नियुक्तियों के मामले में चंद्रचूड़ केंद्र सरकार के प्रति जरूरत से ज्यादा नरम थे। इन आरोपों पर चंद्रचूड़ की सफाई के बीच भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस के शासनकाल में न्यायपालिका की भूमिका और न्यायाधीशों की नियुक्तियों के पुराने विवादों को उठाकर पलटवार किया है। इस तरह अब सवाल इस बात का भी है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर उपदेश देने वाली सियासत अपने अतीत के सवालों का सामना करने को कितनी तैयार है।

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कौल ने यह भी दावा किया कि कॉलेजियम द्वारा सुझाए गए नामों को मंजूरी देने में केंद्र सरकार की कथित चयनात्मक नीति पर सवाल उठाने वाली उनकी पीठ से एक मामला बाद में हटा लिया गया। नवंबर 2023 में उनकी पीठ ने कॉलेजियम की सिफारिशों पर कार्रवाई में देरी को लेकर केंद्र से सवाल किए थे। कौल के मुताबिक, न्यायिक नियुक्तियों से जुड़े इस मामले का अचानक दूसरी पीठ के पास जाना उन्हें सबसे अधिक परेशान करने वाली घटनाओं में से एक लगा। उन्होंने न्यायिक कार्यवाही के संदर्भ में धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) से जुड़े फैसले पर पुनर्विचार के सवाल का मामला भी दूसरी पीठ के समक्ष पहुंचने पर आपत्ति जताई।

हालांकि, इन आरोपों पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने अलग पक्ष रखा है। उन्होंने कहा कि कौल की पुस्तक पढ़े बिना उसके संदर्भ में विस्तृत प्रतिक्रिया देना उचित नहीं होगा। चंद्रचूड़ के अनुसार, उनके कार्यकाल में कॉलेजियम की बैठकें सौहार्दपूर्ण माहौल में हुईं और नियुक्तियों से संबंधित प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किए गए। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें ऐसी किसी घटना की याद नहीं है, जिसमें जस्टिस कौल कॉलेजियम की बैठक से उठकर चले गए हों। इस तरह दोनों पूर्व न्यायाधीशों के बयानों ने नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता और संस्थागत संवाद को लेकर बहस को और गहरा कर दिया है।

दूसरी ओर, इसी विवाद के बीच भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. सुधांशु त्रिवेदी के राजनीतिक जवाब ने बहस को एक नया आयाम दिया है। उनका सवाल यह है कि यदि न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर चर्चा हो रही है, तो इसकी कसौटी सभी राजनीतिक दलों और सभी सरकारों के लिए समान क्यों नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश की ओर से सोशल मीडिया पर किये गये पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि जयराम जी फिर बग़ैर किसी आधिकारिक दस्तावेज़ के कहानियों के आधार पर ‘निर्देशित होकर’ ज्ञान बाँटना शुरू मत कीजिये। उन्होंने लिखा है कि अगर कहानियों की ही बात करनी है तो दिल्ली के गलियारे में यह बहुत चर्चित कहानियाँ थी की आपके ही शासनकाल में न्यायाधीशों की नियुक्ति कैसे हुआ करती थी, उन कहानियों पर अपनी याददाश्त ताज़ा कर लीजिये। डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने लिखा है कि कहा जाता है कि उस दौर मैं चुनिंदा नामों की सूची पहले अहमद पटेल के पास जाती थी। वहाँ कथित तौर पर न्यायिक योग्यता से अधिक विचार इस सवाल पर होता था कि “ये हमारे लिए क्या करेंगे?'' उन्होंने लिखा है कि कहानियों की माने तो इसके बाद कुछ नामों पर सहमति बनती थी। ये नाम तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास पहुँचते थे। वहाँ से सोनिया गांधी की राय ली जाती थी और फिर नामों को अंतिम रूप दिया जाता था। उन्होंने लिखा है, ''अब कुछ सीधे सवाल हैं, जिनका जवाब शायद आपकी याददाश्त से गायब हो गया है पर देश की याददाश्त में है।'' उन्होंने पूछा है कि आप बतायें कि अहमद पटेल और सोनिया गांधी किस संवैधानिक पद पर बैठी थीं कि किसी भी सरकारी प्रक्रिया में उनकी कोई भूमिका हो। क्या न्यायाधीशों के नामों जैसे गंभीर विषय पर उनकी स्वीकृति में उनकी कोई भी भूमिका थी या नहीं? क्या इस कहानी को सच माना जाए।

डॉ. सुधांशु त्रिवेदी आगे लिखते हैं, ''बड़ी विचित्र बात है कि तीन न्यायाधीशों की वरिष्ठता को दरकिनार कर मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने वाले व Committed Judiciary की बात करने वाले आज न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर लंबे-लंबे प्रवचन दिए जा रहे हैं, लेकिन अपने शासनकाल की नियुक्तियों को लेकर उठने वाले इन सवालों पर चर्चा तक नहीं होती।'' उन्होंने आगे लिखा, ''आपने तो कहानी बताई जिसका कोई आधिकारिक दस्तावेज़ न्यायालय में या सरकारी अभिलेखों में नहीं है। लेकिन मैं आपको याद दिलाता हूँ जो सरकारी अभिलेख और न्यायालय के दस्तावेज़ में है। आपने 1967-68 में एक ऐसे व्यक्ति को भारत का मुख्य न्यायाधीश बनाया था जिसके पास कानून की डिग्री ही नहीं थी। यह थे भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे जस्टिस कैलाशनाथ वांचू।'' उन्होंने पूछा है कि क्या आप देश को बता सकते हैं कि है कौन-सी योग्यता थी जिससे उस समय तमाम बेहतरीन कानूनी डिग्री रखने वाले जजों की बजाय एक ऐसे व्यक्ति को भारत के मुख्य न्यायाधीश बना गया जिस के पास कानून की डिग्री ही नहीं थी। उन्होंने लिखा कि यह कोई किताब या अख़बार में छपी हुई कहानी नहीं बल्कि भारत के आधिकारिक दस्तावेज़ और सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्ति की औपचारिक कहानी है। डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने कहा है कि दूसरों को संवैधानिक मर्यादा का पाठ पढ़ाने से पहले इन गंभीर आरोपों का जवाब भी दीजिए।

दूसरी ओर, इस पूरे विवाद का मूल प्रश्न किसी एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश की कार्यशैली तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में कॉलेजियम की स्वायत्तता कितनी प्रभावी है, सरकार के साथ संवाद की सीमा क्या होनी चाहिए और नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए कौन-से संस्थागत सुधार जरूरी हैं। यहां यह भी काबिलेगौर है कि जस्टिस कौल ने स्वयं कॉलेजियम व्यवस्था को अपूर्ण बताया है और स्वीकार किया है कि यह राजनीतिक दबावों से पूरी तरह अलग नहीं रह सकती। वहीं, चंद्रचूड़ की प्रतिक्रिया बताती है कि आरोपों के संदर्भ और उनकी व्याख्या पर मतभेद हैं। ऐसे में इस विवाद को केवल भाजपा बनाम कांग्रेस या एक न्यायाधीश बनाम दूसरे न्यायाधीश के रूप में देखना अधूरा होगा।

बहरहाल, राजनीतिक बयानबाजी के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर बहस सिद्धांतों के आधार पर होगी या फिर सत्ता पक्ष और विपक्ष अपने-अपने सुविधाजनक इतिहास के सहारे एक-दूसरे को कठघरे में खड़ा करते रहेंगे। न्यायपालिका की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है कि आरोपों की जांच प्रमाणों के आधार पर हो, नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी बने और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता किसी भी दल की राजनीतिक सुविधा पर निर्भर न रहे।

-नीरज कुमार दुबे

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